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ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस चौदहवें एपिसोड में देखिए देवर्षि नारद का ब्रह्मलोक में भव्य प्रवेश और ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में उनका पुनः प्रादुर्भाव। कैसे मृत्युलोक के शूद्र बालक से अनंत ब्रह्मांडों के दूत बने नारद ने अपनी नई यात्रा की शुरुआत की? जानने के लिए देखिए पूरा एपिसोड। #BrahmavaivartaPurana #Narada #HinduMythology #Puranas #SpiritualJourney
Transcript
00:00नारद का सुक्ष्म शरीर अब सांसारिक मोह के बंधन से मुक्थ होकर ब्रहमांडिय प्रकाश की असीम उचायों की ओर बढ़
00:07रहा है।
00:09ब्रहमांड के रचिता भगवान ब्रहमा जो अपने श्वेत पद्म आसन पर विराजमान हैं, नारद के आगमन की प्रतीक्षा में अपनी
00:18दिव्य द्रिश्टी से निहार रही हैं।
00:22नारद के चारों और दिव्य मंत्रों की प्रतिध्वनी गूँज रही है, जो उनके अस्तित्व को हर क्षण अधिक पवित्र और
00:29तेजस्वी बनाती जा रही है।
00:32आकाश के उचे गलियारों में बहती मंदाकिनी की धारा नारद के मार्क को अलोकिक सुगंध और शितलता से भर रही
00:40है।
00:41ब्रहम लोग के द्वार पर स्थित दिव्यरक्षक नारद की दिव्यता को पहचान कर भक्तिपूर्ण भाव से अपना शीष जुका रहे
00:49हैं।
00:51भगवान ब्रहमा का गौर्वपूर्ण मुखमंडल नारद की प्रक्ति देख मुस्कुरा उठा, मानो स्रिष्टी ने अपना एक और रत्न पालिया हो।
01:00ब्रहमलोक की स्वर्णिन धरापर नारद के चरण पढ़ते ही, वहां मौजूद कमल पुष्प स्वतह ही और अधिक प्रफुलित हो उठे।
01:09दिव्य ध्वनियों और शंकनाद से संपूर्ण ब्रहमलोक नारद के महा प्रवेश का अभूतपूर्व स्वागत कर रहा है।
01:18नारद के सुक्ष्म शरीर से अब एक दिव्य तेज निकल रहा है जो ब्रहमलोक की आभा में बिलीन हो रहा
01:25है।
01:27ब्रहमाजी अपनी योगमाया से नारद के पिछले जन्म के सभी अवशेशों को पूर्णता शुद्ध कर रहे हैं।
01:35नारद की आखों में अब स्रिष्टी का रहस्य और भक्ती की अनंत गहराई एक साथ प्रतिबिम्बित हो रही है।
01:43ब्रहम लोग के उचे शिकरों पर सजे हुए रत्न सूर्य की किर्णों के बिनाभी स्वयं प्रकाश बिखेर रहे हैं।
01:52ब्रहमा के मानस पुत्र के रूप में नारद अब स्वयं ज्यान के सागर के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं।
02:00ब्रहमा ने मुस्कुराते हुए नारद को स्रिष्टी के कल्यान हेतु वीना धारन करने का संकेत दिया है
02:08नारद ने जैसे ही वीना को स्पर्ष किया, सातों सुरों ने ब्रहमांड में भक्ती का मधुर संचार कर दिया
02:15ब्रहम लोग के वातावर्ण में संगीत के साथ एक दिव्य शान्ती चा गई है जिसे देवताओं ने भी नतमस्तक होकर
02:23स्विकार किया
02:25नारद का यह पुनरजन्म अब केवल एक बालक का नहीं बलकि साक्षात धर्म और भक्ती का एक नया स्वरूप है
02:34ब्रहमाजी ने अपना वरध हस्त नारद के मस्तक पर रखा और उन्हें ब्रहमार्ण के अनंत सुखों का ज्ञान प्रदान किया
02:43नारद के भीतर से अब वेद मंत्रों की अनाहत ध्वनी प्रवाहित हो रही है जो पूरे ब्रहम लोग को अनुगुंजित
02:50कर रही है
02:52ब्रह्म लोक में नारद का महा प्रवेश संपन हुआ और अब स्रिष्टी का नया महाकाव्य लिखने का समया गया है
03:00ब्रह्म लोक के स्वर्णमय द्वार के समक्ष पहुचते ही नारद का दिव्य तेज चारों और एक अभूत पूर्व प्रकाश पुन्च
03:08के समान फैल गया
03:10द्वारपालों ने हाथ जोड कर नमन किया और उन दिव्य रक्षकों की आखों में नारद के प्रतीश रधा का सागर
