इस एपिसोड में जानिए भगवान शिव के अवधूत स्वरूप के उस विकराल रूप को, जिसने सृष्टि की अराजकता को भस्म कर दिया। नारद मुनि की आँखों के सामने कैसे नष्ट हुआ वह शून्य का प्रभाव जिसने ब्रह्मांड को खंडित कर दिया था? ब्रह्मवैवर्त पुराण का यह 29वां रहस्यमयी अध्याय आपको रोंगटे खड़े कर देगा। क्या अब सृष्टि का नया चक्र प्रारंभ होगा? #BrahmavaivartaPurana #LordShiva #NaradMuni #Mythology #SpiritualJourney #SanatanDharma #Puranas
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00:00ब्रहमांड के समस्ट आयामों में एक भयावः और गेहन सन्नाटा पसर गया है। मानो प्रकृती ने स्वयं को शिव के
00:07उस महाध्वनी के बाद थमा लिया हो।
00:11नारद मुनी अपनी वीना को थामे उस दिव्यकम्पन को महसूस करते हैं जो अब ब्रहमांड की हर नस में जड़वत
00:18हो चुकी है।
00:20शिव के अवधूत स्वरूग की शांत मुद्रा ने अंतरिक्ष के उन बिखरे हुए कणों को जैसे किसी चुम्बकिये शक्ती से
00:28बांध लिया है।
00:30तारागन और नक्षत्र भी उस शूने की विशालता में अपनी चमक खोकर शिव की उस मौन उर्जा के प्रती नत्मस्तक
00:38प्रतीत हो रहे हैं।
00:41विस्तरत आकाश गंगा की धारिया अब उस स्थिर उर्जा के घेरे में आकर एक नई संग्रचना की ओर अग्रसर होने
00:48लगी हैं।
00:50भगवान विश्नु जो शेशनाग की सया पर विराजित हैं। इस महा प्रिवर्तन को देख कर अपनी मंद मुस्कान के साथ
00:58ब्रहमांड के पुनरजन्म का संकेत दे रहे हैं।
01:03गरुर के पंकों की फड़फडाहट भी उस संनाटे में विलीन हो गई है, जैसे काल स्वय ठहर कर इस घटना
01:10का गवाह बन रहा हो।
01:12समय की धारा ने जैसे अपनी गती को शूने कर दिया है, जिससे कालचकर की अगली कड़ी का जन्म हो
01:19सके।
01:20शिव के मस्तक पर विद्यमान अर्धचंद्र ने अपनी शीतल आभा से उस संनाटे को एक दिव्य दिव्यता प्रदान कर दी
01:28है।
01:30नारध मुनी ने ध्यानमगन होकर उन अद्रिश्य स्पंदनों को सुना जो अब नए स्रिष्टी के बीज के रूप में अंकुरित
01:37हो रहे हैं।
01:39ब्रहमांड के हर कोने से लोटते हुए सुक्षमकन अब एक केंद्र बिंदु की ओर खींचे चले आ रहे हैं।
01:48एक अलौकिक दिव्य आभा ने पूरे शिखर को घेर लिया है, जो इस बात का प्रमान है कि शिव की
01:54इच्छा का क्रियान वयन हो चुका है।
01:58शुन्य से उत्पन्न यह उर्जा अब एक नई भौतिक संरचना के निर्मान के लिए आधार तयार कर रही है।
02:06विश्नु का सुदर्शन चक्र भी अपनी तीवर्ता को कम कर चुका है, क्योंकि अब विनाश का काल समाप्थ हो चुका
02:13है।
02:15हवा में अब धूल के नहीं, बलकि नवस्रिजन की सुगंध व्याप्थ है, जो प्रकृती के पुनृत्थान का संदेश दे रही
02:23है।
02:24शिव के जटाओं से निकले हुए गंगा के जलने भी उस शांत वातावर्ण में एक मधूर ध्वनी उत्पन्न की है।
02:33ब्रहमांड के सभी देवतागन अपने अपने लोकों में इस महाशांती के अनुभव से अभिभूत होकर स्तब्ध है।
02:42नारद मुनी ने अपनी वीना का एक अंतिम मधूर सुर छेड़ा जो ब्रहमांड की उस नई लए के साथ एकाकार
02:49हो गया।
02:51अब हर दिशा से केवल शिव की उपस्थिती का असास हो रहा है जो सब कुछ समेट कर भी सब
02:57कुछ समवारने वाले हैं।
03:00अवधूत की हुंकार अब इतिहास बन चुकी है और ब्रहमांड अपनी राख से एक नए सत्य के अंकुरन के लिए
03:08तयार है।
03:10ब्रहमांड की राख से उठती हुई एक रहस्यमेई नीली ज्वाला ने समस्त दिशाओं को अपनी आगोश में ले लिया हैं।
03:18अवधूत की तपस्या का प्रभाव अब साक्षात सत्य बन कर उभर रहा है।
