ब्रह्मवैवर्त पुराण के इस रोमांचक अध्याय में देखिए देवर्षि नारद का भीषण प्रतिशोध! जब पिता ब्रह्मा ने नारद को सांसारिक वासनाओं में भटकने का श्राप दिया, तब क्रोधित नारद ने ब्रह्मा को ही ऐसा भयंकर श्राप दे डाला जिससे सम्पूर्ण त्रिलोकी कांप उठी—कि मृत्युलोक में ब्रह्मा की कभी कोई पूजा नहीं होगी! इसके बाद नारद ने कैसे त्यागा अपना दिव्य शरीर और कैसे हुआ गंधर्वराज 'उपबर्हण' के रूप में उनका पुनर्जन्म? जानिए इस अद्वितीय गाथा में! #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #BrahmaShrap #Upabarhana #HinduMythology
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00:00ब्रहमा की सभा में सन्नाटा पसर गया है और देवर्शी नारद के चहरे पर एक ऐसी दिवेजवाला है जो ब्रहमांड
00:07की सीमाओं को चुनौती दे रही है
00:11भगवान विश्णु अपने गरून पर विराज मान होकर इस संधर्ष को देख रहे हैं उनकी शांत मुस्कान में समस्त स्रिष्टी
00:19के भविश्य का रहस्य छिपा है
00:22नारद ने अपना वीना एक ओर रखा और पिता ब्रहमा की आखों में सीधे देखते हुए सत्य का उद्गोश करने
00:29के लिए एक कदम आगे बढ़ाया
00:33आकाश से बिजली की गड़गडाहट सुनाई दी जैसे स्वयन स्रिष्टी का संतुलन डगमगा रहा हो और समय की धारा थम
00:40गई हो
00:42ब्रहमा ने अपनी क्रोधित चार मुखों वाली आकरिती से कहा कि जो मेरे विधान के विरुद्ध है उसे मृत्यू लोग
00:49के दुखों को भुगतना ही होगा
00:52देवर्शी नारद का स्वर गूंज उठा और उन्होंने ब्रहमा के उस श्राप को उसी की गरिमा के साथ अस्विकार करने
01:00का साहस दिखाया
01:02नारद ने अपनी वीना की तारों को छुआ और उनसे निकली एक ऐसी ध्वनी जिसने सभा में उपस्थित सभी देवताओं
01:10को स्तब्ध कर दिया
01:12ब्रहमा के चार मुखों से एक साथ हुंकार निकली जैसे साक्षात वेदों का अपमान कर दिया गया है
01:20स्रिष्टी के रचिता के अहंकार को ललकारते हुए नारद ने उस श्राप को वापस उन्ही की ओर मोरने का संकल्प
01:28लिया
01:29सभा में उपस्थित अन्य रिशीगन अपनी आखें बंद कर इस महा विनाशक समवाद के परिनामों से भैभीत हो गए
01:38नारद ने अपने प्रभु श्री कृष्ण का ध्यान किया और उनके हृदय से निकला वह शब्द जिसने ब्रहमा को भी
01:45कमपायमान कर दिया
01:47ब्रहमान्ड के रचिता ने महसूस किया कि यह कोई साधारन बालत नहीं बलकी भक्ती की शक्ती से परिपून एक दिव्य
01:55आत्मा है
01:57नारद की वानी में वह गूंश थी जिसने स्वर्ग की दीवारों को भी हिला कर रख दिया
02:04ब्रहमा के चारों मुखों पर अब क्रोध के स्थान पर एक अनपेक्षित सन्नाटा और विचार्शीलता चा गई है
02:12नारद ने अपने शब्दों का बान ब्रहमा के उस अहंकार पर छोड़ा जो समय के साथ निर्मान की आड में
02:19पनप गया था
02:21स्रिष्टी के आधार पर दरार पढ़ने लगी है जैसे नारद के श्राप ने वास्तविक्ता की नीम को चुनौती दे दी
