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In Episode 33 of Brahmavaivarta Purana, we explore the terrifying 'Zero Point' of the universe where time itself collapses. Narada Muni ventures into the unknown dimension beyond the reach of Brahma's laws to uncover why the cycle of creation has halted. Witness the cosmic mystery of the unraveling reality and the secret behind the cosmic instability. Subscribe for more divine Puranic secrets! #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #CosmicSecrets #HinduMythology #SanatanDharma #PuranicWisdom #CreationMyth #TimeLoop #VedPurana
Transcript
00:00नारद मुनी ने अनुभव किया कि ब्रहमांड की अनन्त दूरियों में व्याप्त गती अचानक एक ठहरे हुए शुने में विलीन
00:07हो गई है।
00:09नारद मुनी जिनकी आभा उनके मस्तक पर लगे श्वेट चंदन और दिव्य चमक से दमक रही है। इस अचेतन शुने
00:17में स्थिर्ता को देख कर विस्मित खड़े हैं।
00:21उनके हाथों में मौजूद वीना के तार भी अब किसी स्वर का संचार करने में असमर्थ थे, जैसे ध्वनी स्वयंकाल
00:28के साथ ही जम गई हो।
00:31शुनी की इस विशाल धूसर चादर के पीछे अवधूत की वह रहस्यमई चाया ब्रहमांड के आधार भूत नियमों को धीरे
00:39-धीरे मिटा रही है।
00:42ब्रहमांड के इस निरव कोने में नारत को आभास हुआ कि स्रिष्टी की स्पंदनशील हृदय गती किसी अद्रिश्य बंधन में
00:49जकडी गई है।
00:52नारत की द्रिष्टी दूरक्षितिच पर उस सूक्ष्म विचलन को ढूंड रही थी जिसने संपूर्ण अंतरिक्ष की गती को जड़ कर
00:59दिया है।
01:01वे अपनी दिव्यद्रिष्टी से काल की उन सूक्ष्म रेखाओं को देख पा रहे थे, जो अब आपस में उलचकर एक
01:09गांठ में बदल गई है।
01:24किन्तु शूने की निरवता ने उनके शब्दों को भी ध्वनियों के उस पार जाकर मिटा दिया।
01:30वेकुंठ में भगवान विश्णु अपनी शयन मुद्रा से उठकर इस बढ़ते हुए शूने के रहस्य को समझने का प्रयास कर
01:38रहे हैं।
01:40गरूर भी इस ठहरे हुए आकाश में अपनी विशाल पंखों को फड़फडाने में असमर्थ होकर स्थिर खड़ा है।
01:48अस्तित्व का आधार स्तंभ जो कभी गतिमान था, अब एक चित्रपट की भांती निर्जीव प्रतीत हो रहा है।
01:57नारद मुनी ने अनुभव किया कि ब्रहमांड के हर पर्मानु की धड़कन अवधूत के एक अलौकिक मौन में खो गई
02:04है।
02:06भगवान विश्णु का मस्तक धीरे से मुड़ा, जैसे उन्हें इस अग्रिश्य कालचकर के अवरोध की जड़का आभास हो गया हो।
02:15शुन्य बिंदु के भीतर स्थित समय की वह गांट अब एक काले चकर में बदल रही है, जो सब कुछ
02:22निगलने को ततपर है।
02:25अस्तित्व के इस चरम संकट को देख कर नारद के हृदय में भी पहली बार घबराहट के भाव उत्पन हुए
02:31हैं।
02:33ब्रहमांड के सभी आयाम अब इस थहरे हुए शुन्य के प्रती गुरुत्वाकर्शन की भांती खिंचे चले आ रहे हैं।
02:42नारद ने अपनी आखे मून्द ली और भगवान की शरण में जाने हेतु स्वयन को समाधी की गहराई में उतार
02:49लिया।
02:50शुन्य के भीतर भी भगवान विश्नु की वह मायामी उपस्थिती नारद के हृदय में एक प्रकाश पुन्च की भांती धधक
02:58उठी।
02:59काल के इस टकराते हुए शुन्य में विनाश और स्रिजन के बीच एक नई लड़ाई का सूत्रपात होने वाला है।
03:07ब्रहम लोग के स्वर्णमय शिखर पर ब्रहमा जी ने स्रिश्टी के पुनर्स्रिजन हेतु अपनी वैदिक रिचाओं का उच्चारण करना प्रारंभ
03:16किया।
03:17उनके मुख से निकले शब्ध हवा में तैरने के बजाए शुन्य में विलीन हो रहे थे। मानुस्वयं प्रकृती ने अपनी
03:25जड़ता का परिचय दे दिया हो।
03:28ब्रहमा ने अपनी दाएं भुजा उठाई और ब्रहमांड के आधार भूत तत्वों को संगठित करने की चेश्टा की परंतु पंच