03:24नारद मुनी ने भगवान विश्नु को उस रुपांतरित स्रिश्टी की ओर इशारा करते हुए देखा, जहाँ वे अपने दिव्यशंक की
03:32ध्वनी से नई उर्जा का आहवान कर रहे थे।
03:48अब ब्रहमांडिय सत्य के निर्मान के लिए एक पवित्र बीज का रूप ले चुका है।
04:18वह अराजक तत्व जो पहले तबाही मचा रहे थे, अब अवधूत के एक संकेत मात्र से राख में बदल कर
04:24ब्रहमांडिय संतुलन के चर्णों में समर्पित हो रहे हैं।
04:29एक स्वर्णन प्रकाश स्तंभ के रूप में अवधूत की चेतना स्रिष्टी के उस शूने को भेद रही है, जो अब
04:37तक अंधकार का परियाय बना हुआ था।
04:40नारद मुनी ने नत्मस्तक होकर उस महापुनरुथान को देखा, जहां ब्रहमांड की पुरानी राखी अब नए ग्रहों और नक्षत्रों का
04:49आधार बन रही है।
04:52भगवान विश्णू ने अपनी दिव्यद रिष्टी से उस शूने के गर्भ में छिपे हुए सत्य को पहचाना, जो अब अवधूत
04:59की तपस्या से जागरित हो रहा था।
05:02अवधूत के चारों और अब अगनी का एक पवित्र वलय बन चुका है, जो सृष्टी की अशुद्धियों को एक एक
05:09कर समाप्त कर रहा है।
05:12यह वहक्षन है, जहां ब्रहमांड अपना पुराना स्वरूप त्याग कर एक नवस्रिजन की दहलीज पर खड़ा है, जो शुद्धता और
05:20प्रकाश से परिपूर्ण है।
05:23नारद मुनी की वीना के तार अब एक ऐसी धुन छेड रहे हैं, जो काल के उस अंतराल को भर
05:30रही है, जहां पहले केवल शुन्यता का हाहाकार था।
05:34भगवान विश्नु की आग्या मिलते ही स्रिष्टी का यह नया सत्य अवधूत की तपस्या के माध्यम से समस्त लोकों में
05:42प्रजवलित हो उठा है।
05:45तपस्या की ज्वाला में जलते हुए वे विकृत कन अब सोने के महीन धूल में बदल चुके हैं, जो भविश्य
05:52की नीम के लिए तयार हैं।
05:55एक गौरवशाली आभा के साथ अवधूत ने ब्रहमांड के उस नय पटल पर ग्रिश्टिपात किया, जहां अब अराजकता का कोई
06:03नामों निशान नहीं बचा है।
06:06नारद मुनी ने देखा कि कैसे अवधूत के तप के प्रभाव से शूने का वह कालापन अब एक गहरे नीले
06:13निहारिका में रूपांतरित हो चुका है।
06:17भगवान विश्णू ने अपनी गदाधारन करते हुए उस नवस्रिजन को व्यवस्थित करने के लिए अपनी दिव्य सक्रियता प्रदर्शित की।
06:26अब ब्रहमांड का हर तत्व अवधूत की उस हुंकार के प्रती कृतग्यता व्यक्त कर रहा है जिसने उसे फिर से
06:34अस्तित्व प्रदान किया है।
06:37अंतिम द्रिश में स्रिष्टी का नया सत्य एक प्रचन प्रकाश के रूप में उदे हुआ है जो भविष्य के कलपों
06:44के लिए प्रेणा का स्रोत बनेगा।
06:47नारद मुनी ने उस प्रजवलित प्रकाश की ओर देखते हुए अनुभव किया कि यह विनाश कोई अंत नहीं बलकी चेतना
06:55का एक नया विस्तार है।
06:58भगवान विश्नु अपनी गदा थामे हुए, मुस्कुराते हुए नारद की ओर देखते हैं और उन्हें जीवन के इस चक्र के
07:05मर्म को समझने का संकेत देते हैं।
07:09मुनी नारद अपने वीना के तारों को थाम कर उस मौन को सुनने का प्रयास करते हैं, जो विनाश के
07:16बाद ब्रहमाण में व्याप्त था।
07:19आकाश में तैरते हुए स्वर्णिम महल इस सत्य के साक्षी बने की निर्मान की नीम हमेशा शुद्धी की ज्वाला से
07:26ही निकलती है।
07:28नारद के मन में उठ रहे भय के बादल अब उस प्रकाश के स्पर्ष से विलीन हो रहे थे और
07:34एक अगाध शांती का उदे हो रहा था।
07:38विश्णू ने अपनी दिव्यवानी में नारद को बताया कि जिसे संसार प्रलय कहता है वही वास्तविक्ता का शुद्धिकरण है।
