ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस एपिसोड में नारद मुनि सृष्टि के मूल स्रोत और उसके बीज के रहस्य को समझते हैं। क्या सृष्टि का चक्र बदलने वाला है? देखिए परब्रह्म का वो निषिद्ध ज्ञान जो काल के नियमों को भी बदल सकता है। 🕉️✨ #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #SanatanDharma #CosmicMystery #HinduMythology #SpiritualEvolution #PuranaSeries #CreationSecrets
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00:00ब्रहमांड के शूने में स्थित उस आदि बीज के समीप नारद मुनिका शरीर कमपायमान हो उठा, जहां से प्रकाश की
00:07सहसरों किरने फूट रही थी।
00:10नारद ने अपनी आखे मूद ली, क्योंकि उस परब्रम के बीज की आभा उनके दिव्य चक्षूओं को भी विदीरिन करने
00:18को तत पर थी।
00:39भगवान विश्नु के स्वरूप का आभास हुआ, जो उस बीज के सनरक्षन हेतु स्वय वहां उपस्थित थे।
00:47विश्नु ने अपने नीले हाथों से उस बीज को नियंत्रित किया, ताकि ब्रहमांड की उर्जा का संतुलन बना रहे।
00:55नारद की ओर देखते हुए, श्रीहरी के नेत्रों में एक ऐसी गंभीरता थी जिसे कोई साधारन देव भी नहीं समझ
01:03सकता था।
01:04बीज की उर्जा इतनी तीवर थी कि वह दिव्य भवनों की स्वर्ण दीवारों को भी पिघलाने का प्रयास कर रही
01:12थी।
01:13नारद ने अनुभव किया कि स्रिष्टी का हरकन इसी बीज की कमपन से संचालित होता है, चाहे वह शून्य हो
01:21या प्रकाश।
01:22भगवान विश्णु ने धीर स्वर में कहा कि यह बीज ही वह आधार है जो काल की रिखाओं को मोर
01:29सकता है।
01:32नारद ने कापते हुए हाथ जोडे और उस बीज के सत्य को अपनी चेतना में धारन करने की प्रार्थना की।
01:40काल चक्र की वह गती जो अब तक रहस्य थी, अब नारद के सामने एक स्पंदन के रूप में स्पष्ठ
01:46हो रही थी।
01:48पूरे ब्रहमांड में एक क्षण के लिए सन्नाटा चा गया, जैसे काल स्वय ठहर गया हो उस बीज के रहस्य
01:55को सुलजाने के लिए।
01:58नारद ने देखा कि उस बीज में से नए ब्रहमांडों की रचना का प्रतिरूप उभर रहा है, जो अगले युग
02:05का आधार बनेगा।
02:07वह उर्जा नारद के भीतर भी प्रवेश कर रही थी, जिससे उनका भौतिक स्वरूप धीरे-धीरे दिव्य जोती में परिवर्तित
02:15हो रहा था।
02:17समय की प्रत्येक इकाई, जो युगों से कल्पों तक फैली है, उस एक बीज के विस्तार का ही अंश मात्र
02:24थी।
02:25भगवान विश्णु ने नारद की ओर अपना एक हाथ बढ़ाया, जैसे उन्हें उस अनंग चक्र का ज्यान प्रदान कर रहे
02:33हो।
02:34नारद की चेतना उस महा सत्य के बोज से भर गई, जो केवल एक परब्रहम ही पूर्न रूप से अनुभव
02:41कर सकता है।
02:43स्रिष्टी का बीज अब शांत होने लगा था, जैसे वह अपनी उर्जा को पुनह संकुचित कर भविश्य के लिए सुरक्षित
02:51कर रहा हो।
02:52उस महा संकट के टलते ही, नारद ने उस सत्य को ब्रहम वैवर्त की अमर कथाओं में समाहित करने का
03:00संकल्त लिया।
03:02ब्रहमांड के शूने में अचानक समय की गती धीमी पड़ गई और नारद ने देखा कि सितारों के पत अपनी
03:09दिशा बदर रहे हैं।
03:11नारद ने अनुभव किया कि विश्नु के मुख पर एक गंभीर मौन है जो आने वाले युगों के संकुचन की
03:19चेताबनी दे रहा है।
03:22अचानक नारद की दृष्टी में वे घटनाएं तैरने लगी जो अभी घटित ही नहीं हुई थी, जैसे कोई भविश्य का
