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इस एपिसोड में, ओंकार के स्पंदन से जागृत हुए नए ब्रह्मांड के सूक्ष्म तत्वों का रहस्य उजागर होता है। नारद मुनि उस दिव्य प्रक्रिया के साक्षी बनते हैं जहाँ शून्य से 'सृष्टि के वास्तुकार' का उदय होता है। क्या ब्रह्मा इस बार पहले से अलग होंगे? जानिए सृष्टि के नए नियमों के पीछे का महा-रहस्य।
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00:00अनंत्शूने के गर्भ में ओंकार की ध्वनी एक स्पंदन के रूप में गूँच उठी, जिसने पहली बार स्थिर्ता के अंधकार
00:07को विखंडित करना शुरू किया।
00:10नारद मुनि उस दिव्यध्वनी के तरंगों को अपने अंतर्मन में अनुभव करते हुए स्तब्ध खड़े हैं, उनकी वीना से भी
00:18वही आदिनाद स्वत्ह उत्पन्न हो रहा है।
00:22उनकार की तरंगे अब प्रकाश की सूक्ष्म रेखाओं में परिवर्तित हो रही हैं, जो अंतरिक्ष के कैनवास पर ब्रहमांड की
00:29रूपरेखा खीच रही हैं।
00:32इस महाविस्तार के केंद्र में स्थित दिव्य उर्जा का स्पंदन ब्रहमांड के प्रथम वास्तुकार के आगमन की सूचना दे रहा
00:40है।
00:42चारो और व्याप्ट दिव्य नीलिमा और स्वर्ण आभा नारद मुनी की चेतना को एक उच्चतर आयाम की और प्रेरित कर
00:49रही है।
00:51नारद मुनी ने अपनी आखें बंद की और उस ध्वनी के मूल को खोजने के लिए अपने अंतरग्रिष्टी का द्वार
00:58खोल दिया।
01:00प्रकाश की वहरे खाएं अब एक विशाल आकार ले रही हैं, जो शून्य को एक नए अस्तित्व के साचे में
01:07ढालने को तक पर है।
01:29नारद मुनी के मुख से स्तुती गान निकल रहा है, जो उस आदिप्रकाश की महिमा को शब्दों में पिरोने का
01:36विनमर प्रयास है।
01:39उंकार की प्रत्येक ध्वनी एक सुक्ष्म तत्व का स्रिजन कर रही है, जो भविश्य के ब्रहमांड का आधार बनेगा।
01:47यह वहक्षन है, जब स्रिष्टी के वास्तुकार के अद्रिश्य होने के बावजूद, उनकी उपस्थिती का अनुभव पूरे शुनि में हो
01:55रहा है।
01:57नारद मुनि उस महाबीज के अंकुरन को ध्यानमगन होकर देख रहे हैं, जो अंतरिक्ष में अपनी प्रथम शाखाएं फैला रहा
02:05है।
02:06नारद ने अनुभव किया कि कैसे यह प्रकाश की किर्णे अब समय की एक अनवरत धारा में परिवर्तित हो रही
02:14है।
02:16प्रकाश के इन सुक्ष्म कणों के मिलन से एक दिव्य उश्मा उत्पन हो रही है, जो स्रिजन की गर्माहट का
02:23अनुभव करा रही है।
02:25ब्रहमांड के इस प्रारंभिक विस्तार में नारद मुनी स्वयं को एक तुछ दर्शक मानकर उस दिव्य योजना को नमन कर
02:33रही है।
02:35ओंकार का स्पंदन अब तेज हो गया है, जिससे प्रकाश की किर्णे एक विशाल जाल का स्वरूप ले चुकी है।
02:44नारद मुनी ने महसूस किया कि इस जाल के प्रत्येक बिंदु पर स्विजन के नए नियम अनकित किये जा रहे
02:51हैं।
02:53स्रिष्टी के वास्तुकार की पहली आहट ने शूने की निरवता को हमेशा के लिए समाक्ट कर दिया है।
03:00अब ब्रहमांड का जन्म केवल समय की बात है और नारद मुनी इस दिव्य साक्षी के रूप में अपना स्थान
03:07ले चुके हैं।
03:10ब्रहमांड के शूने में तैरते हुए जल के कन अब धीरे-धीरे जमने लगे हैं।
03:15जिससे एक विशाल और अनन्त नीले रंका महासागर आकार लेने लगा है।
03:21महासागर के केंद्र में स्थित दिव्य शया पर लेटे भगवान विश्नु ने अपनी कमल जैसी आखो को मंदमंद खोला, जिससे
03:29संपून ब्रहमांड एक सुनहरी चमक से भर गया।
03:33विश्नु के मुख से निकलने वाली नाद ब्रहमा की गूंच से पंचधूतों का संगठन और अधिक तीवर हो गया है,
03:41जिससे सुक्ष्म उर्जा तरंगे एक केंद्र की ओर खिंची चलिया रही है।
03:47महासागर की गहराई से एक विशाल कमल का पुष्क प्रकट हुआ, जिसकी पंखुडिया ब्रहमांड के समस्त रहसियों को अपने भीतर