07:47नारद की आखों में वह दिव्यद रिष्टी उत्पन हुई जिससे उन्होंने देख लिया कि कैसे धूल के कणों से पुनह
07:54नक्षत्रों का निर्मान हो रहा है।
07:58ब्रहमान्ड के हर पर्मानु में अब एक लैवध स्पंदन सुनाई दे रहा था, जो अवधूत की हुकार के प्रती कृतग्यता
08:06की ध्वनी थी।
08:07विस्तरत आकाश में नारद ने देखा कि समय की नदिया फिर से अपने तटों को ढूंड रही हैं और स्रिष्टी
08:15का पहिया पुनह घूमने लगा है।
08:18नारद ने जुपकर उस नवस्रिजन को नमन किया, क्योंकि उन्होंने समझ लिया था कि सत्यका स्वरूप सदा परिवर्तनशी है।
08:27उस दिव्य प्रकाश ने अब एक नई आकरिती ले ली थी, जो आने वाले कलपों के लिए धर्म का मार्ग
08:35प्रशस्त करेगी।
08:37स्रिष्टी की राख अब एक उर्वरत की तरहे कार्य कर रही थी, जिस पर नए ब्रहमांडों के अंकुर पल्वित होने
08:44को तयार थे।
08:46नारद मुनी ने महसूस किया कि अवधूत का क्रोध नहीं, बलकि उनका करुणापूर्ण विनाश ही जगत का सबसे बड़ा उपकार
08:54था।
08:56विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ नारद की ओर देखा, जैसे वे उनके अंतर्मन के इस नए सत्य को स्वीकार
09:03कर रही हों।
09:16नारद के अंतिम छोर को भी छूलिया, जहां से जीवन की नई लहरें उठने लगी। नारद ने अपनी वीना पर
09:24एक नई राग छेड़ी, जो उस नवस्रिजन की पहली ध्वनी थी।
09:29विश्नु और नारद के उस मिलन ने यह सिद्ध कर दिया कि विनाश केवल निर्मान का एक द्वार है।
09:37ब्रहमांड का नया सत्य अब पूरी तरह स्पष्ट था, जो भविश्य के सभी युगों के लिए एक अटल नियम बन
09:44गया।
09:45नारद ने अपनी आखे मूंद ली और उस अनंत संगीत में विलीन हो गए, जो प्रलय के बाद का नया
09:52आधार बना।
09:54हिमाले की उत्तुम चोटियों पर अवधूत शिव का रौदर शांत होता है, और चारों ओर की बर्फ अब एक दिव्य
10:01नीली आभा में परिवर्तित होने लगती है।
10:06भगवान विश्नु अपनी चतुर्भुज छवी में मंद मुस्कान के साथ उस दिव्य परिवर्तन को देख रहे हैं, जो शिव की
10:13ध्यानावस्था से उत्पन हो रहा है।
10:17अवधूत के ललाट पर विराजमान तीसरी आख धीरे धीरे बंद हो रही है, मानो वह ब्रहमांड की पूरी अराजकता को
10:24अपने भीतर समाहित कर रही हो।
10:28कैलाश के शिखरों पर जमी बर्फ अब स्वर्ण कणों की तरहे चमक रही है, जो नई स्रिष्टी के उदे का
10:34संकेत दे रही है।
10:37शुनी की वह गूंज जो प्रलय का आधार थी, अब एक मधूर संगीत में बदलकर ब्रहमांड के कणकण में स्पंदित
10:44हो रही है।
10:47नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को थाम लिया है, क्योंकि अब उस संगीत की आवश्चक्ता नहीं रही जो
10:54विनाश को नियंत्रित कर रहा था।
10:57शिव के गले में लिप्टे सर्प भी अब शान्त हो चुके हैं, जो इस बात का प्रमान है कि ब्रहमांड
11:03का संतुलन पुनह स्थापित हो गया है।
11:07अद्रिश धागों से बंधी स्रिष्टी की संरचना अब फिर से बुनी जा रही है, जिसका सूत्रधार अवधूत की स्थिर चित्तता
11:15है।
11:16हिमालय की गुफाओं से बाहर निकलती दिव्य उर्जा अब समूचे ब्रहमांड की दिशा को बदलने की सामर्थ्य रखती है।
11:25भगवान विश्णु ने अपना सुदर्शन चक्र वापस ले लिया है, क्योंकि अब प्रलय के अगनिप्रहार की कोई आवश्शक्ता शेश नहीं
11:33है।
11:35नारद मुनी की आखों में अब वह नया सत्य प्रतिबिंबित हो रहा है, जिसे ब्रहमांड के आगामी युगों का विधान
11:42कहा जाएगा।
11:44शिव के जटाओं से टपक्ती गंगा की बून्दे अब अमरित की भानती प्रतीत हो रही हैं, जो धर्ती को नई
