तालाबों में उगने वाली जलकुंभी को असम की महिलाओं ने रोजगार का जरिया बना लिया. इसको सुखाकर हैंडबैग, बैग, टेबल कवर और टोपियां और कालीन जैसे सामान बना रहीं हैं .इस बेकार पौधे को अपनी आजीविका, स्थायित्व और गौरव का स्रोत बना लिया है.इस काम को शुरू करने वाली महिला का नाम पूर्णिमा बोरगोहेन है. जो शिवसागर जिले की रहनेवाली हैं. पूर्णिमा की ये यात्रा 2009 में शुरू हुई. जब उन्होंने डिब्रूगढ़ में जलकुंभी शिल्प की ट्रेनिंग ली. अपने स्किल को निखारने के लिए 2011 में अहमदाबाद गईं. मास्टर ट्रेनर बनकर लौटीं. महिलाओं को ट्रेनिंग देना शुरू किया. इस काम को सीखकर हजारों महिलाएं आत्मनिर्भर बन रहीं हैं.इन महिलाओं ने जलकुंभी से सामान बनाकर प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर पेश किया है. पर्यावरण जागरुकता का संदेश दे रही हैं. साथ ही ग्रामीण भारत की महिलाओं के सशक्तिकरण की कहानी कह रही हैं.
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