03:17उमड पड़ा
03:19नारद ने अपनी वीना को हलके से स्पर्श किया और उससे निकलने वाली मीठी ध्वनी ने ब्रहम लोग के वातावर्ण
03:26को संगीत बद्ध कर दिया
03:29संपूर्ण ब्रहम लोग के शांत क्षितिच पर अनाहत नाद की गूंज एक दिव्य स्पंदन की तरहे तैरने लगी
03:36स्वयन संकादी रिशियों ने आगे बढ़कर नारद का स्वागत किया और उनकी दिव्य आभा के सम्मुख मस्तक जुकाया
03:45सनक रिशी ने मंद मुस्कान के साथ कहा कि स्रिष्टी के प्रथम गायक का आगमन समस्त वेदों के लिए एक
03:52सौभाग्य है
03:54नारद ने विनम्रता पूर्वक अपनी वीना का वादन और तीवर कर दिया जिससे वातावर्ण में दिव्य रसकी वर्षा होने लगी
04:04ब्रहमलोग की आभा अब नारद के तेज से और भी अधिक प्रखर और स्वर्णमय प्रतीत हो रही थी
04:11आगे बढ़ते हुए नारद को मार्ग में खिले हुए मंदार पुष्पों की सुगंध ने एक अद्रिश्य आशिर्वात प्रदान किया
04:20आकाश से उतरते हुए देवगणों ने नारद की भक्ती देख कर उन्हें देवर्षी कह संबोधित किया और पुष्पवर्शा की
04:29नारद के पच्चिनहों से ब्रहमलोग की धरा पर भी दिव्यता के नए अंकुर खिलने लगे
04:36सत्यलोग की सीजियों को चड़ते हुए नारद का हरिदय ब्रहमांड के रहसियों को समझने के लिए उत्सुखो उठा
04:44ब्रहमलोग के रक्षकों ने जब नारद के मस्तक पर ब्रहमतेज को देखा तो वे विस्मय से भर गए
04:51स्वयन सरस्वती माता ने अपनी वीना के तार छेड़ कर नारद के प्रवेश का मधुर स्वागत किया
04:58नारद ने वीना के एक मधुर स्वर के साथ उन दिव्यध्वनियों को प्रतिसाद दिया जो पूरे ब्रहमांड की गूंच बन
05:06गई
05:07सत्यलोग की शांती में अब एक नया अध्याय जुड़ गया जिसे नारद का महाकाव्य कहा जाएगा
05:15नारद के प्रत्येक चरण में ब्रहम ज्यान की गंभीरता और भक्ती की सरलता का अध्गुत संतुलन था
05:23ब्रहम लोग के हर एक रत्न जडित खंभे से नारद के नाम की प्रतिध्वनी सुनाई देने लगी
05:29अब समय आ गया था कि नारद उस दिव्य मंच पर आसीन हो जहां से वे ब्रहमांड के प्रथम संदेशवाहक
05:37बनेंगे
05:38नारद का सत्यलोक में यह महाप्रवेश स्रिष्टी की रचना के नए युग का शंखनाद बनकर गुंजा
05:46ब्रहमा लोग के उस दिव्य मंडप में स्वर्ण और मनियों से सुसजित मंच पर स्वयन स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा अपने श्वेत कमल
05:54आसन से उठे
05:56दिव्य सभा के समस्त रिशिमुनी और देवता स्थब्ध होकर इस एतिहासिक मिलन के क्षण की ओर एक तक देख रहे
06:03थे
06:05नारद ने अपनी वीना को वक्ष से लगा कर ब्रहमांड के प्रथम पिता के चर्णों में साश्टांग प्रणाम किया
06:12स्वर्ण और नील्मनी से जग्मगाते ब्रहमा लोक के आकाश से दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी
06:20ब्रहमा जी ने आगे बढ़कर अपने मानस पुत्र नारद को अपनी विशाल भुजाओं में आलिंगन बद्ध कर लिया
06:28समस्त वेदों की रिचाएं इस पुनर्मिलन के पवित्र अवसर पर स्वय मुखरित होकर गूंज उठी
06:35पिता के स्पर्ष मात्र से नारद के भीतर अनादी काल का दिव्य ज्यान पूर्ण रूप से जागरित हो गया
06:42चारो वेदों ने अपनी मानवीकृत मूर्तियों के रूप में आगे आकर नए संदेशवाहक का अभिनन्दन किया
06:50स्रिष्टिकर्ता ने इस नेह से अपने पुत्र के मस्तक पर अपना अभायदान देने वाला हाथ रखा
06:57ब्रहम लोग के अनंत आकाश में गंधर्वों ने इस महापुनर मिलन के उपलक्ष में मधुर्गान आरंभ किया