11:51चेतना प्रदान करेंगी।
11:54ब्रहमांड के हर सुक्ष्मकन में एक नई हलचल है, जो पुरानी राख से अंकुरित होने वाले नए जीवन की नीम
12:02है।
12:03विश्नु का शांत चित इस बात की पुष्टी करता है कि जो अंत था, वह वास्तव में एक आरंभ का
12:10मार्ग बन गया है।
12:13अवधूत के चर्णों के पास की भूमी अब बर्फ की जगह कमल के फूलों से खिल उठी है, जो शांती
12:19का प्रतीक है।
12:22कैलाश के उपर का आकाश अब गहरा नीला और स्वर्ण मिश्रित हो गया है, जो ब्रहमांड के नए संतुलन को
12:29दर्शाता है।
12:31शिव का मौन अब वहवानी है, जो संपूर्ण स्रिष्टी के वेदों का सार बनकर गुँज रही है।
12:39नारद मुनी ने ब्रहमांड के इस नए सत्य को स्विकार करते हुए नमन किया, क्योंकि अब प्रलै का भय मिख
12:46चुका है।
12:48स्रिष्टी अब अपने ध्यानावस्था के उस केंद्र बिंदु पर आ गई है, जहां से नया समय अपनी गती से चलना
12:55प्रारंभ करेगा।
12:57ब्रहमांड की राख से उपजा नया सत्य अबस्थिर है और अवधूत के ध्यानावस्था में वापसी का यह अंतिम चरण संपन
13:05होता है।
13:07ब्रहम लोग के रिक्ट शूने में धीरे धीरे दिव्यस्वन आभा का संचार होने लगा है, जैसे अंधकार की चादर को
13:15हटा कर ब्रहमांड का आधार पुनरजीवित हो रहा हो।
13:19चतुरमुख ब्रहमाजी ने अपने नेत्र खोले और उनके मुख मंडल पर उस महा प्रलय की समाप्ती की शांती और नवीन
13:27स्रिष्टी के संकल्प का अध्भुत तेज चमक उठा।
13:31स्रिष्टी की सीमाओं को पुनह परिभाशित करने के लिए ब्रहमाजी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बुन्दें ब्रहमांड के
13:39खाली स्थानों में प्रवाहित की।
13:42अस्तित्व के केंद्र में ब्रहमाजी की स्तुती से गूंजता हुआ एक दिव्यस पंदन प्रकट हुआ जो काल के उस पहले
13:49क्षण को पुनरजीवित करने का संकेट है।
13:53ब्रहम लोग की विशालता में अब वेदों की रिचाओं का स्वर गूंजने लगा है जिससे ब्रहमांड के कंकं में चेतना
14:01का संचार पुनह सक्रिय हो गया है।
14:04भगवान विश्नु ने क्षीर सागर की शया से उठकर ब्रहमा जी की ओर देखा और एक मंद मुस्कान के साथ
14:12स्रिष्टी के चक्र को फिर से गती देने का समर्थन किया।
14:16विश्नु जी के श्रीमुक से निकली उर्जा की किरने उस स्थान पर गिरी जहां से नए नक्षत्रों और ग्रहों का
14:23जन्म होना निश्चित था।
14:25शुनी की राख से अब समय के धागे फिर से बुनने लगे हैं, जिससे ब्रहमांड के नए युक का तानाबाना
14:32स्थिर हो रहा है।
14:35नारद मुनी ने अपनी वीना के तारों को छेडा, जिससे निकली मीठी स्वरलहरी ने पूरे ब्रहमलोक को एक नई धुन
14:42में बांध दिया।
14:45नारद मुनी का संगीत ब्रहमांड के उस सत्य का गायन कर रहा है कि विनाश केवल एक अंत नहीं, बलकि
14:52नवीनता की आधार्शिला है।
14:55वीना की गूंच से प्रेरित होकर ब्रहमलोक में दिव्य फूलों की वर्शा होने लगी, जो इस महा प्रिवर्तन का स्वागत
15:02कर रहे हैं।
15:05ब्रहमांड के सभी कोने, जो अभी तक शांत थे, अब जीवन की आहट से फिर से थर्थरा उठे हैं।
15:13स्रिष्टी के नए चक्र को आरंभ करने के लिए ब्रहमांड जी ने एक गहरी सांस ली, जिससे ब्रहमांड में प्रानवायू
15:20का संचार हुआ।
15:22विश्णु जी ने अपना दिव्य सुदर्शन चक्र सक्री किया, जिससे ब्रहमांड के आयामों के बीच फिर से संतुलन स्थापित हुआ।
15:31चक्र के घूमने से निकली उर्जा ने ब्रहमांड के हर सुक्ष्मकन को अपनी निर्धारित कक्षा में पुनह स्थापित कर दिया।
