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इस एपिसोड में देखिए कैसे तारकासुर ने अपनी अंतिम शक्तियों का आह्वान किया और कार्तिकेय के साथ हुए पहले भीषण संघर्ष का रहस्य! स्कंद पुराण के इस अद्भुत अध्याय में देव और असुर सेनाओं के बीच छिड़ी महासंग्राम की पहली झलक। क्या कार्तिकेय का अस्त्र तारकासुर के मायाजाल को भेद पाएगा? देखिए स्कंद पुराण का यह रोमांचक अध्याय! #SkandaPurana #Kartikeya #Tarakasura #HinduMythology #DevasurSangram #AncientIndia #SpiritualHistory #HindiMythology
Transcript
00:00हिमालय की गगन्चुम्बी चोटियों पर बस्ते देवदुन्दुभी के नाद ने समस्त ब्रहमांड को कमपायमान कर दिया है
00:08भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से युद्ध के शंखनाद को स्वीकारते हुए देव सेना के शौर्य का अवलोकन किया
00:30किरने युद्ध के आगमन का साक्षात प्रमान दे रही है
00:35देवराज इंद्र ने कार्तिके के नेत्रित्व में एक जुठ होकर अपनी वजर्शक्ती का आहवान किया
00:42भगवान शिव कैलाश की एकांत शान्ती में बैठे हुए अपने पुत्र के पराक्रम का गुप रूप से निरीच्षन कर रहे
00:49हैं
00:51कार्तिके के संकेट मिलते ही देव सेना के अगरिम दस्ते ने अपनी दिव्यगदाओं और धनुशों के साथ मोर्चा संभाल लिया
01:01पहाडों की चोटियों पर बिखरा सन्नाटा अब युद्ध के गर्जन में परिवर्तित हो रहा है
01:07तारकासुर के मायावी दूतों ने दूर से इस स्वर्निम सेना को देख कर आतंकित होकर अपना रुख मोड लिया
01:15ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल का छिड़काव करके धर्म की रक्षा के लिए इस युद्ध को आशिरवाद
01:23दिया
01:24कार्तिके के मयूर वाहन परवाणी ने अपने पंक फैला कर समूची परवत श्रिंखला को रंगीन आभा से भर दिया
01:33हिम्पात के बीच में खड़ा यह दिव्य मोर्चा किसी भी असुर शक्ती को भस्म करने के लिए तयार है
01:41असुरों के खेमे में मची हल्चल कार्तिके की शक्ती के भय का प्रत्यक्ष परिनाम है
01:48नारद मुनी ने अपनी वीना की जंकार से आकाश में विजय का संदेश गूंजित कर दिया
01:55कार्तिके के तेज से प्रभावित होकर प्रकृती ने भी अपनी मौन चुप्पी त्याग कर युद्ध के संगीत में साथ दिया
02:03धैर्य और शौर्य का ऐसा संगम आज से पहले देवलोक में कभी नहीं देखा गया था
02:10हिमाले की गहरी गुफाओं में बैठे रिशियों ने भी शंक बजाकर इस धर्म युद्ध का समर्थन किया
02:18भगवान विश्णु के गरूर ने आकाश में मंदराते हुए असुरों के गुप्त माया जाल को अपनी तेज द्रिश्टी से पहचान
02:25लिया
02:27कार्तिके का प्रत्येक कदम धर्ती को कम्पित कर रहा है जैसे साक्षात विजय आगे बढ़ रही हो
02:34युद्ध का बिगुल बस चुका है और अब ब्रह्मांड इस अध्वितिय संधर्ष की चरम परिंती देखने के लिए प्रतीक्षारत है
02:43तारकासुर ने अपनी हथेली पर विशैले धुए का आहवान किया जो देखते ही देखते रनभूमी के उपर एक धने प्राणधा
02:51तक कोहरे के रूप में फैल गया
02:54भगवान विश्णु ने गरूर की पीट से उस मायावी धुंध को देखा और अपने सुदर्षन चक्र को सक्रिय करते हुए
03:02देव सेना को सचेत किया
03:05धुंध के अंदर से निकले असुरों के गुप माया जाल के कारण देव सैनिकों की द्रिष्टी क्षीन होने लगी और
03:12उनमें भय का संचार हो गया
03:15ब्रहमांड की शान्ती को चीरते हुए वह काला कोहरा आत्माओं की शक्ती सोखने के लिए एक महाकाय चक्रवात की तरह
03:23घूमने लगा
03:25कार्तिके ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से भांप लिया कि यह कोहरा मात्र प्रकृती नहीं बलकि दानवी माया का एक भयानक
03:33शड्यंत्र है
03:35देवराज इंद्र ने अपने वजर को धारण किया लेकिन मायावी धुन्ध के कारण वे दिशाहीन होकर केवल शूनी में प्रहार
03:43कर रहे थे
