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ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस रोमांचक एपिसोड में जानिए कैसे एक शूद्र बालक अपने पूर्व-जन्म के संस्कारों को पहचानकर सांसारिक मोह-माया को छोड़कर परम सत्य की खोज में निकल पड़ता है। क्या उसे मिल पाएगा गोलोक का मार्ग? देखिए इस महा-गाथा का 10वाँ अध्याय। #BrahmavaivartaPurana #Narada #KrishnaBhakti #SanatanDharma #PuranicStories #SpiritualJourney #GodRealization #VedPuran
Transcript
00:00प्राचीन घने जंगल के मध्य में, बालक अपना शूद्र शरीर लिए तपस्वियों के आश्रम में भारी काश्ट धो रहा था,
00:07जहां उसकी द्रिष्टी अब संसार की माया से उपर उठकर शून्यता को देख रही थी.
00:14वैकुंट की अनंत आभा के भीतर भगवान विश्नु, शेशनाग की शयापर लेटे हुए, अपनी मंद मुस्कान से बालक के हृदय
00:22में जगे उस प्रथम दिव्यस पंदन का अवलोकन कर रही हैं.
00:27बालक अचानक रुक जाता है, और अपने हाथों की रिखाओं को गौर से देखता है, मानो उसे एहसास हो रहा
00:35हो कि ये बंधन केवल मिट्टी के बने एक अस्थाई कारागार हैं.
00:40जंगल की वायू में तैरती हुई बानसुरी की एक अलौकिक ध्वनी गुंजती है, जो बालक के भीतर दबी हुई विस्मृत
00:48यादों के द्वार को धीरे-धीरे खोल रही है.
00:52आश्रम के कठोर तपस्वी अपनी वैदिक रिचाओं में लीन हैं, लेकिन बालक के लिए अब इन मंत्रों की ध्वनी के
00:59पीछे एक गहरा मौन उभरने लगा है.
01:03गरुर देव आकाश में मंद्राते हुए, बालक की इस विरक्ती को देखकर भगवान विश्नु के प्रती अपनी अनन्य भक्ती का
01:11मौन समर्थन प्रकट करते हैं.
01:15बालक अपनी कुलहाडी नीचे रख देता है, और उस भारी बोच को महसूस करता है, जो उसके कंधों पर नहीं,
01:22बल्कि उसके आत्मा के अस्तित्व पर पड़ा है.
01:26समय का चकरत हमसा गया है, जहां व्रिक्षों की डालिया भी इस बालक के सांसारिक मोह त्यागने के संकल्प पर
01:34मानोस्तब्ध होकर खड़ी हैं.
01:37चारों और व्याप्त घोरवन का संनाटा अब बालक के कानों में एक दिव्य मंत्र की तरह सुनाई दे रहा है,
01:44जो उसे सांसारिक पहचान से मुक्त कर रहा है.
01:48भगवान शिव कैलाश के एकान्त में अपने ध्यान से नेत्र खोलते हैं और बालक के इस प्रारंभिक विरक्ती के क्षण
01:56को अपनी कृपाद रिष्टी से देखते हैं.
02:00बालक के मन में उठने वाला यह तीवर वैराग्यत एक ऐसे ज्वाला मुखी की भांती है, जो पुरानी पहचान को
02:07जलाकर राख करने को तत्पर है.
02:11मौन के उस गहरे सागर में बालक को पहली बार अपने भीतर किसी अलौकिक उपस्थिती का आभास हो रहा है,
02:19जो कृष्ण के प्रेम की गंध समेटे हुए है.
02:23आश्रम की सीमाएं, जो कल तक सुरक्षा का प्रतीक थी, अब बालक को किसी कृत्रिम पिंजरे की सलाखों के समान
02:31प्रतीत हो रही है.
02:34देवर्शी नारद वीना के स्वर छेड़ते हैं, और वे बालक के उस सुक्ष्म संकल्प को अपने संगीत के माध्यम से
02:41ब्रहमांड के कंकन तक पहुचा रही है.
02:45बालक के शरीर की ठकान मिक्ती जा रही है, क्योंकि उसका चित अब देह की भूखप्यास से परे एक नई
02:52दिशा की खोज में निकल पड़ा है.
02:56अंधेरा ढलते ही जंगल के जीव भी मानों मौन हो गए हैं, जैसे वे भी इस बालक के महान परिवर्तन
03:02का साक्षी बनने की प्रतीक्षा कर रहे हूं.
03:06उसका शूद्र शरीर, जिसे समाज नेहीन समझा था, अब उसी के भीतर एक महान तपस्वी की आत्मा का उदगम स्थान
03:14बन रहा है.
03:17भगवान विश्णु अपनी योगमाया से बालक की इस मानसिक यात्रा को सुगम बनाते हैं, ताकि वह मोह के जंजाल को
03:24सरलता से त्याग सके.
03:27बालक अब अन्तिम बार अपने उन साथियों को देखता है, जो अभी भी उसी अज्यानता के अंधकार में भटक रहे
03:35हैं, जहां से वह बाहर निकल चुका है.
03:39व्रिंदावन की दिशा से आती हुई एक ठंडी मंध हवा बालक के चर्णों को कृष्ण की खोज के पत पर
03:45चलने के लिए प्रेरित कर रही है.