03:36महाभूत स्थेर और निश्प्रान पड़े रहे।
03:39स्रिष्टी के निर्माता के चारों मुखों से निकलता हुआ दिव्य तेज धीरे-धीरे मध्धम पड़ने लगा और एक रहस्यमय अंधकार
03:47ने ब्रहम लोग को घेर लिया।
03:49ब्रहमा ने व्याकुल होकर अपनी आखें खोली और देखा कि उनकी स्रिजन शक्तियों के सूत्र काल की उलजी हुई रेखाओं
03:58में पूरी तरह से फंस चुके हैं।
04:01उनकी कापती हुई उंडलियों ने पुना मंत्रोचार किया, किन्तु इस बार उनके स्वर में वह आत्म विश्वास नहोकर एक अज्यात
04:10भय का संचार था।
04:12ब्रहमलोक की दिव्य सभाओं में रखी हुई वस्त्वे अपनी चमक हो रही थी, मानो अस्तित्व का मूल आधार ही अपना
04:20रंग त्याग रहा हो।
04:21एक भीशन सन्नाटा ब्रहमलोक में छा गया, जिसे केवल ब्रहमा की भारी और चिंतित होती हुई सांसों ने ही खंडित
04:29किया हुआ था।
04:31तभी ब्रहमांड की धुरी पर दबाव बढ़ा और ब्रहमा को लगा कि जैसे कोई अध्रिश शक्ती उनके स्रिजन के अधिकार
04:39को धीरे-धीरे छीन रही है।
04:42उन्होंने अपने अंतरग्रिश्टी से ब्रहमांड के उस हिस्से को देखा जहां काल का चक्र तूटा था और वहां उन्हें एक
04:50प्रचंड शून्यता का आभास हुआ।
04:53स्रिजन के विफल होते ही ब्रहम लोग की दीवारें कमपकमपाने लगी और वहां से देवशक्तियों का पलायन शुरू हो गया।
05:02ब्रहमां ने स्वयं को सन्यत करने का प्रयास किया लेकिन उनके भीतर उठ रही हलचल ने उनकी समाधी को पूर्णता
05:10खंडित कर दिया था।
05:12शुने के भीतर से आती हुई तरंगों ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब यह केवल एक सामान्य व्यवधान नहीं
05:19बलकि काल का अंत है।
05:22ब्रह्मा ने भगवान विश्णु की छवी का आहवान करना चाहा पर उनकी ध्यानद्रिष्टी वहां तक पहुँचने में भी असफल सिद्ध
05:30हुई।
05:31आकाश के उन हिस्सों में जहां सितारे चमकते थे, वहां अब केवल राख और धुए का एक काला सामराज्य उभरने
05:39लगा था।
05:40समय का वह पहिया जो स्रिष्टी को चलाता था, वह अब उल्टा घूम रहा था, जिससे इतिहास की घटनाएं पुनरजीवित
05:49होकर टकराने लगी।
05:51ब्रहमा ने अपनी दसों उंगलियों से उस तूटते हुए ब्रहमांड को थामने का निश्वल प्रयास किया, पर उनकी शक्ती का
05:59स्तर लगातार घट रहा था।
06:01उनका मुकुट भी उस दबाव के कारण अपनी कांती खो बैठा और मस्तक पर पसीने की बूंदे एक नश्वर प्राणी
06:09के समान चमकने लगी।
06:12ब्रहमांड की हर एक इकाई अब अपने मूल शूने की ओर खिंची चली जा रही थी, जैसे कोई महासागर स्वय
06:20में सब कुछ समाहित करने की प्यास रखता हो।
06:24अंतह ब्रहमा जी ने यह स्विकार कर लिया कि स्रिष्टी का नया चक्र अब उनकी शक्ती से परे है और
06:31यह सब महाकाल की किसी अद्रिश्य इच्छा का परिनाम है।
06:36नारद मुनी ने उस शूने बिंदु की ओर द्रिष्टिपात किया, जहां समय की रेखाएं एक दूसरे को काटती हुई काच
06:43की तरह तूट रही थी।
06:46भगवान विश्णु ने अपनी गदा को थामते हुए उस विखंडित आकाश की ओर देखा, जहां उनके स्वयं के अंश भी
06:54काल के थपेडों से कमपायमान थे।
06:57अचानक उस शूने बिंदु से एक तीवर विध्युत तरंग निकली जिसने काल के पुराने अवशेशों को भस्म करना आरंभ कर
07:05दिया।
07:06काल चक्र के तूटने की गूंज एक भयावा गर्जना बनकर समस्त ब्रहमांड में व्याप्थ हो गई, मानो स्वयन नेती चीख
07:14रही हो।
07:15ब्रहमा जी ने अपनी शेश रही दिव्यद रिष्टी से देखा कि भविश्य के बीज इस शूने में जलकर राख हो
07:22रहे हैं।
07:35केंद्र में एक पारभासी परचाई उभर रही थी, जो न तो भूतकाल थी और नहीं भविश्य की आहट।
07:43शिव के डमरू की ध्वनी वहां के मौन को चीरती हुई गूंजी जैसे काल को पुनह लैबध करने का प्रयास
07:50किया जा रहा हो।