03:29परदा अचानक गिर गया हो।
03:31समय का चक्र एक तूटे हुए दरपण की भानती टुकडों में बिखर गया, जिससे नारद को एक साथ कई कालखंडों
03:39के दर्शन होने लगे।
03:41काल के इस भंजन के कारण दिव्यकक्ष की दीवारों पर अंगिनत अद्रिश्य भविश्य की रेखाएं उभरने लगी।
03:49नारद ने कापते हुए देखा की कैसे एक शक्तिशाली सामराज्य समय की रेट में विलीन होकर धूल बन रहा है।
03:58समय के इन नियमों के तूटते ही ब्रह्मा की लीला के नए अंकुर कहीं और ही पनपने लगे थे।
04:06आकाश का रंग गहरे नील से बदल कर स्वर्निम आभा में परिवर्तित हो गया, जो किसी नए स्रिजन का संकेत
04:13था।
04:15नारद ने स्वयं को कालचक्र के उस केंद्र में पाया जहां न वर्तमान था और नहीं कोई शेश रहने वाला
04:21भविश्य।
04:23गरुर के पंखों की फड़फडाहट से समय की लहरों में कमपन उत्पन हुआ, मानों वे भी इस परिवर्तन से विचलित
04:30हो गए हो।
04:32गरुर ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से उन विसंगतियों को देखा जो काल के प्रवाह को अवरुध कर रही थी।
04:40समय का प्रवाह एक अशांत नदी की भानती उचल रहा था, जिसे थामना किसी साधारन देवता के वश में नहीं
04:47था।
04:49नारद का संकल्प था कि वे इस महा संकट के कारणों को समझ कर उसे लिपिबध करेंगे ताकि स्रिष्टी का
04:56संतुलन बना रहे।
04:58तभी उन्हें दूर कहीं से कालगनी की लप्ते दिखाई दी, जो पुराने युगों की स्मृतियों को भस्म कर रही थी।
05:07नारद ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा और उससे निकलने वाली ध्वनी ने समय के तूटे हुए तंतुओं को
05:14जोड़ना शुरू किया।
05:28नारद की ओर देखा, जैसे वे इस परीक्षा के सफल होने की प्रतीक्षा कर रहे हुँ।
05:35काल के नियम अब धीरे-धीरे अपनी पूर्व निर्धारित लए में लोटने लगे थे, जिससे स्रिष्टी का संकुचन रुप गया।
05:43नारद ने अब समझ लिया था कि परब्रहम का कालचक्र विनाश नहीं, बलकि निरंतर नवीनी करण का एक माध्यम है।
05:52ब्रहम वैवर्त के अगले अध्याय की तयारी में, नारद ने उस सत्य को स्विकार किया जो केवल अनुभव से ही
06:00समझा जा सकता है।
06:02ब्रहमांड की अनन्त गहरायों में नारद ने एक ऐसी दिव्यगूंच सुनी जो सीधे परब्रहम के हृदय से उपजी थी।
06:11भगवान विश्णू ने अपनी योग निद्रा से जागते हुए नारद की ओर देखा, मामो वे इस मौन आदेश के रहस्य
06:18को समझाने की प्रतीक्षा कर रहे हूँ।
06:22नारद ने अपने वीना के तारों पर हाथ रखा, जो उस दिव्य मौन को सुनने के बाद अब स्वयं कमपन
06:29कर रहे थे।
06:30मौन आदेश का यह प्रभाव संपून वैकुंठ में एक सुनहरी चमक के रूप में खैल गया, जैसे समय की धारा
06:38रुक गई हो।
06:39इस विशालता के सामने नारद को बोध हुआ कि परभ्रहम का प्रत्येक शब्द स्रिष्टी के एक नए अध्याय का आरंभ
06:47है।
06:49विश्नु ने मंद मुस्कान के साथ संकेत किया कि नारद को अब उस भार को वहन करना होगा जो ग्यान
06:56की सीमा से परे हैं।
06:59नारद ने देखा कि परभ्रहम के इस आदेश से अंतरिक्ष में मौजूद नक्षत्रों की दिशाएं परिवर्तित होने लगी।
07:07आकाश के एक कोने में समय के कन धूल की तरह चमकते हुए एक नए भविश्य का तानाबाना बुन रहे
07:14थे।
