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Episode 35 of Brahmavaivarta Purana: Narada Muni crosses the boundary of existence to witness the Source of All Creation. What lies behind the forbidden door? Explore the mysteries of cosmic origins, the collapse of time, and the hidden truth behind the Trimurti's power. Join us as we decode the ancient secrets of the Puranas. #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #HinduMythology #SpiritualJourney #VedicMysteries #CosmicTruth #SanatanDharma #PuranicWisdom
Transcript
00:00नारद मुनि उस अनंट और रहस्यों से घिरे द्वार के सामने खड़े हैं, जहां से निकलती उर्जा समय की धाराओं
00:07को विखंदित कर रही है।
00:09नारद की आखों में एक अजीब सी व्याकुलता है, मानो वह देख पा रहे हों कि इस द्वार के पीछे
00:16संपून स्रिष्टी का आदियंत छिपा है।
00:20द्वार के चारों और जो उर्जा के स्पंदन हो रहे हैं, उनसे समय के कन बिखर कर नक्षत्रों के समान
00:27चमक रहे हैं।
00:40अचानक द्वार के भीतर से एक ऐसी दिव्यध्वनी गूंजती है, जो नारद के अस्तित्व के कणकण में कमपन पैदा कर
00:48देती हैं।
00:50नारद अपनी वीना को कसकर थाम लेते हैं, उनके मुख पर अब भय के स्थान पर एक अलौकिक साहस की
00:57जलक दिखाई दे रही है।
01:09इस रहस्य में प्रकाश के बीच समय का चक्रधीमा पढ़ता जा रहा है, जिससे वर्तमान पल एक युग के समान
01:16प्रतीत हो रहा है।
01:19नारद ने अपना एक कदम उस निशिद्ध सीमा की ओर बढ़ाया है, जिसे पार करना किसी भी देवता के लिए
01:26वर्जित है।
01:28विश्नु का समरण करते हुए नारद ने अपनी चेतना को स्थिर किया है, ताकि वे इस ब्रह्मांडिय सत्य का सामना
01:36कर सके।
01:38द्वार की सतह से निकलती ज्वालाएं अब किसी अगनी की भांती नहीं, बलकि शुद्ध चैतन्य की तरंगों की भांती प्रतीत
01:46हो रही है।
01:48इस निशिध द्वार के पीछे का आकाश अब धीरे धीरे पारदर्शी होता जा रहा है, जहां भविश्य और अतीत का
01:55मिलन हो रहा है।
01:58नारद की द्रिष्टी अब उन रहस्यों पर टिकी है, जिन्हें अब तक केवल परब्रहम ही जानता था।
02:05द्वार के ठीक सामने खड़े होकर, नारद को परब्रहम की उपस्थित का आभास एक दिव्य सुगंध के रूप में हो
02:12रहा है।
02:14स्रिष्टी के मूल स्रोच से निकली एक अद्रिष्य उर्जा की लहर ने नारद के शरीर को पूरी तरह से ढख
02:21लिया है।
02:23वे देवता जो इस द्वार की रक्षा कर रहे थे, अब अद्रिष्य हो चुके हैं, मानों वे भी इस महान
02:30क्षण में विलीन हो गए हूँ।
02:32द्वार के अंदर से अब मंत्रोच चार की ऐसी प्रतिध्वनी सुनाई दे रही है, जो ब्रहमांड की उत्पत्ती का आधार
02:40है।
02:42नारद का हृदय धड़क रहा है, क्योंकि वे जानते हैं कि इस द्वार को खोलना केवल एक क्रिया नहीं, बलकि
02:49एक युग का अंत है।
02:52शुन्य बिंदु पर स्थित यह द्वार अब पूरी तरह से जागरत हो उठा है, और नारद उसके द्वारपाल के समान
02:59प्रतीत हो रही हैं।
03:02अंतह नारद ने अपना हाथ उस द्वार की उर्जा को चूने के लिए बढ़ा दिया है, और समय की गती
03:08अब पूर्णत रुक गई है।
03:11नारद की उंगलियां जैसे ही उस अभेद्य द्वार को चूती हैं, उनके रोमरोम में ब्रहमांडिये चेतना का तीवर विद्यत प्रवाह
03:20प्रवाहित होने लगता है।
03:23महरशी नारद के मुख पर एक दिव्य आभाचा जाती है और उनकी आखें बंध हो जाती हैं, मानो वे उस
03:30द्वार के कमपन को अपने हृदय की धड़कन में अनुभव कर रही हूं।
03:35द्वार की सुक्ष्मूर्जा नारद के शरीर को छिन्न भिन करने के बजाए, उसे प्रकाश के एक कण में परिवर्तित कर
03:43उसकी चेतना को अनंत विस्तार दे देती है।
