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  • 2 days ago
ब्रह्मवैवर्त पुराण के 32वें एपिसोड में आपका स्वागत है। काल चक्र के नए मोड़ के बाद अब ब्रह्मांड की संरचना बदल रही है। नारद मुनि अब उस गुप्त दिव्य मार्ग पर हैं जहाँ ब्रह्मा के पुराने नियम और सृष्टि के आधार पूरी तरह से ढह रहे हैं। क्या शिव का अवधूत स्वरूप सृष्टि को नया रूप देगा या सब कुछ शून्य में विलीन हो जाएगा? जानिए इस महा-रहस्यमय एपिसोड में।
Transcript
00:00नारद मुनी ने देखा कि काल के उस शूने बिंदू पर समय का विशाल रत अब आगे नहीं बढ़ रहा
00:06है, बलकि वह स्थिर होकर कामपने लगा है.
00:10नारद मुनी जिनकी स्वर्ण जैसी काया दिव्य तेज से चमक रही है और जिनके हाथों में वीना है, अपने मुख
00:18पर गहरी चिंतालिये काल के इस थमे हुए चक्र को देख रहे हैं.
00:23वे देखते हैं कि समय की धाराएं जैसे एक ही बिंदू पर सिमटकर बिखर रही हैं, जिससे ब्रहमांड का संतुलन
00:31धीरे-धीरे खंडित हो रहा है.
00:34ब्रहमांड की इस अध्भुत विसंगती के उपर एक विशाल स्वर्णिन घडी का चक्र जम चुका है, जो काल की गती
00:41के अंत का मुख प्रमांड दे रहा है.
00:45काल के इस गर्भ में चारों और अनंत शून्यता है, जहां प्रकाश भी अपनी दिशाक होकर भमित्सा प्रतीत हो रहा
00:53है.
00:54नारद मुनी अपनी वीना को थामे हुए उस अज्यात उर्जा के स्रोत का ध्यान करते हैं, जो समय की गती
01:01को अवरुध कर रही है.
01:04अचानक हवा में एक तेज जंकार गूंजती है और शूने की पर्तों में दरारे पढ़ने लगती है.
01:12यह वह स्थान है जहां स्रिष्टी के नियम और काल का अनुशासन मिलकर एक दूसरे का अंत कर रहे हैं.
01:21नारद मुनि सावधान हो जाते हैं, क्योंकि उन्होंने अनुभव किया कि यह केवल समय की रुकावट नहीं, बलकि ब्रह्मा जी
01:29की स्रिजन क्षमता पर एक प्रहार है.
01:33वीना की मधुर ध्वनी उस भयानक सन्नाटे को चीर कर सत्य की खोज के लिए आगे बढ़ती है.
01:41वीना की तरंगें उस स्थान के कणों से टकराती हैं और वहाँ छिपे हुए रहस्य में संकेतों को उजागर करती
01:48हैं.
01:50आकाश के केंदर में एक विशाल दिव्य कमल खिला हुआ है, जो समय के थमने का केंदर बिंदू बना हुआ
01:57है.
01:58इस कमल के भीतर ब्रहमाजी के उन नियमों की प्रतिलिपियां अंकित हैं, जो अब निश्प्रभावी हो चुकी हैं.
02:07नारद मुनी ने विस्मय के साथ देखा कि वे शब्द जो ब्रहमाण को गती देते थे, अब केवल मौन चिनह
02:14बनकर रह गए हैं.
02:17सत्य के इस साक्षातकार ने मुनी को यह आभास करा दिया कि अब काल के गर्ब से कुछ अत्यंत भीशन
02:24प्रकट होने वाला है.
02:27वातावर्ण में उपस्थित वो स्वर्णिम उर्जा अब धीरे-धीरे मध्धम पढ़ने लगी है.
02:34ब्रह्मांड की सीमाएं अब धीली पड़ रही हैं और नदिया अपनी दिशा बदल रही हैं.
02:41नारद मुनी ने अपनी वीना को अपने हृदय से लगा लिया, जैसे वे किसी आने वाली प्रलय को रोकने की
02:48प्रार्थना कर रहे हूं.
02:50काल के गर्ब से एक भारी पज्चाप की ध्वनी गूंजती है, जो पूरे ब्रह्मांड को हिला कर रख देती है.
02:58ब्रह्मा के नियमों का अंत अब निकट है और काल की नई यात्रा का आरंभ हो चुका है.
03:06ब्रह्म लोग की स्वर्ण में दीवारों पर गरारें उभरने लगी हैं, मानो समय का चक्र अपने ही अस्तित्व को निगलने
03:13के लिए आतुर हो उठा हो.
03:16चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने अपनी आखें खोली, तो उनके दिव्य तेज में एक गहरी चिन्ता की रेखा उभराई, जिसे आज
03:24तक किसी देवता ने नहीं देखा था.
03:27स्रिष्टी के उन्मूल भूत सूत्रों को, जिन्हें उन्होंने बड़े जतन से बुना था, अब वे स्वयं ही विलीन होते हुए
03:34देख रहे थे.
03:36एक रहस्यमय अंधकार धीरे-धीरे ब्रहम लोग के वातावर्ण को अपनी आगोश में ले रहा है, जैसे काल का कोई
03:44प्रलेकारी साया सत्य को ढख रहा हो.