15:40सत्य का एक नया स्वरूप अब स्थिर हो चुका है, जहां इश्वर के विधान की विजय हुई है।
15:47ब्रहमा, विश्णु और नारद मुनी की उपस्थिती में ब्रहमलोग का तेज अब सहस्र गुना बढ़ गया है।
15:55ब्रहमांड का हर ग्रह और तारा अब अपनी नई धुरी पर मुग्ध होकर नाचने लगे हैं।
16:02नया स्रिजन अब केवल एक विचार नहीं, बलकि एक साकार सत्य बनकर ब्रहमांड की पर्तों में समा गया है।
16:11अवधूत के ध्यानावस्था की पूर्णता से ब्रहमलोग का यह सजीव पुनरागमन अनंत काल के लिए प्रतिष्थित हो गया है।
16:21ब्रहमांड के शूने से निकल कर देवी प्रकृती अब एक भव्य स्वन कांती के साथ पुनराप्रकट होती हैं, जहां उनका
16:28सौमे स्वरू पूरे रिक्ट आकाश को एक नई चेतना से भर देता है।
16:34भगवान विश्णु अपने क्षीर सागर के शया पर उठकर देवी प्रकृती की इस नई सामंजस्यपूर्ण तरंग को देखकर मुग्ध हो
16:43जाते हैं।
16:45देवी प्रकृती के हाथों से निकलती हुई दिव्यकिर ने बिखरे हुए नक्षत्रों को एक नई और सुरक्षित कक्षा में पिरोने
16:53का कार्य शुरू करती हैं।
16:56ब्रह्मांड के हर कोने में अब एक नई गूंच सुनाई देती है, जैसे कोई भूला हुआ संगीत फिर से जीवित
17:03हो उठा हो।
17:05पर्वतराज हिमालय के शिखरों पर जमी बर्फ अब एक दिव्य सुनहरी आभा में पिघल कर जीवन के अमरित में बदल
17:12रही है।
17:14देवराज इंद्र इंद्रिश परिवर्तनों को देखकर आश्चर्यच कित हैं, क्योंकि प्रकृती का नया रूप पुराने विनाश से कहीं अधिक शक्तिशाली
17:23प्रतीत होता है।
17:26देवी प्रकृती की एक मंद मुस्कान से ब्रहमांड के मृतपराय कणों में स्पंदन शुरू हो जाता है, जो जीवन की
17:33एक नई लएका संकेथ है।
17:36पूरे ब्रहमांड में एक ऐसी अद्रिश्य शिंखला स्थापित हो रही है, जिससे हर जीव अपने नियत स्थान पर संतुलित होने
17:44लगा है।
17:46शुने के भीतर से ही जीवन की पहली कोपल फूटी है, जिसे देवी प्रकृती ने अपने करक्मलों से सनरक्षित किया
17:54है।
18:06अब एक नई प्राणशक्ती का संचार हो रहा है, जो इसे पहले से कहीं अधिक गरिमामय बनाता है।
18:15प्रकृती का नया स्वरूप अब केवल नियम नहीं, बलकि एक पूर्ण सक्य बनकर स्थापित हो चुका है।
18:22शुनी की राख से उपजी यह नई स्रिष्टी अब एक सुन्दर खिलते हुए पुष्प की भाती धीरे-धीरे अपना विस्तार
18:30कर रही है।
18:32भगवान विश्णु मुस्कुराते हुए प्रकृती के इस महान कार्य को अपनी स्वीकृती देते हैं, जिससे ब्रहमांड में स्थिर्ता आजाती है।
18:42देवी प्रकृती के चारों और नक्षत्रों का एक ऐसा चक्र बना है, जो समय के पहिये को सही दिशा में
18:49घुमाने के लिए बाध्य है।
18:52पूरा ब्रहमांड अब एक नई धुन पर आधारित है, जहां प्रत्येक ग्रह एक स्वर बन चुका है।
19:00पर्वत्राज हिमालय की तलहटी में अब नई वनस्पतिया और दिव्य औश्धिया स्वतह ही जन मिले रही है।
19:09देवराज इंद्रस्वयन नत्मस तक होकर देवी प्रकृती की इस नई रचना को नमन कर रही है।
19:16प्रकृती और ब्रहमा का मिलन अब एक ऐसी उर्जा उत्पन कर रहा है जो अनंत काल तक स्रिष्टी को रक्षा
19:24प्रदान करेगी।
19:26ब्रहमांड के इस नए सत्य के उदे के साथ अब एक गौरवशाली यूग की नीम अत्यंत मजबूती से रखी गई
19:33है।
19:35नारद मुनी ने उस दिव्यशूने के बीच अवधूत शिव के समक्ष नत्मस्तक होकर पूछा कि क्या विनाश ही स्रिष्टी का
19:43अंतिन सत्य है।
19:45शिव ने अपनी शांत ग्रिष्टी नारद पर डाली और बताया कि बीच के तूटने के बिना नया अंकुर कभी नहीं
19:52फूट सकता।