07:15नारद ने अनुभव किया कि यह मौन कोई अभाव नहीं बलकी एक अतिसक्रिय उर्जा का भंडार है।
07:23विश्नु ने गरोड की ओर देखा जो इस दिव्यवारतालाप का मूख साक्षी बनकर वहां खड़ा था।
07:31नारद की वीना से निकली ध्वनी अब वैकुंठ के कंकन में गुंजायमान होकर परब्रहम की इच्छा को प्रतिध्वनित कर रही
07:39थी।
07:40परब्रहम का यह आदेश जैसे जल के भीतर तरंगों के समान पूरे ब्रहमांड के चक्र को नई गती देने लगा।
07:48नारद समझ गए कि उन्हें इस ज्ञान को धारन करने के लिए अपनी चेतना को और अधिक परिश्कृत करना होगा।
07:56विश्नु का तेज और भी तीवर हो गया, जिससे नारद की दृष्टी में वह सत्य और अधिक स्पष्ट होने लगा।
08:04स्रिष्टी का हर एक बीज अब उस आदेश की प्रतीक्षा में था, जैसे मेघ वर्षा की बूंदों की बाट जोहते
08:12हैं।
08:14नारद ने नत्मस्तक होकर उस मौन को स्विकार किया, जो अब उनके अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा बन चुका था।
08:22वैकुंठ का वातावर्ण अब पूरी तरह से परब्रह्म की उस संकल्प शक्ती से उतप्रोथ हो चुका था।
08:29नारद को आभास हुआ की आने वाला समय न केवल परिवर्तन लाएगा, बलकि स्रिष्टी के आधार भूत सत्य को भी
08:37पुनरजीवित करेगा।
08:39विया की अंतिम गूंज ने उस मौन को समाप्त नहीं किया, बलकि उसे एक स्थायत्व प्रदान कर दिया।
08:47नारद ने उस पथ पर चलने का निर्ने लिया, जहां परब्रहम की इच्छा ही उनका एक मात्र मार्ग दर्शक थी।
08:55ब्रहमांड के समस्त लोकों में एक अकतनिय कमपन दोड़ गया, जैसे आधारशिला अपनी जगह से खिसक रही हो।
09:04बैकुंट के स्वर्नकमल पर विराजमान भगवान विश्णू ने अपनी कमलन्यन खोल कर स्रिष्टी की इस अस्थिर्ता को ध्यानमगन भाव से
09:12निहारा।
09:14तभी सुकर्मुख के भारी काले ग्रेनाइट के शिलाखंड आपस में टकरा कर प्रित्वी के कमपन को और अधिक तीवर कर
09:21रहे थे।
09:22स्रिष्टी की स्थिर्ता को थामने के लिए ब्रहमांडिय अनुशासन का प्रतीक सुदर्शन चक्र शून्य में एक अगनिवलय के समान घूमने
09:31लगा।
09:32कैलाश के हिमाच छादित शिखरों पर विराजमान भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख खोल दी, जिससे समय का प्रवा एक
09:41शन के लिए ठहर सा गया।
09:43देवताओं के लोकों में देवता भयभीत होकर देखने लगे की कैसे आकाश का रंग निल्मनी से धुंधले राख जैसा होने
09:51लगा है।
09:53क्रिमिभोजन के घोर अंधकार मैं गढ़ों में कीडे और कीट अनियंतरित होकर प्रकाश उत्सरजित करने लगे।
10:00मानो स्रिष्टी की उर्जा अब दिशाहीन हो गई हो।
10:04स्रिष्टी के इसकशोग को देखकर नारत की वीना की तारे स्वतह ही एक दरावनी गूंच उत्पन करने लगी।
10:13अयापान के नरक में पिघला हुआ कांसा बड़े बड़े पातरों से छलक कर चारों और स्वर्ण जैसी चिंगारिया बिखेरने लगा।
10:22यमराज के दूतों ने अपनी दिव्यगदाय उठा कर उस कमपन को रोकने का असफल प्रयास किया जो पाताल लोग की
10:29सीमाओं को तोड रहा था।
10:32ब्रहमांड की हर एक धड़कन अब मध्धम पड़ रही थी जैसे किसी दीपक का तेल समाप्थ होने की कगार पर
10:39हो।
10:40देवराज इंद्र ने अपने सिनहासन से उठकर गगन की ओर देखा जहां नक्षत्र अपनी निश्चित कक्षाओं को छोड रहे थे।
10:49पुयोर के घिनोने कीचर वाली नदिया उफान पर थी जिससे चारों और एक दमघोंटू राख जैसी कोहरे की चादर फैल
10:57गई।
