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For Baloch youth, Eid celebrations are incomplete without the traditional Balochi shalwar. Known for its unique style, loose design, and cultural elegance, the Balochi shalwar is more than just clothing — it is a symbol of heritage, pride, and identity. Every Eid, young people across Balochistan proudly wear beautifully stitched Balochi dresses, keeping centuries-old traditions alive while adding modern fashion trends to their festive look.

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00:00खुश्यामदेद, आज के इस वजाहती जाइजे में हम बलोची लिबास की उन तह तक जाएंगे जो आम तोर पर हमारी
00:07नजरों से छुपी रहती हैं।
00:10आज हम सीधा इन मलबुसात की उस हैरत अंगेज जिसामत और उनके अंदर छुपे राजों की बात करेंगे जो वाकई
00:19दंग कर देने वाले हैं।
00:24हाल ही में ईद के मौके पर बलोचिस्तान में एक 40 फुट घेरे वाली रिवायती बुख्ती शलवार ने पूरे मीडिया
00:31पर सब की तवज्जों हासल कर ली।
00:33चालीस फुट ये सिर्फ एक कपड़ा नहीं है बलके जिस्मानी लिहास से एक बिलकुल हिरत अंगेज तखलीक है।
00:40इन अजीम मलबूसात का वजूद ही अपने आप में एक अलग किसम का जोश पैदा करता है।
00:45पहला हिस्सा बलोचिस्तान का लिबास अब हम थोड़ा आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि इस अजीम लिबास की तयारी
00:53में आखिर मेहनत कितनी लगती है।
00:56एक आम रिवायती बलोची शलवार की चोड़ाई यकीन मानिये हैरान अंगेज तोर पर एक सो इंच तक होती है।
01:03एक सो इंच? ज़र तसवर किया जाए इस एक सूट को मुकमल करने के लिए आठ मीटर तक का कपड़ा
01:09दरकार होता है।
01:10ये हमारे किसी भी आम लिवास के मुकाबले में कई गोना ज्यादा है। है ना है रान कुन बात?
01:16और अगर हम सज़ाद टेलरिंग मास्टर के बताए हुए सिलाई के मरहले देखें तो ये दरासल एक पूरा फन है।
01:23सबसे पहले पांच से आठ मीटर कपड़ा काटा जाता है। फिर वो इंतहाई चोड़ाई पैदा करने के लिए चार कल्यों
01:30को आपस में जोडते हैं।
01:56मर्दों के लिबास की इस बड़ी जिसामत से निकल कर अब हम खवातीन के रिवाईती लिबास की इंतहाई बारीक और
02:03पेचीदा कशीदा कारी की तरफ आते हैं जिसे पाशाख कहा जाता है।
02:07अगर इस पाशाख को करीब से देखा जाए ना तो इसमें शीशे का इंतहाई बारीक काम, रेशम और उन के
02:14धागे, हैंटसी अशकाल और फूलों के शानदार नमूने शामिल होते हैं।
02:18इन को गले, दामन, आस्तीन और शलवार के पैंचों पर सजाया जाता है।
02:22यह हाथ से की जाने वाली कशीदाकारी दिन रात के मुसलसल मेहनत के बाद कई दिनों में जाकर तेयार होती
02:28है।
02:28यह सिर्फ पहनने की कोई आम सी चीज़ नहीं है, दरसल यह फन, खुशी और कुवत बरदाश्ट को जाहिर करने
02:35वाला एक चलता फिरता कैन्वस है।
02:37और मज़े की बात यह है कि यह कदीम रिवायती फन आज के जदीद ई-कॉमर्स के दोर में दराज
02:43जैसे प्लाटफॉर्म्स पर भी अपनी जगा बना चुका है।
03:07तीसरा हिस्सा, सिकाफ्ती आइसबर्ग
03:10और ये शानदार तरीके से वाज़े करता है कि कपड़ों के जाहिरी खुबसूर्ती से आगे बढ़कर अब लिबास की उन
03:18समाजी गहराईों में उतर के देखने का वक्त आ गया है।
03:37इससे पुशीदा मानी छुपे होते हैं जिनें समझना वाकई बेहत जरूरी है।