03:47चारो और व्याप्ट शून्य अब एक महाध्वनी में रूपान्तरित हो रहा है, जिसे केवल योग की सर्वोच अवस्था प्राप्त करने
03:55वाले ही सुन सकते हैं।
03:58नारद को अब अनुभव होता है कि यह द्वार किसी जड़ वस्तु से नहीं, बलकि परमात्मा की संचित इच्छा शक्ती
04:05से निर्मित एक जीवित द्वार है।
04:09अपनी योग शक्ती के बल पर नारद उस चेतना की सुक्षम लहरों को अपनी और आता हुआ देखते हैं, जो
04:16उन्हें ब्रहमांड के आदिसरोत की और बुला रही हैं।
04:21हर एक कमपन के साथ नारद को परब्रहम के मुख से निकले अनादी वेद मंत्रों की गुंजन सुनाई दे रही
04:28है, जो शूने को आलोकित कर रही हैं।
04:32यह वहक्षन है जहां नारद को आभास होता है कि काल के चक्र को चलाने वाली उर्जा स्वय इसी द्वार
04:39के भीतर से निरंतर प्रवाहित हो रही है।
04:43नारद के भीतर का अहंकार पूर्णत विलीन हो जाता है क्योंकि वे अब उस शक्ती के सामने खड़े हैं जो
04:51स्रिष्टी के उदे और विलय का एक मात्र केंद्र है।
04:55भगवान विश्णु का सूक्ष्म अंश नारद के हृदय में प्रविश्ठ होकर उन्हें उस निशिद्ध द्वार की भयाभता को सहने की
05:03शक्ती प्रदान करता है।
05:06द्वार के पार से आती हुई मंद सुगंध और दिव्य संगीत नारद की इंद्रियों को उस उच्च स्तर पर ले
05:13जाता है जहां विचार शून्य हो जाते हैं।
05:17वह द्वार अब पूरी तरह से पारगर्शी हो गया है, जिससे नारद को स्रिष्टी के स्रिजन का वह बीज दिखाई
05:24दे रहा है, जो अभी भी अंकुरित होने की प्रतीक्षा में है।
05:29नारद समझ जाते हैं कि यह द्वार केवल भौतिक मार्ग नहीं, बल्कि जीव की आत्मा का परमात्मा में विलीन होने
05:37का अंतिन द्वार है।
05:39परम्पिता ब्रहमा की प्रेणा से नारद अपना दाहिना हाथ उस प्रकाश पुंज में और अधिक भीतर ले जाते हैं ताकि
05:48वे सत्य का साक्षात दर्शन कर सकें।
05:51द्वार के भीतर से एक शीतल और सुगंधित वायू का जोंका आता है, जो नारद के योग की अगनी को
05:58शांत कर उसे अमरित के समान त्रिप्ट कर देता है।
06:03शुन्य का सन्नाटा अब एक मधुरलय में बदल गया है, जो नारद को एक ऐसी यात्रा पर ले जा रहा
06:10है, जहां से लोटने का मार्ग स्वयंकाल भी नहीं जानता।
06:15नारद ने अब उस उर्जा को पकड़ लिया है, जो स्रिजन की पहली लहर को जन्म देती है, और उनके
06:21हाथ से ब्रहमांडियस पंदन फूट रहे हैं।
06:26स्रिष्टी के इस निशिध द्वार का रहस्य अब नारद के भीतर समाहित हो चुका है, जिससे उनकी चेतना ब्रहमांड के
06:33हर अनु में व्याप्थ हो गई है।
06:37परंतु जैसे ही वे इस सत्य को पूनता से अनुभव करते हैं, द्वार के चारों और का वातावर्ण एक दिव्य
06:44अनुशासन में बंध कर शान्थ हो जाता है।
06:48नारद मुनी उस चेतना के मिलन बिंदु पर खड़े होकर अब यह जान चुके हैं कि परब्रहम ही सत्य है
06:55और बाकी सब केवल उसकी एक मायावी प्रतिध्वनी है।
07:00द्वार के भीतर से उठी वह प्रतम ध्वनी ओम की गूंजने शूने के सन्नाटे को चीरते हुए नारद मुनी की
07:07चेतना को जैसे किसी अनंत सागर में विलीन कर दिया।
07:11नारद मुनी ने देखा कि भगवान विश्नु का चतुर्भुज स्वरूप जो नील कमल के समान श्याम और कांतिवान है उस
07:19अनंत प्रकाश के केंद्र में साक्षात विद्यमान है।
07:24भगवान विश्नु के हाथों में स्थित सुदर्शन चक्र उस दिव्यध्वनी की लए के साथ सुक्षमता से घूमते हुए ब्रहमांड के
07:32परमानूओं को व्यवस्थित कर रहा है।
07:35वह दिव्यध्वनी अब नारत की वीना के तारों में स्वयं प्रवाहित होने लगी जिससे एक अलौकिक संगीत पूरे शुनी में
07:43गुंजायमान हो उठा।
07:46विस्तरत ब्रहमांड के निर्मान की प्रक्रिया उस द्वार के भीतर एक प्रकाश-पुंच के समान रित्य कर रही है जिसे
07:53देखकर नारत का रोम्रोम पुलकित हो उठा।
07:57नारद ने अनुभव किया कि परब्रहम के मुख से निकले उस ओम के नाद में ही स्रिष्टी के समस्त वेदों