03:55समेटे हुए हैं।
03:57कमल की प्रतेक पंखुडी के साथ स्रिष्टी के नए नियम, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का अंकुरण अंतरिक्ष में हो
04:05रहा है।
04:07नारद मुनी अपनी वीना को थामे उस अध्भुत द्रिश्य को देख रहे हैं, जहां ब्रहमा का प्राकट्य होने वाला है।
04:15अगनी तत्व ने अब अपना प्रभाव दिखाते हुए अंतरिक्ष को प्रकाश और उश्मा से भर दिया है, जिससे आकाश में
04:23पहली बार नक्षत्रों का जन्म हुआ।
04:26विश्नु के हृदय से निकलती हुई दिव्यक्रिपा अब ब्रहमा के आगमन के लिए मार्ग प्रशस्त कर रही है।
04:34प्रिथवी तत्व का स्रिजन होते ही, अंतरिक्ष में एक विशाल और ठोस नीम का निर्मान हुआ जो भविश्य के लोकों
04:42का आधार बनेगी।
04:44वायू के अधरिश प्रवाह ने ब्रहमान के तत्वों में गती भर दी है, जिससे शूने में सन्नाटा अब संगीत में
04:51बदलने लगा है।
04:54विश्नु के रोमरोम से निकलने वाली उर्जा अब ब्रहमान के विस्तार की गती को नियंतरित कर रही है।
05:02स्रिष्टी के वास्तुकार के प्रकट होने से पहले का यहक्षन संपूर्ण अस्तित्व के लिए एक शांत और गंभीर प्रतिज्या के
05:09समान है
05:12ब्रहमांड के सभी देवता अपनी अद्रिश्य उपस्थिती से इस दिव्यक्षन के साक्षी बन रहे है
05:20नारद मुनी के मुख से अब अन्जाने में ही स्रिष्टी के प्रथम श्लोक की रचना होने लगी है जो समय
05:26के चक्र को गती दे रही है
05:30अचानक उस विशाल कमल के भीतर से एक दिव्यस पंदन उठा जिसने संपूर्ण नीरक्षीर सागर को आंदोलित कर दिया
05:39पंचभूतों का एकी करण अब पूर्णता की ओर है जहां जल, अगनी, वायु, प्रित्वी और आकाश एक नए धाचे में
05:46ढल गए है
05:49कमल के भीतर से चतुर मुखी ब्रहमा के दिव्यतेज की पहली जलत ने ब्रहमांड को अंधकार से मुक्त कर दिया
05:56है
05:57स्रिष्टी के वास्तुकार के नेत्र खुलने का क्षण निकट है, जिससे काल और कर्म का नया युग प्रारंभ होगा
06:05नारद मुनी ने हाथ जोड कर इस दिव्य आगमन का स्वागत किया, उनकी आखों में स्रिजन के प्रती अगात श्रद्धा
06:13है
06:14अब समय आ गया है कि स्रिष्टी अपने प्रतम निर्माता की द्रिष्टी से अस्तित्व में आये और ब्रह्मांड का भाग्य
06:22निर्धारित हो
06:24ब्रह्मांड के विशाल शूने में एक स्वर्णिम प्रकाश का गोला धीरे-धीरे घनीभूत होने लगा, जो स्रिष्टी के वास्तुकार के
06:32आगमन का संकेत था
06:34नारद मुनी ने अपनी वीना को शांत करते हुए उस दिव्य तेज की और अपनी द्रिष्टी स्थिर कर ली, जहां
06:41से स्रिष्टी का प्रथम शब्द गूजने वाला था
06:45प्रकाश के उस महाबीज से धीरे-धीरे एक दिव्य आकरिती का आभास होने लगा, जो स्वर्ण की कांती और अनंत
06:53शांती से सुसज्जित थी
06:56अंतरिक्ष में एक अलौकिक सुगंध का प्रसार हुआ, जो इस बात का साक्षी था कि स्रिजन की उर्जा अब निराकार
07:03से साकार रूप धारन कर रही है
07:07अचानक उस प्रकाश पुन्च के भीतर से पहली दिव्य स्पंदन हुई, जिसने चारों दिशाओं को एक नए अनुशासन में बांधना
07:14प्रारंभ कर दिया
07:16नारद मुनी की आखों में अश्रुच छलक आये, क्योंकि उन्होंने देखा की कैसे काल का चक्र पहली बार अपनी गतिशीलता
07:24प्राप्त कर रहा है
07:27स्रिष्टी के वास्तुकार के मस्तक पर विद्यमान दिव्य तिलक चमक उठा, जिससे संपून ब्रहमांड में ज्यान का प्रथम प्रकाश प्रजवलित
07:35हो गया
07:37ब्रहमांड के सभी तत्व एक लैबद्ध संगीत में बंध गये, जो ब्रहमा के हृदय की पहली धड़कन के साथ तालमिल
07:44बिठा रहे थे
07:47वास्तुकार ने अपने नेत्र खोलने की प्रक्रिया आरंभ की, जिससे अनंत काल का मौन भंग होने की दहलीज पर आ