07:05नारद ने कृतग्यता से भरे नेत्रों से अपने पिता और ब्रहमांड के स्वामी को देखा
07:12ब्रहमा जी ने कहा है मेरे मानस पुत्र अब संपूर्ण त्रैलोक्य का कल्यान ही तुम्हारा एक मात्र लक्ष होगा
07:20नारद ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा जिससे संपूर्ण ब्रहमांड में भक्ती की पहली लहर दोड़ गई
07:27उस दिव्य संगीत की गूंच से साथ लोक और चौदह भवन आनन्दित हो उठे
07:34सब्तरिशियों ने आगे बढ़कर नारद को अपने परिवार का अभिन्न अंग मानकर गले लगाया
07:41नारद का यह पुनरजन्म केवल एक उत्पत्ती नहीं बलकि भक्ती और ज्यान का महाशंखनाग था
07:49ब्रहमा जी ने नारद को अपने सिनहासन के समीथ ही एक विशेश स्थान प्रदान किया
07:55समस्थ देवताओं ने एक स्वर में जैकार करते हुए इस दिव्य मिलन का उत्सव मनाया
08:02नारद ने अपनी जहवा पर नारायन का नाम जबते हुए अपनी नई लोक्यात्रा की शुरुवात की
08:09इस प्रकार ब्रहम लोक में नारद का महा प्रवेश संपन हुआ और स्रिष्टी को उसका परम संदेशवाहत मिल गया
08:18ब्रहम लोक की दिव्य आभा के बीच मन्दाकिनी की पवित्र जलधारायन नारद के नूतन स्वरूप को अलोकिक तेज से आपलावित
08:26करने लगी
08:28स्वयन स्रिष्टिकर्ता ब्रहमा ने अपने करक्मलों से अमरित्मई जल को नारद के मस्तक पर अभिशेक के रूप में अर्पित किया
08:36जल की प्रत्येक बून्द गिरते ही एक दिव्य तरंग उत्पन करती जो नारद के भीतर बचे हुए सांसारिक संसकारों को
08:45पूर्णतह मिटा रही थी
08:47इस पवित्रस नान के प्रभाव से ब्रहम लोग का वातावर्ण सुगंधित पुष्पों की वर्षा और शंक ध्वनी से गुंजायमान हो
08:55उठा
08:56नारद का शरीर अब पंच्तत्वों के बंधनों से मुक्त होकर ब्रहम तेज से दीप्ट एक शाश्वत स्वरूप में परिवर्तित हो
09:04चुका था
09:06ब्रहमा ने मुस्कुराते हुए नारद को आशिरवाद दिया जिससे उनके हृदय में संपूर्ण वेदों और पुराणों का ज्ञान स्वयं प्रकाशित
09:14हो गया
09:16नारद ने अब अपने हाथों में वीना को धारण किया जिसके तारों से जंकृत होने वाली ध्वनिया स्रिष्टी के कल्यान
09:23का संदेश ले जाने लगी
09:26पवित्र जल की शीतलता ने उनके मानस में केवल श्रीहरी के प्रती अनन्य प्रेन और भक्ती के ही बीजशेश रहने
09:33दिये
09:35ब्रहम लोग की उंचाईयों से नीचे देखते हुए नारद को अब समस्त लोकों में केवल नारायन का ही विराठ दर्शन
09:42होने लगा
09:44ब्रहमा के मानस पुत्र के रूप में नारद अब ज्ञान और भक्ती के संगम का स्वरूप बनकर लोग कल्यान के
09:51लिए तत्पर हुए
09:53मंदाकिनी का वह जल अब नारद के चारों और एक सुरक्षात्मक कवच बनकर उनकी आभाको और अधिक तीवर कर रहा
10:01था
10:02इस दिव्य अनुष्ठान के संपन्न होते ही ब्रहम लोग के समस्थ रिशिमुनी नारद की स्तुती में मगन हो गए
10:10नारद ने विनम्रता पूर्वक नमन करते हुए ब्रहम लोग के विस्तार और वहां की सुक्ष्म उर्जाओं को अपने नए चैतन्य
10:17में समाहित कर लिया
10:20स्वयम ब्रहमा ने नारद को देवर्शी की उपाधी से अलंकृत करते हुए उन्हें विश्व का प्रथम संदेश्वाहक घोशित किया
10:29नारद के मुख से अब अन्वरत रूप से नारायन नारायन का मधूर संगीत गूंजने लगा जो ब्रहम लोग की दीवारों
10:36से टकरा कर चारों दिशाओं में फैल गया
10:40ब्रहम लोग का संपूर्ण प्रांगन अब दिव्यस पंदन और शाश्वत शान्ती के एक अनुठे सामन जस्य का प्रतीक बन गया
10:47था
10:49नारद का वह दिव्यस वरूप अब पूर्णत शुद्ध और निर्दोश था जो काल की सीमाओं को पार कर चुका था