03:45असुरों के काले जादू का प्रभाव इतना गहरा था कि देवताओं के शस्त्रों की चमक धीरे-धीरे मध्धम पड़ने लगी
03:53आकाश में गरूर ने अपने विशाल पंखों को फड़फडाया जिससे उत्पन्वायुवेग ने उस घने कोहरे में एक शनिक दरार पैदा
04:02कर दी
04:03कोहरे के उस पार से तारकासुर की राक्षसी अटहास पूरे ब्रहमांड को कम्पित करने लगी जिसे सुनकर देवताओं का संकल्प
04:11डग्मगाने लगा
04:14भगवान शिव ने अपनी समाधी से आखें खोली और उनके तीसरे नेत्र से एक मंद अगनी पुँझ निकलकर कार्तिके की
04:22ओर बढ़ा
04:23उस दिव्य अगनी के स्पर्ष से देवताओं के शस्त्रों में पुनह प्रान फूंक दिये गए और उनकी कांती लोट आई
04:32कार्तिके ने अपने वेल को उपर उठाया जो अब साक्षात ब्रह्मांडिय उर्जा का सुरोत बनकर चमक रहा था
04:40तारकासुर ने अपनी माया का स्तर बढ़ाते हुए कोहरे में से विशैले कीटों की एक सेना उत्पन्न कर दी
04:49देवगन अब उस कीटों के आक्रमन से जूज रहे थे जहां उनकी तलवारे मायावी जींगुरों को नश्ट करने में अक्षम
04:56सिद्ध हो रही थी
04:59कार्तिके की गती इतनी तीवर थी कि उनकी उपस्थिती ही उस मायावी कीटों के दल को भस्म करने लगी
05:07अंधकार और प्रकाश का यह संधर्ष एक ऐसे बिंदु पर आपहुचा था जहां प्रकृती के नियम भी स्तब्ध थे
05:16तारकासुर ने अपनी पूरी शक्ती का उप्योग करते हुए उस कोहरे को और भी अधिक सघन और विशैला बना दिया
05:23इस संकड के समय कार्तिकेय ने अपने मयूर परावानी को आहूत किया जिसने अपनी पंखों की फड़फडाहट से उस विशैले
05:32जाल को चीरना शुरू कर दिया
05:35पूरे ब्रहमांड ने देखा कि कैसे कार्तिकेय की शक्ती के आगे दानवी माया का सामराज जढहने लगा था
05:43युद्ध का यह चरण अब निर्नायत मोर पर था जहां कार्तिकेय ने स्वयं को एक प्रल्यंकारी योधा के रूप में
05:50सिध्ध कर दिया था
05:53कार्तिकेय ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से तारकासुर के रक्षाधेरे की निर्बल कडियों को भांप लिया और अग्निदेव का स्मरण कर
06:00ब्रहमांडिय शिखा को प्रजवलित किया
06:04भगवान विश्णू ने क्षीर सागर के अपने शांत लोक से यह द्रिष्ट देखा और मुस्कुराते हुए अपने सुदर्शन चक्र को
06:12युध की दिशा में संकेट के रूप में घुमाया
06:16जैसे ही अग्नी की लप्टे तारकासुर के माया जाल से टक्राई वैसे ही डानवी भ्रम के परदे फटने लगे और
06:23शत्रू की सैन्य व्यूह रचना उजागर हो गई
06:27युध क्षेत्र के उपर आकाश में नक्षत्रों ने अपनी स्थिती बदली और कार्तिके के आदेशानुसार देव सेना के लिए विजय
06:35का मार प्रशस्त किया
06:38विस्त्रत रणभूमी में अब कार्तिके का मयूर परावानी एक प्रचन्ड अगनिचकर की भानती घूम रहा था जो हर ओर दानवी
06:46माया का भस्म कर रहा था
06:49देवराज इंद्र ने कार्तिके की इस अध्भूत रणनीतिक कौशल को देख कर अपना मस्तक श्रद्धा से जुकाया और स्वय युद्ध
06:57में उतरने का निरने लिया
07:00कार्तिकेय ने अपने सैनेकों को नक्षत्रों के संरेखन का पालन करने का संकेत दिया, जिससे देव सेना एक वजर की
07:08भांती शत्रू की रक्षा पंक्ती को भेदने के लिए तैयार हो गई
07:13दानवी शक्तियों का वह काला धुआ, जो अब तक रनभूमी को ढके हुए था, कार्तिकेय की अगनी से टक्रा कर
07:20राख के धेर में परिवर्तित हो गया
07:23पूरे ब्रहमांड में कार्तिकेय की इस रननीतिक श्रेष्ठता की गूँच सुनाई दी, जिसे सुनकर असुरों के हृदय में पहली बार
07:31मृत्यु का भहे उत्पन हुआ
07:34शिवजी ने कैलाश के शिखर से अपने पुत्र की विजय यात्रा को आशिरवाद दिया और वहां के हिमपात में भी
07:41एक दिव्य उश्मा का अनुभव हुआ
07:45रणनीती के इस निनायक चरण में कार्तिके ने शत्रु के सेनापती को सीधे चुनोती देते हुए अपनी दिव्य शक्ती का