08:03का सार समाहित है
08:06उस दिव्यद्वार की चोखट पर उभरते हुए स्वर्ण अक्षरों ने सत्य के उस निशिद्ध ज्यान को नारद की द्रिष्टी के
08:13समक्ष पूर्णत प्रकट कर दिया
08:17संपूर्ण ब्रहमांडिय उर्जा उस बिंदु पर आकर थम गई, मानो काल का चक्र स्वयर रुक कर उस परमध्वनी का अभिननदन
08:24कर रहा हो
08:26नारद मुनी ने देखा कि परब्रहम की वही निराकार उर्जा, साक्षात श्रीहरी के रूप में उस द्वार की रक्षाहेतु एक
08:34अभेद्य कवच बनी हुई है
08:37भगवान विश्णों की शांत द्रिष्टी में नारद ने संपूर्ण ब्रहमांड की उत्पत्ती और प्रलै का चक्र एक साथ देख लिया
08:46उस नाद के प्रभाव से द्वार के चारों और की मायावी परतें धीरे-धीरे बिखरने लगी और सत्य का स्वरूप
08:53स्पष्ठ होने लगा
08:55यह वहक्षन था जब नारद मुनी को ज्यात हुआ कि उनका अस्तित्व भी उसी ध्वनी का एक ननहासा प्रतिध्वनी मात्र
09:03है
09:05ब्रहमांड के समस्त नक्षत्र उस ध्वनी के साथ तालमेल बिठाते हुए एक दिव्य संगीत की रचना में व्यस्त दिखाई देने
09:13लगे
09:14भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ उस ध्वनी को नियंत्रित किया जिससे संपूर्ण स्रिष्टी में एक नई चेतना का
09:22संचार हुआ
09:24नारद मुनी ने अपनी वीना को नीचे रखा और उस परम ध्वनी में अपना पूर्ण समर्पन कर दिया
09:31एक दिव्य आभा ने पूरे वातावर्ण को अपने आगोश में ले लिया, जहां अब केवल परब्रह्म की उपस्थिती का ही
09:39बोधशेश था
09:41स्रिष्टी का वह आदिसरोत अब नारद के भीतर एक धधकती हुई जोती बन कर चमकने लगा था
09:48भगवान विश्णु ने आशिरवाद के रूप में अपना एक हाथ उठाया और उस एक संकेट से समस्त ब्रहमांडिय संतुलन पुनह
09:57स्थापित हो गया
09:59नारद मुनी की चेतना अब उस द्वार के पार देखने में सक्षम हो गई थी जहां काल का भी कोई
10:05अस्तित्व नहीं था
10:08परब्रहम का वह महार हस्य अब एक शांत अनुभव बन चुका था जो नारद को ब्रहम अज्यान की नई गहराईयों
10:15की ओर ले जा रहा था
10:17नारद मुनी ने कापते हाथों से परब्रहम के उस विशाल द्वार को स्पर्श किया जहां से अनंत प्रकाश की पहली
10:25किरने बाहर फूटने लगी
10:27भगवान विश्णु के शांत मुख मंडल पर एक सूक्षम मुस्कान आई जो उस रहस्य को प्रकट करने की अनुमती का
10:35मौन संकेत थी
10:37जैसे जैसे द्वार की शिलाएं खिसकी धीतर से काल के चक्रों के रुकने की एक भयावा गूंच सुनाई दी
10:45द्वार के मध्य में प्रकाश और अंधकार का ऐसा मिलन हो रहा था जैसे स्रिष्टी की उत्पत्ती का प्रथम क्षण
10:53अभी भी जीवित हो
10:55नारद की द्रिष्टी जैसे ही उस अलौकिक द्रिष्ट पर पड़ी उनकी चेतना ने ब्रहमांड की संपूर्ण संरचना को एक बिंदू
11:03में समट्ते हुए देखा
11:06भगवान विश्णु ने अपनी अभय मुद्रा के माध्यम से नारद के मन को उस असीमित द्रिष्ट को सहने की शक्ती
11:12प्रदान की
11:14अंदर का वातावर्ण स्थिर था फिर भी वहां गती के ऐसे आयाम थे जो काल की गती को भी तुछ
11:21सिद्ध कर रहे थे
11:23प्रकाश की एक दिव्यधारा ने नारद के शरीर को छुआ जिससे उनका अहमकार पूरी तरह लुप्थ हो गया
11:31विशाल द्वार के पीछे उन्हें वेदों के मंत्र साकार रूप में निरित्य करते हुए प्रतीत हुए
11:38श्री हरी ने संकेत किया कि यह द्रिश्य ही परब्रहम का वह निशिध स्वरूप है जिसे केवल ज्यान से ही
11:45देखा जा सकता है
11:48नारद ने देखा कि उस जोती के भीतर ही ब्रहमा विश्नु और महेश का सम्मिलित प्रतिबिम विद्यमान था
11:56अंधकार और प्रकाश के इस अध्भुत संगम ने नारद के ब्रहमज्यान को पूर्णता प्रदान कर दी
12:03ब्रहमांड के सभी नियम यहां आकलित होकर एक मौन संगीत का निर्मान कर रहे थे
12:10भगवान विश्नु के आशिर्वाद से नारद उस उर्जा को समझने के योग्य बने जिसे देख पाना भी देवताओं के लिए