10:57जैसे जैसे वह पवित्र जल लुप्थ हुआ नारद के भीतर की दिव्यद रिष्टी ने स्रिष्टी के गुख्त रहसियों को उद्धाटित
11:04कर दिया
11:06ब्रहमा की आध्या पाकर नारद ने अब स्रिष्टी के विभिन लोकों की यात्रा के लिए अपनी पहली उडान भरी
11:14ब्रहम लोग की पवित्रता के साथ देवर्शी नारद का वह दिव्य अवतार अब जगत के कल्यान हेतु पूरी तरह तत्पर
11:22था
11:23ब्रहम लोग के अनंत विस्तार में, जहां प्रकाश की किरने भी संगीत की लहरों में परिवर्तित हो जाती हैं, ब्रहमा
11:30जी ने नारत को अपने समीक बुलाया
11:34स्रिष्टी के रचिता के मुख से स्वुटित होती मधुर आभा और तेजपुंच के बीच नारत ने अत्यंत विनमर्ता और भक्ती
11:42के साथ अपने पिता के सम्मुख मस्तक जुकाया
11:46ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल का एक अंजली नारत के मस्तक पर छिड़का, जिससे उनके भीतर की
11:53आध्यात्मिक उर्जा का पूर्ण जागर्ण हुआ
11:57एक दिव्य तरंग के साथ ब्रहमा जी के हाथों में अचानक अंतरिक्ष के रहस्यों को समेटे हुए एक स्वर्ण में
12:04वीना प्रकट हुई जो स्वयं ब्रहमांड की स्पंदन थी
12:09ब्रहमा ने उस महती वीना को नारत के हाथों में सौंपते हुए कहा कि यह केवल एक वाध्य नहीं बलकि
12:16धर्म और भक्ती का जीवन्त स्वर है
12:19वीना को स्पर्ष करते ही नारत की उंगलियों से निकले पहले स्वर ने समस्थ ब्रहम लोग को प्रेम और शांती
12:27के अलोकिक संगीत से सराबोर कर दिया
12:29उस संगीत की लहरें इतनी शक्तिशाली थी कि उन्होंने स्रिजन के कणकण में समाहित परमात्मा की चेतना को जंकृत कर
12:38दिया
12:40स्वयम ब्रहमा जी उस संगीत को सुनकर भाव विभोर हो गए और उन्होंने नारद को स्रिष्टी के हर कोने में
12:47जाकर कृष्ण की भक्ती का प्रसार करने का आशीश दिया
12:51ब्रहम लोग के उंचे शिखर से देखते हुए नारद ने उस वीना के साथ अपनी पहली यात्रा का संकल्प लिया
12:59जिसमें अब वे पूरी स्रिष्टी के मार्ग गर्शक बनने वाले थे
13:03नारद ने अपनी आखे मूंद कर उस वीना के तारों को छेड़ा जिससे निकली गूंच पूरे ब्रहमांड के लोकों में
13:11एक अध्भुत मधुर्ता लेकर प्रवाहित होने लगी
13:15महती वीना की मधुर ध्वनी ने ब्रहम लोक के पक्षियों और दिव्य पुष्पों को भी जीवन्त कर दिया जो नारद
13:22की साधना के साक्षी बन गए
13:24यह संगीत केवल शब्द नहीं थे बलकि वे मंत्र थे जो आत्मा को जड़ता से मुक्ती दिलाकर भक्ती के महासागर
13:33में विलीन करने में समर्थ थे
13:36ब्रहमा जी की दृष्टी में नारद अब एक सामान्य पुत्र नहीं बलकि उस अनन्त सत्य के वाहक थे जो आने
13:43वाले युगों में धर्म की धोजा उठाएंगे
13:47नारद ने अनुभव किया कि जैसे जैसे वे वीना बजा रहे हैं, स्रिष्टी के रहस्यों का जाल उनके मन में
13:54स्वय ही सुलचता जा रहा है
13:57पूरे ब्रहम लोक में एक दिव्य प्रकाश का संचार हुआ, मानो स्रिष्टी का रच्चिता और उसका प्रथम शिष्य एक ही
14:04चेतना के सूत्र में बंध गए हो
14:07नारद ने अपने पिता के चर्णों को पुनह प्रणाम किया, यह जानते हुए कि अब उनकी यात्रा एक असीमित लक्षय
14:15की और बढ़ने वाली है
14:18महती वीना के हर तार से अब ब्रह्मांड के कल्यान का गान फूट रहा था, जो नारद के हर कदम
14:25के साथ गूंजता रहने वाला था
14:28ब्रह्म लोग की वह पवित्र आभा नारद के शरीर के चारों और एक सुरक्षा कवच की तरह फैल गई, उन्हें
14:35उनकी आने वाली यात्रा के लिए सशक्त बनाते हुए
14:39नारद ने आकाश की ओर अपना मुख किया और एक मधूर तान छेडी, जिससे उनके चारों ओर की उर्जा भी