07:52केंद्र एक बिंदु पर केंद्रित कर दिया
07:56वातावर्ण में तैर्ती हुई गंधत की दुरगंध अब कार्तिके की दिव्य सुगंध से विस्थापित होने लगी थी, जिससे रणभूमी का
08:04वातावर्ण शुद्ध हो गया
08:06शत्रु की व्यू रचना जो अभी तक अभेद्य लग रही थी, अब कार्तिके की बुध्धिमत्ता के सामने रेट के महल
08:13की भांती ढहने लगी थी
08:16कार्तिके ने युद्ध के मैदान में एक नई उर्जा का संचार किया, जिससे पराजित होते देवताओं में भी अदमे साहस
08:24का उदे हुआ
08:26युद्ध का हर एक क्षन कार्तिके की योजना के अनुरूप बीत रहा था, मानोकाल स्वय उनके इशारों पर नाच रहा
08:34हो
08:36प्रल्यंकारी शक्तियों के बीच कार्तिके की शांती ही उनका सबसे बड़ा अस्त्र सिद्ध हो रही थी, जिसने तारकासुर के तंत्र
08:44को जड़ से हिला दिया
08:46तारकासुर के मायावी रक्षकों का दल जो अब तक अंधकार की ओट में छिपा था
08:51कार्तिके के तेज के सामने नगन होकर अपनी रक्षाहीन स्थिती में आ गया
08:58देवताओं के सेनापती ने एक बार पुनह अपनी हुंकार भरी जो युद्ध के मैदान की सीमाओं को पार कर ब्रहमांड
09:05के हर कोने में गुंजूठी
09:08कार्तिके की टैक्टिकल दक्षता के कारण असुरों की विशाल सेना अब बिखर कर रनक्षेत्र में इधर उधर भागने को मजबूर
09:16हो गई
09:18ब्रहमांड धर्रा उठा था क्योंकी कार्तिके का यह प्रहार केवल एक सैनिक आक्रमन नहीं बलकि दानवी अहंकार के अंत की
09:26उद्गोशना थी
09:28तारकासुर के भयानक सेनाप्ती अपने काले रथों पर सवार होकर रौरव नरक्की दहक्ती हुई ज्वालाओं के बीच से युद्ध के
09:36मैदान की ओर बिजली की गती से आगे बढ़े
09:40युद्ध की विभीशिका को अपने त्रिनेत्र से निहारते हुए भगवान शिव ने एक गंभीर मुद्रा में भगवान विश्णू की ओर
09:48संकेत किया जैसे वे प्रलय के आरंभ को देख रहे हुँ
09:53असुरों के क्रूर सेनाप्तियों ने अचानक अपनी रणनीती बदलते हुए एक तीक्षन पंजरी चाल अपनाई जिससे देवताओं की सैन्य व्यवस्था
10:02में हल्चल मच गई
10:04रौरव के नर्किये वातावर्ण में उठते हुए काले धुएं और भीशन अगनी के स्तंभों के बीच दानवी अहंकार और दैविय
10:12मर्यादा का यह युद्ध एक भयावध द्रिश उत्पन्न कर रहा था
10:17अचानक गणों की एक विशाल तोली अपने आराध्यकार्तिके के आदेशानुसार चट्टानों के समान अडिक खड़ी हो गई और असुरों के
10:26वेग को थाम लिया
10:29भगवान विश्णू ने अपनी गदा को उठाकर देवताओं को संबोधित करते हुए कहा कि सत्य की शक्ती ही इस अधर्म
10:36के विनाश का एक मात्र माध्यम है
10:40गणों के महाबली नेता ने एक भीशन हुंकार भरी और अपनी गदा से असुरों के प्रथम रत को चकनाचूर कर
10:47दिया
10:49नरक की दहकती हुई खाईया गवाह बनी जब देवताओं और असुरों के शस्त्रों के टकराने से ब्रहमांड में गड़गडाहट पैदा
10:57हुई
10:58तारकासुर के सेनापती अपनी क्रूर हंसी के साथ आगे बढ़े उनकी भुजाओं पर लिप्टे विशैले नागों ने अगनी के बीच
11:06से रास्ता बनाया
11:08गनों ने अपनी ढालों को एक साथ जोड कर एक अभेद्य सुरक्षा चक्र बनाया जिसे देखकर असुरों की सेना कुछ
11:16क्षन के लिए ठिठक गई
11:19धूल और राख के गुबार में छिपे असुरों ने अपने गुप्ट अस्त्रों का प्रयोग किया जिससे रनभूमी का वातावर्ण और
11:26भी विशाक्त हो गया
11:28शिव का तेज उन गणों के शरीरों पर एक सुरक्षा कवच बनकर चमकने लगा जिससे वे असुरों के विशैले अस्त्रों
11:36से अप्रभावित रहे
11:39कार्तिकेय ने अपने वीर सैनिकों को आगे बढ़ने का संकेत दिया उनकी आग्या पाकर गणों का क्रोध ज्वाला बनकर असुरों
11:47पर बरसने लगा
11:49भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद रिष्टी से रणक्षेत्र की हलचल को देखा और ब्रहमांडिय संतुलन बनाये रखने के लिए अपनी
11:57शंक ध्वनी का आहवान किया