10:59रौरव नरक में अगनी की लपतें अपना रंग बदल कर गहरे लाल से काली पड़ गई थी जो विनाश का
11:05संकेत दे रही थी।
11:08गरुर देव ने अपने विशाल पंक फैला कर आकाश के उस अस्थिर शोर को दबाने का प्रयत्न किया पर्व्यर्थ।
11:16नारद ने अनुभव किया कि परब्रह्म के कालचक्र की धुरी अब एक ऐसे मोर पर है जहां पुरानी स्रिष्टी को
11:23मिटना ही होगा।
11:25स्रिष्टी के बीज के चारों और जमा हुआ सुरक्षा कवच अब तूटने लगा था जिससे प्राचीन उर्जा का रिसाव होने
11:33लगा।
11:35महान रिशियों के आश्रमों में रखे हवन कुंडों की अगनी बुझने लगी जो इस महासंकट का मौन संदेश था।
11:43अंधकार और प्रकाश के बीच का संतुलन बिगड़ चुका था और प्रकृती स्वया अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए काम
11:51प्रही थी।
11:52नारद ने अपनी आखें बंद कर ली क्योंकि अब केवल परब्रम के संकल्प का साक्षी बनना ही उनका एक मात्र
12:00नीती थी।
12:02नारद का हृदय एक अनिश्चित्ता के सागर में डूब रहा था जहां वे स्वयं को स्रिष्टी के विगटन के केंदर
12:09में एक मुख दर्शक के रूप में पा रहे थे।
12:12गरुड के विशाल पंखों की चाया के नीचे भगवान विश्णु ने नारद की ओर देखा, जिनकी आखों में ब्रहमांडिय परिवर्तन
12:21की पीडा स्पष्ट जलक रही थी।
12:24नारद ने कापते हुए स्वरों में पूछा की क्या उनका अस्तित्व केवल विनाश के साक्षियों को लिपिबध करने के लिए
12:31ही शेश रह गया है।
12:34ब्रहमांड के हर कण में बिखरा हुआ वह परब्रहम का प्रकाश अब धीरे-धीरे सिमट रहा था, जैसे कोई अनंत
12:41जोती अपनी अंतिम सांसे ले रही हो।
12:45कैलाश की निरवता के बीच नारद को यह एहसास हुआ कि विनाश का यह तांडव केवल एक अंत नहीं, बलकि
12:52एक नए आरंभ की अनिवार्य आहट है।
12:56महादेव ध्यान की मुद्रा में अडिक थे, उनका मौन इस बात का संकेत था कि परिवर्तन के इस चक्र को
13:03रोकना स्वयंकाल के नियमों के विरुद्ध है।
13:07नारद ने अनुभव किया कि प्रकृती के बीज सूख रहे हैं, ताकि आने वाले समय में वे और भी अधिक
13:14उर्वर्ता के साथ अंकुरित हो सकें।
13:18वातावर्ण में एक अलौकिक कमपन व्याप्त था, जो नारद की चेतना को पूरी तरह से जख जोरने का प्रयत्न कर
13:25रहा था।
13:27अयापान के तप्तकुंडों से उठती हुई स्वर्ण स्फुलिंगे नारद को यह स्मरन दिला रही थी कि शुद्धी के बिना नई
13:34स्रिष्टी का निर्मान असंभव है।
13:38भगवान विश्णु ने धीर स्वर में कहा कि नारद तुम केवल एक लेखक नहीं, बल्कि उस परमपरा के वाहक हो
13:45जो प्रलय के बाद भी जीवित रहती है।
13:49नारद ने अपनी वीना के तारों को छुआ, जिससे एक ऐसी ध्वनी निकली जो विनाश के कोलाहल को शांत करने
13:56में समर्थ थी।
13:58ब्रहमांड की हर दिशा से आती हुई ध्वनिया नारद के मस्तिश्क में एक महामंत्र का रूप ले रही थी, जो
14:05स्रिष्टी के नए अध्याय का आधार था।
14:08पयोदा के दुरगंधित कीचर में फंसी हुई स्मृतिया अब धीरे-धीरे राख में बदल रही थी, ताकि बीते हुए युक
14:17का कोई भी अन्शेश न रहे।
14:20यम के दूतों ने जब नारद की ओर देखा, तो उनकी आखों में भी एक अजीब सी करूना थी, क्योंकि
14:27वे भी महाप्रिवर्तन की प्रतीक्षा में थे।
14:30नारद को यह बोध हुआ की अहमकार ही वह सबसे बड़ा अवरोध है, जो मनुष्य को परब्रहम के कालचक्र को