03:49बालक के पैर उस वनपत पर बढ़ चले हैं, जहां व्रिक्षों की डालिया कृष्ण की मधुर बन्शी का अनुकरण करती
03:56हुई प्रतीत हो रही हैं.
03:59शीर सागर के गर्भ मेस्थित अपने दिव्यशयन कक्ष से भगवान विश्नु मंद मुस्कान के साथ इस बालक के आध्यात्मिक उत्थान
04:07का अवलोकन कर रही हैं.
04:11जैसे जैसे वह घने जंगल की ओर बढ़ता है, पत्तों की सरसराहट में उसे श्याम नाम की प्रतिध्वनी सुनाई देने
04:18लगती हैं.
04:20आकाश में उरने वाले पक्षी भी मानो उस बालक के पत प्रदर्शन के लिए एक निश्चित दिशा में पंक पसार
04:27रहे हैं.
04:29जंगल की गहराई में पहुँचते ही व्रिक्षों के बीच से एक अलौकिक नीली आभा दिखाई देती है, जो कृष्ण के
04:37सामिके का आभास कराती है.
04:40विश्णू का गरूर अपने विशाल स्वर्ण पंको को समेटे आकाश से उस बालक की रक्षा के लिए सतर्क खड़ा है.
04:49बालक अपनी आखों को बंद कर लेता है और उस ध्वनी को महसूस करता है जो उसके भीतर की आत्मा
04:56को जग जोर रही है.
04:59समस्थ प्रकृती मानो थम गई है और व्रिक्षों की टहनिया बालक के स्वागत में जुक रही है.
05:06वन के उस निर्जन स्थान पर जहां केवल सन्नाटा था, अब हवा में चंदन और पुश्पों की सुगंधी घुल गई
05:14है.
05:15भगवान विश्णु अपनी चतुर्भुज छवी से एक सुक्ष्म दिव्यकिरन बालक के हृदय की ओर भेजते हैं ताकि उसका विश्वास अडिग
05:24रहे.
05:25बालक को अपनी हथेलियों पर एक अनोखी उश्णता का अनुभव होता है, जैसे कोई अद्रिश्य शक्ती उसे सहारा दे रही
05:34हो.
05:35धैर्य का बांध तूट रहा है और बालक अब दौडते हुए उस ध्वनी के मूल स्थान को ढूंडने के लिए
05:42आतुर हो गया है.
05:44वन की जाडियों के पीछे से चमकती हुई एक जोती उसे संकेत देती है कि वह सही मार्ग पर चल
05:51रहा है.
05:53विश्णु का गरुड एक गूंजती हुई आवाज निकालता है जो उस बालक के मन के संशय को पूरी तरह समाप्त
06:01कर देती है.
06:03बालक एक उचे टीले पर चड़ता है जहां से पूरा वरिंदावन छेत्र अपनी दिव्य आभा के साथ द्रिश्टि गोचर हो
06:11रहा है.
06:13द्रिश्टि की भव्यता देखकर बालक के नेत्रों से भक्ती के अश्रुच छलक पड़े हैं जो उसके हृदय की निर्मलता का
06:20प्रमाण है.
06:22वन की वह बानसुरी अब बिल्कुल समीप है जैसे कोई स्वय उसके कानों में फुस्फुसा कर बुला रहा हो.
06:31भगवान विश्टु उस बालक की भक्ती की तीवर्ता को देख अपनी योगमाया को थोड़ा और विस्तार देते हैं.
06:39बालक अब पूर्णत है सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर उस कृष्णध्वनी की ओर दौर पड़ता है.
06:47व्रिंदावन की दिव्य भूनी पर बालक के चरण पड़ते ही पूरी वनस्थली एक साथ खिल उठी है.
06:54व्रिंदावन के घने कुंजों के मध्य बालक के चारों और माया का एक स्वर्ण में आवर्ण बिच जाता है जो
07:02उसकी इंद्रियों को विचलित करने का प्रयास करता है.
07:06योगनिद्रा में लीन भगवान विश्णू अपने क्षीर सागर के दिव्य आसन पर विराज मान होकर मंद मुस्कान के साथ माया
07:14के इस खेल का अवलोकन कर रही हैं.
07:18माया ने बालक के समक्ष एक ऐसे महल की रचना की जो उसे उसके पूर्व वैभव की याद दिला कर
07:25पुनह सांसारिक मोह में जकडने का स्वपन दिखा रहा है.
07:30व्रिंदावन के आकाश में अचानक से एक गहरे तामर रंग की छाया छा जाती है जो बालक के मन में
07:37उत्पन होने वाले अहंकार के प्रती सचेट करती है.
07:42बालक के कानों में वह दिव्य वन्शिध्वनी पुनह गूंजती है जो माया के स्वर्ण महल को एक क्षण में धूल
07:49के समान फीका कर देती है.
07:52भगवान विश्णु का अंशुरूप गरुड अपने विशाल स्वर्ण पंखों से माया के बादलों को चीरते हुए बालक के मार्ग से
08:00अवरोधों को हटा रहा है.
08:03बालक अपने आखों को मलता है और माया के उस जाल को पहचानते ही अपने हृदय में क्रिश्ण के नाम
08:10का स्मरण तीवर कर देता है.