19:54अवधूत के हाथ से निकलती उर्जा की तरंगे ब्रहमांड की बिखरी हुई राख को एक नए आकार में ढालने लगी।
20:02वहक्षण ऐसा था मानो समय स्वयन ठहर गया हो और प्रकृती अपनी पुरानी काया को त्याग कर पुनह जन्म लेने
20:10को आतुर हो।
20:12नारद मुनी ने देखा कि कैसे शिव की हुंकार से सुक्षमतम कणों में जीवन का संचार होने लगा है।
20:20शिव का अवधूत रूप जो अब तक विनाश का प्रतीक लग रहा था, अब स्रिजन की शक्ती में रूपांतरित हो
20:27रहा है।
20:29ब्रहमांड के इस पुरुत्थान में देवराज इंद्र के संकेत पर सभी देवता एक साथ मिलकर मंत्रोचार करने लगे।
20:38यह स्वर तरंगे साक्षात वेद की रिचाओं के रूप में ब्रहमांड की दिशाओं को पुनह जागरित कर रही थी।
20:46नारद मुनी ने अनुभव किया कि विनाश और निर्मान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जिन्हें शिव ने धारन
20:53कर रखा है।
20:55शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि जिस राख को तुम अंत समझ रहे हो वही नई स्रिष्टी की उर्वर मिक्टी
21:02है।
21:04स्रिष्टी के इन बिखरे हुए परमान वो ने अब शिव के संकेत पर एक नए ब्रहमांडी धाचे का रूप लेना
21:11शुरू किया।
21:12यह द्रिष्य इतना भव्य था कि कैलाश के शिखर भी मानो उस पवित्र उर्जा के भार से जुक गए हो।
21:20नारद के मुख से अब अंजाने में ही स्तुती के शब्द फूट पड़े जो उस नए सत्य का स्वागत कर
21:27रहे थे।
21:28शिव ने अपनी त्रिशूल को भूमी पर स्पर्श कराया और एक नई उर्जा की लहर पूरी स्रिष्टी में फैल गई।
21:37इस दिव्यस पंदन ने उन सभी मृतप्राय ग्रहों को पुनर जीवित कर दिया जो प्रलय की राख में दबे हुए
21:43थे।
21:45ब्रहमांड का यह नया सत्य अब और अधिक शुद्ध और काल की सीमाओं से परेश ठापित होने लगा।
21:52नारद ने अनुभव किया कि यह नई स्रिष्टी पुराने प्रलय की तुलना में कहीं अधिक गौरवशाली और दिव्य है।
22:01अवधूत शिव ने अपनी आखें बंद कर ली और फिर से उस आदी ध्यान में लीन हो गए जहां स्रिष्टी
22:07का सारा रहस्य नहित है।
22:10कैलाश के शांत वातावर्ण में अब केवल उस नए ब्रहमांड की धड़कन सुनाई दे रही थी जो शिव के हृदय
22:17से जुड़ी थी।
22:19एक गौरवशाली यूग का सूर्योदय हो चुका था और नारद मुनी ने इस नए सत्य को लोक कल्यान के लिए
22:26धारन कर लिया।
22:28ब्रहमांड के शुने से उत्पन होती हुई एक नई उर्जा की लेहर ने अंतरिक्ष के रिक्त स्थानों को स्वर्ण में
22:35आभासे भर दिया।
22:38भगवान विश्नु ने अपनी अनंत निद्रा त्यागते हुए उस दिव्य संतुलन को देखा जो अब स्रिष्टी के कणकण में पुनह
22:45स्थापित हो रहा था।
22:47गरुर के पंखों की फड़फडाहट से निकली वायू ने उस नए सत्य के बीज को ब्रहमाण की दिशाओं में बिखेरना
22:54आरंभ कर दिया।
22:56कैलाश की हिमशिखरों के उपर एक अद्रिश स्वर्ण रेखा का उदे हुआ जो काल के नए विधान की आधार शिला
23:04बनी।
23:05ब्रहमाजी ने अपने चारों मुखों से उस नए स्रिश्टिक्रम का मंत्रोत चारण किया जिसे स्वय अवधूत शिव ने आत्म साथ
23:13किया था।
23:15देवताओं की सभा में एक अद्रिश कवच का निर्मान हुआ जो किसी भी बाह्य अराजक्ता को स्रिश्टी के भीतर प्रवेश
23:22करने से रोकेगा।
23:24शुन्य से उपजे सुख्षम कणों ने मिलकर भौतिक नियमों की उस अद्रिश्य दीवारों को गढ़ा जिनसे पदार्थ का अस्तित्व परिभाशित
23:33होता है।
23:35यह वह ध्रूव सत्य था, जिसे न तो अगनी जला सकती थी और नहीं काल का प्रवाह इसे अपनी गती
23:42से विचलित कर सकता था।