07:52पूरे ब्रहमांड में बिखरे हुए तारे उन तूटी हुई कालरे खाओं की और पतंगों के समान खिंचे चले आ रहे
07:59थे।
08:00भगवान विश्णू ने अपनी गदा से उस उर्जा के बहाव को रोकने का एक असफल प्रयास किया जिससे स्वर्णिम चिंगारियां
08:08चारों और बिखर गई।
08:11चिंगारियों के गिरते ही वहां का ग्रे रंग का वातावर्ण एक क्षण के लिए दिव्यस्वर्ण में परिवर्तित हो गया।
08:19ब्रहमांड के सभी देवता इस अद्रिश्य संधर्ष को देख कर मूख दर्शक बने रहने को विवश्ट थे।
08:25शून्य बिंदु का विस्तार इतना अधिक हो गया कि उसने काल के समस्त नियमों को अपने भीतर समाहित कर लिया।
08:34नारद मुनी को उस शून्य में स्वय अपने पूर्व जन्मों की प्रतिध्वनिया सुनाई देने लगी।
08:41उस बिंदु से एक ऐसा स्वर उभरा जो न तो ध्वन्यात्मक था और नहीं मौन्क बलकि वह स्वय ओम की
08:48एक आदिन गूम्ज थी।
08:51भगवान विश्णु ने समझ लिया कि यह शूने कोई विनाश नहीं बलकि एक नए स्रिजन की अनिवार्य कोख है।
08:59ब्रहमा जी के मस्तक से एक स्वेत प्रकाश पुंज निकला जो उस शूने में जाकर विलीन हो गया।
09:07काल के उन बिखरे हुए टुकडों ने उस प्रकाश पुंज को धारन किया और आपस में जुडने लगे।
09:14ब्रहमांड की कमपन थम गई और शूने बिंदु एक दिव्य द्वार में परिवर्तित हो गया।
09:21नारद मुनी ने उस द्वार के पार देखा, जहांसे उन्हें भविश्य की प्रथम किरण का आभास हुआ।
09:28नारद मुनी ने उस अज्यात आयाम की दहलीज पर कदम रखा, जहां शूने का सन्नाटा भी अनंत संगीत की तरह
09:36गूझ रहा था।
09:37विश्नु भगवान ने अपने शेशनाग शया से उठकर उस दिव्यस पंदन को अनुभव किया जो नारद के प्रवेश के साथ
09:45ही पूरे ब्रहमांड में फैल गया था।
09:48मुनी नारद ने देखा कि उस लोग के कणकण में समय का प्रवाह रुप गया है और प्रकाश की किरने
09:55स्थिर होकर मूर्तियों का रूप ले रही हैं।
09:59शुन्य बिंदु के चारों और की आकरितिया जैसे ही सजीव हुई। एक आदिम कमपन ने उस आयाम की सीमाओं को
10:07जखजोर कर रख दिया।
10:09नारद के अस्तित्व के साथ ही वह आयाम धीरे धीरे अपनी जीवन्त ताख होने लगा, जैसे कोई सोया हुआ दैत्य
10:17अचानक जाग उठा हो।
10:20कैलाश परवत पर शिवजी के त्रिशूल की चमक अचानक फीकी पड़ गई, जो इस बात का संकेत था कि उस
10:27अज्यात आयाम में काल का नियम तूट रहा है।
10:31नारद ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा ताकि उस शूने की शांती को भं करके वे समय की गती
10:37को फिर से दिशा दे सकें।
10:40पूरे आयाम में बिखरे हुए प्रकाश के उन टुकडों ने नारत की धुन के साथ तालमिल बिठाते हुए पुनरगठित होना
10:48शुरू किया।
10:49अज्यात आयाम के उस सूने आकाश में एक विराट महादवार प्रकट हुआ जिसके पार ब्रहमांड के निर्मान की प्राचीन स्मृतिया
10:58सुरक्षित थी।
11:00विश्नु भगवान की दृष्टी उस महादवार पर टिक गई क्योंकि उन्हें ग्यात था कि इसे खोलना अब सृष्टी के लिए
11:08अनिवार्य हो गया है।
11:10नारद ने अपनी चेतना को केंद्रित करके उस महादवार की कुंजियों को स्पर्ष किया जो अभी तक केवल निराकार उर्जा
11:19के रूप में थी।
11:21जैसे ही दवार के ताले खुले उस आयाम की स्थिर्टा भंग हो गई और समय की नदिया एक बार फिर
11:27से बहने लगी।
11:40शिवजी ने अपनी आखें खोली क्योंकि अब काल चक्र का वह विचलन मिट चुका था जो स्रिष्टी को निगलने वाला
11:47था।
11:49नारद के हृदय में वह दिव्यग्यान प्रविष्ठ हुआ जो उस आयाम के शून्य बिंदु की सबसे बड़ी उपलब्धी थी।
11:56स्रिष्टी के उस सुक्षम केंद्र में अब स्थिर्ता आचुकी थी, जहां भविष्य की किरने अपनी निश्चित दिशा में प्रवाहित हो
12:05रही थी।
12:06नारग मुनी ने उस स्थान से प्रस्थान किया, अपने पीछे उस अनंत आयाम को एक स्थिर स्मृती की तरह छोड़ते
12:14हुए।