08:13माया की शक्ती अपना प्रभाव खोने लगती है और उसके द्वारा रचित स्वर्ण महल धीरे-धीरे लुक्त होकर व्रिक्षों में
08:21विलीन होने लगता है.
08:23समस्थ विंदावन अब एक दिव्य प्रकाश से जग्मगा उठता है. मानो प्रकृती स्वयं बालक के साहस की परीक्षा को सफल
08:31मानकर अभिनंदन कर रही हो.
08:34भगवान विश्णु अपनी योगमाया को संकेत देते हैं कि अब बालक के वैराग्य का अगला चरण आरंभ किया जाए.
08:43बालक के पैरों में अब एक अलौकिक शक्ती का अनुभव हो रहा है, जो उसे उन बाधाओं के उपर से
08:50ले जा रही है, जो उसे पीछे खीचती थी.
08:54आकाश से फूलों की दिव्य वर्षा होती है, जो बालक के मार्ग को सुगंधित और पावन बना देती है.
09:02वन के मार्ग में अब कोई भी सांसारिक प्रलोभन शेश नहीं रहा, क्योंकि बालक का मन पूर्णत है गोविंद के
09:09ध्यान में स्थिर हो चुका है.
09:12भगवान विश्नु की स्थुती करते हुए गरुड बालक के सिर के उपर एक सुरक्षा का छत्राकार घेरा बना कर उड़
09:19रहा है.
09:21बालक अचानक रुपता है और सामने एक दिव्य नदी को बहते देखता है, जिसका जल अमरित के समान चमक रहा
09:29है.
09:31यह नदी माया और सत्य का अंतर स्पष्ट करती है और बालक को निडर होकर आगे बढ़ने का संदेश देती
09:38है.
09:40वन की हर ध्वनी अब केवल क्रिश्न क्रिश्न का मंत्र बनकर बालक के भीतर अनुगूंचित हो रही है.
09:48भगवान विश्नों की योगमाया स्वयंग एक साध्वी का वेश धारन कर बालक के मार्ग में खड़ी है ताकि उसकी अंतिम
09:56परीक्षा ली जा सके.
09:58साध्वी बालक से पूछती है कि क्या वह अपने घर के सुख़द स्मृतियों को सदैव के लिए त्यागने हेतु तयार
10:05है.
10:07बालक के होठों पर एक शांत मुस्कान है जो यह सिद्ध करती है कि वह सासारिक सुखों को नहीं अपितु
10:15केवल क्रिश्न को खोज रहा है.
10:18साध्वी के प्रशनों के उत्तर में बालक ने अपने चारों और फैली मायावी स्मृतियों के जाल को अपनी इच्छा शक्ती
10:25से राख में बदलते हुए अपनी चेतना को अनंत शूने में विलीन कर लिया.
10:31भगवान विश्नों अपनी योगमाया के सुक्षम स्वरूप का निरीक्षन करते हुए एक क्षन के लिए मुस्कराएं और उन्होंने अपनी दिव्यद
10:39रिष्टी से बालक के हरिदय के स्पंदन को स्थिर कर दिया.
10:43आमकार के अंतिम अंश को त्यागते ही बालक के पैरों के नीचे की प्रित्वी थर्थराने लगी और उसके अतीत की
10:51स्मृतिया धुए के गुबार की भाती आकाश में विलीन होने लगी.
10:56चारों और सन्नाटा पसर गया और केवल उस रहस्य में बांसुरी की ध्वनी गूंजने लगी जो भगवान कृष्ण के दिव्य
11:03अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमार थी.
11:07साध्वी ने एक तेजस्वी प्रकाश के रूप में बालक के समक्ष अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करने का निर्नैलिया और वातावर्ण
11:15में दिव्य गंध व्याप्थ हो गई.
11:18योगमाया का वह साध्वी रूप अब एक दिव्य देवी के तेज से प्रकाशित होने लगा, जिसके सामने बालक का मस्तक
11:25स्वतही श्रधा से जुप गया.
11:28बालक ने अनुभव किया कि उसका शरीर अब भौतिक सीमाओं से परे हो रहा है, जैसे वह किसी महासागर की
11:36गहराईयों को स्पर्श कर रहा हो.
11:39आंकार का दमन करने की इस अगनिप्रीक्षा में बालक के मस्तिष्क से वह नाम मिट गया जिसे लोग उसे इस
11:46लोक में पुकारते थे.
11:48दूर कहीं वैकुंट के द्वार पर गरूर ने अपने विशाल पंखों को फड़फडाया, मानो वह बालक के इस कठिन सन्यास
11:56का स्वागत कर रहा हो.
11:58भगवान विश्णू ने गरूर की ओर देखते हुए संकेत किया कि बालक अब उस सीमा पर खड़ा है, जहां से
12:06केवल कृष्ण की अनुकमपा ही मार्ग दिखा सकती है.
12:10बालक ने अपनी आखे बंद की और अंतर्मन में उस मुली मनोहर का ध्यान किया, जिसका आहवान वह जन्मों से
12:18कर रहा था.
12:20प्रकृती ने भी अपनी गती रोक दी, मानो संपूर्ण वन इस बालक के अहंकार विहीन होने की गवाही देने के
12:27लिए थम गया हो.
12:29साध्वी रूपी योग माया ने अपने हाथ हवा में लहराए, जिससे वह स्थान अचानक एक स्वर्नकांती से भर उठा जो
12:37वैकुंठ की आभा के समान थी.