07:54गया
07:56देवर्शी नारद ने अपनी वीना पर एक मंद स्वर छेड़ा, जो स्रिजन की इस पावन घड़ी को एक संगीत में
08:03भेंट समर्पित करता है
08:06ब्रहमांड के कणकण में एक पुलकन दोड़ गई, क्योंकि निर्माता की द्रिष्टी के लिए अब केवल एक पल का अंतरशेश
08:13था
08:15स्रिष्टी के नए नियमों को निर्धारित करने वाली दिव्य शक्ती अब पूरी तरह से सक्रिय हो चुकी थी, जो शूने
08:22को एक आधार प्रदान कर रही थी
08:25वास्तुकार के मस्तक के पीछे का दिव्य प्रभामंडल और भी तीवर हो गया, जिसने संपूर्ण अंतरिक्ष को स्वर्ण में आभासे
08:33भर दिया
08:35नारद मुनी ने अपनी द्रिष्टी जुका ली, क्योंकि उस निर्माता के तेज को सहन करना किसी भी सामान्य चेतना के
08:42लिए संभव नहीं था
08:44तभी एक दिव्य हुंकार हुई, जिससे स्रिष्टी के प्रथम अंकुर ने अपना आकार धारन कर लिया और ब्रहमांड का विस्तार
08:53प्रारंभ हुआ
08:55ब्रहमांड के शूने का अंधकार अब पूरी तरह से विलीन हो गया था और उसकी जगह एक प्रकाश्मई व्यवस्था ले
09:02रही थी
09:04वास्तुकार का संपूर्ण शरीर अब दिव्य आभूशनों और वेदों के ज्यान से सुसज्जित होकर पूर्णता प्राप्त कर चुका था
09:13नारद मुनी ने एक गहरा श्वास लिया क्योंकि उन्हें ग्यात था कि अब केवल एक सेकंड का समय बचा है
09:20जब स्रिष्टी अपने पूर्ण व्यभव के साथ प्रकट होगी
09:24अंतिन क्षणों की शांती पूरे ब्रहमांड में व्याप्थ हो गई जहां समय भी अपनी गती को थाम कर उस महान
09:31क्षण की प्रतीक्षा करने लगा
09:34और फिर वह काल आया जब स्रिष्टी के वास्तुकार ने पहली बार अपने नेत्र खोले जिससे एक साथ अंगिनत आकाश
09:43गंगाओं का जन्म हो गया
09:45ब्रहमा के नेत्र खुलते ही नाभिक्मल से फूट्ती दिव्य रश्मिया पूरे शूने को एक स्वर्णिन प्रकाश के सागर में बदल
09:52देती हैं
09:55विश्णु भगवान जो शेश्शया पर विराजमान थे ब्रहमा के इस नवप्राकट्य को देख अपनी मंद मुस्कान के साथ आशिरवाद मुद्रा
10:04में हाथ उठाते हैं
10:06ब्रहमा का सुक्ष्म शरीर धीरे धीरे स्थूल आकार लेने लगता है जिससे ब्रहमान के कंकन में एक अध्भुत कंपन दोड़
10:15जाता है
10:16उस महान दिव्यक्षण में ब्रहमा के चारों मुखों से चार वेदों की ध्वनिया प्रस्पुटित होकर अंतरिक्ष के मौन को भंग
10:24कर देती हैं
10:26चारों दिशाओं में ब्रहमा के सौमय तेज का विस्तार होने लगता है जिससे आकाश गंगाओं की पहली श्रिंख लाएं अपनी
10:34धुरी पर स्थिर होने लगती है
10:38विश्नु का ध्यान जो अब तक शूनिय में लीन था अब ब्रहमा की ओर मुर्ता है ताकि सृष्टी के प्रथम
10:45संकल्प को गती मिल सके
10:47ब्रहमा अपने हाथों में स्थित कमंडल से जल के कणों का छिड़काव करते हैं जिससे अंतरिक्ष में जीवन के आधार
10:55भूत तत्व सक्रिय हो जाते हैं
10:59ब्रहमांड की सीमाओं का निर्धारन करने हेतु ब्रहमा अपने संकल्प से एक अद्रिश घेरा खीचते हैं, जो समय की पहली
11:07सीमा बन जाता है
11:10संपूर्ण शून्यता अब एक संगठित ब्रहमांड में परिवर्तित हो रही है, जहां ब्रहमा के नेत्रों की चमक नक्षत्रों के रूप
11:17में चमक रही है
11:20नारायन की द्रिश्टी में शृष्टी का यह अध्भुत नित्य किसी महायग्य की पूर्णाहूती जैसा प्रतीत हो रहा है
11:28ब्रहमा का तेज अब एक दिव्य धवल प्रकाश पुझ में परिवर्तित होकर ब्रहमांड के केंद्र में स्थित होकर स्थिर्ता प्रदान
11:36कर रहा है
11:38इस शांतिपूर्ण स्रिजन के वातावर्ण में स्रिष्टी का वास्तुकार अपनी पहली श्वास लेता है जिससे वायू और प्राण की उत्पत्ती
11:47होती है
11:49ब्रहमांड के इस विशाल विस्तार में ब्रहमा स्वयन को उस दिव्य उर्जा के साथ एक रूप कर लेते हैं जो