12:00शंक की उस भीशन गर्जना ने असुरों के कान के परदे फार दिये और उनके रचे गए मायावी जाल को
12:07छिन भिन कर दिया
12:09असुर सेनाप्ती अपनी विफलता को देख कर क्रोध से भर उठा और उसने अपने विशाल खड़ से गणों की अग्रिम
12:17पंती पर घातक प्रहार किया
12:20गणों ने भी हार न मानते हुए अपने दिव्य अस्त्रों का प्रयोग किया जिससे रणक्षेत्र का कोना-कोना प्रकाश और
12:27अंधकार के द्वंद्व से भर गया
12:30असुरों का अहंकार उस समयध है गया जब उन्होंने देखा कि उनकी संख्यात्मक श्रिष्ठता के बावजूद गणों का संकल्प अडिग
12:38है
12:40ब्रहमांड के रक्षक और विनाशक के गणों के बीच का यह संघर्ष अब अपने चरम बिंदु पर पहुँच चुका था
12:47जहां केवल विजय ही एक मात्र लक्षे था
12:51इस रक्तरंजित युद्ध के मध्य में कार्तिके की अद्रिष उर्जा गणों को बार-बार शक्ती प्रदान कर रही थी जिससे
12:59वे असुरों के प्रत्येक प्रहार को विफल कर रहे थे
13:03रनभूमी के केंद्र में भगवान कार्तिके ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से उन विशाक्त अस्त्रों को पहचाना जो असुरों ने मायावी जाल
13:12की तरह फैला रखे थे
13:14महादेव ने अपनी तीसरी आख के एक सुक्षम अंश से कार्तिके का मार्ग दर्शन किया जिससे वे अस्त्रविद्या के गूढ
13:22रहसियों को प्रकट कर सके
13:25कार्तिकेय ने अपनी अंगुलियों के संकेतों से अगने आस्त्र का आहवान किया, जिसने असुरों द्वारा छोड़े गए विशैले बानों को
13:33क्षण भर में भस्न कर दिया
13:36आकाश में अगनी की एक प्रचंड लपट उभी, जो उस भयावा अंधकार को चीरते हुए दैट्य सेना के मध्य एक
13:44सुरक्षा घेरा बनाने लगी
13:47कार्तिके ने अपने गणों को संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक अस्त्र केवल शस्त्र नहीं, बलकि ब्रहमांडिय संतुलन का एक
13:55अंश है
13:57भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ इस ज्ञान के प्रसार को देखा, क्योंकि वे जानते थे कि असुरों
14:05का मायाजाल अब अंत की ओर है
14:08गणों ने कार्तिके द्वारा सिखाये गए वरुनास्त्र का प्रयोग कर उन मायावी छायास्त्रों को शीतल जल्धारा में परिवर्तित कर शांत
14:17कर दिया
14:19युद्ध का वातावर्ण अब असुरों के पक्ष से निकल कर देवों की रणनीतिक कुशल्ता के अधीन हो गया था
14:26कार्तिकेये ने एक और मंत्र का उच्चारण किया, जिससे वायव्यास्त्र ने असुरों के जहरीले धुए को एक ही जोके में
14:34दूर फेंक दिया
14:36दैथ्य सेनाप्ती इस अप्रत्याशित शक्ती को देख स्तब्ध थे, क्योंकि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि देव इतनी तीवरता से
14:44अपनी विद्याओं का प्रयोग करेंगे
14:48गणों की एक टुकडी ने कार्तिके की आग्या का पालन करते हुए अस्त्रों को एक धाल के रूप में परिनत
14:54किया, जिसने असुरों के प्रत्येक हमले को शूने कर दिया
14:59पूरे ब्रहमांड में कार्तिके के इस अस्त्रसंचालन की गूंच सुनाई दी, मानोस्वयं प्रकृती उनकी विजय का उद्गोश कर रही हो
15:09कार्तिके ने अब एक और शक्तिशाली अस्त्र का संधान किया, जो असुरों की गुप्त शक्तियों को खोजने में सक्षम था
15:17भगवान शिव ने अपनी स्वीकृती में अपना मस्तक जुकाया क्योंकि कार्तिकेय ने अस्त्रविद्या के माध्यम से न केवल युद्ध जीता
15:26बल्कि अनुशासन भी स्थापित किया
15:29जैसे ही वह अस्त्र असुरों के मायावी ठिकानों से टकराया उनकी सभी अद्रिश बाधाएं भस्म होकर धुआ बन गई
15:38अब रणभू में असुरों के छिपने का स्थान नहीं बल्कि उनके पतन का साक्षी बन रही थी
15:46कार्तिकेय ने एक गरज्टी हुई आवाज में कहा कि छल और विश से अरजित शक्ती कभी भी धर्म के तेज
15:53के सामने नहीं टिक सकती
15:55देवों की सेना में एक नई उर्जा का संचार हुआ उन्होंने अपनी तलवारें उठाई और असुरों की ओर एक निरनायक