03:47ब्रहमा ने उन नियमों को पुना परिभाशित करने का प्रयास किया, किन्तु प्रक्तेक मंत्र और विधान निश्प्रभावी होकर शूनी में
03:55विलीन हो गया.
03:57वैकुंट में विराजमान श्री हरी ने अपनी आखें खोली और ब्रहमा की इस विवशता को समझते हुए मंद मुस्कान के
04:05साथ अपना सुदर्शन चक्र प्रकट किया.
04:09सुदर्शन की आभासे ब्रहम लोग का अंधकार कुछ क्षणों के लिए ठहर गया, जैसे कोई दैविय हस्तक्षे प्रकृती के नियमों
04:17को चुनौती दे रहा हो.
04:20ब्रहमा के चार मुखों से एक साथ उद्घोश हुआ, जो समस्त ब्रहमान की नीम को जखजोरने के लिए परियाप्त था.
04:28कैलाश के शिखर पर समाधी में लीन शिव ने भी अपनी तीसरी आख का स्पंदन महसूस किया, जैसे किसी अज्यात
04:36शक्ती ने काल की दिशा बदल दी हो.
04:39शिव ने अपनी ध्यान मुद्रा नहीं तोड़ी, किन्तु उनके गले में लिप्टे नागराज वासुकी के फणों में एक अनपेक्षित हल्चल
04:47स्पष्ट दिखाई दे रही थी.
04:50शिव का त्रिशूल स्वय ही धर्ती पर गूंजने लगा, जो ब्रहमांड में आने वाले एक बड़े बदलाव का संकेत दे
04:57रहा था.
04:59कैलाश के चारों और के बादल अब सात्विक श्वेट से बदल कर एक गहरा नीलिमा लिये हुए हो गए हैं,
05:06जो काल के नए चरण को दर्शाते हैं.
05:10ब्रहमा ने अपनी दाई भुजा उठाई और स्रिजन के अंतिन बीज को सुरक्षित करने हेतु उसे एक दिव्यपात्र में समाहित
05:18करने का प्रयास किया.
05:20विश्नु का गरुड आकाश में अपनी विशाल पंक फैला कर ब्रहम लोग के द्वारों पर सतर्क पहरा देने लगा, जैसे
05:28वह काल की गती को रोकने वाला एक मात्र प्रहरी हो.
05:32अचानक उस दिव्यपात्र से एक तीक्षन स्वर निकला, जैसे स्रिजन का नियम किसी पुरानी जन्जीर को तोड़ कर बाहर आने
05:40का प्रयत्न कर रहा हो.
05:43संपूर्ण ब्रहम लोग इस ध्वनी से गूंच उठा, जिससे देवताओं के आभूशनों में कमपन उत्पन हो गया.
05:50ब्रहमा की विवशता अब क्रोध में बदलने लगी थी, क्योंकि उनके द्वारा रचित व्यवस्था पर काल का नियंत्रन बढ़ता जा
05:58रहा था.
06:00नारद मुनी ने दूर से ही इस महा संद्राम के बीज को देख लिया था, और वे अपनी वीना की
06:06तारों को धीमा करते हुए मौन हो गए.
06:10समय की लहरेंग अब ब्रहमा के अधीन नहीं रही, बलकि एक अनियंत्रित वेग के साथ भविश्य की ओर बढ़ने लगी.
06:18स्रिजन में पड़ी वह दरार अब इतनी गहरी हो गई है कि स्वय विधाता को भी नहीं पता कि इसके
06:25पार क्या सत्यचिपा है.
06:28ब्रहमांड के सुदूर छोर पर एक विशाल, काला और निश्चल शूने धीरे-धीरे आकार लेने लगा है, जो नक्षत्रों की
06:36आभा को निगलने के लिए आतुर है.
06:40विश्णू लोक में शेशनाग की शया पर लेटे भगवान विश्णू ने अपनी कमल जैसी आखे खोली, उनके मुख पर इस
06:47अनपेक्षित विपत्ती के प्रती एक गंभीर चिंता की रेखा उभराई.
06:53शूनी की लहरेंग अब उन नक्षत्रों के केंद्र तक पहुँच गई हैं, जहां जलते हुए अगनितत्व का अस्तित्व सिमटकर राख
07:01की परतों में तबदील हो रहा है.
07:04ब्रहमांड का संतुलन पूरी तरह से डग्मगा गया है, जहां प्रकाश और अंधकार के बीच की सीमारेखा अब उजल होने
07:12लगी है.
07:14विश्नु ने अपने बाएं हाथ से संकेत किया और गरूर को इस अनिश्चित्ता के स्रोत की खोज करने के लिए
07:21ब्रहमांड के अंतिम छोर की ओर उड़ने का आदेश दिया.
07:26गरूर के विशाल पंकों की फड़फडाहट से उत्पन वायु प्रवाह ने उस शूने को कुछ क्षणों के लिए पीछे धकेल
07:33दिया, जिससे वहां छिपी हुई भयानक सक्चाईयों की जलक दिखने लगी.
07:38उस शून्यता के केंदर में नारद मुनी ने देखा कि पुराने कलपों की यादें एक मृत प्राय अवशेश की तरह
07:45विलीन होती जा रही थी.
07:48यह वह स्थान था जहां समय का चक्र ठहर गया था और अस्तित्व की डोर पूरी तरह से तूट चुकी
07:55थी, जिसे देखकर आकाश गंगा भी काम उठी.