12:15विष्णु भगवान ने एक मंद मुस्कान के साथ उस ब्रहमांडिय संतुलन को स्विकार किया, जिसे नारग की निडर्ता ने फिर
12:23से स्थापित किया था।
12:26समय की रेखाएं अब आपस में नहीं टकरा रही थी, बलकि एक लैबध नरित्य की तरह अपने मार्ग पर आगे
12:33बढ़ रही थी।
12:35ब्रहमांड के शूने बिंदु का रहस्य अब सुलच शुका था, और नारग के अनुभव से काल का चक्र एक बार
12:42फिर से अपनी पूरी गती के साथ चलने को तयार था।
12:46नारग मुनी ने उस असीम अंधकार में प्रवेश किया, जहां अस्तित्व के बीज कभी अंकुरित नहीं हो पाए और केवल
12:54मौन का सामराज्य था।
12:57महरशी नारद के चहरे पर विस्मय था क्योंकि उन्हें उन ब्रहमांडों की स्पंदन सुनाई दे रही थी जो नेती की
13:04भूल से काल के गर्भ में ही विलीन हो गए थे।
13:08शून्य बिंदु के केंद्र में एक पारभासी उर्जा पुन्च तैर रहा था, जो भविश्य और अतीत के उन खंडित टुक्डों
13:16को संजोए हुए था जिनका कोई गवाह नहीं था।
13:20चारों और फैली यह निर्वात की शांती उस महा विनाश की गूँच थी, जिसने स्रिष्टी के आरंभ होने से पहले
13:27ही उसकी संभावनाओं को मिटा दिया था।
13:30नारद ने अनुभव किया कि यह शूने केवल अभाव नहीं, बलकि एक अचेतन शक्ती का महासागर है, जो किसी भीक्षन
13:39पुनह जन्म लेने को आतुर है।
13:42तभी महर्शी के कानों में एक गुंजार सुनाई दी, जो उन अंगिनत आत्माओं की आह थी, जो कभी किसी शरीर
13:50को धारन करने में असमर्थ रही।
13:52अनंत की गहरायों में चमक्ती सुष्म रेखाएं नारद के सामने निरित्य करने लगी, जैसे वे किसी प्राचीन लिपी को बुन
14:01रही हो।
14:02यह वह स्थान था जहां समय का प्रभाव शूने था, और केवल चेतना ही अपने शुधतम रूप में विद्यमान थी।
14:10नारद मुनी ने देखा कि कैसे काल की रेखाएं यहां आकर ठहर जाती हैं और एक नए चक्र का आधार
14:18तयार करती हैं।
14:21ब्रह्मा जी की स्रिजन की व्यगरता यहां एक मंद प्रकाश के रूप में नारद को महसूस हो रही थी, जो
14:28शूने को भरने का प्रयत्न कर रही थी।
14:30प्रत्येक स्पंदन के साथ एक नया आयाम उत्पन होने का संकेट मिलता था, किन्तु वह पुना अंधकार में विलीन हो
14:39जाता था।
14:40इस विस्मयकारी द्रिश्य को देख नारद मुनी की वानी मौन हो गई और वे उस महान शक्ती के समक्ष नत्मस्तक
14:48हो गए।
14:50शूने बिंदु का तापमान अचानक बदलने लगा और वहा ठंडी नीली आभा के साथ एक नई उर्जा का प्रादुर्भाव होने
14:58लगा।
14:59नारद ने उस नीली आभा के भीतर कुछ आकरितिया देखी जो आने वाले युगों की रूपरेखा और भविश्य के देवताओं
15:07की परचाईया थी।
15:09वह उर्जा का प्रवाह तीवर हो गया और शूने बिंदु एक गर्जना के साथ काम उठा जैसे प्रलय के बाद
15:17का पहला शब्द गुंजा हो।
15:18यह ब्रह्मांडिय गर्जना उस सत्य की घोशना थी कि कोई भी उर्जा पूर्णता नश्ट नहीं होती, वह केवल अपना रूप
15:27बदलती है।
15:29नारद के चारों और की रेखाएं तेजी से घूमने लगी और उन्होंने स्वयं को समय के उस चक्र के भीतर
15:36घिरता हुआ पाया।
15:39वे अब उस आयाम का हिस्सा बन चुके थे जहां स्रिजन और विनाश एक ही सिक्के के दो पहलू थे।
15:47अचानक नारद ने उस अनाम शक्ती का अनुभव किया जो इस पूरे काल चक्र को अपनी इच्छा से संचालित कर
15:54रही थी।
15:55नारद के दिव्यनेत्र अब उस सत्य को देख पा रहे थे जिसे ब्रहमाभी केवल एक कलपना मानते थे, एक ऐसा
16:03ब्रहमांड जो आदी और अंत से परे हैं।
16:07नारद ने देखा कि कार्यकारण का शाश्वत सिध्धान्त एक काच की भांती चटक रहा है और ब्रहमांडिय लए बिखरने लगी
16:15है।
16:17नारद की व्याकुल द्रिष्टी ने भगवान विश्णु को देखा, जो शेशनाग की शया पर इस महाप्रलै के वेग को शांत
16:24करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र को सक्रिय कर रहे थे।