12:40बालक के भीतर उठने वाले सभी द्वंद्वशान्थ हो गए और अहंकार के स्थान पर केवल भक्ती का एक निर्मल स्रोत
12:48बहने लगा.
12:50साध्वी ने मुस्कुराते हुए बालक को आशिरवाद दिया, जिससे उसके भीतर का अंतिम संशय भी भस्म हो गया.
12:59प्रतिकात्मक रूप से बालक के कंधों पर लदा हुआ वह सांसारिक बोज अब मिट्टी में मिलकर गायब हो गया, जो
13:06उसके पूर्व जीवन का अंति था.
13:09भगवान विश्णु ने बालक की इस परीक्षा को पूर्ण घोशित करते हुए वैकुंट से एक दिव्य पुष्प की वर्षा करवाई.
13:17गरुर ने आकाश में एक चक्र लगाया और उसकी गूँज बालक के कानों में एक दिव्य मंत्र के समान सुनाई
13:24दी.
13:26आमकार के दमन के बाद अब बालक के सामने वहपत खुल गया था जो सीधे उसके इश्ट देव की ओर
13:33जाता था.
13:35बालक ने पहली बार पूर्ण आत्मविश्वास के साथ आगे कदम बढ़ाया, क्योंकि अब उसे कृष्ण की खोज में किसी और
13:43प्रमान की आवश्शक्ता नहीं थी.
13:46अचानक आस्मान में काले बादलों का डेरा जम गया और वातावर्ण में एक अंजानी खामोशी छा गई, जैसे प्रकृती स्वयं
13:54बालक के साहस को चुनौती देने के लिए तयार हो गई हो.
13:59गरुर के पंकों की गूंज अब स्थिर हो चुकी थी, मानो वह भी उपर से बालक की इस भीशन परीक्षा
14:06का साक्षी बनने के लिए ठहर गया हो.
14:09बिजली की कड़कडाहट के साथ मुसलाधार वर्शाने धर्ती को अपनी आगोश में ले लिया, लेकिन बालक के संकल्प में कोई
14:17हलचल नहीं हुई.
14:19बालक के वस्त्र भीग कर भारी हो चुके थे, पर उसकी दृष्टी उस बिंदु पर टिकी थी जहां से उसे
14:26कृष्ण के दिव्य प्रकाश की किरने आभासित हो रही थी.
14:31तेज हवाएं पेडों को जगजोर रही थी, मानोवे बालक को उसकी जगह से हटाने के लिए कोई दानविय शक्ती का
14:38उप्योग कर रही हो.
14:41आखाश से गिरती हुई जल की बूंदे बालक की त्वचा पर चोट की तरहे लग रही थी, फिर भी उसने
14:47अपने ध्यान की डोरी को धीला नहीं होने दिया.
14:51प्रकृती के इस कोलाहल में बालक को अपनी अंतरात्मा के भीतर कृष्ण की उस मधुर वन्शी का कमपन सुनाई देने
14:59लगा जो तूफान को शांत कर रही थी.
15:03मानो वायू और जल के इस भीशन युद्ध के बीच समय की धारा थम गई हो और बालक का समर्पन
15:09ब्रहमांड के केंदर में प्रवेश कर रहा हो.
15:13दूर कहीं से उठती हुई गड़गडाहट ने वन की सीमाओं को हिला दिया, जैसे कि कोई अद्रिश शक्ती बालक की
15:20द्रिड़ता को चुनोती देने है तू समीप आ रही हो.
15:24विश्नु के स्वरूग की एक जलक बालक के मानस पटल पर उभी, जो उसे इस परीक्षा के हर एक कण
15:31में अपना आशिरवाद प्रदान कर रहे थे.
15:35बालक ने अपनी ठिठुरन को भूल कर अपने पूरे अस्तित्व को उस इष्ट की सेवा में समर्पित कर दिया, जिसका
15:42नाम लेते ही भय भी विलीन हो जाता है.
15:46बादलों के फटने से उत्पन हुआ वह महाजल प्रलय अब बालक के चारों और एक सुरक्षा धेरा बना चुका था,
15:54जिससे बाहर की माया उसे स्पर्ष न कर सकी.
15:58वन के सन्नाटे में बालक की सांसों की लए अब उस मंतर के साथ जूर गई थी, जो अनादी काल
16:05से कृष्ण की स्तुती में गाया जाता रहा है.
16:09शून्य में स्थित बालक अब केवल एक देह नहीं, बलकी एक चेतना बन चुका था जो भौतिक बाधाओं के परे
16:16कृष्ण के दर्शन की प्रतीक्षा कर रही थी.
16:20तभी एक दिव्य अगनी ने बादलों के बीच रास्ता बनाया, जो बालक के तपकी अगनी को स्विकार करने के लिए
16:27नीचे की ओर प्रजवलित हुई.
16:30यह अगनी प्रीक्षा का वह क्षन था जहां सांसारिक मोह का अंतिम अवशेश भी भस्म होकर बालक के प्रेम में
16:37विलीन होने जा रहा था.
16:40बालक के अधरों पर एक मधुर मुस्कान तैर गई, क्योंकि उसे आभास हो गया था कि वह अब अकेला नहीं,
16:47अपितु कृष्ण के सानिध्य में है.