14:47नृत्य करने लगी
14:49ब्रहमा जी की उपस्थिती में ही, नारद ने उस दिव्य वीना के साथ अपनी प्रत्रम यात्रा के लिए उडान भरी
14:56और ब्रहम लोग के द्वार उनके लिए खुल गए
15:00ब्रहम लोग की स्वर्ण में दीवारों के भीतर प्रवेश करते ही नारत को वेदों की अनादी ध्वनिया एक मधुर गुंजन
15:07के रूप में सुनाई देने लगी
15:10ब्रहम जी ने अपने चतुर मुखी रूप में एक शांत और गंभीर मुद्रा में नारत की ओर देखा, मानों वे
15:17उनके भीतर ब्रहमांड के सारे रहसियों को पढ़ रहे हूँ
15:22ब्रहमा जी ने अपनी हस्त मुद्रा से एक दिव्य प्रकाश पुंज उत्पन किया, जो सीधे नारत के हृदय के केंद्र
15:29में समाहित हो गया
15:31उस ज्यान के स्पर्ष से नारत की चेतना में सातों लोकों का सूक्ष्म भूगोल और कालचक्र की गती स्पष्ट रूप
15:39से अनकित हो गई
15:41ब्रहमा जी ने वेदों के रहसियों को उजागर करते हुए नारत को यह समझाया कि शब्ध ही इस स्रिष्टी के
15:48मूल आधार है
15:50नारत ने विस्मय और भक्ती के साथ ब्रहमा जी से प्रश्ण किया कि समस्त विद्याओं का अंतिम सार क्या है
15:59ब्रहमा जी ने मंद मुस्कान के साथ श्री कृष्ण के उस दिव्य स्वरूप का वर्णन किया जो काल के प्रभाव
16:06से परे और शाश्वत है
16:09नारत के मन में भक्ती का ऐसा जवार उठा कि उनके चारों और की दिव्य उर्जा नीले रंग की आभा
16:16में परिवर्तित हो गई
16:18ब्रहमा जी ने उपनिश्दों के उस गूर तत्व को नारत के भीतर स्थापित किया जिसे आत्मसाक्षातकार कहा जाता है
16:27इस ज्यान ने नारत के अहंकार के अंतिम अंश को भी मिटा दिया जिससे वे अब पूरी तरह से नारायन
16:34की भक्ती में समर्पित हो गए
16:37वीना की तान अब पहले से अधिक गंभीर और ब्रहमांडी हो गई जैसे वह स्वयंकाल के संगीत को बजा रही
16:44हो
16:46ब्रहमाजी ने कहा कि अब तुम उस यात्रा के लिए तयार हो जहाँ न कोई दिशा है और नहीं कोई
16:52सीमा
16:54नारत ने अपनी आखें खोली और उनका तेज एक दिव्य सूर्य की भांती पूरे ब्रहमलोग को प्रकाशित करने लगा
17:03ब्रहमलोग के सभी देवता और रिशी जो अब तक मौन थे नारत की इस नई उर्जा को देखकर नत्मस्तक हो
17:10गए
17:12नारत ने ब्रहमाजी के चर्णों को स्पर्ष किया और कृतग्यता के आसु उनकी आखों से जर पड़े
17:19ब्रहमाजी ने उन्हें आशिरवाद देते हुए कहा कि तुम्हारी यात्रा अब केवल मेरी आज्या नहीं बलकि श्री कृष्ण की इच्छा
17:28है
17:29नारत ने एक लंबी गहरी सास ली और अपने संकल्प को ब्रहमाण की धड़कन के साथ एकाकार कर दिया
17:38ब्रहमलोग का आकाश अब धीरे-धीरे बैंगनी और स्वर्ण के रंगों में बदलने लगा जो उनकी प्रस्थान की बेला का
17:46सूचक था
17:47नारत अपनी वीना को कंधे पर रखकर ब्रहमलोग के द्वार से बाहर की ओर बढ़ने लगे
17:54अब नारत ब्रहमलोग के पुत्र के रूप में नहीं बलकि श्री कृष्ण के दूट के रूप में इस पूरे विश्व
18:01की यात्रा पर निकल पड़े
18:04ब्रहमलोग की सीमाओं को पार करते ही नारत के चर्णों तले संपून ब्रहमांड का अनंत विस्तार चमक उठा
18:12उनकी वीना के हर एक कमपन से चौधा भुवनों के समस्त लोग स्वतह ही जागरित होने लगे
18:19अतल और पाताल लोग के अंधकार्मय गर्थ भी उनके पावन चर्णों की आहट से प्रकाशमान हो उठे
18:27ब्रहमाजी द्वारा प्रदत उस अमोग वर्दान के प्रभाव से अंतरिक्ष का हर मार्ग उनके लिए सुगम हो गया
18:34स्वर्ग की अपसराओं और गंधर्वों ने नंदन कानन में उनके स्वागत में पुश्पों की वर्षा की