11:56स्वय नारायन का अंश है
11:59विश्णु का सुक्ष्म स्वर ब्रहमा के हृदय में गूँजता है जो उन्हें स्रिष्टी के उत्तरदायत्व का प्रथम पाठ पढ़ाता है
12:08ब्रहमा की उंगलियों से निकलते हुए उर्जा के सूत्र ब्रहमांड के सुक्ष्म तत्वों को एक दूसरे के साथ जोड़ने का
12:16कार्य कर रहे हैं
12:19प्रतिकात्मक रूप से ब्रहमा का उदे उस अंधकार का अंध है जिसने प्रलै के समय पूरी स्रिष्टी को अपनी गोद
12:26में समेट रखा था
12:28दूर कहीं ब्रहमांड के छोर पर समय की पहली घडी का कांटा ब्रहमा की इच्छा से टिक-टिक करने लगा
12:35है
12:37नारायन अब अपनी शया से उठकर ब्रहमा की ओर कदम बढ़ाते हैं यह सुनिष्चित करने के लिए कि स्रिष्टी का
12:44पत सत्य और धर्म के अनुकूल हो
12:48ब्रहमा के चार मुख अब एक साथ वेदों का उच्चारण कर रहे हैं, जिनकी धुन से ब्रहमांड के सभी ग्रह
12:55अपनी अपनी कक्षाओं में स्थापित हो रहे हैं
12:59इस प्रकार शूनिय से निकली यह स्रिष्टी अब अपने वास्तुकार के मार्क दर्शन में पूर्णता की ओर अग्रसर हो रही
13:06है
13:08ब्रहमा के हृदय में अचानक पूर्व कल्पों की अनंत स्मृतिया एक तीवर प्रकाश पुन्च की भांती प्रवाहित होने लगी, मानो
13:16समय का चक्र पुनह सक्रिय हो गया हो
13:20भगवान नारायन ने ब्रहमा की ओर अपनी करुणा भरी द्रिष्टी डाली, जो यह स्पष्ट कर रही थी कि स्रिजन का
13:27यह भार केवल ज्यान का नहीं, बल्कि उत्तरदायत्व का है
13:32ब्रहमा ने अपने चारों मुखों से वेदों की रिचाओं के साथ साथ उन प्राचीन अनुभवों को भी आत्मसाथ किया, जो
13:40उन्हें इस बार की स्रिष्टी को त्रुटिहीन बनाने की प्रेणा दे रहे थे
13:45ब्रहमांड के शूने में एक दिव्यज्योती उत्पन्न हुई, जो ब्रहमा की स्मृती में संजोए गए उन सिध्धान्तों का मूर्त रूप
13:53थी जिन्हें वे अब साकार करने जा रहे थे
13:57नारायन के संकेत पर ब्रहमा ने अपने ध्यान की शक्तियों को ब्रहमांड के विस्तार में फैलाना शुरू किया, ताकि स्रिष्टी
14:05का हरकन उनके अनुशासन से बंध जाए
14:09नारद मुनी जो इस अद्भुत परिवर्तन के साक्षी थे, ने अनुभव किया कि ब्रहमा का विवेक अब अधिक परिपक्व और
14:17सजग हो गया है
14:19ब्रहमा ने अपने हाथों में स्थित कमंडल के जल को अंतरिक्ष में बिखेरा, जिससे वेदों के मंत्रों का कमपन पहली
14:27बार सघन पदार्थों के रूप में प्रकट होने लगा
14:31स्रिष्टी के इस सुक्ष्म आधार में ब्रहमा ने अपने पिछले अनुभवों के ज्ञान को इस तरह पिरो दिया कि यह
14:38काल के थपेडों को भी सहन करने में सक्षम हो
14:41पूरे ब्रहमांड में एक शांत और दिव्यस पंदन गूँज उठा जो ब्रहमा के द्वारा स्थापित किये गए नए नियमों की
14:49पहली पुष्टी थी
14:51भगवान नारायन मंदमंद मुस्कुराते हुए ब्रहमा के आत्म विश्वास को देख रहे थे क्योंकि वे जानते थे कि अब स्रिष्टी
14:59धर्म की धुरी पर स्थिर होगी
15:02ब्रहमा के चार मुखों से अब निरंतर एक उच्च लए में मंत्रों चारण हो रहा था जिससे शूनी में ग्रहंक्षत्रों
15:10का धाचा व्यवस्थित होने लगा था
15:13एक स्वर्णमें तेज ने ब्रहमा को घेर लिया जो इस बात का प्रतीक था कि वे अब स्रिजन के असीमित
15:20ज्ञान से पूर्णता युक्थ हो चुके हैं
15:23स्रिष्टी के वास्तुकार के रूप में ब्रहमा ने उन सभी स्मृतियों को एक दिव्यग्रंथ के रूप में अपने भीतर सुरक्षित
15:31कर लिया जो आने वाले युगों का आधार बनेंगी
15:36नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा जिससे ब्रहमा के बनाए नियमों के प्रती ब्रहमांड में एक आनंदमई
15:43स्विकार्यता का संचार हुआ