16:29अचानक भौतिक नियमों के ध्वस्त होने से वहां के सुनहरे कमल के पुष्प गलकर प्रकाश की बूंदों में परिवर्तित होने
16:37लगे।
16:38ब्रहमांड की स्थिर्टा का संतुलन खो जाने से एक अंजाना भयाव सन्नाटा छा गया जो समय के अस्तित्व को निगल
16:46रहा था।
16:47नारद ने उस शुन्य बिंदू की ओर हाथ बढ़ाया जहां से स्रिजन के मूल बीज पूरी तरहे से नश्ट होते
16:54हुए प्रतीत हो रहे थे।
16:57भगवान विश्णू ने गंभीर स्वर में कहा कि यदी यह बिंदू स्थिर नहीं हुआ तो आने वाले सभी युग केवल
17:04भ्रम और त्रुटियों का भंडार होंगे।
17:07नारद ने अपनी दिव्य वीना के तारों को छेडा ताकि ध्वनी की तरंगों से उस शून्य बिंदू की थर्थराहट को
17:14नियंत्रित किया जा सके।
17:16वीना की गूंच से रिक्ट स्थान में सुनहरे ज्यामितिय चक्र उभरने लगे जो ब्रहमांड की नीम को पुनह संरेखित कर
17:24रहे थे।
17:25विस्तरत ब्रहमांड के क्षितिच पर समय की रेखाएं आपस में टकरा कर चिंगारिया उत्पन कर रही थी, जिससे एक नया
17:34कालचकर निर्मित हो रहा था।
17:36भगवान विश्णु ने अपनी योगमाया का विस्तार किया, जिससे वह शून्य बिंदु एक जलते हुए सूर्य की भांती तेजस्वी हो
17:45उठा।
17:46नारद को अनुभव हुआ कि वह शून्य बिंदु केवल एक स्थान नहीं, बलकि एक चेतना है, जो स्वयन निर्माता की
17:54सांसों से जुड़ी है।
17:57शून्य बिंदु के चारों और एक सुरक्षा कवच का निर्मान हो रहा था, जो भविश्य की स्रिजन प्रक्रियाओं को तुरुटिहीन
18:04बनाने के लिए था।
18:07नारद ने अपनी साधना को और अधिक तीवर कर दिया, क्योंकि अब उन्हें काल के उस पार के सत्य को
18:13आत्म साथ करना था।
18:15भगवान विश्नु के सुदर्शन चक्र ने एक तीवर प्रकाश पुन्ष छोड़कर उस शून्य बिंदु के विकारों को भस्म कर दिया।
18:24पूरे ब्रहमांड में एक मधुर ध्वनी गूंजी जो संकेत दे रही थी कि काल का चक्र पुन्ह अपनी सही दिशा
18:32में लोट आया है।
18:34शून्य बिंदु की अस्थिर्ता समाप्थ हो गई और वहां से दिव्य अमरित की भांती स्रिजन की नई तरंगे फूटने लगी।
18:43नारद का शरीर दिव्य उर्जा से उतप्रोथ था क्योंकि उन्होंने उस सत्य को देख लिया था जिसे केवल स्रिष्टि करता
18:50ही जानते हैं।
18:53ब्रह्मांड की नीम अब उस शून्य बिंदु पर टिकी थी जिसे नारद ने अपने संगीत से पुनरजीवित कर दिया था।
19:02काल के टक्राने से उतपन हुई वे चिंगारिया अब नक्षत्रों का रूप लेकर आकाश में स्थिर हो गई थी।
19:09नारद ने एक लंबी सांस ली और जान गए की आने वाला युग अब उसी मर्यादा के अधीन होगा जिसे
19:16देवताओं ने स्वयन सुरक्षित किया है।
19:19तभी उस नवसंतुलित शून्य बिंदु के अनंत विस्तार में एक रहस्यमई कमपन हुआ और काल की शांत धाराओं के मध्य
19:28एक अलोकिक छाया में आकरिती प्रकट होने लगी।
19:32देवर्शी नारद ने अपनी तनवी वीना को वक्ष से सटा लिया और विस्मय से उस अध्वितिय स्वरूप को देखने लगे
19:39जो न तो किसी देवता की भांती था और नहीं किसी दैत्य जैसा।
19:45वह पारदर्शी और जाजवल्यमान सत्ता धीरे धीरे सघन होकर एक भव्य आकरिती में ढल गई जिसके शरीर के भीतर अजन्मी
19:54द्रिष्टियां और अव्यक्त ब्रहमांड स्पंदित हो रहे थे।
19:58उस सत्ता की फैली हुई हथेलियों के उपर काल के अनगुने रिश्मी सूत्र तैर रहे थे, जो स्रिजन और प्रलय
20:06दोनों की सीमाओं से पूरी तरहे परे प्रतीत होते थे।
20:09उस अज्यात सत्ता की उपस्थिती मात्र से वह संपूर्ण शून्य लोक एक दिवे शान्ती और स्वर्णिम आभा से भर उठा,
20:18जिसने समय की हर बची हुई व्याकुलता को शान्त कर दिया।
20:23नारद ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रस्वर में पूछा, हे परम रहस्यमेई तेज इस कालहीन महाशून्य में आप कौन हैं जो