07:59हिमालय के शिखरों पर ध्यानमगन शिव ने अपने त्रीतिय नेत्र के स्पंदन से इस महाविनाश की आहट को अनुभव किया
08:07और उनका मौन भंग हुआ.
08:09शिव ने त्रिशूल को भूमी पर स्थापित किया, जिससे एक दिव्य उर्जा की लहर निकली जिसने कैलाश की शान्ती को
08:17एक युद्ध क्षेत्र के धैर्य में बदल दिया.
08:21त्रिशूल की उस पूर्जा ने ब्रहमांड के बाहरी कोनों में फैले शूने को एक क्षण के लिए विभाजित कर दिया,
08:27जिससे सत्य का एक नया स्वरूप प्रकट हुआ.
08:31शून्यता के भीतर से अब उन प्राचीन नियमों की गूंच सुनाई दे रही है, जिन्हें विधाता ने स्रिष्टी के आरंभ
08:38में स्थापित किया था.
08:41ब्रहमा जी अपनी स्रिजन की वेदिका पर बैठे हुए, उन तूटे हुए सूत्रों को जोडने का प्रयास कर रहे हैं,
08:48जो अब काल की पहुँच से बाहर हो चुके हैं.
08:52विधाता के चार मुखों से एक साथ निकल रहे मंत्रों ने ब्रहमांड की दिशा को बदलने का प्रयास किया, लेकिन
09:00शूनी की पकड़ और भी अधिक सशक्त होती गई.
09:04मंत्रों की शक्ती से सजे हुए वे दिव्य अक्षर जब शूने से तकराते हैं, तो वहां एक भयानक विस्पोत की
09:11जगह एक मौन सन्नाटा पसर जाता है.
09:15सन्नाटा इतना गहरा है कि स्वयम ब्रहमा को भी अपनी ही स्रिजन शक्ती की ध्वनी अब सुनाई नहीं दे रही
09:22है.
09:24गरूर उस शूने के सबसे भीतर के बिंदू पर पहुँच चुका है, जहां उसने देखा कि स्रिष्टी के नियमों का
09:31केंद्र अब पूरी तरह से रिक्थ हो चुका है.
09:35गरूर के नेत्रों में वह सत्य प्रतिबिम्वित हो रहा है, जिसे देखकर देव भी विचलित हो जाएं, क्योंकि यह अंत
09:42नहीं, बलकी नियमों का विनाश है.
09:46विधाता ने एक गहरी सांस ली और अपने संकल्प से ब्रहमांड के इस रिक्थ स्थान को पुनह भरने का एक
09:53अंतिम प्रयास किया.
09:55शुन्य ने उन प्रयासों को आत्म साथ कर लिया, और इसी के साथ काल के गर्ब से एक नई अज्यात
10:02शक्ती का उदे होना निश्चित हो गया.
10:06ब्रहमांड के इस रिक्थ अंतराल में अचानक एक सुनहरी आभा का पुन्च प्रकट हुआ, जिसने नारद मुनी की चेतना को
10:13अपने भीतर समाहित कर लिया.
10:16नारद मुनी ने देखा कि वह उर्जा पुन्च किसी प्राचीन ध्वनी की तरह गूंज रहा है, मानोकाल स्वयंग उनसे किसी
10:23गुप्ट भाशा में समबाद कर रहा हो.
10:27जैसे ही नारद ने उस पुन्च को छुआ, उनके चर्णों के नीचे एक अद्रिश्य मार्ग का विस्तार हुआ, जो सीधे
10:34अनंत आकाश की गहराईयों में जाता था.
10:37इस मार्ग के चारों और समय के खंडित अंश इस प्रकार तैर रहे थे, जैसे किसी दरपण के तूटने पर
10:44उसके टुक्रे शूने में बिखर गए हो.
10:48नारद इस अलौकिक मार्ग पर आगे बढ़े, जहां उनके हर कदम के साथ वायुमंडल में तीवरस पंदन और दैविय संगीत
10:56का आभास होने लगा.
10:59अचानक मार्ग के केंद्र में ब्रहमा के खोए हुए संकल्पों का एक प्रतिबिंद दिखाई दिया, जो अब स्वयंकाल के नियमों
11:06के विरुद्ध संधर्ष कर रहे थे.
11:09नारद ने अपनी वीना को थामते हुए उस प्रतिबिंद के भीतर छिपे उन रहसियों को समझने का प्रयास किया, जो
11:16स्रिष्टी की नीम भिलाने में सक्षम थे.
11:20शूनी की इस गहरी शांती में, काल के एक अत्यंत विशाल पहिये की धमक नारद को स्पष्ट सुनाई देने लगी,
11:28जो ब्रहमांड की धड़कन को नियंत्रित करता था.
11:32मार्ग का अंट एक ऐसे द्वार पर हुआ, जिसके पार शिव और काल का मिलन होने वाला था, जहां न
11:38तो प्रकाश था और नहीं अंधकार.
11:42नारद मुनी ने देखा कि भगवान शिव वहां अपने अवधूत स्वरूप में स्थिर थे, और उनके चारों और का आकाश
11:49काल के नए नियमों के अधीन हो रहा था.
11:53शिव के मस्तक पर विद्यमान तीसरी आख से निकलती उर्जा, काल के उस पहिये को गती प्रदान कर रही थी,
12:00जिससे समय की दिशा बदलने लगी.