18:42देवराज इंद्र ने अपने सिनहासन से उठकर त्रिलोकी के इस स्वतंत्र सन्यासी को सादर नमन किया
18:49नारद ने वीना के तारों को छेड़ते हुए नारायन नारायन के मधुर मंत्र का गान आरंभ किया
18:57उनकी स्वर लहरियों ने मृत्यू लोक से लेकर ब्रहम लोक तक के सभी जीवों के मन को मोहलिया
19:04कैलाश की बरफीली वादियों में बैठे महादेव ने भी मुस्कुरा कर अपने प्रिय भक्त के आगमन को स्विकारा
19:12शिवजी ने अपनी योग समाधी से जाग कर नारत की इस नूतन गती और स्वतंत्रता को आशिरवाद दिया
19:20वैकुंठ धाम के दिव्यद्वारों पर जय और विजय ने भी शीश जुका कर उनका स्वागत किया
19:27शीर सागर के उपर तैरते हुए उस पावन धाम में श्री हरी और लक्ष्मी जी के दर्शन हुए
19:34श्री कृष्न के परम धाम गोलोक की अलोकिक जोती ने उनके अंतस को पूर्ण रूप से त्रिप्ट कर दिया
19:41माता लक्ष्मी ने प्रसन होकर उन्हें भक्ती और प्रेम का अमर संदेश प्रसारित करने की प्रेणा दी
19:49नारद ने अपनी वीना पर भक्ती का एक ऐसा नया राग छेड़ा जो स्रिष्टी के कणकण में गूझ उठा
19:57अब वे किसी एक लोक के बंधन में नहीं थे बलकि संपूर्ण ब्रह्मांड ही उनका अपना घर बन चुका था
20:06रिशिमुनी देवता और गंधर्व उनके इस अनूठे लोकभ्रमन को देखकर विस्मय में डूग गए
20:12उनकी यह स्वतंत्र यात्रा आने वाले युगों में धर्म और भक्ती के प्रचार का मुख्य आधार बनी
20:20नारद ने हर लोक में जाकर प्रेम और समर्पन का वह संदेश फैलाया जो उन्हें श्री कृष्ण से प्राप्थ हुआ
20:27था
20:27इस प्रकार ब्रहम पुत्र नारद ने अपने इस असीन वर्दान के साथ ब्रहमांड की अनंत यात्रा का सूत्रपात किया
20:37ब्रहम लोग के पवित्र और दिव्य प्रांगण में नारद ने अपनी नई महाती वीना को थांकर उसका पहला अलौकिक स्वर
20:44गूंजायमान किया
20:46उस वीना के पहले ही स्पंदन से ब्रहमांड के सभी आयामों में श्री कृष्ण के अनंत यश्की गूंज फैल गई
20:55नारद की उंगलियों के स्पर्ष से उत्पन्नवह प्रथम संगीत एक ऐसी स्थुती बन गया जो सीधे परमिश्वर श्री कृष्ण के
21:03चर्णों में समर्पित थी
21:05उस महान कीर्टन के प्रभाव से ब्रहम लोग के विशाल स्वर्ण स्तंभ भी आनंद के मारे कामपने लगे
21:13ब्रहमाजी के मानस पुत्र के रूप में जन्मे नारद का यह प्रथम गान समस्थ देवताओं के लिए एक असीन विस्मय
21:20का विशर बन गया
21:22भगवान विश्नु के परमधाम वैकुंठ तक से इस अध्भुत कीर्तन की मधूर स्वरलहरियां पहुँच गई
21:30नारद के कंट से फूटने वाले हर एक शब्द में केवल कृष्न प्रेम की अमरित धारा बह रही थी
21:37उस दिव्य संगीत की तरंगों ने संपून ब्रहमांड को एक नए आध्यात्मिक आनन से भर दिया
21:45ब्रहमाजी ने अपने पुत्र की इस अध्वितिय भक्ती को देख कर प्रसन्नता से अपने नेत्र बंद कर लिये
21:53देवर्शी की वीना के तारों से निकलने वाले स्वर्मानों साक्षात वेदों की रिचाओं का जीवन्त रूप थे
22:00हर एक राग और हर एक ताल भगवान क्रिश्न की लीलाओं का गुनगान कर रही थी
22:07ब्रह्मलोक की सभा में उपस्थित सभी रिशिमुनी इस अलौकिक संगीत की पराकाष्ठा में लीन हो गए
22:14यह प्रथम महाकीर्तन इस बात का प्रमान था कि अब नारत का जीवन केवल और केवल भक्ती के लिए समर्पित
22:22है
22:24संगीत की उस महान धारा ने सभी उपस्थित देवताओं के हृध्यों को पवित्रता से नहला दिया
22:31नारत के मुख से निकला प्रत्येक्ष लोक ब्रहमांड के कोने-कोने तक प्रतिध्वनियत होने लगा