20:31अस्तित्व और अनस्तित्व दोनों से परे जान पड़ते हैं।
20:36उस परासत्ता के नेत्र, जो सुप्ट तारों की गहरी जीलों के समान शान्त थे, धीरे से खुले और शूनी में
20:44एक ऐसा दिव्यस्वर गूंजा मानों कोई अनकहा वेद स्वयम बोल रहा हो।
20:49उस अलौकिक मुख से शब्द निकले, हे देवर्शी, जब काल की रेखाएं टकरा कर भस्म हो जाती हैं, तब मैं
20:57उस अवशेश में बची हुई अनन्त संभावना का रक्षक बन कर जागता हूं।
21:02उस सक्ता ने शूने के धरातल पर एक पग आगे बढ़ाया और उसके प्रत्येक चरण चेहन से अवव्यक्त स्रिजन की
21:09एक नई स्वर्णिम किरन प्रस्फुटित होने लगी।
21:13अस्तित्व के उस संरक्षक ने कहा कि स्रिजन और सहार तो केवल चक्र हैं, किन्तु काल के तूटने के बाद
21:20भी जो शेश रह जाता है, वही ब्रह्मांड की सक्ची शक्ती है।
21:25उस रहस्यमई सत्ता ने अपनी हथेली उठाई और शूने में बिखरी हुई काल की एक विखंडित विध्युत को थाम कर
21:33उसे एक तेजस्वी स्वर्णिम बीज में परिवर्तित कर दिया।
21:37वह दिव्य बीज उस सत्ता की हथेली में वैसे ही स्पंदित हो रहा था जैसे किसी अजन में ब्रह्मांड की
21:45पहली धड़कन महाशून्य में प्राण फूंक रही हो।
21:49संपून शून्य लोक उस अव्यक्त शक्ती के गौरव से जंक्रित हो उठा। मानो यह घोशना हो रही हो कि परमात्मा
21:56की संभावना कभी भी नश्ट नहीं हो सकती।
22:00देवर्शी नारत के हृदय में श्रीहरी की लीला का वह गूढ रहस्य प्रकट हो गया कि शूने केवल अंत नहीं,
22:08अपितु प्रत्येक नई शुरुवात की असीन संभावना है।
22:11उस संरक्षक सक्ता ने आगे बढ़कर अपनी दिव्य अंगुलियों से नारत की वीना के तारों को छुआ, जिससे उसमें अव्यक्त
22:20संगीत का एक नया स्वर समाहित हो गया।
22:24वीना से एक ऐसा उंकार युक्त महानाद उत्पन हुआ जिसने काल के शूने बिंदु को सदासदा के लिए एक परम
22:32संतुलन में बांध दिया।
22:33अब वह शूने बिंदु किसी भयावः खाई के समान नहीं, बलकि सृष्टी के पुनरजन्म का एक शांत और देदी प्यमान
22:42गर्भग्रह प्रतीत हो रहा था।
22:45सरक्षक सत्ता ने नारत को आशिरवाद देते हुए कहा, जाओ देवर्शी, लोकों को बताओ कि जब काल भी मौन हो
22:52जाता है, तब भी प्रभु का संकल्प कभी ख्षीन नहीं होता।
22:57यह कहकर वह अध्भुत आकरिती धीरे-धीरे ब्रहमांड के उसी शून्य में विलीन होने लगी और उसके स्थान पर केवल
23:05एक दिव्य स्वर्णिम प्रतीक जग्मगाता रह गया।
23:09नारद मुनि उस आलोकित महाशून्य में अकेले खड़े थे, उनके मुख पर पर्मानंद था और वे इस अनंत संभावना का
23:17संदेश लेकर तीनों लोकों की ओर लोटने को ततपर हुए।
23:22नारद मुनि उस स्वर्णिम प्रतीक की ओर बढ़े, मानो शूने का यह विस्तार अब स्वयं उनसे समवाद करने को आतुर
23:30हो।
23:31तभी उस प्रतीक से एक ध्वनी गुंजी, जो नारद के हृदय में कमपन उत्पन कर रही थी, जैसे किसी दिव्यवीना
23:39के तार अचानक जंजना उठे हो।
23:42शूने के भीटर से प्रकट होते हुए एक अद्रिश्य उर्जा पुंज ने नारद को भेर लिया, जिसका तेज सहसर सूरियों
23:50के उदे जैसा प्रचंड था।
23:52चारो दिशाओं में काल की रेखाएं तूटने लगी, जैसे कोई पुराना बांध तूटकर अनंट जलधाराओं को मुक्ती देने जा रहा
24:00हो।
24:02नारद ने कापते स्वरों में पूछा की क्या यह प्रलय है, या फिर किसी नवीन स्रिष्टी का गर्ब से बाहर
24:08आने का श्रमकाल।
24:10उत्तर में उस निराकार सत्ताने नारद के भीतर यह बोध जगाया की व्यवस्था का अन्थी वास्तव में मुक्ती का द्वार
24:18खोलता है।
24:21नारद ने देखा की कैसे पुरानी स्मृतिया और ब्रहमांडिय नियम एक-एक करके राख में बदल रहे हैं, जिससे एक
24:28शूने का स्रिजन हो सके।
24:31दिव्य चेतना ने चेतावनी दी की जब काल की रेखाएं आपस में टकराती हैं, तब केवल वही बचता है जिसका