12:04नारद ने अनुभव किया कि काल के गर्ब से उपजी यह नई शक्ती, न तो नकारात्मक थी और नहीं सकारात्मक
12:11अपितु यह एक अनिवार्य परिवर्तन थी.
12:15शिव ने अपनी आखें खोली और नारद की ओर देखा, मानों वे जानते हों कि उनके इस रहस्य में मिलन
12:22का साक्षी केवल वही बन सकता है.
12:26शिव के उस दिव्य चित्वन से ही नारद का संपूर्ण ज्यान एक नई दिशा में प्रवाहित हो गया, और वे
12:32भविश्य के उस सत्य को देख पाए जिसे कोई नहीं देख सकता था.
12:38ब्रह्मा के नियमों का वह अंत, जिसे एक विपत्ती माना जा रहा था, वास्तव में एक नए और उन्नत स्रिष्टी
12:45चक्र का प्रारंब सिध्ध हो रहा था.
12:48नारद ने मस्तक जुका कर इस अग्भुट सत्य को स्विकार किया, क्योंकि वे अब उस काल के साक्षी थे, जिसे
12:56स्वयंग विधाता ने भी नहीं पहचाना था.
12:59शिव और काल का यह मिलन बिंदु अब एक नए ब्रह्मांडिय द्वार में परिवर्तित हो गया था, जो नारद को
13:06अगले रहस्य की ओर ले जाने वाला था.
13:10नारद मुनी ने उस द्वार में प्रवेश करने का निर्ने लिया, क्योंकि वे जान चुके थे कि उनका कार्य अब
13:17केवल सूचना पहुचाना नहीं, बलकि युग परिवर्तन का साक्षी बनना है.
13:23जैसे ही वे उस द्वार में प्रविष्ठ हुए, ब्रह्मांड का वह पुराना धाचा उजल हो गया और एक नई अंजानी
13:30स्रिष्टी के दर्शन होने लगे.
13:33काल के गर्भ में छिपावह भयानक सत्य अब एक दिव्य प्रकाश बन चुका था, जिसने आने वाले समय की सम्पून
13:41रुपरेखा बदल दी थी.
13:43नारद मुनी ने देखा कि उस शून्य लोक में समय की धाराएं स्थेर होकर स्वटिक की तरहें चमक रही हैं,
13:50जहां न दिन का अस्तित्व है, और नहीं रात का.
13:55ब्रहमा जी की दिव्य चेतना वहां एक स्वर्ण कमल की आभा के साथ प्रकट हुई, जो इस नए आयाम के
14:02स्रिजन की नीम रखने हे तु तक पर थी.
14:05महर्शी नारद के मस्तक पर चिन्ता की लकीरें उभी, क्योंकि उन्हें आभास हुआ कि यह चेतना ब्रहमांड के पुराने धर्मों
14:13से सर्वता भिन्न है.
14:16शुन्य लोग के कणकण में एक संगीत गुंजायमान हुआ, जो स्रिष्टी के विनाश और पुनर निर्मान के एक साथ होने
14:24का संकेत दे रहा था.
14:26सहसा वह दिव्य प्रकाश सिमटने लगा और एक विशाल नेत्र के रूप में प्रकट हुआ, जिसे देखकर नारद मुनी की
14:34वानी स्तब्ध रह गई.
14:37भगवान विश्णु का चतुर्भुज रूप उस शूने के केंद्र में स्थित हुआ, जिन्होंने अपनी उपस्थिती से उस अनिश्चित्ता को स्थिर्ता
14:45प्रदान की.
14:46नारद ने साश्टान प्रणाम करते हुए पूछा कि क्या यह वही अन्थ है, जिसकी कलपना किसी नहीं की थी.
14:55विश्णु जी की मुस्कान ने पूरे लोग को एक दिवे शांती से भर दिया, जैसे समुद्र के शांत होने पर
15:01लहरें ठहर जाती हैं.
15:04तभी उस शून्य लोग की दिवारों पर प्राचीन लिपिया उभरने लगी, जो निती के बदले हुए मार्क का वर्णन कर
15:12रही थी.
15:14आकाश के रंग बदलते हुए नीलम से स्वर्ण हो गए, जो एक नए युक्के उदे का साक्षात प्रमार था.
15:22ब्रह्मा के हाथों से स्रिजन के नए सूत्र छूट रहे थे, जिन्हें नियंत्रित करना अब किसी साधारन शक्ती के वश
15:29में नहीं था.
15:31नारद ने अनुभव किया कि चेतना का यह स्तर स्वयं के भीतर उतरने का मार्ग है, न की बाहर खोजने
15:38का.
15:40शुन्य लोग के भीतर एक विशाल द्वार खुला, जिससे होकर समय के अगले सोपान की जहलक नारद को प्राप्थ हुई.
15:48द्वार के दूसरी ओर से भगवान शिव की गरजना गुंजी, जो उस नए सत्य को स्विकार करने का आहवान कर
15:55रही थी.
15:57नारद मुनी ने उस द्वार को पार करने के लिए अपना पहला कदम बढ़ाया, यह जानते हुए कि पीछे लोटने
16:04का कोई मार्ग नहीं है.
16:07समय का चक्र अब सीधे रेखा की तरह आगे बढ़ रहा था, बिना किसी अवरोध या पुन्रावरित्ती के.