15:46ब्रहमा ने अंतरिक्ष के एक विशिष्ट बिंदु पर ध्यान के इंद्रित किया जहां से भौतिक स्रिष्टी का भौतिक निर्मान वास्तव
15:54में गती पकड़ेगा
15:56स्रिष्टी के इन नियमों के साथ एक अलौकिक शान्ती का उदे हुआ जो पिछले सभी चक्रों की अराजक्ता को शान्त
16:03करने के लिए परियाप्त थी
16:06ब्रह्मा ने अपनी आखें खोली और उनकी द्रिष्टी में वह स्पष्टता थी जो पहले कभी नहीं देखी गई थी क्योंकि
16:14अब वे द्रिष्टा और रच्चिता दोनों थे
16:18नारायन के साथ एक मूख समवाद में ब्रह्मा ने स्वीकृती दी की वे इस बार की स्रिष्टी में धर्म के
16:24प्रती पूर्ण समर्पित रहेंगे
16:28ब्रह्मांड के हर पर्मानु में अब ब्रह्मा के संकल्प का स्पंदन सुनाई दे रहा था, जो की एक सुव्यवस्थित और
16:35धर्म में स्रिष्टी का शंकनाद था
16:38स्रिष्टी के वास्तुकार ने पहली बार अपनी पूर्ण जागरित चेतना के साथ ब्रह्मांड को देखा और इसी क्षण से नए
16:46कालचकर की पहली धड़कन शुरू हुई
16:49ब्रह्मा ने अपने मानस से संकल्प की उन तरंगों को उत्पन किया जो ब्रह्मांड के प्रथम अनुशासन के रूप में
16:57अंतरिक्ष में फैलने लगी
16:59नारायन ने मंद मुस्कान के साथ ब्रह्मा को देखा जैसे वे इस नई स्रिष्टी की कठिन यात्रा के लिए उन्हें
17:07मौन आशिरवाद दे रहे हो
17:09ब्रह्मा के हाथों से निकली सुनहरी किरने अंतरिक्ष में एक सुक्ष्म रेखाचितर की भाती भौतिक सीमाओं को बुनने लगी
17:19अस्तित्व के इन प्राथमिक नियमों के चारों और एक दिव्य सुरक्षा कवच का निर्मान हुआ जिससे अराजक्ता का हर अंश
17:26दूर हो गया
17:28ब्रह्मा ने काल के विभाजन की घोशना की जिससे समय की पहली सुक्ष्म गती ब्रह्माण में स्पंदित होने लगी
17:37नारायन के नेत्रों में ब्रह्माण्डिय सत्य का प्रतिबिंब था उन्होंने संकेत दिया कि नियमों की कठोरता ही स्रिष्टी को धारण
17:45करेगी
17:46स्रिष्टी के इन नियमों के साथ ही पदार्थ की पहली इंट के रूप में पंच्तत्वों के सुक्ष्म स्वरूपों का अंकुरण
17:53हुआ
17:55ब्रहमांड की हर दिशा में एक दिव्यस तंभसा खड़ा हुआ जैसे कोई अद्रिश्य वास्तुकार पूरे भवन को मजबूती दे रहा
18:03हो
18:04ब्रहमा ने एकाग्रचित्त होकर उन नियमों को लिपिबद्ध किया जो अब से सूर्य, चंद्र और तारों की गती तै करेंगे
18:13नारायन ने एक सौमे मुद्रा में अपनी भुजा उठाई जिससे ब्रहमा द्वारा बनाए गए नियमों को शाश्वत स्थिर्ता प्राप्थ हुई
18:22उर्जा के महासागर में अब नए नियमों की लहरें उठने लगी, जिससे पदार्थ को ठोस आकार मिलने का मार्ग प्रशस्थ
18:30हुआ
18:32स्रिष्टी के इस प्रथम अनुशासन की गूंज वैकुंट के हर रत्न और स्तंब से टकरा कर संगीत के रूप में
18:38मुखरित होने लगी
18:41ब्रहमा ने संकल्प लिया कि इस बार की स्रिष्टी में धर्म और अधर्म की सीमाएं पत्थर की लकीर जैसी स्पष्ठ
18:48होंगी
18:50नारायन ने ब्रहमा के प्रती अपनी स्वीकृती प्रकट की उनकी डैविय कांती और अधिक तीवर हो गई
18:58नियमों के जाल ने अब अंतरिक्ष को एक दिशा दे दी थी जहां से अब आगे के निर्मान का कार्य
19:04सुगम हो गया था
19:06ब्रहमान की शुन्यता अब एक व्यवस्थित प्रयोगशाला में बदल चुकी थी जहां ब्रहमाने निर्मान की अपनी पहली विधी पूरी की
19:16प्रकृती के तत्व अब ब्रहमा के निर्देशों को सुनने के लिए लालायत थे क्योंकि नियम बन कर तयार थे
19:24नारायन के मुख से निकली एक शांत ध्वनी ने पूरे ब्रहमान में शांती का संचार कर दिया
19:30अब नियम बन चुके थे और ब्रहमाने द्रिश्टी दोडाई उस खाली स्थान पर जहां अब संसार के बीज बोए जाने
19:38थे
19:40ब्रहमान का यह पहला अनुशासन काल के प्रवाह में एक ऐसी नीव बना जिस पर आने वाली अनन्त पीढिया टिकी