23:45कैलाश के मौन में अब शिव के उनस्पंदनों का अनुभव हो रहा था, जो हर अनु को उसकी मर्यादा में
23:52बांधने के लिए परियाप थे।
23:55नारद मुनी ने वीना के तारों को छेडा, जिससे उस नए संगीत की ध्वनी ब्रहमांड के प्रत्येक कोने में गूझ
24:02गुठी।
24:03वीना की मधूर जंकार से आकाश में नक्षत्रों ने अपनी नई कक्षाएं बनाना शुरू कर दिया, जो अब एक व्यवस्थित
24:11मार्क का अनुसर्ण करेंगे।
24:14स्रिष्टी के इस नए विन्यास में संतुलन की वह शक्ती प्रबल हो गई, जिसने अराजक्ता को सदैप के लिए अतीत
24:21बना दिया।
24:23कैलाश के चारों और बर्फ की उनक्रिस्टलिय परतों ने एक सुरक्षा घेरा बना लिया, जो केवल सत्य की अनुभूतियों को
24:31अंदर आने की अनुमती देती हैं।
24:34भगवान शिव ने अपनी आखें खोली और उनकी द्रिष्टी की उस तीवर्ता ने स्रिष्टी के नए नियमों पर अपनी अंतिम
24:42स्विकृती की छाप अंकित कर दी।
24:45उस द्रिष्टी के प्रभाव से ब्रह्मांड की राख से जीवन की पहली को मल किरने फूटने लगी, जो अब एक
24:52व्यवस्थित विकास का संकेत थी।
24:54यह द्रिष्ट देखकर स्वर्ग के द्वार खुल गए और देवताओं ने पुष्प वर्षा के माध्यम से इस नवीन स्रिष्टी के
25:02स्वागत का आहवान किया।
25:05कैलाश का वह स्थान अब एक ऐसे तीर्थ के रूप में स्थापित हो गया, जहां स्रिष्टी के नए संकल्प की
25:12उर्जा अनंतकाल तक प्रवाहित रहेगी।
25:15स्रिष्टी के नियम अब पत्थर की लकीर बन चुके थे, जिन्हें तोरना किसी भी असुर्याकाल की शक्ती के लिए असंभव
25:23था।
25:24नारद मुनी ने उस परमसत्य को अपने भीतर उतार लिया, जो अब आने वाले युगों के लिए एक अटल मार्गदर्शक
25:32बनेगा।
25:34ब्रहमांड की राख से एक नया सूर्योदय हो चुका था, जो अंधकार की उन परचाईयों को हमेशा के लिए समाप्त
25:42कर चुका था।
25:44नारद मुनी ने उस पवित्र धरातल को प्रणाम किया, जहां से स्रिष्टी का नया अंकुर फूटने की प्रतीक्षा में था।
25:51वीना की मधुर जंकार के साथ नारद के मुख से वह स्तुती निकली जिसने ब्रहमांड के कणों को एक लए
25:59प्रदान की।
26:01उनकी द्रिष्टी ने उस शूने को टटोला, जो अब एक नई और अनंत संभावनाओ वाली चेतना का केंद्र बन चुका
26:09था।
26:10शाश्वत धाम की इस भव्यता ने उनके मन में उस नई यात्रा का संकल्प द्रिढ कर दिया, जिसे इश्वर ने
26:17स्वय नेती में लिखा था।
26:20नारद मुनी ने अपने संकल्प को वायू में विलीन कर दिया और ब्रहमाण की नई सीमाओ के दर्शन हेतु प्रस्थान
26:27किया।
26:28हर कदम पर उनके चर्णों की आहट से ब्रहमाण की रिक्तता में एक नई तरंग का संचार हो रहा था।
26:36वे उस अद्रिश्य सूत्र को खंगाल रहे थे जो भविश्य के आने वाले अंगिनत कालों और युगों को जोडने वाला
26:43था।
27:05नारद का हृदय एक अपार शांती और सात्विक उर्जा से भर गया।
27:10उन्होंने उस स्थान को देखा जहां से अब सत्य का नया प्रकाश पूरे अस्तित्व को आलोकित करने वाला था।
27:18यह यात्रा केवल भ्रमण न थी बलकि यह आने वाले युगों के सत्य को स्वय में समाहित करने की एक
27:25तपस्या थी।
27:27नारद की वीना से निकलने वाला प्रत्येक स्वर ब्रहमांड के हर सुक्ष्मकन को नई चेतना प्रदान कर रहा था।
27:35उनके संकल्प की द्रिडता ने ब्रहमांड के उस शूने को भी जीवंत कर दिया जो अब तक मौन पड़ा था।
27:42हर कदम पर नई स्रिष्टी की रूपरेखा उनके भीतर स्पष्ठ होती जा रही थी, जैसे कोई चित्रकार अपनी कृती को
27:51पूर्ण कर रहा हो।