16:15चेतना का यह नया आयाम हर जीव को यह सोचने पर विवश कर रहा था कि क्या वे अपनी सीमाओं
16:22को जानते हैं.
16:25ब्रह्मा, विश्नु और शिव का एकत्व उस शून्य लोक में सपष्ट रूप से परिलक्षित हो रहा था, जैसे तीन नदिया
16:32एक सागर में मिल गई हो.
16:35नारद मुनी ने उस परम सत्य को आत्म साथ कर लिया, कि नियम केवल तब तक हैं, जब तक स्रिजन
16:41की चाह है.
16:43काल के गर्ब से जन्मावह सच अब पूरे ब्रहमांड की नई धुरी बन चुका था, और नारद उसके साक्षी बने.
16:52नारद मुनी ने उस शून्य लोग की अनंत गहराई में देखा, जहां काल की धाराएं अब बिखरे हुए नक्षत्रों की
16:59तरहे दिशाहीन हो रही थी.
17:02विश्नु का शांत चेहरा उस बदलते हुए ब्रहमांडिय संतुलन को देख रहा था, जैसे वे किसी जटिल गणितिय सूत्र को
17:10सुलजा रहे हो.
17:12नारद ने शिव के अवधूत रूप द्वारा छोड़े गए उस भस्म के निशानों को स्पर्श किया, जिससे समय की अद्रिश्य
17:19रेखाएं चमकने लगी.
17:22वह शूने धीरे-धीरे एक रहस्य मेई ओज से भर उठा, जैसे कोई प्राचीन द्वार नारद की द्रिश्टी के लिए
17:29खुल रहा हो.
17:31विस्त्रत पटल पर नारद ने देखा कि काल के पहिये अब एक नए और अज्यात मार्ग की ओर अग्रसर हो
17:38रहे हैं.
17:40नारद के मुख से एक अंचाही जिग्यासा निकली, हे देवाधिदेव, क्या यह काल की अंतिम सीमा है, जहां नियम समाप्थ
17:48होते हैं?
17:50नारद ने उस अद्रिश्य धागे को पकड़ लिया जो भूत, वर्तमान और भविश्य को आपस में जोड़कर एक नई गाथा
17:58बुन रहा था.
18:00चारों और एक दिव्य सन्नाटा चा गया, मानो संपूर्ण ब्रहमांड ने अपनी सांसे रोक ली हो ताकि सत्य का उदे
18:07हो सके.
18:09ब्रहमांड की विशालकाय धुरी अब धर्थराने लगी थी, संकेत देते हुए कि ब्रहमा के पुराने नियमकाल की नई गती के
18:17आगे जुक रहे थे.
18:19नारद की अंतरद्रिष्टी में वह सत्य प्रजवलित हुआ, जिसने उन्हें यह समझाया कि परिवर्तन ही स्रिजन का एक मात्र अनिवार्य
18:28सत्य है.
18:30नारद ने देखा कि उस भस्म के कणों से एक नई समयसार्णी का निर्मान हो रहा है, जिसे ब्रहमा ने
18:37पहले कभी नहीं देखा था.
18:39वह द्रिश नारद की चेतना को जगजोर रहा था, जैसे कोई अनंत सागर अपनी लहरों के साथ रहसियों का एक
18:47नया तट खोल रहा हो.
18:50ब्रहमांड के हर कोने में मौजूद दिव्य शक्तियां इस परिवर्तन को महसूस कर रही थी, जिससे एक अनोखी गूंच उत्पन
18:58हुई.
18:59विश्नु ने अपनी मंद मुस्कान के साथ नारद की ओर देखा, मानो वे इस ज्यानोदय की प्रतीक्षा ही कर रहे
19:06थे.
19:08नारद ने अनुभव किया कि काल अब न तो अतीत का बंधक था और नहीं भविश्य की चिंता, बल्कि वह
19:15केवल वर्तमान का निरंतर प्रवाह था.
19:18अद्रिश्य शक्तियों का वह अनुठा संगम उस स्थान पर फिर से जीवन्थो उठा, जिसे शिव ने अपने अवधूत संकेट से
19:26चिनहित किया था.
19:28काल के गर्भ में छिपावह भयानक सच अब नारद के सामने था, स्रिजन का अंत विनाश का मार्ग नहीं, बल्कि
19:36नए स्रिजन की अनिवार्य नीम्ब थी.
19:39नारद ने नत्मस्तक होकर उस नई व्यवस्था को प्रणाम किया, जो ब्रहमा के नियमों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रही
19:47थी.
19:48उस दिव्यक्षन में नारद मुनी ने महसूस किया कि काल अब ब्रहमा की सीमित द्रिश्टी का मोहताज नहीं रहा.
19:56ब्रहमांड के उस महसागर में नारद के साक्षी होने का यह अध्याय काल के नए युग की पहली किरन बन
20:04कर उभरा.
20:05ब्रहमांड के अनंत रिक्ट स्थान में स्थित वैकुंठ लोग की स्वर्णमे आभा में सुक्ष्म तत्वों ने एक महास्मिती का आयोजन
20:13किया.
20:15नारायन के चर्णों में उपस्थित उन सुक्ष्म उर्जाओं ने अपनी कमपकपाती वाणी में कहा कि अब वर्तमान स्रिजन का अस्तित्व
20:23भार बन गया है.