14:37समझने से रोगता है।
14:40वायुमंडल में तैरते हुए वे सूक्षमकन, जो कभी सृष्टी का आधार थे, अब प्रकाश के नए आयामों में विलीन हो
14:48रहे थे।
14:50रौरव के जलते हुए स्तंभ नारद के समक्ष यह प्रमानित कर रहे थे कि अधर्म का अंथी धर्म के पुनरुथान
14:57की एक मात्र सीधी है।
15:00इश्वर ने नारद को यह आश्वासन दिया कि विनाश की यह अगनी केवल कच्रे को जला रही है। सत्य के
15:07बीस तो सदा अक्षुन रहते हैं।
15:11नारद की उंगलिया वीना पर तेज चलने लगी और उनके गीतों से पूरा ब्रहमांड एक नए लए में बंधने लगा।
15:29आल्चक्र को पहचान लिया था।
15:31A sudden manifestation of the Divine Mother, Adi Shakti, appears in the
15:38Stabilizing the chaotic energies that were threatening to consume नारदा
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15:50Stabilizing the chaotic energies that were threatening to consume नारदा
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17:27Stabilizing the chaotic energies that were threatening to consume नारदा
17:32ब्रहमांड के समस्त लोकों में एक अजीब सी स्थिरता चागई है, जहां
17:37समय का पहिया जैसे अपनी गतीक होकर शूने में विलीन होने लगा है
17:43नारद मुनी ने देखा कि भगवान विश्नु का चतुर्भुज स्वरूप जो सदैव सौमय रहता था, अब
17:49ब्रहमांड के विसर्जन की गंभीरता को धारन कर चुका है
17:54अचानक आकाश के केंद्र से एक दिव्य जोती निकली, जिसने पुरानी कालगणना की नीम को रेट की तरह बिखेरना शुरू
18:02कर दिया
18:04यह वह क्षन था जब नेती के बनाये हुए अद्रिश्य सूत्रक जो स्वर्ग और प्रित्वी को जोड़े रखते थे, धीरे
18:11धीरे धीले होकर अनंत आकाश में ओजल होने लगे
18:15नारद ने अपनी वीना के तारों को थाम लिया, क्योंकि उनसे निकलने वाली ध्वनी भी अब नए युग के आहवान
18:22में परिवर्तित हो रही थी
18:25भगवान विश्णों के नेत्रों में समय का वह चक्र घूम रहा था, जिसमें स्रिष्टी के पुराने नियम पिघल कर एक
18:32नए रहस्य में रूप में ढल रहे थे
18:35दिव्य सभा में उपस्थित अन्य देवता, जो अब तक इस परिवर्तन से अन्भिग्य थे, अचानक अपने अस्तित्व को धुंधला महसूस
18:44करने लगे
18:46परिवर्तन का यह प्रभाव ऐसा था जैसे किसी विशाल सरोवर का जल धीरे-धीरे अपने ही मूल तत्व में वापस
18:53लौट रहा हूँ
18:55नारद मुनी को अनुभव हुआ कि उनकी भक्ती और ज्यान भी इस महा प्रिवर्तन के प्रवाह में नई गहराई प्राप्त
19:02कर रहे हैं
19:05विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि जो पुराना है उसे मिटना ही होगा ताकि नवाचार का बीज पूर्णत
19:12है पल्वित हो सके
19:15हवाओं में एक मधुर संगीत गूंजने लगा जो किसी विदाई का गीत नहीं बल्कि आने वाले युग के स्वागत का
19:22शंकनाद था
19:24ब्रहमांड के कोने कोने में व्याप्त उर्जा अब एक संगठित प्रवाह में बदल गई थी जो सीधे परब्रहम के संकल्प
19:32से प्रेरित थी
19:34नारद ने देखा कि परब्रहम का असली कालचक्र कोई यंत्र नहीं बल्कि एक चेतना है जो निरंतर स्वयन को पुनर
19:42जीवित करती है
19:44पुराने लोकों की सीमाएं अब मिट चुकी थी जिससे एक ऐसा लोक तयार हो रहा था जहां माया का प्रभाव