12:18कठिन था
12:20नारद ने अपना सिर जुका कर उस परब्रम के महार हस्य को नमन किया जो अब उनके भीतर उतर चुका
12:27था
12:28वातावर्ण में एक दिव्य सुगंध फैल गई जो उस निशिद्ध द्वार के खुलने का अंतिम परिणाम थी
12:36स्रिष्टी के मूल स्रोत के दर्शन ने नारद के मन में से संसार की अंतिम भ्रांतियों को मिटा दिया
12:43भगवान विश्णों ने धीमे स्वर में कहा कि यही वह अनंत मार्ग है जहां से स्रिष्टी जन्म लेती है और
12:50पुना विलीन हो जाती है
12:53नारद मुनी उस प्रकाश की ओर बढ़ते गए जैसे कोई भक्त अपने अंतिम गंतव्य की ओर अग्रसर हो
13:01महारहस्य का वह द्वार अंतह एक दिव्य प्रकाश में परिवर्तित हो गया जिसने संपून शून्य को आलोकित कर दिया
13:10द्वार के पार का असीन विस्तार एक विशाल स्वर्नकमल के रूप में प्रकट हुआ, जिसके भीतर ब्रहमांड के जन्म का
13:17स्पंदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था
13:21नारद मुनी ने देखा कि परब्रहम के उस निशिध द्वार के भीतर एक दिव्य प्रकाश पुन्च साकार होकर पुरुष और
13:28प्रकृती के शाश्वत मिलन का सूत्र पात कर रहा है
13:32उस आदिशक्ती के तेज से एक सुक्ष्म बिंदु का उदे हुआ, जो धीरे-धीरे आकार लेते हुए संपून चराचर जगत
13:40का बीज बन गया
13:43ब्रहमांड के उस प्रथम स्पंदन को देखकर नारत का रोम-रोम पुलकित हो उठा, जैसे उन्होंने स्वयनकाल को गर्भ में
13:50पलते हुए देख लिया हो
13:53तभी उस दिव्य प्रकाश से प्रकृती का एक रूप प्रकट हुआ, जो जड़ और चेतन के बीच की महीन रेखा
14:00को मिटाने में सक्षम था
14:02नारत ने अनुभव किया कि यह वही शक्ती है जो माया के आवर्ण को बुनकर भौतिक जगत को अस्तित्व प्रदान
14:10करती है
14:12पुरुष तत्व के रूप में भगवान विश्णु का अंश उस प्रकृती के बीज के चारों और एक सुरक्षा कवच की
14:19भाती फैल गया
14:21उस मिलन से एक दिव्यध्वनी उत्पन हुई जिसने शूने के सन्नाटे को अनंत मंत्रों की गूँज में परिवर्तित कर दिया
14:29विशाल ब्रहमांडिय फलक पर नारद ने देखा कि कैसे प्रत्येक ग्रह और नक्षत्र उसी आदिबीज से अपना अस्तित्व ग्रहें कर
14:38रहे थे
14:40परब्रहम की वह दिव्यध्योती जो प्रकृती को सक्रिय करने वाली थी अब नारद के सम्मुख साक्षात विद्यमान थी
14:48प्रकृती के उस सुक्ष्मकन ने अपना विस्तार करना आरंभ किया जिससे भौतिक तत्वों के निर्मान का मार्ग प्रशस्थ हुआ
14:57शुन्य बिंदु का वह स्थान अब एक दिव्यकार यशाला बन चुका था जहां नेती के धागे स्वयन परब्रहम द्वारा बुने
15:05जा रहे थे
15:07नारद मुनी ने उन धागों को स्पर्श करने का साहस किया जिससे उन्हें काल के भविश्य की एक जलक प्राप्थ
15:14हुई
15:26एक स्थिर स्पंदन के साथ यह घोशित किया कि स्रिष्टी का चक्र अब कभी नहीं रुकेगा
15:33चारों और व्याप्थ दिव्याभा ने नारद की चेतना को पूरी तरह से उस आधितत्व में विलीन कर दिया
15:41नारद ने अनुभव किया कि वे अब केवल एक दर्शक नहीं बल्कि उस निर्मान प्रक्रिया का एक सुक्ष्म हिस्सा बन
15:49चुके हैं
15:51दिव्यद्वार से प्रस्फुटित हुई उर्जा अब ब्रह्मांड के विस्तार की सीमाओं को नई दिशा दे रही थी
15:58स्रिष्टी के उस मूल बीज ने अपना पहला अंकुर छोड़ा जिससे पंच तत्वों की उत्पत्ती का आधार तयार हुआ
16:07नारद का नेत्र अब उस सत्य को देख चुका था जिसे जानने के लिए देवताभी युगों तक तपस्या करते हैं
16:16नारद ने देखा कि काल की धाराए अब सीधी नहीं बलकि अन्थीन वृत्तों में उलच गई हैं जहां हर क्षण
16:23एक नया ब्रहमांड जन्म ले रहा है और नश्ट हो रहा है
16:28नारद ने उस शून्यता की गहराई में भगवान विश्णू को देखा जिनके शांत मुख पर स्रिष्टी के समस्त दुखों और
16:36सुखों का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था