20:26सुक्ष्म तत्वों के मुख से निकली यह बात समस्त ब्रह्मांड में गूंज उठी की पुराने नियमों के साथ अब और
20:33अधिक समय तक स्रिजन की मर्यादा नहीं बची है.
20:37नारद मुनी ने उस स्थान पर एक दिव्यत रिशूल के समान चमकते हुए काल के उस अंश को देखा, जो
20:44पुनरगठन की मांग कर रहा था.
20:47ब्रह्मांड की उन सुक्ष्म चेतनाओं ने स्पष्ट किया कि जब तक आधारभूत विनाश नहीं होता, तब तक नया स्रिजन केवल
20:55एक स्वपन है.
20:58नारद मुनी ने नत्मस्तक होकर यह स्विकार किया कि उनके द्वारा देखी गई यह नई व्यवस्था ही अब भविश्य का
21:06इकलोता सत्य है.
21:08हर कन, हर अनु और हर दिव्यस पंदन ने मिलकर यह घोशना की कि स्रिष्टी को एक नए आधार की
21:15आवश्षकता है.
21:18वैकुंट के स्वर्ण महलों के भीतर अब काल के उस अज्यात गर्भ का सन्नाटा चा गया, जहां से पुनरगठन की
21:25प्रक्रिया शुरू होनी थी.
21:28नारायन के मस्तत पर एक क्षण के लिए वह गंभीर चिन्ता दिखाई दी, जो स्रिष्टी के संपूर्ण नाश की सूचना
21:35दे रही थी.
21:37ब्रह्मांड के सभी देवता इस अनपेक्षित परिवर्तन के साक्षी बने, जो उनके अस्तित्व के आधार को ही बदलने वाला था.
21:46नारत के कानों में वह ध्वनी गूंजी जो समय के पहियों के तूटने और नए चक्रों के निर्मान की आहट
21:53थी.
21:54वह दिव्यस्थल जहां वैकुंट का वैभव था, वहाँ अब एक नई उर्जा का उदे हो रहा था जिसे किसी नियम
22:01की सीमा में नहीं बांधा जा सकता था.
22:05सुक्ष्म तत्वों ने ब्रह्मा के पुराने स्रिजन्यमों के प्रती अपनी विमुक्ता प्रकट करते हुए संपूर्ण विलै का आहवान किया.
22:14नारायन ने मंद मुस्कुराते हुए अपना सुदर्शन चक्र प्रकट किया, जो अब केवल रक्षा के लिए नहीं, बलकि शुद्धिकरण के
22:22लिए तैयार था.
22:24नारद मुनी ने महसूस किया कि काल की गती अब ब्रहमा के संकल्प से निकल कर सीधे स्रिष्टी के मूल
22:31आधार में प्रवेश कर रही है.
22:34स्रिष्टी के पुनरगठन की मांग अब एक ब्रहमांडिय लहर बनकर गूज रही थी, जिसे कोई भी दिव्य शक्ती रोक पाने
22:42में सक्षम नहीं थी.
22:44पूरा वैकुन्थ लोक एक अद्भुत शांत कमपन से भर गया, जैसे स्वयं ब्रहमांड अपनी पुरानी यादों को मिटाने के लिए
22:52तैयार हो रहा हो.
22:54नारद ने उस महासागर की गहराई में देखा, जहां से स्रिजन का नया बीज अंकुरित होने के लिए संघर्ष कर
23:02रहा था.
23:03अंतिम निर्नय की वेला समीब थी, और नारायन ने अब काल को एक नई दिशा में प्रवाहित होने का मौन
23:10संकेट दे दिया था.
23:13स्रिष्टी अब उस मोर पर खड़ी थी, जहां पुराना समाप्थ हो रहा था और अज्यात का आरंभी इकलोता सत्य था.
23:21नारत की दृष्टी के सामने अंतरिक्ष का वह कोना खुल गया, जहां समय की रेखाएं आपस में उलचकर किसी अनसुलजी
23:29पहेली सी प्रतीत हो रही थी.
23:32नारायन ने अपने शांत और गंभीर मुख से नारत की ओर देखते हुए कहा कि यह परिवर्तन अनिवार्य है क्योंकि
23:40ब्रह्मांड अब परिपक्वता के एक ऐसे मोर पर है जहां पुराने नियम स्वयं को विसर्जित कर रहे हैं.
23:48नारत ने देखा कि एक अद्रिश्य उर्जा ब्रहमा के मानस पतल से उन स्मृतियों को धीरे-धीरे मिटा रही है
23:55जो पिछले युगों के निर्मान का आधार थी.
23:59समस्ट आकाश मंडल में एक अजीब सी स्थिर्टा छा गई है. मानो काल ने अपनी गती को थाम कर किसी
24:06प्रल्यंकारी सत्य के आने की प्रतीक्षा करने का निश्चय कर लिया हो.
24:12नारत को आभास हुआ कि आने वाला समय इतना कठोर होगा कि स्वयन देवताओं को भी अपनी अस्तित्व की परिभाशा
24:20पुनह लिखनी पड़ेगी.
24:22विश्णु के सानिध्य में बैठे नारत के हृदय में वह भय घर कर गया जो स्रिष्टी के विनाश से भी
24:29अधिक भयावा और अज्यात था.