16:03प्रहार करने के लिए आगे बढ़े
16:06असुर अपनी पराजय को देखते हुए अब घबराकर पीछे हटने लगे उनकी मायावी विद्याएं कार्तिके के संकल्प के आगे पूरी
16:15तरह निश्प्रभावी हो चुकी थी
16:18ब्रहमांड के इस कोने में अस्त्रविद्या के सही प्रयोग ने युद्ध की दिशा बदल दी थी और तारकासुर के अंत
16:25की शुरुवात हो गई थी
16:28तारकासुर अपने विशाल काले रत पर खड़ा होकर युद्ध के मैदान की दैनिय स्थिती को निहार रहा था जहां उसके
16:36अजे युद्धा धूल चटाए जा रहे थे
16:39भगवान विश्णु ने अपने शेशनात पर विराजित होकर एक दिव्यद रिष्टी से युद्ध की विभीशिका को देखा और शांत स्वर
16:47में गरूर को संकेत दिया
16:50तारकासुर ने क्रोध में आकर अपने सबसे शक्तिशाली सेनाप्ती को आदेश दिया कि वह कार्तिके की ओर मायावी अगनी के
16:58गोले फेंके
17:00ब्रहमांड के इस भयावह रौरव क्षेत्र में आसमान का रंगधुएं और असुरों के पतन के कारण गहरा लाल और काला
17:08पड़ गया था
17:10कार्तिके की शक्ती के आगे तारकासुर के तंत्रमंत्र सब विफल हो रहे थे जिससे उसका अहंकार अंदर तक हिल चुका
17:18था
17:19विश्नु का शांत चहरा युद्ध की भीशंता के बीच भी स्थिर्ता का प्रतीक बना हुआ था, मानों वे आने वाले
17:27परिणाम को पहले से जानते हूँ
17:30तारकासुर ने एक विक्राल हुंकार भरी और अपने मायावी शस्त्रागार से काले लोहे के त्रिशूलों की वर्षा कार्तीके की सेना
17:38पर करवा दी
17:40अंधेरे और अगनी से भरा यह रौरव का धरातल अब असुरों के असहाय क्रंदन और असुरों की हार का मुख
17:47गवाह बन चुका था
17:50कार्तीके ने अपने दिव्य शस्त्रों के प्रहार से तारकासुर की माया को क्षन भर में चीर कर रख दिया
17:57भगवान शिव अपनी समाधी में कार्तीके की विजय का आभास पाकर एक मंद मुस्कान के साथ स्थिर बैठे रहे
18:06तारकासुर ने अपने रत के पहियों को नीचे की ओर धनसा हुआ देखा जैसे पूरी धर्ती ही उसका साथ छोड़
18:13रही हो
18:15वातावर्ण में गूंजती असुरों की चीखें तारकासुर के कानों में एक अप्रिय संगीत की तरह बज रही थी जिससे उसका
18:23क्रोध और बढ़ गया
18:25ब्रहमांड के इस कोने में तारकासुर के अस्त्रों का प्रभाव अब केवल उसकी अपनी निराशा को बढ़ाने का साधन बनकर
18:33रह गया था
18:35भगवान विश्णु ने अपनी उंगलियों के सुख्ष्म संकेतों से कार्तिके को युद्ध के उस निरनायक बिंदु की ओर संकेत किया
18:43जहां तारकासुर खड़ा था
18:46रनभूमी के पत्थर कार्तिके के तेज से काम प्रहे थे और तारकासुर की सेना को कहीं भी शरण नहीं मिल
18:53रही थी
18:54अंधकार के इस राज्य में तारकासुर का रत अब एक पिंजरे की भांती लगने लगा था जहां वह स्वय ही
19:02अपने अहंकार का कैदी बन गया था
19:05कार्तिके ने अपने संकल्प की शक्ती से युद्ध की दिशा बदल दी थी जिससे असुरों का साहस जड़ से उखड
19:12गया
19:14शिव का त्रिशूल दूर हिमालय पर अपनी चमक बिखेर रहा था जो की आने वाले प्रलय का स्पष्ट संकेत था
19:22तारकासुर ने अपनी तलवार खीचते हुए एक अंतिम प्रयास में कार्तिके की ओर ललकारने का साहस किया जबकि उसके हाथ
19:31कांप रहे थे
19:33पूरे ब्रहमांड की धड़कने रुक्सी गई थी क्योंकि अब कार्तिके और तारकासुर के बीच का यह संधर्ष अपने अंतिम चरण
19:41में प्रवेश कर चुका था
19:44आकाश के विस्तार में सुवर्णमे रथों का वेग बिजली की गती से बढ़ रहा था
19:49मानो नक्षत्रों का समूह युद्ध के लिए उतर आया हो
19:53विश्नु भगवान ने अपने गरूर पर आरूड होकर युद्ध की गंभीरता को देखते हुए सुदर्षन चक्र को सक्रिय किया
20:01उनका मुखमंडल गंभीर और अटल था
20:05कार्तिकेय ने अपने दैविय भाले को अंतरिक्ष में घुमाया जिससे घर्षन से निटली अगनी ने बादलों को स्वर्णमी बना दिया
