00:00बहुत दिनों पहले की बात है
00:02एक विक्रम सिंग नाम का प्रजाहित तक्ष राजा
00:06मेधावती नामक नगर पर राज्य करता था
00:09एक बार विक्रम सिंग ने एक बड़ा यज्य किया
00:13उस यज्य से प्रसन होकर एक देव गंधर्व उस अगनी से पाहर आकर बोला
00:20राजा मैं तुम्हारे यज्य से बहुत प्रसन हूँ
00:24मैं तुम्हे एक जादूई आईना भेट करता हूँ
00:28इसकी खुबी यह है कि जिस किसी चीज का प्रतिपिम उस पर पड़ेगा
00:33वह चीज सो गुना हो जाएगी
00:36इसलिए इसे बहुत सावधानी से पुयोग मिलाना
00:40और जब जरूरत नहीं हो तो एक बीले वस्तर से उसे ठीक से ढख कर रख दिया करना
00:48ऐसा कहकर वह देव गंधर्व लूपत हो गया
00:52राजा विक्रम सिंग ने उस आईने की परिक्षा करने हे थू एक सोने की मुहर उस आईने के सामने रख दी
00:59और आश्चर्य की बात ये कि उस एक स्वर्णमुद्रा की सो स्वर्णमुद्राय हो गयी
01:05राजा विक्रम सिंग को बहुत संतोष हुआ
01:09पर राजा विक्रम सिंग लालची नहीं था
01:12उसने वह आईना उसके कोशागार में सावधानी से पीले कपड़े से ठक्कर रख दिया
01:19उसने उस आईने का अपने स्वार्थ के लिए कभी भी दुरूपयोग नहीं किया
01:25एक बार मेधावती राज पर संकट आया
01:29पड़ोस के राजा भैरो सिंग ने उसकी बहुत सारी सेना लेकर मेधावती राज पर हमला कर दिया
01:36राजा विक्रम सिंग के सैइन्य ने बहुत पुर्शार्थ किया पर भैरो सिंग के सेना के आगे उसका बल कम पढ़ रहा था
01:45विक्रम सिंग चिंतित हो गया कि अब करे तो क्या करे उतने भी उसे जादूई आईना याद आया
01:53उसने अपने कोशागार से वह जादूई आईना बाहर निकाला और उसके सामने उसने अपनी तलवार रख दी
02:00तो क्या अश्चरिय उसके एक तलवार से सो तलवारे बन गई फिर उसने एक घोड़े को आईने के सामने रखा तो एक घोड़े से सो घोड़े बन गए
02:12फिर उसने एक साइनिक को आईने के सामने खड़ा कर दिया तो उस एक साइनिक जैसे और सो साइनिक वहाँ पर निर्मान हो गये
02:22इस तरह उस युद्ध को जीतने के लिए राजा विक्रम सिंग ने पूरी युद्ध सामगरी उस आईने की मदद से निर्मान कर ली और उसने बैरो सिंग को पूर्ण रूप से हरा दिया
02:34और मेधावती राज पूर्ण रूप से संकत मुख्त और खुशाल हो गया
02:40बच्चों हमें इस कहानी से ये सीख मिलती है कि अपने पास उपलब्ध साधनों का उपयोग होशियारी से और बिना स्वार्थ अपना कर्तव निभाने के लिए जरूर करना चाहिए