16:50स्वय भगवान विश्नु बालक की इस निशकाम भक्ती को देख कर अपनी सुक्षम द्रिश्टी से उसकी यात्रा को और भी
16:58सुगम बना रहे थे.
17:00वर्षा का वेग धीरे-धीरे कम हो रहा था, मानो वह स्वय भी इस बालक के आगे अपना मस्तक जुका
17:07कर विदाले रही हो.
17:10परीक्षा की अगनी ने न केवल बालक के शरीर को पवित्र किया, बल्कि उसके भीतर के उस मार्ग को खोल
17:16दिया जो सीधे कृष्ण के लोग की ओर ले जाता था.
17:21प्राचीन तपोवन के द्वार पर पहुँचते ही बालक को दिव्य उर्जाओं का एक ऐसा घेरा अनुभव हुआ जैसे सदियों की
17:28तपस्या एक साथ वहां मूर्त रूप ले रही हो.
17:32बैकुंठ लोग से भगवान विश्णू ने अपनी सुक्षम द्रिष्टी से उस आश्रम को देखा, जहां रिशियों की तपस्या का तेज
17:40सूर्य की किर्णों को भी परास्त कर रहा था.
17:44बालक ने अपनी ठकी हुई आखों को मलते हुए देखा कि आश्रम के भीतर रिशिमुनी किसी अग्रिश ध्वनी के ध्यान
17:51में पूर्णतह लीन थे.
17:54हवा में तैर्ती हुई सुगंध और ओस की बूंदों ने एक ऐसी शांती पैदा की, जैसे समय स्वय उस स्थान
18:01पर आकर रुप गया हो.
18:04अचानक रिशियों की कुटीर से निकलने वाला तेज बालक के मन की गहराईयों को चुगया और उसे अपने भीतर एक
18:11नई स्पूर्ती का अनुभव हुआ.
18:14विश्नु भगवान ने मुस्कराते हुए गरूर को संकेत दिया कि इस बालक की परीक्षा का एक और चरण अब प्रारंभ
18:22होने वाला है.
18:24बालक ने एक वृद्ध रिशी के चरण चुए, जिनके स्पर्ष मात्र से उसे ब्रहमांड के रहसियों की एक छोटी सी
18:32जलक प्राप्थ हुई.
18:34आश्रम की दिवालों पर अनकित प्राचीन चिनह एक दिव्य लिपी की तरहे चमक उठे, मानोवे बालक का स्वागत कर रहे
18:41हुँ.
18:43समस्त वातावर्ण में एक अलौकिक संगीत गूंच उठा जो बालक के हृदय में छिपी कृष्ण की छवी को और अधिक
18:50स्पष्ट कर रहा था.
18:52भगवान विश्णों की माया ने आश्रम के भीतर एक ऐसी आभा निर्मित की जहां बालक को अपने ही पूर्व जन्म
19:00की परचाईया दिखाई देने लगी.
19:03रिशियों के समोह में से एक तेजस्वी रिशी ने बालक की ओर देखा और उसकी आखों में छिपी व्याकुलता को
19:10भांप लिया.
19:12समय का चक्र इस तरह स्थिर प्रतीत हुआ की बालक को लगा जैसे वह किसी अन्य लोक में आ गया
19:18है जहां केवल भक्ती का ही अस्तित्व है.
19:22आश्रम के पीछे बहने वाली पवित्र नदी की कलकल ध्वनी ने उस शांती में एक लए जोर दी जो बालक
19:29के कानों को कृष्ण के बांसुरी की याद दिलाने लगी.
19:34विश्णु भगवान ने बालक के मस्तक पर अपनी कृपा द्रिष्टी डाली जिससे उसके मन के सारे संशय एक क्षण में
19:41मिट गए.
19:43बालक ने अपनी कुटिया के पास बैठकर ध्यान मुद्रा अपनाई, जैसे वह अपनी आत्मा को पूर्णत है भगवान को समर्पित
19:51करने के लिए तयार हो.
19:53आश्रम के चारों और खिले हुए दिव्यपुष्प एक विशेश सुगंध बिखेर रहे थे, जो ध्यान की अवस्था को और अधिक
20:01गहरा बना रही थी.
20:03जैसे जैसे दिन्धला, आश्रम के दीपकों ने एक सामुहिक तेज को जन्म दिया, जो अंधकार को दूर करने की क्षमता
20:11रखता था.
20:13भगवान विश्णु मुस्कुराए क्योंकि बालक अब उस मुकाम पर था, जहां माया का कोई भी आवर्ण उसे सत्य से विचलित
20:21नहीं कर सकता था.
20:23रिशियों ने बालक के लिए विशेश हवन का आयोजन किया, जिसकी अगनी से निकलने वाला धुआ एक पवित्र आकरितियों का
20:31रूप लेने लगा.
20:33रात के सन्नाटे में बालक ने महसूस किया कि उसका अगला गंतव्य अब दूर नहीं है और उसके भीतर का
20:40मार्ग सीधे कृष्ण की ओर खुल गया है.
20:44बालक ने जैसे ही आखे मून दी, उसके चारों और का वन विलीन हो गया और वह एक अनंत नीले
20:51आकाश के नीचे स्वयं को एक गंधर्व के रूप में देखने लगा.
