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18 अप्रैल, 2024 को हुए बोध प्रत्यूषा सत्र से।
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Transcript
00:00महावीर बरसों तक बताते रहे मुझे जाना है, उनके घरवाले जाने न दे, यहां दोनों कथाओं में बड़ी भिन्नता है,
00:05दोनों राजपुरुष थे, तो जाके बोले जाने तो पोले नहीं अभी रुख जाओ, अभी पिताव रिद्ध है, तो ऐसा जाने
00:11तीन बार जाने
00:26कि यह जा चुका है, यह लड़का अब है नहीं, हमने इसकी देह को ही रोक लिया है, क्योंकि हमारा
00:31इससे रिष्टा देह का है, और इसी के नाते यह हमारी आग्या लिये भी न जान नहीं रहा है, क्योंकि
00:36इसकी देह पर हमारा अधिकार है, यह देह से हाँ है, लेकिन इसकी
00:40चेतना जा चुकी है, ये मन से याँ का भै नहीं, रोकते रोकते रोकते जब घरालों को सफष्ट हो गया
00:45कि रोकने से कुछ होगा नहीं, ये तो जा चुका है, उड़ गया, तुन्हों निका तुम जा,
00:48कुल मिलाकर बात ये कि देह का रिण तो चुकाना पड़ता है, और मात्र अपने परिवार के प्रते नहीं, समस्त
00:56जगत के प्रते.
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