22:38वहक्षन ब्रहम लोक के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज हो गया
22:44इस प्रत्म गान के साथ ही नारत ने अपनी अमर यात्रा का वास्तविक शंकनाद कर दिया था
22:52संपूर्ण सभा ने एक स्वर में नारायन, नारायन के जैकारों के साथ इस महान कीर्टन का अभिनन्दन किया
23:00भक्ती और संगीत के इस अध्भुत संगम ने देवर्शी नारत के भविश्य के पत को पूरी तरह से प्रकाशित कर
23:07दिया
23:08इस प्रकार ब्रहम लोक में गूंजा वह पहला महाकीर्टन आने वाले युगों के लिए प्रेम और भक्ती का मार्गदर्शक बन
23:16गया
23:17ब्रहमा ने अपने कमंडल से पवित्र जल का छिड़काव करते हुए देवर्शी नारत को ब्रहम लोक के स्वर्ण सिनहासन के
23:25समक्ष आमंत्रित किया
23:28स्रिष्टिकर्ता ने गंभीर वानी में कहा कि अब तुम केवल ब्रहम पुत्र नहीं अपितु संपूर्ण ब्रहमांड में धर्म के संदेश
23:35वाहक बनोगे
23:37नारत के हाथों में वीना को सौपते हुए ब्रहमा ने उन्हें अनंत काल तक संसार में भ्रमन करने का दिवयदायत्व
23:44सौपा
23:46ब्रहम लोक का आकाश अचानक एक दिवयतेश से भर उठा जैसे साक्षात नारायन ने इस संकल्प पर अपनी स्विक्रिती दी
23:54हो
23:56ब्रहमा ने नारत के मस्तक पर अपना हस्तक्मल रखा जिससे देवर्शी को त्रिकालदर्शी होने की असीमित शक्ती प्राप्थ हुई
24:05नारत ने विनीत भाव से ब्रहमा के चर्णों में जुपकर इस महाकार्य को अपना परम सौभाग्य स्विकार किया
24:13तभी देवर्शी के हरिदय में नारायन मंत्र की ध्वनी प्रतिध्वनित होने लगी जो उनके रोम्रों में भक्ती का संचार कर
24:21रही थी
24:22ब्रहमा ने स्पष्ट आदेश दिया कि तुम्हारा कार्य किसी एक लोग तक सीमित नहीं बलकी नरक से स्वर्ग तक व्याप्थ
24:30होगा
24:31ब्रहम लोग की दिव्य सभाने नारत के इस नूतन अवतार के रूप में उन्हें एक भावी पथप्रदर्शक के रूप में
24:39सम्मानित किया
24:41देवराज इंद्र ने भी अपने आसन से उठकर देवर्शी का अभिनंदन किया जिससे यह स्पष्ट हो गया कि अब वे
24:48त्रिलोकी के मान्य अतिथी हैं
24:52नारत ने अपनी वीना के तारों को छेड़ा जिससे उत्पन्न मधुर जंकार से ब्रहम लोक के कंकन में सात्विक उर्जा
24:59प्रवाहित होने लगी
25:02चारों दिशाओं में ब्रहमा की यह घोशना गूंज उठी की देवर्शी नारत ही अब अधर्म के नाश और धर्म की
25:09स्थापना के सूत्रधार होंगे
25:12नारत ने समस्थ देवताओं को संबोधित करते हुए कहा कि मेरा हर चरण केवल नारायन की भक्ती के प्रचार के
25:19लिए होगा
25:21ब्रहमा के चार मुखों से निकले आशिरवाद ने नारत को एक ऐसा सुरक्षा कवच प्रदान किया जिससे कोई भी नकारात्मक
25:29शक्ती उन्हें विचलित न कर सके
25:32सभा में उपस्थित अन्य रिशिमुनियों ने इस महान दायत्व की स्वीकृती में मंत्रो चार शुरू कर दिया जिससे वातावर्ण और
25:40भी पवित्र हो गया
25:43वातावर्ण में एक अध्भुत शांती व्याप्त थी, मानो समय स्वय नारत के प्रथम पक के लिए रुख गया हो
25:51नारत के चहरे पर अब कोई मोह या बंधन नहीं था, केवल जगत कल्यान की एक निश्चल चमक शेश थी
25:59ब्रह्मा ने पुनह संकेत दिया कि अब तुम्हारा गमंत्र लोग की शुद्धी के लिए अनिवार्य है
26:07देवर्शी नारत ने ब्रह्म लोग को सादर प्रणाम किया और धर्म की स्थापना की यात्रा के लिए अपना पहला कदम
26:14बढ़ाया
26:15इस प्रकार ब्रह्मा के पुत्र के रूप में पुनर्जन्म लेकर नारत अपनी सनातन यात्रा पर निकल पड़े जिसे आज भी
26:23इतिहास भक्ती के अमर महाकाव्य के रूप में याद करता है