19:52सीमित और ज्ञान का विस्तार अनन्थ होगा
19:55देवताओं के आभूशन और उनकी दिव्यशक्तियां भी अब एक नई लए में स्पंदित होने लगी मानों वे किसी नए अभिशेक
20:03के लिए तयार हो
20:06नारद मुनी ने हाथ जोड़कर इस महान परिवर्तन को प्रणाम किया क्योंकि उन्होंने अब सत्य को पूर्णता आत्मसात कर लिया
20:14था
20:16ब्रहमांड के महासंकट का समाधान इसी परिवर्तन में नहित था जो स्रिजन के बीज को पुनरजीवित करने का एक मात्र
20:24मार्ग था
20:25स्थिर्टा के इस वातावर्ण में समय का प्रवाह अब एक दिशा में बह रहा था जहां से वापसी संभव नहीं
20:33थी
20:34परब्रहम की लीला ने नारद के भीतर एक ऐसे ज्ञान का बीज बोदिया था जो आने वाले युगों तक मानवता
20:41का मार्ग दर्शक बनेगा
20:44जैसे ही पुराना युग पूर्णता विलीन हुआ वैकुंठा की कांती और भी अधिक तेजस्वी होकर पूरी स्रिष्टी को नई उर्जा
20:52से भर गई
20:54नारद के मस्तक के भीतर ज्ञान की किरने एक महासागर की भाती हिलोरे लेने लगी जिससे उनकी चेतना ब्रहमांड के
21:02अनंत विस्तार में खो गई
21:05भगवान विश्णु अपनी चतुर्भुज छवी में शांत ग्रिष्टी से नारद को निहार रहे थे जैसे वे उस अपार ज्ञान के
21:12भार को सहने की नारद की ख्शमता का आकलन कर रहे हूँ
21:17ज्यान का वह असीन भार नारद के भीतर स्थित अहमकार की पर्तों को भेद कर उन्हें शूने की ओर धकेलने
21:24लगा
21:26आकाश में उभरते हुए दिव्य चिन्हों ने यह स्पष्ट कर दिया कि स्रिष्टी के बीज का रहस्य अब नारद के
21:33व्यक्तिगत अस्तित्व को मिटा कर उसे वैश्विक चेतना में परिवर्तित कर रहा है
21:39नारद ने अनुभव किया कि उनका अपना व्यक्तित्व एक पतले धागे की भानती उस प्रकाश पुंज में विलीन हो रहा
21:46है जिसे उन्होंने स्रिष्टी का बीज कहा था
21:51विश्णू ने धीर गंभीर स्वर में कहा कि सत्य का भार वही वहन कर सकता है जो स्वयन को करता
21:57मानना छोड़ दे
21:59नारद के हाथों से उनकी वीना धीरे से छूट कर हवा में तैरने लगी मानो ध्वनी का आधार भी उस
22:06दिव्य मौन के आगे हार मान गया हो
22:10हवा में तैरते वे स्वर्ण अक्षरों के कंड नारद की भुजाओं पर अनकित होने लगे जैसे कोई प्राचीन लिपी उनके
22:17शरीर को ही ग्रंथ बना रही हो
22:20स्रिष्टी की आदिध्वनी नारद के हरिदय में गूंजने लगी जिससे उनके भीतर का द्वैट मिटकर अखंड अद्वैट की स्थापना होने
22:29लगी
22:30विष्णू की मंद मुस्कान में वह आश्वासन था कि नारद इस प्रल्यकारी ज्यान के सागर में डूबेंगे नहीं अपितु स्वयन
22:38सागर बन जाएंगे
22:40नारद ने अपनी आखें खोली तो उन्हें संसार की हर वस्तु में वही स्रिजन का बीज स्पंदित होता हुआ दिखाई
22:48दिया
22:49संपूर्ण वैकुंट के स्तंभों से निकलने वाली कांती नारद के शरीर के चारों और एक सुरक्षा धेरा बनाने लगी
22:58समय का प्रवाह अब नारद के लिए स्थिर हो गया था क्योंकि वे काल से परे उस बीज के मूल
23:04स्रोत तक पहुँच चुके थे
23:07विश्नु ने अपना हस्त नारद के मस्तक पर रखा जिससे वह असहनिय ज्यान एक शीतल अमरित के समान शांत हो
23:15गया
23:16नारद ने अनुभव किया कि स्रिष्टी का बीज केवल एक वस्तु नहीं बलकि समस्थ चेतनाओं का सामुहिक सत्य है
23:25वातावर्ण में गूंजता हुआ ओंकार का नाद उस ज्यान को नारद के रोमरों में अंकित कर रहा था