16:39काल के नियमों से मुक्ठ होकर नारद के सुख्ष्म शरीर के चारों और नक्षत्र और ग्रह अपनी पुरानी कक्षाएं छोड़कर
16:47एक नई लए में नाचने लगे
16:50एक विशाल स्वर्ण कमल के भीतर सिंटा हुआ समय का चक्र अब पिघलकर प्रकाश की किर्णों में परिवर्तित हो रहा
16:57था
16:59तभी नारद ने देखा कि अतीत की स्मृतिया वर्तमान की परचाईयों के साथ मिलकर एक जटिल मायावी जाल बुन रही
17:07है
17:09भगवान विश्णु ने अपनी मंद मुस्कान से काल की उन उलजी हुई पर्तों को शांती प्रदान की जैसे सागर शांत
17:16हो जाता है
17:18नारद के कानों में वेदों की ध्वनिया गुमजी जो अब शब्दों में नहीं बलकी शुद्ध ब्रहमान्डियस पंदनों में सुनाई दे
17:26रही थी
17:28समय का वह ठहराव एक मूख संगीत बन गया था जिसे केवल वे ही सुन सकते थे जिनकी आत्मा माया
17:35के आबर्ण से मुक्थ हो चुकी थी
17:38नारद ने अनुभव किया कि सृष्टी का हर पर्मानु एक स्वतंत्र काल का स्वामी है जो अपनी इच्छा से गतिया
17:46विराम चुन सकता है
17:49ब्रहमांड के रचिता ब्रहमाजी के चार मुखों से निकलती हुई दिव्य आकृतिया इस कालशून्य क्षेत्र में साक्षात उतर रही थी
17:58स्रिष्टी के उस मूल द्वार के पास पहुँचते ही नारत को ऐसा लगा जैसे वे स्वय अस्तित्व के गर्भ में
18:05प्रवेश कर रहे हुँ
18:07द्वार के पार का दृष्य किसी भी मानविय कलपना से परे था जहां न तो प्रकाश का उदे था और
18:14नहीं अंधकार का अंत
18:16काल के समस्त नियम इस द्वार के समीप आकर अपने आप में ही विलीन होने लगे थे
18:24भगवान विश्णू ने नारत की ओर इशारा किया मानो उन्हें इस अंतिन रहस्य के दर्शन करने की अनुमती दी जा
18:31रही हो
18:32नारत ने अपनी आखें बंद कर ली क्योंकि वे सत्य की उस प्रकार जोती को सहने के लिए अभी पूर्णत
18:39है तयार नहीं थे
18:42स्रिश्टी का महार हस्य अब उस द्वार की दरारों से बाहर निकल कर ब्रहमांड के शुनिय में तैरने लगा था
18:49नारत के चारों ओर की दिशाएं और दूरिया मिट गई और वे एक ऐसे स्थान पर खड़े थे जहां समय
18:56का कोई नामों निशान नहीं था
18:59इस विस्मयकारी स्थिती में नारत को परब्रहम की उस निराकार शक्ती का आभास हुआ जो काल को भी अपनी गोद
19:07में पालती है
19:18नारत का सत्य अब प्रकट होने ही वाला था जो स्रिजन के मूल उद्देश को बदल सकता था
19:25नारत ने जैसे ही अपना हाथ उस थर्थराते द्वार पर रखा उन्हें आभास हुआ कि संपूर्ण ब्रहमांड की नीम्व किसी
19:33अग्रिश दरार से विचलित हो रही है
19:36नारत मुनी जिनकी त्वचा सामवली और चहरे पर ब्रहम तेश की कांती है उन्होंने अपनी वीना को एक ओर रखकर
19:44परम आश्चर्य और भय के मिश्रित भावों के साथ उस द्वार की दरार को देखा
19:51दरार के भीतर से निकलती दिव्य रश्मिया ब्रहमांडिय नियमों को खंडित कर रही थी जिससे काल के चक्र पर गहरी
19:58लकीरें उभर आई थी
20:00यह विसंगती मात्र एक दुरघटना नहीं थी अपितु एक महायोजना का संकेत थी जिसे स्वयं परब्रहम की इच्छा से ही
20:09रचा गया था
20:11द्वार के पीछे से गूंजता हुआ अनाहत नाद नारद के अस्तित्व के कणकन को स्पंदित कर रहा था जैसे वे
20:18साक्षात स्रिजन के केंदर में खड़े हो
20:21नारद ने अनुभव किया कि यह दरार स्रिष्टी को पुनरगठित करने का एक सुक्षम प्रयास है जो समस्त मायावी बंधनों
20:30को तोड़ कर सत्य को उजागर करने वाली है
20:34अचानक द्वार के उस पार से एक प्रकाश पुंज निकला जिसने नारद के चारों और की माया के आवर्ण को
20:41पूर्णता छिन्न भिन्न कर दिया
20:44प्रकाश के उस महासागर में नारद ने देखा कि काल की सीमाए मात्र एक भ्रम थी जिन्हें मिटाने की तयारी
20:52की जा रही थी
20:54इस रहस्य को प्रत्यक्ष देखकर नारद का हृदय थर्रा उठा क्योंकि उन्हें ग्यात हो गया कि अब कोई भी नियम