20:14ब्रहमांड के इस महा संग्राम में देव और असुरों के अस्त्रों का मिलन एक ऐसी अगनी उत्पन्न कर रहा था
20:21जो पूरे आकाश को दाहक रंगों से भर रही थी
20:26तारकासुर के भयानक दैट्य सेनाप्ती अपनी काली सेनाओं के साथ बादलों की ओट से अचानक प्रकट होकर देवों पर तूट
20:34पड़े
20:35भगवान शिव अपने ध्यान की मुद्रा में हिमालय की उची चोटी पर स्थित होकर भी अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस युद्ध
20:43के प्रत्येक क्षण को नियंत्रित कर रहे थे
20:46गरुर के पंखों की फड़फडाहट से उत्पनवायु वेग ने असुरों के रथों को दिशाहीन कर दिया जिससे वे आपस में
20:54टकरा कर गिरने लगे
20:56अंधकार और प्रकाश का यह अद्भुत संगम संपून ब्रहमांड की धुरी को हिला रहा था
21:03कार्तिके की शक्ती से प्रभावित होकर देवराज इंद्र ने वजर का आहवान किया जो बिजली की गड़गराहट के साथ असुरों
21:12की व्यूह रचना को भेदने लगा
21:14विश्नु भगवान ने अपनी शंक ध्वनी से आकाश को गुंजाय मान कर दिया जिससे असुरों के कानों में भयंकर पीड़ा
21:22उत्पन हुई
21:24असुरों का सेनाप्ती तारकासुर का सबसे शक्तिशाली योध्धा अपनी गड़ा लेकर कार्तिके की और एक धातक प्रहार करने के लिए
21:33लबका
21:34पूरे आकाश में जलती हुई गडाओं और दिव्यतीरों के कारण अगनी वर्षा जैसा द्रिश उपस्थित हो गया था
21:43कार्तिके ने पलक जपकते ही अपनी गती से उस योध्धा को परास्त कर दिया और उसका रत चकनाचूर हो गया
21:51तारकासूर यह द्रिश देख क्रोध से पागल हो उठा और उसने स्वयं को युद्ध के केंद्र में धकेल दिया
21:59उसकी उपस्थिती से आकाश में एक काली चाया चा गई जो बादलों के बीच अपनी भयावता फैला रही थी
22:08कार्तिके और तारकासूर के बीच का यह प्रत्यक्ष सामना संपून ब्रहमांड के लिए एक निर्नायक मोर साबित होने वाला था
22:17देवराज इंद्र और अन्य देवतागन कार्तिके के साहस को देखकर विस्मय और आशा से भरे हुए थे
22:25असुरों की सेना ने एक बार फिर से संगठित होकर कार्तिके पर हमला किया लेकिन इस बार कार्तिके के दिव्यतेज
22:33ने उन्हें पीछे धकेल दिया
22:36आकाश के एक छोर से दूसरे छोर तक युद्ध की प्रतिध्वनी गूँज रही थी जो स्रिष्टी के अंतिम सक्त्य को
22:44पुकार रही थी
22:45अब समय आ गया था कि कार्तिके अपनी अंतिम शक्ती का प्रयोग करें जिससे ब्रहमांड का तंत्र सदैव के लिए
22:53बदल जाए
23:05अपनी योग निद्रा से जाग कर ब्रहमांडिय संतुलन के उस छिपे हुए सूत्र को प्रकट किया जो तारकासुर के अंकार
23:13की नीम को हिलाने वाला था
23:16कार्तिके के हृदय में उन कर्मों का लेखा जोखा तैरने लगा जिन्हें तारकासुर ने अपनी कुरूरता से अपने भाग्य की
23:24लकीरों में लिखा था
23:26आकाश के फलक पर एक दिव्य आलेक उभराया जो यह स्मरन दिला रहा था कि विधी का विधान किसी भी
23:34वर्दान की सीमा से परे होता है
23:37ब्रहमांड के इस सुक्ष्म तंत्र में कार्तिके को उन सभी आत्माओं का करोन क्रंदन सुनाई दिया जिन्हें तारकासुर ने अपनी
23:45सत्ता के नशे में कुछला था
23:48स्वयं देवर्शी नारद ने प्रकट होकर उस शाप की व्याख्या की जो तारकासुर के वर्दान को धीरे धीरे भीतर से
23:56खोखला कर रहा था
23:58प्रत्येक असुर के द्वारा किया गया अधर्म कार्तिके की शक्ती के सामने एक पत्थर की भांती भारी होता जा रहा
24:06था
24:07यह ब्रह्मान्दिय संतुलन का वहक्षन था, जहां न्याय और अन्याय का तुलादंड अपनी अंतिम दिशा चुनने के लिए तैयार था
24:17तारकासुर का वह अखंड वर्दान जिसे वह अजे समझता था, अब उसके अपने ही पापों के बोज तले दबने लगा
24:24था
24:26देवराज इंद्र ने भी अपनी सभा में उस प्रकाश को देखा, जिसने असुरों के गड़ में अंधकार की दिवारों को
24:33ध्वस्त करना शुरू कर दिया था