20:56शीर सागर की लहरों के बीच विराजित भगवान विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ अपने गरूर को बालक की स्मृतियों
21:04को जागरत करने का संकेत दिया.
21:07गरूर के पंकों की फड़फडा हट से ब्रहमांड की धूल हटी और बालक को ब्रहमा के मुख से निकला वह
21:13शाप स्पष्ट रूप से सुनाई देने लगा.
21:17उसकी आत्मा में गूंजता हुआ वह शाप एक ठंडी बिजली की तरह कौन धा, जिसने उसकी पूर्वचेतना के बंद द्वारों
21:25को जखजोर कर रख दिया.
21:27विशाल सुनहरे कमल के पुश्पों के बीच, बालक ने स्वय को स्वर्ग लोग की अपसराओं के नृत्य के बीच एक
21:34दिव्य संगीत अग्य के रूप में देखा.
21:38भगवान विश्णु ने अपनी योगमाया के द्वारा उस द्रिश को और अधिक स्पष्ट किया, जिससे बालक को अपनी पूर्व पहचान
21:46का हर अंश दिखाई देने लगा.
21:48बालक ने देखा कि कैसे उसने ब्रह्मा की सभा में अहंकार के वशीभूत होकर संगीत की लएको भंग किया था.
21:57वह द्रिश उस गंधर्व के लिए पीडादायक था, क्योंकि उसने सत्य की उपेक्षा कर अपनी कला के अभिमान को सर्वोपरी
22:05मान लिया था.
22:07चारों और व्याप्त दिव्य नीलिमा में बालक को वहक्षन याद आया जब ब्रह्माने क्रोध में आकर उसे मृत्य लोक में
22:15जन्म लेने का श्राप दिया था.
22:18विश्नु का शांत चहरा उसके अंतर्मन में प्रतिबिन्बित हुआ, मानो वे कह रहे हों कि यह निर्वासन ही मोक्ष का
22:25एक मात्रद्वार है.
22:28बालक की चेतना अब उस दिव्य स्थान पर स्थिर हो गई, जहां समय का प्रभाव शून्य है और केवल क्रिष्न
22:35का प्रेन ही सत्य है.
22:38आकाश में गूंजती वह बांसुरी की धुन अब और भी स्पष्ठ हो गई, जैसे वह स्वय क्रिष्न के होठों से
22:45निकल कर उसकी आत्मा को बुला रही हो.
22:48वह पुनरुथ्थान इतना तीवर था कि बालक का शारिरिक शरीर भी उस दिव्य उर्जा के स्पर्ष से कामपने लगा.
22:56भगवान विश्नु ने बालक के मस्तक पर अपना आशिरवाद रखा, जिससे उसकी सारी सांसारिक स्मृती एक धुमिल धुएं की तरह
23:05समाप्थ हो गई.
23:07बालक के भीतर का वह बालक अब नहीं रहा, उसके स्थान पर एक ज्यानी गंधर्व की चेतना का उदे हुआ
23:14था.
23:15चारों और चमक्ती हुई स्वर्णिम आभा ने उस पूरे वातावर्ण को एक दिव्य मंदिर में परिवर्तित कर दिया.
23:23अब बालक के लिए मृत्युलोग का कोई अर्थ नहीं था, क्योंकि उसने अपने वास्तवित स्वरूप को कृष्ण की शरण में
23:31पहचान लिया था.
23:33भगवान विश्णों की स्थुती करते हुए, वह गंधर्व अपने उस पिछले अहंकार के लिए क्षमा याचना कर रहा था.
23:41उसकी आत्मा का प्रत्येक कन अब केवल कृष्ण की भक्ती में तलीन होने की प्रतीक्षा कर रहा था.
23:48अंतिम दृष्ण में बालक ने आखें खोली तो उसके चहरे पर एक दिव्य मुस्कान थी, जैसे उसे अपना गंतव्य मिल
23:56गया हो.
23:58बालक उठा और उसने देखा कि वन की सधन हरियाली अब एक अलौकिक नीले प्रकाश में चमकने लगी है.
24:06स्वय भगवान विश्णू उस दिव्य गंधर्व की भक्ती से प्रसन्न होकर आकाश मार्ग से उसकी दिशा में संकेत भेज रहे
24:14थे.
24:16एक सफेध हंस उसके चर्णों के पास आकर रुका और उसे पूर्व दिशा की ओर संकेत करने लगा.
24:24हवाएं एक रहस्यमई सुर में बहने लगी, जैसे प्रकृती का प्रत्येक कन बालक को उसके अंतिन सत्य की ओर बुला
24:31रहा हो.
24:33वह निर्भीकता से घने जंगलों को पार करता रहा, क्योंकि उसे ज्यात था कि अब उसका मार्ग स्वयन क्रिश्न द्वारा
24:40निर्धारित है.
24:42तभी आकाश में गरूर के पंखों की गूंच सुनाई दी, मानोकाल स्वयन उसके मार्ग को प्रशस्त कर रहा हो.
24:51बालक ने रुपकर देखा, तो एक हिरन ने अपने सींगों से उसे एक गुप्ट गुफा का द्वार दिखाया.
24:58उस गुफा के भीतर से एक शांत और पावन सुगंध हा रही थी, जो उसे किसी दिव्य लोक के अनुभव
25:05का आभास करा रही थी.