27:53यह यात्रा उस सत्य की खोज थी, जो विनाश की राख के नीचे दबकर अमर हो गया था।
27:59नारद मुनी आगे बढ़ते गए, उनकी पच्चाप से ब्रहमांड के नए नक्षत्र अपनी सही दिशा में स्थापित होने लगे।
28:09दिव्य सभा के द्वार उनके आगमन से स्वय ही खुल गए, जैसे स्रिष्टी के नियम भी उनका स्वागत करने को
28:16आतुर थे।
28:17उन्होंने अपनी वीना को उचा किया और एक ऐसी राग छेड़ दी, जिसने पूरे ब्रहमांड को नई चेतना से उतप्रोत
28:26कर दिया।
28:27सत्य का एक नया सूर्योदय नारत के संकल्प के साथ ही उस नई स्रिष्टी के क्षितिच पर चमक उठा।
28:35ब्रहमांड के विशाल फलत पर कैलाश के बरफीले शिकरों के चारों और एक अलौकिक नीलिमा फैल गई है जो आने
28:43वाले महा प्रिवर्तन का संकेट दे रही है।
28:48भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से उठकर उन तरंगों को अनुभव कर रहे हैं जो अवधूत के स्वरूप से पूरे
28:55अस्तित्व में प्रवाहित हो रही हैं।
28:59गरूर देव अपनी स्वर्ण आभा बिखेरते हुए आकाश में उस उर्जा के केंद्र की ओर बढ़ रहे हैं जहां अवधूत
29:06की गूंशेश ब्रहमांड को पुनर्व्यवस्थित कर रही है।
29:11कैलाश की तलहटी में जमी बर्फ अचानक पिघल कर बहने लगी है, जैसे समय स्वय अपनी पुरानी बेडिया तोड़ कर
29:19बहने को व्याकुल हो।
29:21शिव का अवधूत स्वरूप अब एक दिव्यस्तंभ के रूप में खड़ा है, जिसकी छाया से नए नक्षत्रों और ग्रहों का
29:28निर्मान हो रहा है।
29:31नारद मुनी अपनी वीना को थामे हुए विस्मय के साथ देख रहे हैं कि कैसे स्रिष्टी का कंकन उस अवधूत
29:38के एक संकेत पर पुनह स्रिजित हो रहा है।
29:42स्रिष्टी के सुक्ष्मकन अब अपनी पुरानी अराजक्ता को त्याग कर एक नए अनुशासन में बंधने लगे हैं, जो ब्रहम वैवर्त
29:50के नए युग का आधार है।
29:53ब्रहमांड की राख से निकले हुए वे दिव्यरत्न अब अंतरिक्ष में चमक रहे हैं, जो आने वाले स्वर्ण युग की
30:01मशाल के समान हैं।
30:04कैलाश की पवित्रता अब संपूर्ण ब्रहमांड में एक शांत तरंग की भांती फैल रही है, जो पुराने कलेशों को मिटा
30:11कर नई शुद्धता ला रही है।
30:15भगवान विश्नु का मुखमंडल एक मंद मुस्कान से भर गया है, क्योंकि वे जानते हैं कि यह विनाश वास्तव में
30:22एक परम सत्यकादवार है।
30:25अवधूत के नयन अब उस अनन्त की ओर देख रहे हैं, जहां समय की नदिया एक नए संगम में मिलने
30:32के लिए आतुर है।
30:35स्रिष्टी की हर ध्वनी अब ओमकार के उस नाद में विलीन हो रही है, जिसे सुनकर समस्त देवगण भी नत्मस्तक
30:42हैं।
30:44धूल और राख के उन बादलों के पीछे से सत्यका एक नया स्वरूप प्रकट हो रहा है, जिसे अभी तक
30:51किसी ने नहीं देखा था।
30:53नारद मुनी ने अपनी विना का अंतिनतार छेड़ा है, जिससे निकली ध्वनी ने पूरे शून्य को एक नई आकरती प्रदान
31:01की है।
31:03अब अवधूत की हुंकार शान्त हो चुकी है, और उस शान्ती के गर्ब से एक नया सत्य जन्म लेने को
31:10तयार है।
31:12ब्रहमांड के सभी आयाम अब एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठा रहे हैं, मानो कोई महान संगीतकार अपनी धुन पूरी
31:21कर रहा हो।
31:23कैलाश के शिखरों पर अब एक नई प्रभात की पहली किरन दिखाई दे रही है, जो पुराने युग के अंत
31:29की अंतिम गवाह है।
31:32भगवान विश्णु ने अपनी गदा को थाम कर उस सत्य को स्विकार किया है, जो अब शिव के संकल्प से
31:39पूर्ण होने जा रहा है।
31:52अंधकार के सामराज्य का अंत हुआ और एक नए अध्याय की आहट ने समस्त ब्रहमांड को जंकृत कर दिया है।