24:32अचानक नारायन के हाथ से छूटा हुआ एक प्रकाश पुन्ज ब्रहमांड के उस अंधकार में प्रवेश कर गया जिसे अब
24:39तक किसी ने भी नहीं देखा था.
24:42उस अंधकार के पार नारत को उन भावी आपदाओं की जहलक मिली जो स्रिष्टी की नीम को हिला देने की
24:49शक्ती रखती थी.
24:51ब्रहमा का स्रिजन चक्र जो अब तक लैबध था उस नई उर्जा के संपर्क में आते ही अपनी गतिक होने
24:58लगा है.
25:01नारत ने देखा की कैसे समय के धागे एक दूसरे में उलचकर काले पड़ गए हैं, जो भविश्च में होने
25:08वाले घोर संधर्ष का संकेत दे रहे हैं.
25:12स्रिष्टी के इस नए चरण में उन्य और पाप के बीच का अंतर बहुत धुंधला हो चुका था, जिससे देव
25:19और दानव दोनों ही भ्रमित हो गए थे.
25:23ब्रहमांड के इस मौन में नारद के स्वर ने गूँच कर पूछा कि क्या इस अंत के बाद फिर से
25:28किसी नए प्रकाश का उदे संभव है.
25:32विश्णु का मौन ही नारद के लिए सबसे बड़ी चेतावनी थी, क्योंकि वे जानते थे कि इश्वर का मौन ही
25:39महाप्रलय का प्रथम स्वर होता है.
25:43नारद ने अपनी वीना को कसकर पकड़ लिया और वे इस नई और अनिश्चित नेती की ओर बढ़ने के लिए
25:50तयार हो गए.
25:52आकाश के रंग बदलते हुए अब गहरे बैंगनी और रक्तवर्नी नारंगी हो गए हैं, जो यह बता रही हैं कि
25:59काल का चक्र अब अपनी पुरानी परिधी को तोर चुका है.
26:04स्रिष्टी की हर इकाई अब उस आने वाले तूफान के लिए स्वयन को तयार कर रही है, जिसके बारे में
26:11कोई भी देव अभी तक अन्भिज्य है.
26:15ब्रहमा के नियमों का वह कवच जो युगों से स्रिष्टी की रक्षा कर रहा था, अब धीरे धीरे ढह रहा
26:21है.
26:23नारद की अंतरात्मा ने अनुभव किया कि जो कुछ भी हो रहा है, वह किसी बड़ी योजना का अन्तिम हिस्सा
26:30है.
26:32समय का गर्ब अब फट चुका है और उससे जो नई वास्तविक्ता बाहर आने वाली है, वह इतिहास के पन्नों
26:39में सबसे अधिक भयानक होगी.
26:42नारद मुनी ने उस अंधकार में पैर रखा, जानते हुए कि अब कोई भी वापसी का मार्ग शेश नहीं बचा
26:49है.
26:51नारद मुनी ने उस अंधकार मई सीमा को पार किया, जहां राओरव के तप्त लौह स्तंभों की गूंज अंतरिक्ष को
26:58कमपा रही थी.
27:00अचानक काल देव की छाया एक विशालकाय आकरित के रूप में प्रकट हुई, जिसकी आखों में प्रलय की अंगिनत संध्याएं
27:08समाहित थी.
27:10काल के हाथों में वह चक्र घूम रहा था जो अब ब्रहमा की नहीं, बलकि स्वयन शिव की इच्छा शक्ती
27:17से नियंत्रित हो रहा था.
27:19नारद ने अनुभव किया कि काल के हर स्पंदन में शिव की अर्धनारीश्वर शक्ती का एक रहस्य में स्पंदन प्रतिध्वनित
27:27हो रहा है
27:29अंधकार के उस गेहन शेत्र में काल देव ने अपना शीष जुका कर एक अद्रिश्य सत्ता को नमन किया जो
27:36शिव की उपस्थिती का संकेत था
27:39नारद मुनि के मुख से केवल एक ही शब्द निकला क्या काल अब शिव का शस्त्र बनकर ब्रहमांड के विध्वन्स
27:46का मार्ग प्रशस्त करेगा
27:49काल देव की मंद मुस्कान में छिपा था वह भयानक सत्य की ब्रहमा के नियमों की आयू अब केवल कुछ
27:55क्षणों की शेश है
27:58शिव के आदेश का आभास पाकर राओरव की अगनी ने अपना स्वरूप बदला और वह एक शांत नीले प्रकाश में
28:06परिवर्तित होने लगी
28:08कैलाश के शिखरों से एक शीतल पवन का जोंका उस नरक में प्रवेश कर गया जो शिव के आगमन की
28:15गवाही दे रहा था
28:18स्वया भगवान शिव अपने भव्य और रौधर रूप में काल के समक्ष प्रकट हुए जिनकी जटाओं से गंगा के जल
28:25के समान पवित्र समय की धारा बह रही थी
28:29शिव के त्रिशूल की नोप पर समय का चक्रस्थेर हो गया जिससे ब्रहमांड की गती थम गई और सन्नाटा पसर
28:36गया
28:38पूरे ब्रहमांड में एक ही गूंच सुनाई दी जो स्रिजन ब्रहमां ने किया था उसे अब काल और शिव मिलकर
28:45पुनह शूनि में विसरजित करेंगे
28:48नारग मुनी ने देखा कि शिव के एक संकेट मात्र से काल देव ने अपना स्वरूप बदलकर उस भविश्य को