25:08चारो और सन्नाटा इतना गहरा था कि उसे अपने भीतर की धड़कनों में कृष्ण का नाम सुनाई देने लगा.
25:16भगवान शिव अपनी समाधी से उठकर बालक की अटूट श्रद्धा को देख मुस्कुरा उठे और ब्रहमांड में दिव्यस पंदन गुज
25:24उठा.
25:25गुफा की दीवारों पर अचानक स्वय ही दिये प्रजवलित होने लगे, मानो कोई अद्रिश्य हाथ पूजा की तैयारी कर रहा
25:33हो.
25:34प्रकृती के उन तत्वों को देख कर बालक को अनुभव हुआ की संसार का मोह केवल एक शन भंगुर माया
25:41है.
25:43दूर से आती हुई नदी की कलकल ध्वनी में उसे वन्शी के स्वर का आभास होने लगा, जो उसे सम्मोहित
25:50कर रही थी.
25:52गरुर ने पुनह अपने उडान भरी और आकाश में एक चमकती हुई लकीर खीच दी, जो बालक के गंतव्य की
26:00ओर संकेत थी.
26:02बालक ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और हवा में लहराते हुए परागकन जैसे किसी मंत्र की तरहें चमकने लगे.
26:10यह द्रिशे इतना दिव्य था कि मानो साक्षात बैकुंट की आभा उस वन्चे कोने-कोने में उतर आई हो.
26:19अचानक एक तेजस्वी जोती उसके सामने प्रकट हुई, जिसने उसके हृदय के सारे भाय और संशों को भस्म कर दिया.
26:27उस जोती के भीतर उसे अपने उस पिछले जन्म का स्पष्ट प्रतिविम दिखाई दिया, जहां वह प्रभु के सानिध्य में
26:35था.
26:36उसने समझ लिया कि वह मात्र एक बालक नहीं, अपितु कृष्ण की सेवा में समर्पित एक शाश्वत आत्मा है.
26:45वह जोती विलीन हो गई और बालक ने एक नई उर्जा के साथ उस मार्ग पर कदम बढ़ाया जो सीधे
26:52पर मात्मा की ओर जाता था.
26:55बालक चलते चलते एक शांत सघन वन के मध्यस्थित प्राचीन जलकुंड के पास आकर रुख जाता है, जहां का वातावर्ण
27:03अलोकिक नीली आभा से परिपूर्ण है.
27:07उसके हृदय में उठ रही व्याकुलता उसे जल के स्थिर धरातल को निहारने के लिए विवश कर देती है, मानो
27:14वहां कोई गुप रहस्य प्रतीक्षा कर रहा हो.
27:18जैसे ही उसने अपनी द्रिष्टी कुंड के शांत जल पर डाली, उसके भीतर का प्रतिबिंद सामवली घटाओं और कोमल मुस्कान
27:26वाली छवी में बदलने लगा.
27:28वह सामवली छवी साक्षात परमात्मा की थी, जिसकी दिवे कान्ती ने उस पूरे कुंड के जल को स्वर्ण के समान
27:36चमकने पर विवश कर दिया.
27:39बालक के नेत्र विस्मय से फैल गए और वह अपनी सुधबुध खोकर मंत्रमुग्ध होकर उस प्रतिबिंद की ओर एक टक
27:46देखने लगा.
27:48उसने कापते हुए हाथों से जल को छुआ, जिससे तरंगें उठीन और वह सामवली छवी और भी अधिक जीवन्त प्रतीत
27:56होने लगी.
27:58कुंड का जल अचानक एक मधुर मुरली की ध्वनी से गूंच उठा, जो सीधे बालक के अंतर्मन की गहराईयों में
28:05जाकर बस गई.
28:08आकाश से गिरती हुई दिव्य पुष्पों की वर्षा उस स्थान को वैकुंट की पवित्रता से भर रही थी, जिसे देखकर
28:15बालक का रोम-रोम पुलकित हो उठा.
28:18वह क्षण ऐसा था मानो समय की गती ठहर गई हो, और बालक के चारों और का संसार कृष्ण के
28:25प्रेम में विलीन हो चुका था.
28:28क्रिष्ण की वह सूक्ष्म छवी अब बालक के हरिदय में समा गई थी, जिसके कारण उसे अपने भीतर एक असीम
28:35शान्ती का अनुभव हुआ.
28:38उसने जाना की यही वह सत्य है, जिसकी खोज में वह जन्मों से भटक रहा था और यही उसके जीवन
28:45का एक मात्र लक्ष है.
28:57बालक ने उठकर अपने नत्मस्तक प्रणाम को दिशाहीन शूनी की ओर समर्पित किया, जहां से वह प्रेम की अनुभूती हो
29:05रही थी.
29:06उसकी आखों से प्रवाहित हुए हर्ष के आशू उस भूमी को पवित्र कर रहे थे, जैसे उसने साक्षात प्रभू के
29:14चरण पखार लिये हो.
29:16वह समझ गया कि अब उसे सांसारिक बंधनों के पीछे नहीं भागना है, बलकि उसी भीतर छिपे हुए प्रभू को
29:24बाहर खोजना है.
29:26उसके प्रत्येक पग में अब एक नई उर्जा थी, जो उसे उस पथ पर आगे बढ़ा रही थी जहां भक्त
29:33और भगवान का मिलन निश्चित है.