19:47रहींगी
19:49ब्रहमा के चारों मुखों से निकलती हुई दिव्य जोतिया अंतरिक्ष के उस रिक्ट स्थान में गणितिय रिखाओं के रूप में
19:56फैल रही थी
19:58नारद मुने अपनी वीना को थामे हुए स्तब्ध खड़े थे क्योंकि वे जानते थे कि आज रचा जाने वाला हर
20:05अंक भविश्य के पूरे ब्रहमांड की नियती तय करेगा
20:10ब्रहमा ने अपनी तरजनी से शून्य में एक बिंदु अंकित किया जो देखते ही देखते काल के चक्र का प्रथम
20:17केंद्र बन गया
20:18इस सुक्ष्म बिंदु के चारों और स्वर्ण में प्रकाश की लहरें एक जटिल चक्र का रूप धारन करने लगी जो
20:26ब्रहमांड की धुरी बन गई
20:29ब्रहमांड की विशालता को एक व्यवस्थित साचे में ढालने के लिए ब्रहमा अब उन जटिल गणनाओं में डूप गए थे
20:36जो वेदों के सार से प्रेरित थी
20:39नारद ने देखा की कैसे ब्रहमा की प्रत्येक श्वास के साथ स्रिष्टी के उन तत्वों में संतुलन का संचार हो
20:46रहा था
20:48ब्रहमा की एक आगरता ने अंतरिक्ष में व्याप्त मौन को एक विशिष्ट लए प्रदान की जो धीरे-धीरे संगीत में
20:55बदलने लगी
20:57शुन्य में तैरते हुए वे नियम अब एक चमकते हुए स्वर्ण कवच के समान पूरी स्रिष्टी को सुरक्षा प्रदान करने
21:04लगे
21:06स्रिष्टी के इस प्रथम शिल्पकार के चारों मुख अब एक साथ वेदों की उन सुक्षम रिचाओं का उच्चारण कर रहे
21:13थे जिनसे नियम स्थिर हो रहे थे
21:16नारद ने श्रद्धा पूर्वक अपना मस्तक जुकाया क्योंकि उन्हें ग्यात था कि वे जिस प्रक्रिया को देख रहे हैं वह
21:24अपारगर्शी भविश्य को स्पष्टता दे रही है
21:28अचानक ब्रहमा ने अपनी आखें खोली और उनकी द्रिष्टी के संपर्क में आते ही उन गणितिय रिखाओं में प्राण का
21:36संचार हो गया
21:38प्रकाश की वे पहली किरने पूरे ब्रहमांड में किसी महाविस्पोर्ट की शान्ती के साथ फैल गई जैसे कोई सोई हुई
21:45चेतना जाग उठी हो
21:48ब्रहमांड के उन प्रधम नियमों को एक अदरिष्य लिपी में ब्रहमांड की भित्तियों पर अंकित किया गया ताकि कोई भी
21:55इसे मिटा न सके
21:58नारद की आखों में वह द्रिश्य अंकित हो गया, जैसे वे किसी कालजई ग्रंथ के प्रथम प्रिष्ट का अवलोकन कर
22:05रही हो
22:07ब्रहमा ने हाथ हिला कर उन नियमों को एक दिशा दी, जिससे ब्रहमांड में घूर्णन और वेक का जन्म हुआ
22:15प्रकृती के ये नियम अब स्वसंचालित हो चुके थे और ब्रहमा को अपनी रचना पर एक संतुष्ट मुस्कान का अनुभव
22:22हुआ
22:24ब्रहमांड की उस नीव के उपर अब नई आकाश गंगाओं के निर्मान की संभावना प्रबल होने लगी थी
22:31नारद ने वीना के तारों को छेड़ा और उस नई स्रिष्टी के सम्मान में एक मधुर राक छेड़ दिया
22:39यह लए उन नियमों के साथ घुल मिल गई जिससे पूरे ब्रहमांड में एक नई सामंजस्य पूर्ण धड़कन सुनाई देने
22:47लगी
22:48स्रिष्टी के वास्तुकार ने पहली बार अपनी पूर्ण रचना को निहारा और जान गए कि अब ब्रहमांड अपनी नेती लिखने
22:56के लिए तयार है
22:58ब्रहमांड के विशाल रिक्ट स्थान में काल की प्रथम किरण ने सुनहरी रेखा बनकर अपना प्रवेश किया जिससे अंधकार की
23:06परतें छंटने लगी
23:09स्रिष्टी के वास्तुकार ब्रहमा ने अपने नेत्रों के सम्मुख उस दिव्यस पंदन को देखा जो काल को एक निश्चित दिशा
23:16देने के लिए आतुर था
23:19काल की पहली धड़कन एक सुक्ष्म तरंग बनकर पूरे ब्रहमांड में फैल गई जिसने पदार्थ को आकार देने की प्रक्रिया
23:27तेज कर दी
23:28जह समय का प्रथम प्रहर था, जहां हरकन अपनी स्थेर्था को त्याक कर ब्रहमांडिय नियमों के अनुशासन में बंधने को
23:36तयार था
23:38ब्रह्मा ने अपनी स्रिजन शक्ती को सक्रिय किया, जिससे अंतरिक्ष में तैरते सुक्ष्म तत्वों में जीवन का संचार होने लगा