21:01शाश्वत नहीं रहने वाला था
21:04पर ब्रहम की लीला के इस निशिध अंशने नारद को यह समझा दिया कि स्रिष्टी का मूल सदैफ परिवर्तन और
21:11पुनर स्रिजन की मांग करता है
21:15द्वार की दरारें अब धीरे धीरे विस्तरित हो रही थी जैसे वे किसी नए कल्प के आगमन का मार्ग प्रशस्त
21:22कर रही हो
21:24ब्रहमांडिय संग्रचना की यह दरार एक विशाल गर्भग्रह के समान थी जहां से नई संभावनाय अस्तित्व में आने के लिए
21:32आतुर थी
21:34नारद ने स्वयन को उस परमशूने में अनुभव किया जहां काल कर्म और फल का कोई भी प्रभाव शेष नहीं
21:41रहा था
21:42उनकी द्रिष्टी उस केंद्र बिंदुपर्टी की थी जहां से परब्रहम की इच्छा शक्ती तरंगों की भाती पूरे ब्रहमांड में प्रवाहित
21:51हो रही थी
21:52यह वहक्षन था जब नारद ने समझा कि स्रिजन का विनाश और पुनरगठन दोनों ही एक ही परमशक्ती की दो
22:00भुजाएं हैं
22:02ब्रहमांड की नीम्ग में पड़ी यह दरार अब एक सेतु में परिवर्तित हो रही थी जो परब्रहम को उनकी स्रिष्टी
22:09से पुनह जोड़ने वाली थी
22:12नारद की वीना से अनायास ही एक ऐसी स्वरलहरी निकली जिसने उस दरार के कमपन के साथ मिलकर एक नया
22:20सामनजस्य स्थापित कर दिया
22:22परब्रहम का वह निशिद्ध द्वार अब पूरी तरह खुल चुका था और उसके पीछे का द्रिश किसी भी चक्षु की
22:29क्षमता से परे था
22:32स्रिश्टी के नियमों की वह दरार अब लुप्थ हो गई थी क्योंकि स्वयन सत्य ने उस शूने को अपने दिव्य
22:38प्रकाश से भर दिया था
22:41नारद जानते थे कि अब जो ब्रहमांड होगा वह पहले से कहीं अधिक भव्य और परब्रहम की इच्छा के अधिक
22:49निकट होगा
22:50परब्रहम के द्वार से फूट्ती अलौकिक उर्जा नारद की सुक्षम चेतना को एक प्रचंड जटके के साथ हिला देती है
22:58मानों वे अनंत सागर के बीच एक तिनके की तरह बिखर रहे हूँ
23:03नारद अपनी बंध होती आखों से उस विराट सत्य को देखते हैं जहां काल के समस्त समिकरन पिघलकर ब्रहमा की
23:11अनंत शांती में विलीन हो रहे थे
23:14वे अपने हाथों में थमी वीना को शिथिल होते महसूस करते हैं क्योंकि अब इस स्रिष्टी की कोई भी ध्वनी
23:21उस निस्तब्धता का वर्णन करने में सक्षम नहीं थी
23:26एक गुंजता हुआ सन्नाटा पूरे ब्रहमांड को अपने आगोश में ले लेता है जहां समय का पहिया अब किसी और
23:33दिशा में मुरने के लिए तयार हो रहा है
23:37नारद का मानस पटल उस अपार ज्यान के दबाव से काम्प उठता है जो एक साथ हजारों जन्मों के सत्यों
23:44को उनके भीतर समाहित कर रहा है
23:48वे जानते हैं कि यह दिव्यबोध यदि अपात्र मनुश्यों तक पहुँचा तो स्रिष्टी की मर्यादाय छिन्नभिन हो जाएंगी और अस्तित्व
23:57का आधार ही समाप्थ हो जाएगा
24:00नारद के भीतर एक गहरा द्वंदव छिड़ जाता है क्या वे इस रहस्य को अपने भीतर दबाले या इसे जगत
24:07के कल्यान के लिए एक पहली बना कर छोड़ दें
24:11आकाश में तैरते स्वर्नक्मल धीरे धीरे अपना तेज कम करने लगते हैं मानो वे भी इस महार हस्य के भार
24:19को सहन करने में असमर्थ हो
24:22नारद का अस्तित्व अब एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां से पीछे लोटना असंभव है और आगे बढ़ना स्वयंके
24:30विनाश के समान है
24:33गरूर के पंखों की फड़फडाहट से उत्पन हुई हवा नारत को चेतना में वापस लाती है जो उनकी सहायता के
24:40लिए निस्तब्ध आकाश में मंदरा रही है
24:44गरूर की आखों में उन्हें वही चेतावनी दिखाई देती है जिसे वे अब तक केवल शब्दों में सुनते आये थे
24:51सत्य का भार देवता भी नहीं उठा सकते
24:56ब्रहमांड के समस्ट नक्षत्र इस घटना को मूग दर्शक बनकर देख रहे हैं
25:01जैसे कि वे किसी महा प्रिवर्तन की प्रतीक्षा कर रहे हूं
25:06नारद अपनी दैविय उर्जा को केंद्रित करते हैं ताकि वे उस निशिद्ध ज्यान की तीवरता को थोड़ा कम कर सकें