29:36वन के व्रिक्ष भी मानों अपनी शाखाएं जुका कर उस बालक के संकल्प का स्वागत कर रहे थे, जो अब
29:43परमात्मा का पथिक बन चुका था.
29:46उसका मन अब एक शांत सरोवर की भानती था, जिसमें केवल कृष्ण के नाम की तरंगे उठती थी और विलीन
29:54होती थी.
29:56उस दिव्यदर्शन ने उसकी चेतना को पूर्ण रूप से जागरित कर दिया था, जिससे अब कोई भी सांसारिक मोह उसे
30:03बांध नहीं सकता था.
30:06बालक अब उस अज्यात गंतव्य की ओर अग्रसर हुआ, जहां साक्षात श्री कृष्ण उसके हृदय के मार्ग पर उसकी प्रतीक्षा
30:14कर रहे थे.
30:16बालक के पच्चिनह अब धूल भरी पकडंडियों को छोड़कर एक ऐसे रहस्य में वन की ओर मुर गए हैं, जहां
30:23हवाओं में केवल कृष्ण के नाम की गूँच समाहित है.
30:27गरुड के विशाल पंखों की छाया से आच्छादित होकर, भगवान विश्णु अपनी शेश्षया पर शांत भाव से उस बालक की
30:35भक्ती की तीवर्ता को निहार रहे हैं.
30:39वह बालक चलते-चलते एक ऐसे शिलाखंड के समीप रुखता है, जहां से मधुर बानसुरी की ध्वनी किसी अद्रिश्य लोक
30:47से रिसकर कानों में अमरित घोल रही है.
30:51यह विरान वन अब एक दिव्यतीर्थ बन चुका है, जहां प्रकृती का कणकन उस बालक की एकागरता के समक्ष नत्मस्तक
30:59प्रतीत होता है.
31:02बालक के नेत्रों में अब सानसारिक दुखों का कोई भी चिन्ह नहीं, अपितु उसमें एक असीन सागर की गहराई और
31:09कृष्ण की छवी के प्रती अटूट प्यास दिखाई देती है.
31:14भगवान शिव कैलाश की एकांत उचाईयों पर समाधी में लीन होकर उस बालक की भक्ती के स्पंदन को अपने हृदय
31:22में अनुभव कर रहे हैं.
31:25अचानक वह बालक अपने हाथों में पड़ी धूल को त्याग कर उस दिशा में दौर पड़ता है, जहांसे उसे कृष्ण
31:32के चरंचहनों का आभास हो रहा है.
31:36समय मानो थम सा गया है और चारों और की वायू अब केवल कृष्ण नाम का जाप कर रही है,
31:43जो इस बालक के सन्यास को पूर्णता प्रदान कर रही है.
31:48विस्तरत वनक्षेत्र के बीचों बीच वह बालक एक दिव्य प्रकाश पुन्च के सामने खड़ा है, जो उसे सांसारिक मोह से
31:55दूर ले जाने का द्वार प्रतीत होता है.
31:59गरुर के मुख से एक मृदु स्वर निकलता है, जो भगवान विश्णु के हृदय के संकल्प को बालक के अंतरमन
32:06तक पहुचाने का कार्य कर रहा है.
32:10बालक अपनी काया के भार को भी भूल चुका है, और उसका मन अब केवल उस अज्यात गंतव्य की ओर
32:17खिंचा चला जा रहा है.
32:20प्रकृती के गूड रहसियों के बीच वह बालक अब एक ऐसे व्रिक्ष के नीचे पहुचता है, जिसकी छाया में स्वयं
32:27परमात्मा का साक्षात करने की शक्ती है.
32:31दूर क्षितिच पर चमकते हुए वे दिव्य लोक अब उसके समीप लग रहे हैं, जहां कृष्ण का रास कभी समाप्त
32:38नहीं होता और जहां समय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता.
32:43भगवान शिव अपनी आखें खोलते हैं और उनकी द्रिष्टी में उस बालक के प्रती एक दिव्य आशिरवात का भाव उभराता
32:51है.
32:53बालक उस दिव्य वरिक्ष को स्पर्ष करता है और उसके भीतर छिपी सारी सांसारिक स्मृतिया एक धूमिल अतीत की भानती
33:01लुप्थ हो जाती हैं.
33:03अब केवल वह बालक और उसके हरिदय में विराजमान कृष्ण का नाम ही शेश बचा है, जो ब्रहमांड की अंतिन
33:11सत्यता है.
33:13वन की गहन शांती में भी एक मधुर संगीत तरंगित हो रहा है, जो बालक को उसके अंतिन लक्ष की
33:20और बढ़ने का संकेट दे रहा है.
33:24भगवान विश्णु का दिव्यरत अब उस मार्क पर ग्रिष्टी बनाए हुए है, जहां से उस बालक का पुनरजन्म एक भक्त
33:31के रूप में सिद्ध होने वाला है.
33:35बालक ने अब अपने पुराने वस्त्रों का मोह भी त्याग दिया है, और वह कृष्ण की खोज में किसी सिद्ध
33:41साधक की भाती आगे बढ़ चला है.
33:45अनंत संभावनाओं के द्वार अब खुल चुके हैं और बालक का यह महा सन्यास अब एक नए ब्रहम वैवर्थ की
33:52कथा को जन देने जा रहा है.

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