23:47उनके मुख से निकले मंत्रों की गूंजने शूने को मुखरित कर दिया और समय का चक्र अपनी धुरी पर पहली
23:54बार घूमा
23:56स्रिष्टी की आधार शिला रखने है तू ब्रह्मा ने अपने हाथों से प्रकाश के तंतूओं को बुना, जिससे पहली बार
24:03आकाश और पाताल की सीमाए निश्चित हुई
24:07एक अद्रिष्य घडी की टिक-टिक ब्रहमांड के कोने-कोने में गूंजी, जिसने काल के प्रथम प्रहर के अंत और
24:14द्वितिय के आरंभ को चिनहित किया
24:17इस नए ब्रहमांडिय परिवेश में प्रकाश की तीवरता बढ़ने लगी, जिससे चारों ओर की धुन्ध छंट गई और एक नई
24:25स्पष्टता उत्पन हुई
24:27ब्रहमा का मुख मंडल एक अलौकिक मुस्कान से भर उठा, क्योंकि उन्होंने देखा कि उनकी संकल्प शक्ती से समय स्वय
24:35एक जीवित इकाई बन गया है
24:39समय की उस पहली किरण के स्पर्ष से शूने में तैर रहे सुक्षम तत्व धीरे-धीरे एक ठोस रूप लेने
24:46लगे
24:47ब्रहमांड के इस नए धाचे के चारों और उर्जा का एक सुरक्षा कवच निर्मित हुआ, जो समय के प्रवाह को
24:54नियंत्रित करने के लिए था
24:57ब्रहमा ने अपनी दाएं हथेली उठाई, जिससे काल का प्रवाह अधिक गतिमान हो गया और स्रिष्टी के पहिये की गती
25:05तीवर हो गई
25:07चारों दिशाओं में समय की लहरें एक साथ प्रवाहित हुई, जिससे हर स्थान पर एक समान काल का उदे हुआ
25:15स्रिष्टी के निर्माता की द्रिष्टी अब उस विशालतम रचना पर थी, जो अब आत्मसंचालित होने की दिशा में अग्रसर थी
25:24आकाश में बिखरी चमकती हुई उर्जा ने अब नक्षत्रों की प्रारंभिक रूपरेखा लेना शुरू कर दिया था
25:32समय का प्रथम प्रहर अपनी परिंती की ओर बढ़ रहा था और हर क्षण एक नए नियम को जन्म दे
25:39रहा था
25:40ब्रहमा के अस्तित्व से निकली एक दिव्य जोती ने ब्रहमांड के अंतिम छोर तक पहुँचकर एक धेरा तयार किया
25:48पूरा ब्रहमांड अब एक लए में स्पंदित हो रहा था जैसे कोई विशाल हृदय समय के साथ धड़क रहा हो
25:57प्रथम प्रहर के अंत में ब्रहमा ने अपनी आखे मूंद ली और काल का प्रवाह अब स्वतंत्र रूप से बहने
26:04के लिए तयार था
26:06ब्रहमा की बंद पलकों के भीतर एक सुख्षम बीज का उदे हुआ जो धीरे धीरे अनंत रिक्ट स्थान में फैलने
26:13लगा
26:15भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा के बीच से ही स्रिष्टी के इस प्रथम स्पंदन को देख कर मंद मंद मुस्कुरा
26:22उठे
26:23उस बीज की नाभिकिये उर्जा से निकली पहली प्रकाश की किरण ने शूने के अंधकार को चीर कर दिशाओं का
26:30निर्मान किया
26:32स्रिष्टी का यह अंकुरण अब एक विशाल स्वर्ण कमल के रूप में आकार लेने लगा था जिसके गर्भ में संपून
26:40ब्रहमांड के नक्षत्र समाहित थे
26:43नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को छेडा और उस अद्भुत रचना के स्वागत में पहला ब्रहमांडिय राक अलापा
26:52नारद मुनी जिनकी आभा एक सन्यासी की भांती शांत और मुख पर ज्ञान का तेज है इस नई स्रिष्टी को
26:59देखकर भाव विभोर हो गए
27:02वेनु की ध्वनी के साथ ही उस स्वर्ण कमल की पंखुडिया ब्रहमांड के विस्तार के साथ खुलने लगी
27:09ब्रहमांडी उर्जा अब एक चक्रवात का रूप ले चुकी थी जो ब्रहमा के संकल्प को पदार्थ में बदल रही थी
27:18विस्त्रिक पटल पर आकाश गंगाओं की पहली संरचनाएं चमकते हुए बिंदूओं के रूप में उभरने लगी
27:25गरुड अपनी स्वर्ण पंखों की छटा के साथ भगवान विश्नु के चर्मों में जुपकर इस अध्भुत नवनिर्मान को निहारने लगा
27:34हर एक तारा एक देवशक्ती का प्रतिनिधी बनकर आकाश की नीली चादर पर चमकने लगा
27:42ब्रहमान्ड की यह पहली संग्रचना एक ननहे शिशु के पहले स्पंदन की तरहे जीवन्त प्रतीत हो रही थी