24:36कार्तिकेय ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से यह पहचान लिया कि असुरों का अहमकार ही उनकी सबसे बड़ी दुर्बलता बन चुका है
24:46आकाश गंगा के नक्षत्र भी उस परिवर्तन को साक्षी मान रहे थे, जहा कर्म के फल का उदे सुनिश्चित हो
24:53रहा था
24:55कार्तिकेय का तेज अब केवल अस्त्रों का नहीं, बल्कि सत्य के उस न्याय का प्रतिनिधित्व कर रहा था जिसे टाला
25:02नहीं जा सकता
25:04भगवान शिव ने अपनी समाधी से एक संकेत दिया, जिसने ब्रहमांड के हर पर्मानु में हलचल पैदा कर दी
25:13कार्तिकेय के भीतर की शक्ती का विस्तार अब पूरे आकाश को अपने दिव्य आवर्ण में लपेट चुका था
25:20ब्रहमांड के इस तंत्र में अब केवल धर्म का विजय गोश शेश था, जिसे कोई वर्दान नहीं रोक सकता था
25:28असुरों की सेना के भीतर वह भय व्याप्थ हो गया, जो उनकी अजे होने की भ्रान्ती को क्षण भर में
25:35नश्ट कर गया
25:37कार्तिकेय का प्रत्येक पच्चाप स्रिष्टी के अंतिम सत्य की प्रतिध्वनी के रूप में गूज रहा था
25:44समय का वह चक्र अब तारकासुर की ओर मुर्चुका था, जिसे रोकने वाला अब कोई देवता या दानव नहीं था
25:53अंतिम युद्ध का उद्गोश हो चुका था और कार्तिकेय ने अपने तेज से ब्रहमांड को सत्य के मार्प पर लाने
26:00का संकल्त लिया
26:02कार्तिकेय के रनभूमी में प्रवेश करते ही मारावरव के अंधकार्मय शिखरों पर जमी राख की परतें बिजली की कौंध की
26:10तरह थर्थराने लगी
26:12भगवाण विश्णु ने अपनी योग माया से देखा कि कार्तिकेय के आगमन मातर से ही असुरों की मायावी दृष्टी का
26:20जाल दिखरने लगा है
26:23कार्तिके ने अपने दैविय शक्ती के प्रवाह को जैसे ही धर्ती पर उतारा, वहां की जहरीली काली ज्वालाएं शान्त होकर
26:31एक नई जोती में बदल गई
26:34महाकाल का वह दिव्य पुत्र अपनी आभासे संपूर्ण माहरावरव के भयानक वातावर्ण को धर्म के सत्य से प्रकाशित करने लगा
26:43रनभूमी के चारों और व्याप्त शूलों के स्तंभ कार्तिकेय के तेज से पिघल कर धराशाई होने लगे, मानो सत्य के
26:51आगे असत्य जुक रहा हो
26:54देवराज इंद्र ने आकाश से यह द्रिश देखा और नत्मस्तक होकर उस दिव्य बालक के शौर्य को नमन किया
27:02कार्तिकेय ने अपने शक्तिधनुष को धारण किया, जिससे एक अलोकिक कमपन पूरे ब्रहमांड की सीमाओं तक अनुभव किया गया
27:10उनकी पच्चाप से माहरावरव की धर्ती में छिपी हुई असुरों की मायावी सुरंगे ध्वस्त हो गई और सब कुछ स्पष्ट
27:19दिखने लगा
27:21पूरे माहरावरव के आकाश में छाई हुई रक्तवर्नी धुंध कार्तिके के संकल्प की पवित्र हवा से छंटने लगी
27:29भगवान शिव अपने ध्यान की गहराई में मुस्कुरा उठे क्योंकि उन्हें पता था कि उनके पुत्र की शक्ती अब काल
27:37की गती को मोरने वाली है
27:40तारकासुर के भयानक योध्धा जो अब तक अपने छद्म भेश में छिपे थे कार्तिके के तेज से बेनकाब हो गए
27:49स्रिष्टी के उस परम सत्य का तेज कार्तिके के मुखमंडल पर एक ऐसे दिव्य ओज के रूप में चमक रहा
27:56था जिसे कोई दानव देख न सका
27:59माहरावरव की वह अतल गहराई जहां केवल मृत्यु का शासन था अब कार्तिके के पवित्र आगमन से जीवन्त होने लगी
28:09देवर्शी नारद ने वीना बजाते हुए आकाश से घोशनाकी की युगों की प्रतीक्षा अब अंत के समीप है
28:17कार्तिके की शक्ती का एक अंश धरा के उन स्थानों तक जा पहुँचा जहां असुरों ने अपने काले मंत्रों का
28:24गड़ बनाया था
28:26यह ब्रहमांड का वह दुलब ख्षन था जब शक्ती और धर्म का संगम एक बालक के स्वरूप में असुरों का
28:33काल बन खड़ा था
28:36तारकासुर की सेना के बड़े बड़े असुर सेनापती कार्तिके के तेज को देख अपनी तलवारें गिराने पर विवश हो गए
28:45कार्तिके ने अपने हाथों से एक दिव्य चक्र को प्रेरित किया जिसने पूरे युद्ध क्षेत्र को सत्य के सुरक्षा कवच
