00:00गाडी में पेटरोल बिल्कुल शून्य के बराबर सुई दिखा रही थी
00:04वो एक के बाद एक सढक में इधर भी देख रहे ही किदर पेटरोल पंप
00:08वो बढ़ते जा रहे आगे आगे पर भी चरही वे थी चरही वे
00:29चरही वेती, चरही वेती, अरे मुरक तुम चल इसलिए रहे थे ताकि उस जगह तक पहुँच पाओ, अब वहाँ पहुच
00:36गए हो, अभी भी खोशते रहोगे क्या, अब रुको, पर नहीं हमें तो चलना है, चलने में कोई बुराई है,
00:41हाँ चलने में बुराई है, कि आगे �
00:43पाओगे, वही था जो तुम्हें आगे चलने की शक्त्य और इंधन देता, और तो मुझसे आगे निकल गए, अब चलने
00:49ही पाओगे, तारी यात्रा मनजिल तक पहुचने के लिए होती है, मनजिल से आगे बढ़ जाने के लिए नहीं होती,
00:54और मनजिल से आगे हम इसलिए �
00:56बढ़ते कि हम खूजी हैं, मनजल से आगे हम क्यों बढ़ते हैं, क्योंकि हम भोगी हैं, जितना जरूरी है कहीं
01:02सर न जुकाना, उतना ही जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है, कि ये जुके भी, जहा जुकना चाहिए
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