24:39अस्तित्व सत्य के शुद्धतम आधार पर टिका हो।
24:43विस्त्रत शूने के केंद्र में नारत का मस्तक नत्मस्तक था, वे उस महान परिवर्तन के साक्षी बन रहे थे जिसने
24:50देवताओं को भी चिन्ता में डाल दिया था।
24:54उपर दिव्य लोक में भगवान विश्नु अपने शेशनाग के आसन से उठे और उन्होंने इस महान शूने के स्पंदन को
25:02स्पष्ट महसूस किया।
25:04उनकी दृष्टी में ब्रहमांड की आने वाली अराजकता का संकेत था, किन्तु उनके अध्रों पर एक अटल शान्ती की मुस्कान
25:12विद्यमान थी।
25:14विश्नु ने अपने हाथों से एक दिव्य चक्र को गती दी, ताकि उस शूने की उर्जा को तीनों लोकों के
25:21कल्यान हेतु नियंत्रित किया जा सके।
25:24इसी समय कैलाश पर शिव ने अपनी समाधी तोड़ी और उनकी तीसरी आख से निकलने वाली अगनी ने ब्रहमांड के
25:32उस शूने को प्रकाशित कर दिया।
25:35कैलाश के हिमशिखर उन उर्जा तरंगों के टक्राने से कमपायमान हो उठे जो नारद द्वारा उस अग्यात आयाम से वापस
25:43भेजी जा रही थी।
25:46शिव का अवधूत रूप एक क्षण के लिए उस शूने के केंद्र में प्रकट हुआ जहां नारद अभी भी स्तब्ध
25:53खड़े थे।
25:55उन्होंने संकेत किया कि यह काल की मुक्ती है जिसे रोकने का प्रयास करना स्वयं काल के विरुध जाने के
26:01समान होगा।
26:03नारद ने उस महान सत्य को आत्मसात किया और उनके स्वर से पूरा शूने गुंजायमान हो उठा।
26:10हे प्रभु मैं इस परिवर्तन का समवाहक बनने को तयार हूँ।
26:15उस सप्ता ने अंतिम बार नारद को स्पर्श किया जिससे उनके भीतर ब्रहमान के सारे रहसियों का ज्यान समाहित हो
26:23गया।
26:24स्वर्णिम प्रतीक अब मंद पढ़ने लगा था और नारद के पद अब वापस प्रित्वी की ओर अग्रसर होने के लिए
26:31विचलित हो रहे थे।
26:34काल की रेखाएं पुन सन्योजित होने लगी, किन्तु इस बार वे उस दिव्य संदेश को लेकर चल रही थी जो
26:41ब्रहमान को एक नई दिशा देने वाला था।
26:44नारद मुनी ने उस शूने बिंदु के स्पंदन को महसूस किया जो साक्षात आदिशक्ती के कणों से निर्मित प्रतीत होता
26:52था।
26:54ब्रहमान्ड के रचिता ब्रहमा जी ने नारद की आखों में उस दिव्य सत्य की चमक देखी जो समस्त वेदों का
27:00सार था।
27:02नारद ने अपनी वीना के तारों को छेडा और वे ध्वनिया उस शूने के रिक्त स्थान में एक नई लयात्मक
27:09संरचना बुनने लगी।
27:11समय की ठहर्ती हुई रिखाएं अचानक एक दिव्य चक्र के रूप में परिवर्तित होकर शूने के केंद्र को प्रकाशित करने
27:19लगी।
27:20अवधूत के रहस्य में हास्य के पीछे का कारण अब नारद की अंतरद्रिष्टी के समक्ष पूरी तरह से स्पष्ठ हो
27:27रहा था।
27:29नारद मुनी ने भगवान विश्णू की ओर देखते हुए कहा कि यह शूने बिंदु वास्तव में आदिशक्ती की स्रिजन प्रक्रिया
27:37का द्वार है।
27:39वीण की गूंड से निकला दिव्य स्पंदन काल की रुकी हुई गती को पुनरजीवित करने के लिए ब्रहमांडिय स्पंदनों से
27:46टकराया।
27:48ब्रहमांड के समस्त नक्षत्र एक क्षण के लिए उस दिव्य जोत की ओर जुक गए जो शूने से प्रस्पुटित हुई
27:55थी।
27:56नारद ने देखा कि उस शूने के भीतर आदिशक्ती का प्रतिविम्ब स्वयं को अनेक रूपों में विभाजित कर रहा था।
28:04विष्णू ने अपनी मंद मुस्कान के साथ नारद को उस गूर सत्य का अनुभव करने का निर्देश दिया जिसे काल
28:12की रेखाएं छुपा रही थी।
28:14नारद मुनी की चेतना उस सुक्ष्म कमपन के साथ एकाकार हो गई जो समस्त स्रिष्टी की नीम्व का आधार है।
28:34कि अवधूत का हर कदम केवल विनाश नहीं, अपितु एक नई स्रिष्टी का आवाहन है।
29:04में प्रवाहित हो रहा था।
29:07नारद को अब यह ज्यात हो चुका था कि अवधूत शिव का मौन वास्तव में उस आदी ध्वनी की प्रतीक्षा
29:14था।
