00:28खुश्याम देद
00:31जिहां हाजी मुहम्मद आलम चन्ना ने 1982 से लेकर 1998 तक दुनिया के सबसे तवील उलकामत जिन्दा इनसान का गिनिस
00:40वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम रखा।
00:42साथ फुट आठ हिंच का कदना किसी भी आम इनसानी तसवर से वाकई बहुत बहुत बढ़ा है।
00:49हिस्सा पहला सिंद का अजीम शख्स और सहवान की गल्यों में उनकी आम सी शुरूआ है।
00:54तो कहानी शुरू होती है 1953 के आसपास सहवान के एक इंतहाई गरीब सिंधी घराने से।
01:00माली हालात इतने सख्त थे कि वो बच्पन में कोई बाकाइदा तालीम ही हासल नहीं कर पाए।
01:06और जानते हैं उन्होंने अपनी अमली जिंदगी कहां से शुरू की किसी बड़ी नौकरी से नहीं बलके साड़े छेसु साल
01:11पुराने सूफी बुजर्ग हजरत लाल शहबाज गलंदर के मजार पर वहां वो एक खादिम और खाक रूप के तौर पर
01:18काम करते थे।
01:19यही वो जगा थी जहां उन्हें सुकून मिलता था और यह मजार उनकी अपनी सकाफ़त और अकीदे से गहरी वाबस्तगी
01:25को जाहर करता है।
01:49उनकी वजा क्या थी? तिब भी माहरीन बताते हैं कि उनके पिट्यूट्री ग्लैंड में एक ट्यूमर बन गया था जिसने
01:54उनकी जिस्मानी साख़त को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया।
01:57हिस्सा दूसरा मजर से सरकस तक का सफर और वो माशी मजबूरी जिसने उन्हें रोशनियों की तरफ ढखेला।
02:05अब साल आता है 1978 ये उनकी जिन्दगी का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट था। एक टोरिंग सरकस के मालिक की
02:13नजर उन पर पड़ी जब वो मजार पर सफाई कर रहे थे। और उसने एक ऐसी पेशकश की जिसने रातो
02:20रात उनकी दुन्या ही बदल दी।
02:22इसे ऐसे समझ ये मजार पर उन्हें हफ़ते के सिफ पंदरा रुपे मिलते थे जो उस वक तकरीबन डेड़ डॉलर
02:28बनता था। और सरकस में वहां उन्हें महाना 160 रुपे की पेशकश हुई। एक गरीब और माशी तंगदस्ती के शिकार
02:35इनसान के लिए ये आमदनी एक ब
02:51करते और अपने कंदों पर बिठा लेते थे। बस इस सादा से मजाहिया एक्ट ने पूरे सिंध के दिलों में
02:57ऐसी जगा बनाई कि वो देखते ही देखते एक मकामी सिलेबरिटी बन गए। लेकिन शोहरत सिर्फ सिंध तक महदूत थोड़ी
03:04रही। 1981 में किसी फैन ने उनकी
03:07तस्वीर गिनिस वर्ल्ड रेकर्ड्स वालों को भेज दी। फिर क्या था गिनिस की ओफिशल्स ने खुद सहवान आकर उनका कद
03:13नापा और अलम चन्ना दुन्या भर में मशूर हो गए। इस फेम की वज़ा से उन्होंने गलोबल टूर्स किये जरा
03:20सोचे लंडन की डबल �
03:21पर बसों को आराम से उपर से चुना और टोकियो में उनका शानदार इस्तक्बाल ये सब उनकी आलमी मकबूलियत का
03:28बिलकुल वाज़ सुबूत था।
03:51और जानते हैं उन्होंने क्या किया उन्होंने वो अच्छे पैसों वाली सरकस की नौकरी छोड़ने का इंतहाई हिम्मत भरा फैसला
03:58कर लिया। अवामी नजरों से बचने और अपना सुकून वापस पाने के लिए वो चुप चाप दुबारा उसी मजार पर
04:04अपनी वोही कम
04:05आमदनी वाली सफाई की नौकरी पर वापस आ गए। ये थी उनकी असली सादगी।
04:10हिस्सा चौथा एक अजीम सकाफती अलामत जब किसी का कद एक इस्तारा यानि मेटफर बन जाए। अब हम आते हैं
04:181985 की रिपब्लिक डे परेड पर। उस वक्त के मिलिटरी डिक्टेटर जेनरल जिया उलहक को अलम चन्ना को एक खुसूसी
04:26अवोर्ड देना था और तमगा प
04:40अब भी जिया को छोटा समझता है। हम यहां किसी सियासी बहस में नहीं पढ़ रहे हैं लेकिन ये देखना
04:45जरूरी है कि किस तरहां प्रेस ने अलम चन्ना की लंबी जिस्मानी साखत को उनकी अपनी मर्जी के बगेर ही
04:51सियासी मकासिद के लिए इस्तिमाल कर लिया। हिस्स
05:07के साथ उनके तिबी मसायल मसलसल बढ़ते गए। उसी पिटियोटरी ग्लैंट के ट्यूमर ने मजीद परेशानिया खड़ी कर दी। उन्हें
05:15बलड प्रेशर का शदीद आर्जा लाहक हो गया और आखिरकार उनके गुर्दे मुकमल तोर पर काम करना चोड़ गए। नाइ�
05:29और इनी हालात में एक बहुत ही तल्ख हकीकत सामने आई। इतनी आलमी शोहरत के बावजूद मकामी एस्पतालों में उनके
05:38बारे गद के मताबिक बन्यादी आलात यहां तक के ऑपरेशन टेबल्स भी मौजूद नहीं थे। एपी आर्काइफ की फुटिज में
05:45एक डॉक्�
05:49यानि सिर्फ पचास से साट एमेल का हो चुका था और बदकिस्मती से अस्पताल में इतने बड़े कद के शख्स
05:55की सरजरी के लिए मुनासिब सर्जिकल एक्विप्मेंट ही दस्तियाब नहीं थे। यह मशूर होने के बावजूद बेबसी की एक इंतहाई
06:03बड़ी मिसाल थ
06:17लेकिन जैसा हमने बताया 1998 में सिहत मुकमल तौर पर गिर गई। हुकूमत ने आखरकार उनके इलाज के लिए उन्हें
06:27अमेरिका भेजा। मगर बदकिस्मती से 2 जुलाई 1998 को सिर्फ 45 साल की छोटी उमर में न्यू यॉक के एक
06:36अस्पताल में कोमा के हालत में वो इस दुनिय
06:43का इख्तिताम इस सबसे एहम सवाल पर होता है जब कोई शक्स सिर्फ एक आम और सादा जिन्दगी गुजारना चाहता
06:49हो तो ऐसी गैर मामूली शोहरत की असली कीमत आखिर क्या होती है।
07:13अब इस बारे में जरूर सोचेगा।
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