23:32नारद की देह अब उस दिव्यकांती को धारन करने के लिए पूर्णतह सक्षम हो चुकी थी जिसे सहना साधारन मनुश्यों
23:40के लिए असंभव था
23:43भगवान विश्णु ने संकेत दिया कि अब समया गया है कि इस ज्यान को स्रिष्टी के अगले चरण की नीम
23:49बनाया जाए
23:51ज्यान का वह भारी बोज अब एक दिव्य प्रकाश बन चुका था जो नारद को उनके नए कर्तव्यकी और प्रेरित
23:59कर रहा था
24:00एक अंतिम चमक के साथ नारद का व्यक्तित्व ब्रहमांड के उस मूल बीज में एकाकार हो गया जिससे नई स्रिष्टी
24:08का मार्ग प्रशस्थ हुआ
24:11ब्रहमांड के समस्त तत्व अपनी सीमाओं को त्याग कर एक महासागर के समान एकाकार होने लगे जैसे कोई शांत मन
24:19गहरे ध्यान में विलीन हो जाए
24:22भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा के अंतिम चरण में जागरित हो रहे हैं उनके मुख पर स्रिष्टी को पुनह समवारने
24:29का सौमय संकल्प स्पष्ट दिखाई दे रहा है
24:34विश्णु के हाथों से निकलती हुई दिव्यकिर ने उन पुराने बीस्तत्वों को चुनकर राख कर रही हैं जो अब समय
24:41की गती के साथ व्यर्थ हो चुके थे
24:44यह प्रलय का दृष्य विनाश नहीं बलकि एक पवित्रस नान है जो ब्रह्मांड की आत्मा को नए जन्म के लिए
24:52शुद्ध कर रहा है
24:54विशाल परवत श्रिंक लाए जैसे मोम की तरह पिघल रही हैं और उनके स्थान पर केवल अनंत नीले आकाश का
25:02विस्तार शेश बचा है
25:05गरुर देव इस महा प्रिवर्तन को देख स्थब्ध हैं उनके विशाल पंक अब ब्रह्मांड के वायुवेक को नियंत्रित करने के
25:12लिए फैल रहे हैं
25:15गरुर के पंकों की फड़फडाहट से ब्रह्मांडिय धूल का वह पुराना आवर्ण छंटने लगा है जिससे सत्य का बास्तविक स्वरूप
25:23स्पष्ट दिखाई दे रहा है
25:26विनाश और स्रिजन के बीच का यह सूक्ष्म अंतर एक जलते हुए स्वर्ण दीख के समान प्रज्वलित है
25:34प्रकृती का सारा वैभव अब धीरे धीरे अपने मूल बिंदु पर सिमटता जा रहा है जैसे वर्षा की बूंदे वापस
25:42बादल में विलीन हो रही हो
25:45महादेव कैलाश पर बैठे इस महान घटना के साक्षी है उनकी तीसरी आख से निकलती जोती ब्रहमांड की काया पलट
25:53को दिशा दे रही है
25:55शिव का त्रिशूल अब शान्त हो गया है क्योंकि वर्तमान का कालचक्र अपनी पूर्णता प्राप्त कर चुका है
26:03यह ब्रहमांडिय शून्यता ही वह रिक्त स्थान है जहां से नई चेतना का उदे होगा
26:10संसार के सभी बीज अब एक दिव्यपात्र में एकत्रित हो रहे हैं जिन्हे भगवान विश्नुपुन्ह नई स्रिष्टी के लिए अंकुरित
26:19करेंगे
26:20नारद मुनी इस द्रिष्य को देख स्वयन को धन्य मान रहे हैं क्योंकि वे साक्षात ब्रहमा के चक्र को अपनी
26:27आखों से देख रहे हैं
26:30नारद अपनी वीना के तारों को छेड़ते हैं और उस ध्वनी से प्रलय की शांती एक मधुर संगीत में बदल
26:37जाती है
26:40संगीत की लहरें ब्रहमांड के कोने-कोने तक पहुँचकर मृतप्राय तत्वों में फिर से जीवन का स्पंदन भर रही हैं
26:48अब समय आ गया है कि पुराने अहंकार और द्वैत को मिटा कर एक नई चेतना का बीजारोपन किया जाएं
26:57विश्नु का सुदर्शन चक्र अब ब्रहमांड के केंद्र को काट रहा है ताकि एक नई परिधी का निर्मान हो सके
27:05ब्रहमांड की सीमाएं अब नई उर्जा से स्पंदित होने लगी हैं जो की स्रिजन की नई संभावनाओ का संकेत है