02:28हो
02:30ब्रहमा की सभा के वेस्तंभ जो युगों से स्थिर थे आज पहली बार कांप उठे
02:37नारद के मुख से निकला वह श्राप जिसने ब्रहमा को सत्य का वह दर्पन दिखाया जिसे वह भूल चुके थे
02:45संपूर्ण ब्रहमांड में जैसे समय की धारा रुक गई हो और हर देवता इस निर्नायक पल को देख रहा है
02:53नारद का वह श्राप अब एक अटूट सत्य बन चुका है जिसने ब्रहमा के अस्तित्व के अगले अध्याय को लिख
03:00दिया है
03:02ब्रहमा के अस्तित्व का आकाश अब नारद के श्राप की गून से थर्रा उठा है, जहां दिव्य उर्जा एक स्थिर
03:09नीले रंग में परिवर्तित हो गई है
03:13भगवान विष्णु का शांत मुख अब गंभीर हो गया है, उनकी मंद मुस्कान लुक्त हो गई है क्योंकि वे ब्रहमांडिय
03:20संतुलन के डगमगाने को देख रहे हैं
03:24नारद के हाथों से निकली उर्जा की लहरेंग ब्रहमा के चतुर मुख मुख मंडल पर सीधे प्रहार कर रही हैं,
03:31जिससे उनके स्वर्ण आभूशनों की चमक फीकी पढ़ने लगी है
03:37ब्रहमांड के सभी देवता एक साथ मिलकर इस अभूथ पूर्व द्रिशे को देख रहे हैं, मानो समय की धड़कने पूरी
03:44तरह से थम गई हो
03:47नारद का स्वर्वजर की भानती गूंज रहा है, उन्होंने घोशना की है कि जो स्वयन को स्रिष्टि करता कहते हैं,
03:54अब उन्हें जन्मानस के हृदय से विमुख होना पड़ेगा
03:59भगवान शिव अपने कैलाश शिखर पर ध्यानावस्थित होकर इस कल्यूगी श्राप के परिणामों को अपनी तीसरी आख के माध्यम से
04:07देख रहे हैं
04:09ब्रह्मा के चार मुखों में से अब एक अलग ही पीडा की लहर दिखाई दे रही है, जैसे श्राप का
04:16प्रभाव उनकी दिव्यचेतना को जखजोर रहा हो
04:20पूरा वैकुंठ धाम नीले रंग की प्रकाश तरंगों में डूग गया है, मानो यह घटना भविश्य के उन युगों की
04:27नीम रख रही है, जिनहें मनुष्य अभी नहीं जानते
04:31नारद ने अपनी वीना को कसकर थाम लिया है, उनके चहरे पर अब कोई द्वेश नहीं, बलकि एक अटल सत्य
04:39को स्थापित करने का संतोश है
04:42विश्णु का सुदर्शन चक्र अब उनके दाहिने हाथ में स्वय ही घूमने लगा है, मानो ब्रहमांड की व्यवस्था के प्रतीवे
04:50अपनी तत्परता दिखा रही हूँ
04:53श्राप के कारण ब्रहमा के चारों और की स्वर्ण आभा धुंधली पड़ने लगी है, और उनके चारों और का दिव्यवातावर्ण
05:01ठंडा और नीरस हो गया है
05:05ब्रहमांड की सुक्ष्म शक्तिया इस पल को दर्स कर रही हैं, और एक ऐसी रेखा खींच दी गई है, जिसे
05:12अब कोई भी देवता मिटा नहीं सकता
05:15स्रिष्टी के निर्माता ब्रहमा अब स्वयं को एक गहरे आत्ममंथन की स्थिती में पाते हैं, जहां उनका अहंकार पूरी तरह
05:23समाप्थ हो गया है
05:26भगवान विश्णु ने अपना दिव्य हाथ आगे बढ़ाया है, न रोकने के लिए, बलकि इस श्राप के सत्य को स्विकार
05:33करने के लिए
05:35श्राप की उर्जा अब पूरे वैकुंठ के स्थम्भों में समा गई है, जिससे पत्थरों पर दिव्य नकाशी और भी अधिक