03:42इस छुपी हुई दुन्या को समझने के लिए सेमियोटिक्स यानि इल्म अलामतियात की थोड़ी सी समझ होनी चाहिए।
03:49ये दरसल किसी भी सकाफत में निशानात, अलामतों के इस्तमाल और उनकी तशरी का इल्म होता है।
03:56आगे चलकर इस जाइजे में यही इल्म हमारे लिए एक डीकोडर रिंग यानि एक ऐसी चाबी का काम करेगा जिससे
04:02हम इन लिबासों की दरसल हकीकत को समझ पाएंगे।
04:05चौथा हिस्सा अलामतों को समझना।
04:09तो चलिए अब उन मखसूस पुशीदा पेगामात का जाइजा लेते हैं जो आम बलोची लबास में बुने हुए हैं।
04:15मिसाल के तॉट पर टर्बन यानि पगड़ी का रंग ये महज कोई फैशन या पसंद का इन्तिखाब नहीं होता।
04:22मरी कबीले में सफैद रंग दरसल घजैनी हिस्से को जाहिर करता है।
04:27काला रंग बिंजारनी को और सुर्मई रंग लोहारानी कबीले के लोगों की पहचान है।
04:32कबाईली जिर्गों और फैसले की मजलिसों में ये पगड़ी इज्जत वकार और जिम्मधारी की एक इंतहाई एहम अलामत मानी जाती
04:41है।
04:41और बात सिर्फ रंग की नहीं हैं पगड़ी बांधने के अंदाज में भी बहुत गहरे मानी चुपे हैं।
04:47एक बच्चे या किसी कबाईली बुजर्ग की सीधी और बिल्कुल रस्मी पगड़ी का मवाजना किसी नौजवान की थोड़ी सी तिर्ची
04:55पगड़ी से किया जाए।
04:56ये तिर्चापन और उसके नीचे चुपी टूपी का जान बूज कर थोड़ा सा दिखाई देना ये दरसल जोश, जिन्दगी की
05:04चमक और महबबत जैसे जज़बात को बयान करता है।
05:26और इसमें हैरान कुन बात ये है कि जब कबीले पर कोई गम या दुक का वक्त आता है न,
05:31तो इस मुड़ी हुई दाड़ी को वाज़े तोर पर फौरण खोल दिया जाता है, ताके गम का इज़ार हो सके।
05:37खवातीन की सजावट में भी अलामतियात का एक बिलकुल अलग पहलो नज़र आता है।
05:42तोख यानि गले का च्छला और जेवर मखसूस तोर पर सिर्फ शादी शुदा खवातीन के लिए मुकरर है।
05:48इसके बिलकुल बारक्स मेंधी की खास चोटी खालसतन एक गेर शादी शुदा लड़की की अलामत है।
05:55और शादी के वक्त इस चोटी को खोलने का एक बाकाइदा और एहम रिवाज मौजूद है जो एक बड़े स्टेटिस
06:00चेंज को जाहर करता है।
06:31यहां एक और एहम अलामत दिखते हैं।
06:32यहां वाकई इंतहाई दिलचस्प है कि कबीले की इन गहरी रिवायात ने वक्त के गुजरने के साथ साथ एक वसी
06:39गौमी शनाख्त की बुन्याद कैसे रखी।
06:41इस लबास के सफर की टाइम लाइन को ही देख लें।
06:44दस्वी सदी में ये सहरा में गर्मी और रेट से बचने के लिए खाना बदोशु का सिर्फ एक अमली लबास
06:49था।
06:50फिर उन्निस्वी सदी के बरतानवी दोर में इसकी कशीदा कारी ने समाजी और सकाफती मुजाहमत की शकल इक्तियार कर ली।
06:57और आखिर में उन्निस सु सिंतालीस के बाद से ये सीधा पाकिस्तान की कौमी शनाख्त और इत्तिहाद का मरकज बन
07:03गया।
07:04तो यहां जो सबसे एहम नुक्ता है वो बिलकुल वो ही है जो इस तजजिये में बयान किया गया है।
07:09यहां ने उस अजीम बलूची शलवार को लिया, उसके घेरे को थोड़ा कम किया, कमीस की लंबाई में थोड़ा इजाफा
07:15किया और इस तरह एक खुबसूरत, बावकार और आम फहम कौमी लिबास तशकील पा गया।
07:21यह दरसल हमारी कसीर उस सकाफ़ती सुसाइटी में मुख्तलिफ रिवायात के इतिहाद यानि यूनिटी इन डिवर्सिटी की एक बहतरीन मिसाल
07:29है।
07:29इसलिए अगली मरतबा जब भी कोई आम या रिवायती लिबास हमारे सामने आए तो हमें सिर्फ कपड़े या उसके डिजाइन
07:37तक महदूद नहीं रहना चाहिए।
07:59झाल झाल झाल झाल
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