26:28ब्रह्म लोग की स्वर्ण आभा को पीछे छोड़ते हुए नारत ने ब्रह्मांड के अनन्त विस्तार में अपना पहला कदम रखा
26:36जहां शूनी भी उनके चर्णों के स्पर्ष से स्पंदित हो उठा
26:41वैकुंट के द्वार पर विराजित शेश्शाई भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद रिष्टी से देवर्शी के आगमन को स्विकार किया जैसे
26:49समुद्र की लहरें किसी भक्त के आने पर शांथ हो जाती है
26:54गरुर के पंखों की फड़फडाहट से पूरे वैकुंट लोक में संगीत की गूंच फैल गई, मानोस्वया वायु देव ने नारत
27:02के स्वागत में मंत्रों का आहवान किया हो
27:06नारत ने भक्ती के सागर में डूबे हुए अपनी वीना के तारों को छेडा, जिससे निकली धुन ने आकाश के
27:13नक्षत्रों में भी भक्ती का नया संचार कर दिया
27:17अंधकार से भरी रावरव नगरी की ओर बढ़ते हुए, देवर्शी ने देखा कि कैसे दुष्ट आत्माओं का संताप भी उनके
27:25आने से कुछ क्षणों के लिए ठहर गया
27:28नारद के मुख पर एक सौमय मुस्कान थी, जो यम के दूतों की कुरूरता के मध्य भी परम सत्य के
27:35प्रकाश को प्रसारित करने में समर्थ थी
27:38भयानत पिलर के पास खड़े होकर उन्होंने नारायन के नाम का ऐसा कीर्टन किया कि पाताल के पाशान भी उस
27:46ध्वनी से काम उठे
27:48दोशों और पापों के उस दुर्गम छेत्र में नारत के तेजस्वी अस्तित्व ने एक दिव्य कवच का कार्य किया, जिसे
27:56देखकर काल भी अपनी गती धीमा करने पर विवश हो गया
28:00अब देवर्शी का गमन उस अयहपान लोग की ओर था, जहां तप्त कांस्य के पात्रों में अधर्म का अंत करने
28:08वाली अगनी प्रजवलित हो रही थी
28:11यमराज के गण नारत की तेजस्विता देखकर विस्मित थे, क्योंकि उन्होंने आज तक किसी जीव को इस नर्क की उष्णता
28:19में इतना शांत नहीं देखा था
28:22तप्त पात्रों से निकलने वाली अगनी की लप्ते नारत के चर्णों को छुकर पुश्पों में बदल रही थी, मानोस्वयं अगनी
28:30देव उनकी सेवा में समर्पित थे
28:33ब्रहमा के मानस पुत्र की उपस्थिती ने इस कठोर लोग को एक तपोवन में परिवर्थित कर दिया, जहां केवल नारायन
28:41की स्तुती गूंज रही थी
28:43अपनी अगली यात्रा पर निकलते हुए, वे उस क्रीमिभोजन लोप में पहुँचे, जो अपनी वीभत्सता के लिए पूरे ब्रहमांड में
28:52कुख्यात था
28:54वहां की दुरगंध को अपनी योगशक्ती से दूर करते हुए, नारद ने मंत्रों का ऐसा घोश किया की सडीडी आत्माओं
29:01को भी नारायन के नाम का बोध हुआ
29:05क्रीमिभोजन के कीडेम कोडे जो सदा कष्ट में रहते थे, आज देवर्शी के वीना की मधुर ध्वनी सुनकर अपने दुखों
29:12को भूल कर परमानंद में लीन हो गए
29:15इस विकट स्थान को भक्ती का केंद्र बनाकर नारद ने यह सिद्ध कर दिया कि इश्वर का नाम कहीं भी
29:22मोक्ष का द्वार खोल सकता है
29:26यात्रा के अंतिम चरण में वे सुकर्मुख की उन शिलाओं के पास पहुँचे जहां अहंकार को कुचलने का विधान सदियों
29:34से चला आ रहा था
29:36वराहमुख धारी द्वारपालों ने जब नारद के मस्तक पर ब्रहमा की अंगुली का आशिरवाद देखा तो उन्होंने अपना सिर जुका
29:44कर मार्ग प्रशस्त कर दिया
29:47पत्थरों के बीच से गुजरते हुए नारद ने एक ऐसी तान छेडी जिसने शिलाओं के कठोर स्वभाव को कोमल कर
29:54दिया और उन्हें स्थिर कर दिया
29:57नारद ने अब ब्रहमांड की सीमाओं को लांध कर लोक कल्यान का वह मार्ग चुन लिया था जो लुगों लुगों
30:04तक संसार को मार्ग गर्शन देता रहेगा

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