27:14स्रिष्टी का चक्र फिर से घूमने के लिए तत्पर है और इस बार का बीजारोपन और भी दिव्य और व्यापक
27:21होने वाला है
27:24ब्रहमांड के सुदर्शन चक्र के प्रहार से उत्पन्न महा जंजावात नारत को वर्तमान आयाम से दूर एक अज्यात और शूने
27:32स्थान की ओर खींच ले गया
27:34शूने की इस अनंत गहराई में नारत ने अनुभव किया कि समय की गती यहां थम गई है और वास्तविक्ता
27:42के सूत्र बिखर रही है
27:45नारत के चर्णों के नीचे अज्यात आयाम की धरातल जो की क्रिमि भोजन के समान बायो लुमिनेसेंट हरे रंग की
27:52नमी और चमकते हुए परजीवियों से आच्छा दित्थी कांप उठी
27:57हवा में तैरते हुए चमकते कीडों की पंखुडियों के बीच नारत ने देखा कि संपूर्ण आयाम एक विशाल जीवित प्राणी
28:05के भीतर धड़क रहा है
28:08विश्नु का सुदर्शन चक्र यहां से भी एक दूरस्थ प्रकाश के बिंदू की भाती दिखाई दे रहा था जो की
28:15इस आयाम की स्थिर्ता को बनाए रखने के लिए अंतिम स्तंभ का कार्य कर रहा था
28:21नारद ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा जिससे उस अज्यात आयाम की शांट और रहस्यमेई गूझ में जीवन के
28:29बीस पुनरजीवित होने लगे
28:31नारद की वीना की प्रत्येक ध्वनी तरंग यहां के परजीवियों को एक नई चेतना प्रदान कर रही थी जिससे वे
28:39धीरे-धीरे दिव्य आकृतियों में परिवर्तित होने लगे
28:43इस आयाम के चारों और एक अलौकिक सन्नाट आचा गया मानो संपूर्ण स्रिष्टी नारद द्वारा रचित इस संगीत के पूर्ण
28:51होने की प्रतीक्षा कर रही हो
28:54अचानक आकाश में एक तीवर विस्फोट हुआ और नारद के सामने एक पोर्टल खुला जिसके भीतर परब्रहम के कालचक्र की
29:02हलचल साफ दिखाई दे रही थी
29:05नारद ने देखा कि परब्रहम स्वयं उस चक्र को गती प्रदान कर रहे थे और उनके हाथों की आभासे पूरा
29:13आयाम स्वर्ण में बन गया था
29:15उस चक्र के घूमते ही अज्यात आयाम की धर्ती ने अपना स्वरूप बदला और वह एक उर्जस्वित दिव्यधरा में परिवर्तित
29:24हो गई
29:25नारद के हृदय में एक अलौकिक शान्ती का संचार हुआ क्योंकि उन्हें समझा गया था कि परब्रहम ने उन्हें इसी
29:33शुद्धी और स्रिजन के लिए यहां बुलाया है
29:37परब्रहम का वह विशाल चक्र अब एक नई दिशा की ओर संकेत कर रहा था जहां से ब्रहमांड की नई
29:44उर्जा का प्रवाह शुरू होना था
29:47नारद ने अपनी वीना को कंधे पर रखा और उस नई दिशा की ओर कदम बढ़ाए जहां स्रिश्टी के भविश्य
29:54का निर्मान होने वाला था
29:57उनके प्रत्यक कदम के साथ उस अज्यात धरापर नई व्रिक्षों और पुष्पों का उदे हो रहा था जो दिव्य सुगंधी
30:05और ओज से भरे थे
30:07इस आयाम की काया पलट ने न केवल नारत को चकित किया बलकि पूरे ब्रहमांड के संतुलन को एक नए
30:14स्तर पर स्थापित कर दिया
30:17आकाश में गूंजती हुई दिव्यध्वनिया नारत के स्वागत में एक नए युक्के आगमन का उद्गोश कर रही थी
30:25नारत ने मुरकर उस पुराने आयाम को देखा जो अब पूरी तरह से समाप्थ होकर नए बीज में परिवर्तित हो
30:32चुका था
30:34परब्रह्म की क्रिपा का अनुभव करते हुए नारत को ग्यात हुआ कि स्रिजन का यह चक्र कभी नहीं रुकता यह
30:41मात्र अपना रूप बदलता है
30:44अगले पड़ाव की ओर बढ़ते हुए नारत का मन अब पूरी तरह से ब्रहमांडिये चेतना के साथ एकाकार हो चुका
30:51था