28:52में ढख लिया
28:54सत्य के उस कवच से असुरों के सभी मंत्र और तंत्र विफल होकर भस्म हो गए
29:00ब्रहमांड अब एक नए यूग की आहट महसूस कर रहा था जहां कार्तिके की विजय का अर्थ केवल असुरों का
29:08अंत नहीं धर्म की पुनरस्था अपना थी
29:12युद्धक्षेत्र के सन्नाटे में तारकासुर अपने प्राण बचाने हेतु क्रूर और तप्त रौरव नरक की उसकाली खाई की ओर भागा
29:20जहां अगनी की लप्टे आकाश को चूम रही थी
29:24भगवान विश्णु ने अपनी गरुड रूपी द्रिश्टी से उस असुर के पलायन को देखा और महादेव से संकेत की प्रतीक्षा
29:31में गंभीर मुद्राधारण की
29:34तारकासुर ने अपने विशाल शरीर को रौरव की दहक्ती हुई शिलाओं के बीच जुका लिया और तंत्रमंत्र के माध्यम से
29:42अपनी असुर शक्तियों को पुनरजीवित करने का घोर प्रयास प्रारंभ कर दिया
29:47उस नरक के गर्ब से निकलती काली धुने की लप्तें ब्रहमांड के संतुलन को चुनोती देने लगी, मानोस्वयम प्रकृती तारकासुर
29:56की दुष्टता पर शोक मना रही हो
29:59दूर कैलाश पर महादेव ने अपनी तीसरी आख से उस असुर के कुटिल अनुष्ठान को देख लिया और उनके मस्तक
30:07पर क्रोध की रेखाएं स्पष्ट हो गई
30:10शिव के गणों ने देखा कि महादेव ने समाधी से बाहर आकर अपने त्रिशूल को भूमी पर टिकाया, जिससे कैलाश
30:18का पूरा शिखर कमपन से भर उठा
30:21कैलाश के शिखरों से टकराती हुई गूंज ने स्वर्ग की सीमाओं को हिला दिया, जिससे सभी देवताओं को यह आभास
30:29हो गया कि अंत समय अत्यंत निकट आ चुका है
30:34ब्रह्मांड की शांती एक गहरे सन्नाटे में बदल गई, जहां हर क्षन तारकासुर की तंत्रशक्ती का विस्तार और कार्तिके के
30:42तेज का प्रतिक्षन बढ़ना स्पष्ट था
30:45नरक के उस अंधकार मै कक्ष में तारकासुर के शरीर से अब विशैली भाप निकलने लगी थी, जो उसकी आसुरी
30:53शक्ती के चरम सीमा तक पहुँचने का संकेट थी
30:57शिव ने नारत को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म की अगनी में तारकासुर के इस अहंकार का भस्म होना
31:04अब नेती का अनिवार्य सक्य बन चुका है
31:09नारत ने अपनी वीना के तार छेड़ कर कारतिके को वह संकेट भेजा, जिसे सुनकर देवताओं का सेनाप्ती रणभूमी की
31:17और पुनह प्रस्थान करने के लिए तत्पर हो गया
31:21ब्रहमांड की धारा अब निरनायक युद्ध के मोर पर आखड़ी हुई थी, जहां एक तरफ तारकासुर का पाताल तंत्र था
31:28और दूसरी तरफ कारतिके का देविय प्रकाश
31:32रौरव नरक की गहरायों में तारकासुर के सहायक असुर कामपने लगे क्योंकि उन्हें कारतिके की शक्ती का प्रचंड वेग महसूस
31:41होने लगा था
31:43तारकासुर ने अपनी गरजना से नरक की दीवारों को दहला दिया और एक विकृत मुस्कान के साथ अपने तंत्र का
31:50अंतिम प्रहार तयार करना शुरू किया
31:54असुर के हाथों से निकलते हुए काले त्रिशूल ने नरक की अगनी को और भी भयानक रूप दे दिया जिससे
32:01पूरा रौरव क्षेत्र कामप उठा
32:04ब्रहमांड के रक्षक देवताओं ने अपनी आखे बंद कर ली जैसे वे इस महाविनाश की अंतिम घड़ी को देखने का
32:11साहस नहीं जुटा पा रहे थे
32:14कार्तिकेय ने अपने मोर की सवारी पर आरूढ होकर उस युद्ध क्षेत्र की ओर उडान भरी जहां उनके आने से
32:22आकाश भी स्वर्णमय हो उठा
32:25कार्तिकेय के आगमन के साथ ही ब्रहमांड का धर्मधवच पुना फहराने लगा और असुरों के तंत्र का प्रभाव च्षीन होने
32:33लगा
32:34तारा का सुर ने उपर की ओर देखा और उसके चहरे की क्रूरता क्षन भर के लिए भय में बदल
32:40गई क्योंकि उसने स्वयां अंत को अपने सामने खड़े देखा
32:45युद्ध का यह अंतिन प्रहर अब सत्य और असत्य के बीच के उस महान मिलन का साक्षी बनने वाला था
32:52जिससे भविश्य की पूरी गाथा तय होनी थी
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