29:15ब्रहमांड के शूने बिंदू का रहस्य एक पहेली की तरह सुलजने लगा और नारद की द्रिष्टी में अब स्पष्टता थी।
29:24वीना की अंतिम तान ने उस शूने को विभाजित कर दिया, जिससे आदिशक्ती के प्रकाश की एक किरन बाहर आई।
29:33नारद समझ गए कि अब काल की रेखाएं पुनह जूर चुकी हैं और एक नए युग का द्वार खुलने के
29:39लिए तयार है।
29:41उस अव्यक्त शूने से बाहर निकलते ही देवर्शी नारद ने स्वयं को स्रिष्टी की अंतिम परिधी पर उपस्थित पाया, जहां
29:49काल की नई तरंगे ब्रहमांड को कमपित कर रही थी।
29:54ज्यान के इस अपार भार को अपने अंतहकरण में धारण किये नारत के मुख मंदल पर एक अभूत पूर्व गंभीरता
30:01और चिंता की रेखाएं स्पष्ट उभराई थी।
30:04अपनी वीना को कसकर थामे देवर्शी ने सत्यलोग की ओर अपने दिव्यपक बढ़ाए, जिससे उनके चर्णों के नीचे प्रकाश के
30:13अंगिनत चक्र प्रस्पुटित होने लगे।
30:16समस्ट आकाश गंगाय मानों किसी अद्रिश्य हलचल से सिहर उठी थी, क्योंकि काल का चक्र अब केवल विधाता के अधीन
30:25नहीं रह गया था।
30:27सत्यलोग के स्वर्ण प्रासादों के सम्मुख पहुँचते ही नारद ने देखा कि वहां की अमर जोती भी इस ब्रहमांडिय विसंगती
30:35से हलकी सी धुंधली हो चुकी थी।
30:38देवर्शी की दृष्टी सत्यलोग के भव्य मंडप पर्टी की, जहां स्रिजन करता ब्रहमार इस अकथनिय सत्य से अब तक अनभिग्य
30:46बैठे थे।
30:48जैसे ही नारद ने सत्यलोग के मुख्यद्वार की देहरी लांगी, उनके आगमन की पच्चाप से वहां की शांत वायू में
30:56एक रहस्य में तरंग फैल गई।
30:59प्रासाद के स्वर्ण स्तंभों से टकराती नारत की वीना की मौन अनुगूज ने जैसे पूरे सत्यलोग को किसी आसन्न परिवर्तन
31:07की चेतावनी दे दी थी।
31:10सभाकक्ष के मध्य में अपने चतुर मुखी स्वरूप में आसीन पितामा ब्रह्मा स्रिष्टी की घट्ती गती को देख अत्यंत उद्विग्न
31:18प्रतीत हो रहे थे।
31:20ब्रह्मा के चारों मुखों पर स्रिजन का आत्म विश्वास क्षीन हो चुका था और उनकी वेदद्रिष्टी किसी अज्यात अवरोध से
31:28टकरा कर लौट रही थी।
31:30नारद ने मौन रहकर अपने पिता और विधाता के सम्मुक सिर जुकाया, परन्तु उनके नेत्रों का मौन किसी भीशन रहस्य
31:38की घोशना कर रहा था।
31:40ब्रहमा के करक्मलों से लिप्ता स्रिजन सूत्र अचानक मंद पड़ गया, मानो ब्रहमांड की जीवन धडकन ने एक क्षण के
31:48लिए सांस रोक ली हो।
31:51समस्ट सत्यलोक में एक गहरा सन्नाट आचा गया, जहां देवताओं के संगीत की जगह केवल काल के मंद प्रवाह की
31:59भारी गूंच सुनाई दे रही थी।
32:02पितामा ब्रहमा ने अपनी दृष्टी नारद पर स्थिर की और कम्पित वानी में पूछा की शूने के उस छोर पर
32:09काल की गती में यह कैसा व्यवधान आया है।
32:13नारद ने अपनी वीना को हृदय से लगाते हुए वह कठोर सत्य कह सुनाया की ब्रहमांड का नियंत्रन अब केवल
32:20विधाता के संकल्प पर निर्भर नहीं रहा।
32:24इस रहस्योध घाटन के साथ ही सत्यलोग के मध्य में काल की दो विप्रीत धाराएं द्रिश रूप में प्रकट होकर
32:31आपस में टक्राने लगी।
32:34सत्यलोग के क्षितिच पर अनादी काल से बहती स्वर्ण प्रभात की आभा अब एक रहस्य में संध्याप्रकाश में परिवर्तित होने
32:42लगी थी।
32:44ब्रह्मा के चारों मुखों पर एक साथ विस्मय और आत्मस्मर्पन का भाव छा गया, क्योंकि वे समझ गये कि यह
32:51स्वयंपरात पर शक्ती का प्रत्यक्ष हस्तक्षेप है।
32:56देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर एक अंतिम गंभीर स्वर्चेडा, जिसने विधाता के मन में उठते भय को
33:04श्रधा और शांती में बदल दिया।
33:07सत्यलोग के सर्वोच शिखर पर खड़े होकर नारद और ब्रहमा दोनों ने देखा कि एक नए युग की प्रचंड उर्जा
33:14अब समस्त ब्रहमांड का पुनरगठन करने को तत पर थी।

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