27:50दूर दूर तक फैले इस शूने में अब जीवन के संकेतों का आधार भूत तत्व निर्मित हो चुका था
27:57भगवान शिवने कैलाश की उचाईयों से अपनी त्रिनेत्र की एक जलक से उस बीज में चेतना का संचार किया
28:06चेतना के प्रवेश करते ही पदार्थ के कणों में गुरुत्वा कर्शन और गती का तालमेल बैठने लगा
28:13एक अकल्पनिय अनुशासन के साथ आकाश गंगाओं ने अपने निश्चित्पत का चुनाव करना प्रारंब किया
28:21स्रिष्टी का यह अंकुरन अब अपनी जडों को काल के विस्तार में गहराई से जमा चुका था
28:28ब्रह्मा की निद्रा और विष्णो की मुस्कान के मिलन ने काल चक्र की पहली धुरी का निर्मान किया
28:35अंकुरत हो चुका यह ब्रह्मांड अब अपनी पहली सास लेने के लिए तैयार खड़ा था
28:41स्रिष्टी के वास्तुकार ने पुनह अपनी दिव्यद्रिष्टी खोली और इस अंकुरत ब्रह्मांड में प्रकाश का प्रलया गया
28:50ब्रह्मांड के शुने में फैली अनंत खामोशी अचानक एक कमपन से काम उठी जैसे स्रिष्टी ने पहली बार अपनी चेतना
28:58की धड़कने महसूस की हो
29:01भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से जागते हुए मुस्कुराएं और उनकी उस सौमय मुस्कान से अंतरिक्ष में दिव्यस पंदन की
29:09लहरें दोड़ गई
29:11नारद मुनी ने देखा कि ब्रहमा के खुलते ही नेत्रों से निकली तेज किरने ब्रहमांड के अग्रिश्य धागों को बुनने
29:18लगी
29:20चारों और व्याप्त दिव्य नीलिमा में एक नया और अनपेक्षित प्रकाश पुंज उभर रहा था जो अस्तित्व के जटिल नियमों
29:28का आधार बनने वाला था
29:30ब्रहमांड के हर कोने में अब काल का सूक्ष्म चक्र सक्रिय हो गया था जिसे समय की पहली सांस कहा
29:37जा सकता था
29:39नारद मुनी का मस्तक विसमय से जुप गया क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि स्रिष्टी का प्रत्यक कन अब एक दैविय
29:46अनुशासन से बंधने वाला है
29:50ब्रहमा के चार मुखों से निकले वेदमंत्रों ने अंतरिक्ष की स्तब्धता को तोड़ कर पहली बार ध्वनी की रचना की
29:58ध्वनी के इन स्पंदनों ने आकाश में रंगीन उर्जा की आकृतियां बनानी शुरू कर दी जो वास्तुशिल्प का आधार बनी
30:07स्रिष्टी का यह विशाल भवन अब नीम्द के पत्थरों की तरहे सत्रंगी प्रकाश पुंजों से जगमगा उठा था
30:15विश्णु ने अपनी दाहिनी हथेली उठाई और उस संकेट से स्रिष्टी की मर्यादाओं के पहले नियम ने आकार लिया
30:24नियमों की यह श्रिंखला ब्रहमांड के कणकण में समा गई जिससे अनियंत्रित अराजक्ता का अंत हो गया
30:31अब हर क्रिया के पीछे एक प्रतिक्रिया सुनिश्चित हो गई थी जो काल के इस नए यूग की पहचान बनी
30:40नारद मुनी ने देखा की कैसे ब्रहमांड के इस पुनरगठन से नक्षत्रों और ग्रहों के बनने की प्रक्रिया तेज हो
30:47गई थी
30:49भगवान विश्नु का ध्यान अब उस महाबीज पर था जो अब एक विशालकाय तेजोमय जोती में बदल चुका था
30:57ब्रहमा का हर विचार अब एक नई दिशा को जन्न दे रहा था जो स्रिष्टी के नक्षे को व्यापक बनाता
31:04गया
31:05स्रिष्टी का द्वार खुल चुका था और प्रकाश की पहली रेखाओं ने ब्रहमांड के हर अंधेरे कोने को आलोकित कर
31:12दिया
31:14नारद मुनी के मुख से स्वतह ही नारायन के जैकारे निकल पड़े इस महा प्रिवर्तन को देख कर उनका हृदय
31:21गदगद हो गया
31:23ब्रहमांड ने अपनी पहली व्यवस्थित सास ली जिससे तत्वों का संतुलन पूर्णता की ओर अग्रसर हुआ
31:31इस नए युग के उदे के साथ अब ब्रहमा और विश्णु की सहमती ने स्रिष्टी को एक निश्चित गती प्रदान
31:38कर दी
31:39स्रिष्टी का वास्तुकार अब अपने निर्मान को जीवन्त होते देख रहा था और ब्रहमांड का भाग्य अब एक नई दिशा
31:47में प्रवाहित होने लगा