28:55दर्शाया जो अभी तक अनलिखा था
28:58काल ने शिव के चर्णों में अपना मस्तक रखा और उस गठ बंधन की शपत ली जो कभी भी ब्रहमा
29:05के संग्यान में नहीं थी
29:07शिव की अर्धनारीश्वर शक्ती के प्रभाव से काल अब पुरुष नहीं रहा वह एक ऐसी उर्जा बन गया जो विनाश
29:15और स्रिजन के बीच की रेखा को मिटा देती है
29:20ब्रहमांड के नियमों का वह जटिल जाल जिसे ब्रहमा ने सदियों से बुनकर रखा था अब शिव के एक संकल्प
29:27से तिनके की तरह बिखरने लगा
29:30नारद मुनी ने इस द्रिश को देख अपनी आखे बंद कर ली क्योंकि वे जानते थे कि अब सत्य का
29:36सामना करना और भी कठिन होने वाला है
29:40काल और शिव का यह मिलन केवल एक गठ बंधन नहीं था बलकि यह उस युग के अंत की घोशना
29:47थी जिसमें ब्रहमा प्रधान थे
29:50समय का चक्र अब सीधे शिव के त्रिशूल से होकर गुजर रहा था जो भविश्य की अनिश्चित्ताओं को अपनी धार
29:57में समेटे हुए था
30:00ब्रहमा के नियमों का वह अंतिम स्तंभ भी ढह गया और नारद मुनी ने उस महान रहस्य का अनुभव किया
30:07जिसके लिए वे युगों से भटक रहे थे
30:10नारद मुनी ने उस शूने की ओर कदम बढ़ाया जहां काल की रेखाएं आपस में उलचकर एक नए आयाम का
30:17द्वार खोल रही थी
30:20गरुर पर आरूड होकर विश्नु ने उस द्वार की विक्रालता को देख गंभीर मुद्रा में मौन धारन कर लिया
30:28नारद मुनी ने अपने वीना के तारों से उस कमपन को उत्पन किया जो काल के गर्भ में छिपी बाधा
30:34को तोड़ने हे तु आवश्यक था
30:38वातावर्ण में एक रहस्यमें कमपन गुमजा जैसे स्वयंकाल का चक्र अपनी धुरी से विचलित होकर किसी महान परिवर्तन का संकेत
30:46दे रहा हो
30:48अनंत अंतरिक्ष की गहरायों से एक ऐसा स्वर उभरा जो किसी भी लोग की सीमाओं में बंधा हुआ प्रतीत नहीं
30:55होता था
30:57नारद मुनी के मुख पर एक क्षण के लिए भय और अगले ही पल परम शान्ती का भाव तैर गया
31:03क्योंकि वे समझ गये थे कि वे नेती के पार देख रहे हैं
31:09विया की एक तीवर ध्वनी के साथ उस दिव्य अवरोध में एक दरार उत्पन हुई जिससे भविष्य की धुंधली छविया
31:16बाहर जाकने लगी
31:19यह द्रिशे किसी स्वपनिल जगत जैसा था जहां समय के नियम अपने आपको पुनह परिभाशित करने के लिए संधर्श कर
31:26रहे थे
31:28सुकर्मुख लोग की गहरी गलियारों में पत्थर के दैत्यद्वारपाल जागरित हो उठे और अपने भारी मूसल पटकने लगे
31:37नारद्मुनी ने उनकी ओर देखा परंतु उनकी द्रिश्टी उन बाधाओं के पार किसी और ही लक्षे पर स्थिर थी
31:46दैत्यों ने अपनी गदाओं से प्रहार किया लेकिन वह प्रहार शूने में विलीन होकर एक नया नक्षत्र बन गया
31:54काल के गर्भ में छिपावह भयानक सच अब मूर्तिमान होने लगा था जिसे देखकर स्वयन देवर्शी के भी पै डग्मगा
32:02गए
32:03अयापान लोग की तप्त ज्वालाओं के बीच पिगला हुआ कांस्य नदी बनकर बहने लगा जो समय के बहते प्रवाह को
32:11दर्शा रहा था
32:13विश्नु ने अपनी गदा से उस तप्त प्रवाह को एक नई दिशादी ताकी नारत की यात्रा बाधित न हो
32:21ज्वालाओं के बीच एक आकरिती उभी जो ब्रह्मा के उस नियम का प्रतीक थी जिसे शिव ने पहले ही भंग
32:27कर दिया था
32:29यह विस्मयकारी था कि कैसे एक प्राचीन नियम के अंत से इतने विनाशकारी उर्जा का जन्म हो सकता था
32:38नारत मुनी अब उस यात्रा के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे थे जहां काल का कोई अस्तित्व नहीं था
32:45दूर कहीं कैलाश के बरफानी शिखरों पर शिव की तीसरी आख खुली मानोवे नारत के साहस को स्विकार कर रहे
32:53हो
32:54उस त्रिशूल की चमक से पूरा ब्रहमांड जग्मगा उठा जिसने ब्रहमा के उन पुराने नियमों को पूरी तरह राख में
33:02बदल दिया था
33:04नारत मुनी के अगले लोग का द्वार खुल गया था और अब उन्हें काल की उन गलियों से गुजरना था
33:10जिनका कोई अंत नहीं था

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