25:13और उसे केवल समृतियों में सुरक्षित रख सकें
25:18भगवान विश्नु का दिव्य प्रकाश नारद के चारों और एक सुरक्षा कवच बनाता है
25:23जिससे उनका मन उस प्रचंड ज्यान के प्रभाव से सुरक्षित हो जाता है
25:29स्मृति के उस सागर में नारद उंद्रिश्यों को ताले में बंद कर देते हैं
25:34जिन्हें केवल काल के अंत में ही खोला जाना निर्धारित था
25:39स्रिष्टी का वह सुक्ष्म कमपन जो विग्टन की ओर अग्रसर था
25:43अब पुनह शांत होकर अपने नियमित लए में लोट रहा है
25:48नारद ने अब यह जान लिया है कि परब्रम की इच्छा से उपर कुछ भी नहीं है
25:53और उनका कार्य मात्र एक साक्षी बने रहना है
25:58काल के टकराते चक्र अब एक दूसरे के समानांतर चलने लगे हैं
26:03जिससे ब्रहमांड में फैली अराजक्ता का अंत हो गया है
26:08वे धीरे धीरे उस निशिद्ध द्वार से दूर हटते हैं
26:12उनके चहरे पर अब उस अज्यात के प्रती एक परम स्विकृती का भाव है
26:18सृष्टी का महार हस्य अब सुरक्षित है
26:20और नारद के पद अब उस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं
26:24जहां मानवता के लिए नया सूर्य उदे होने वाला है
26:29नारद मुनी ने उस असीम शूने के क्षितिच को पीछे छोड़ते हुए
26:33अपनी वीना के तारों को शांत किया
26:36ताकि ब्रहमांड की स्पंदन उनके कदमों के साथ एक लए में आ सके
26:42विश्नु लोक के द्वार पर स्थित दिव्यरक्षक अपने तेजोमय नेत्रों से नारद के लोटते हुए स्वरूप को देखते हैं
26:49जहां उनके चहरे पर उस परब्रहम के दर्शन की गंभीरता अंकित है
26:55नारद ने अपनी आखें बंद की और उस परम सत्य के प्रकाश को अपने भीतर समाहित कर लिया
27:01जो अब उनके हर शब्द में एक इश्वरिय गूंच की तरह विद्यमान हो गया था
27:07स्वर्ण महल के गलियारों में नारद के पच्चाप एक ऐसे संकल्प की ध्वनी बन गए थे
27:13जो आने वाले युगों तक धर्म और मर्यादा के रक्षक का मार प्रशस्त करने वाले थे
27:19दिव्य चेतना की लहरें उनके चारों और एक सुरक्षा कवच का निर्मान कर रही हैं
27:25जिससे वे अब निशिद सत्य के बोज से मुक्त होकर वापस सामान्य कालचकर में प्रवेश कर रही हैं
27:33गरुर देव का आगमन उस दिव्य लोग की शांती को एक नई गती देता है
27:38और उनके पंखों की फड़फडाहट से वेदों का स्वर्पुन गुंजायमान हो उठता है
27:45नारद ने अपनी वीना के तार छेड़े जिससे उत्पन हुई ध्वनी ने उस निशिद द्वार के पीछे की स्मृतियों को
27:52एक दिव्य ताले की तरह सदैव के लिए सुरक्षित कर दिया
27:57काल के टकराते चक्र अब धी में पढ़कर शांत हो गए हैं जैसे कोई विशाल समुद्र मन्थन के पश्चात पुना
28:04अपने स्थिर रूप में लौट आया हो
28:08नारद अब उस स्थान से दूर निकल आये हैं जहां ब्रहमांडिय नियम अर्थहीन हो जाते थे और उनके भीतर का
28:15देवर्शी पुना मानविय कल्यान के भाव से भर उठा है
28:20ब्रहमाजी का ध्यान नारद की वापसी पर केंद्रित होता है और उनकी दिव्यद रिष्टी से निकलती एक किरण नारद को
28:28उस ध्यान के मार्क का बोध कराती है
28:32नारद ने जुक कर उस परम सत्ता को नमन किया जिसे उन्होंने उस निशिध द्वार के पार अनुभव किया था
28:39और उनके चहरे पर एक अतींद्रिय मुस्कान तैर गई
28:43उस निशिध द्वार की स्मृती को नारद ने अपने मानस के एक ऐसे कोने में छिपा लिया है जहां कोई
28:50भी सांसारिक जीव कभी पहुँच न सके
28:54धरा की और बढ़ते नारद के चर्णों में अब एक ऐसी दिव्य उर्जा है जो सूखे मरुस्थलों में भी धर्म
29:01के अंकुर उगाने में सक्षम है
29:04स्वर्ग के देवता उन्हें देख रहे हैं उनके नेत्रों में उस महान देवर्शी के प्रति सम्मान है जो अब स्रिष्टी
29:12के महारहस्य का एक मात्र जीवित साक्षी है
29:16वीना की तान में अब वह रहस्यमय सन्नाटा भी समाहित है, जो नारद ने उस निशिद्ध द्वार के दूसरी ओर
29:24महसूस किया था
29:26स्रिष्टी का चक्र फिर से सुचारू रूप से चलने लगा है, और तारों की चाल में वह स्थिर्ता लौट आई
29:32है, जो आदिकाल से नियत थी
29:36नारद का संकल्प अब मानवता के कल्यान के लिए एक कवच बन चुका है, जो उन्हीं किसी भी आसुरी प्रवृत्तियों
29:43से सुरक्षित रखने के लिए प्रतिबध है
29:47एक नए सूर्य का उदे प्रित्वी की ओर संकेत कर रहा है, जहां नारद का आगमन एक नई आध्यात्मिक क्रांती
29:55का आधार बनने वाला है
29:58देवर्शी ने आकाश की ओर देखा और उस परम ब्रह्मा को मुख धन्यवाद दिया, जिन्होंने उन्हें उस महारहस्य की सीमा
30:06तक पहुँचने का अधिकार दिया था
30:09स्रिष्टी के इस महारहस्य का द्वार अब बंध हो चुका है, किन्तु इसका ज्यान नारद की वानी में सदैव जीवित
30:17रहेगा ताकि आने वाली पीढ़िया धर्म का मार्ग न भटकें
30:22देवर्शी नारद के कदम अब ब्रहमांड की सीमाओं को लांग कर सत्य लोग की स्वर्णिम सीधियों की ओर तेजी से
30:29बढ़ने लगे हैं
30:31ब्रहमा जी अपने कमल आसन पर विराज मान होकर स्रिष्टी की अस्थिर्ता को भांप रहे हैं, जैसे किसी महाविनाश की
30:39आहट उन्हें बेचैन कर रही हो
30:42नारद ने जुपकर पिता ब्रहमा को प्रणाम किया और उनके मुख से निकले शब्दों ने ब्रहमांड के उस गुप रहस्य
30:50की प्रथम जलक साजा की
30:52सत्य लोग के वातावर्ण में एक दिव्यकमपन उत्पन हुआ, जो नारद द्वारा लाए गए सत्य के भार को सहने में
31:00असमर्थ सा प्रतीत होता था
31:03ब्रहमा जी की चार भुजाओं में स्थित कमंडल और वेदों का तेज उस रहस्य को सुनते ही मानो अपनी चमक
31:10खोने लगा हो
31:12नारद ने अपनी वानी में उस कालचक्र के तूटने की गवाही दी, जिसने परभ्रहम के निशिध द्वार के पीछे की
31:19अनंत्ता को स्पर्श किया था
31:22ब्रहमा जी के त्रीतिय नेत्र के स्थान पर एक सुक्ष्म दिव्य चमक उभी, जो इस महासंकट के निवारण का मार्क
31:29खोजने में तल्लीन हो गई
31:32सत्य लोग की स्वर्ण भितिया अचानक कम्पित हो उठीन, मानो ब्रहमांड का अस्तित्व ही उस सत्य के सत्यता को स्विकार
31:40करने की चेश्टा कर रहा हो
31:43नारद ने ब्रहमा जी को बताया कि परब्रहम का वह द्वार साधारन नहीं, बलकि समस्थकाल और नेती का अंतिम विराम
31:50बिंदु है
31:52ब्रहमा जी ने गंभीरता से कहा कि जिस द्वार को परब्रहम ने स्वयन सुरक्षित किया है, उसे खोलना स्रिष्टी के
32:00अंत के बराबर है
32:03नारद की उंगलियां वीना के तारों पर थमी हुई थी, किन्तु उनकी धुन में उस रहस्य का संगीत अभी भी
32:09प्रतिध्वनित हो रहा था
32:12सत्यलोग की दिव्य सभा में तैनात सेलेस्टियल गार्ड्स भी उस रहस्य में उर्जा के प्रभाव से निश्चल और स्तब्ध खड़ी
32:20रह गई
32:21प्रित्वी की ओर संकेत करते हुए ब्रहमा जी ने नारद को एक नए आध्यात्मिक संतुलन के निर्मान का आदेश दिया
32:30नारद ने विनमर्ता से अपना मस्तत जुकाया, जानते हुए कि अब उनका कर्तव्य केवल देखना नहीं, बलकि धर्म का मार
32:38प्रशस्त करना है
32:50प्रभाव अब स्वर्ग और प्रित्वी के बीच की दूरियों को मिटाने के लिए तत्पर हो गया है
32:57नारद ने पुनह आकाश की ओर देखा, जहां अब उन्हे परब्रहम की उपस्थिती एक शांत और स्थिर प्रकाश के रूप
33:04में अनुभव हो रही थी
33:07ब्रहमा जी ने नारद को एक दिव्य संकेत दिया, जो उन्हें आने वाले महा संकट के प्रत्येक चरण में मार्ग
33:14दर्शन देगा
33:16देवर्शी नारद के भीतर का ज्यान अब एक मशाल के समान प्रजवलित हो उठा है, जो आने वाली पीधियों के
33:23लिए धर्म की रक्षा करेगा
33:26सत्य का प्रसार अब शुरू हो चुका है और नारद का यह सफर आने वाले समय में इतिहास का नया
33:32अध्याय लिखने को तयार है

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