05:42चमक उठी है
05:45एक अद्रिश्य दिवार का निर्मान हुआ है, जिसके कारण ब्रह्मा का पूजन अब उन मंदिरों तक सीमित नहीं रहेगा, जैसा
05:53की पूर्व में निर्धारित था
05:56नारद ने अपनी द्रिश्टी को नीचे पृत्वी लोग की ओर मोडा है, जहां से अब यह श्राप एक नेती का
06:03रूप धारन करने वाला है
06:06कैलाश पर भगवान शिव की ध्यान मुद्रा अब तूट गई है, और उन्होंने एक लंबी गहरी सास लेकर ब्रहमांड के
06:13नए संतुलन को महसूस किया है
06:17देवगण अब कापते हुए आपस में फुस्फुसा रहे हैं, उन्हें इस बात का एहसास हो गया है कि ब्रहमा का
06:24युग अब एक नई चुनोती की ओर बढ़ रहा है
06:29अंतर नारद का श्राप ब्रहमा के भविश्य पर एक ऐसी अमिक छाप छोड़ गया है, जिसे अब केवल काल का
06:36चक्र ही परिवर्तित कर सकता है
06:39ब्रहमा जी के मानस पटल पर नारद के शब्दों का काम पता हुआ प्रभाव अब एक वजर्पात की भांती उतरा
06:46है, जिससे सत्यलोक का स्वर्ण सिनहासन भी थर्थराने लगा है
06:52चतुर्मुख ब्रहमा अपने कापते हाथों को देखते हुए यह समझ चुके हैं कि जिस स्रिष्टी की उन्होंने रचना की है,
07:00वही अब उनके अपने ही श्राप के भारी बोच से दबी हुई है
07:05वे अपनी दिव्य द्रिष्टी से स्रिष्टी के उस अनंत जाल को देख रहे हैं, जहां महामाया का सुक्ष्म धागाहर जीव
07:13के भाग्य को काल के चक्र में बांध रहा है
07:17सत्यलोग के चारों और फैली दिव्य आभा अब धीमी हो गई है, मानो स्वयन स्रिष्टी का निर्माता अपनी रचना की
07:25नश्वर्ता को स्विकार कर रहा हो
07:28ब्रह्मा ने अपनी आखे बंद कर ली हैं, और उनके मुख से एक मौन प्रार्थना निकल रही है, जो साक्षात
07:35श्री कृष्ण के चर्णों में समर्पित है
07:39तभी देवर्शी नारत का वहस्वर उनके कानों में गूंजता है, जो उन्हें उनकी सीमाओं का और उस अमिट श्राप की
07:46तीवर्ता का बोध करा रहा है
07:50ब्रह्मा ने धीरे से अपने मस्तक को नत किया है, और उनके चारों चेहरों पर अब क्रोध के स्थान पर
07:56एक विवश्च स्विकारोक्ती की शांत रेखाएं उभर आई है
08:02सत्यलोक के वातावर्ण में अब एक गंभीर स्थिर्ता का वास है, मानो स्वयन समय भी ब्रह्मा के इस महा प्रिवर्तन
08:09को साक्षी मान कर ठहर गया हो
08:13ब्रह्मा की वह ओजस्वी कांती, जो पहले प्रखर थी, अब एक दिव्य जोती के रूप में सिमट कर उनके हृदय
08:20के केंदर में समाहित हो रही है
08:23वे अब इस सत्य को आत्मसात कर चुके हैं कि स्रिष्टी का रचिता भी काल के नियमों के परे नहीं
08:30है, और नहीं वह भगवान के विधान से मुक्त है
08:35उनके चार हाथों में विध्यमान, वेद और कमंडल अब एक नई स्पूर्ती के साथ चमक रहे हैं, जैसे वे स्रिष्टी
08:42के नए अध्याय की प्रतीक्षा कर रहे हो
08:46सत्यलोग की सीमाओं से परे ब्रहमान्ड की विशालता में एक हलचल मची है, जैसे कोई अध्रिष्य शक्ती अब नया संतुलन
08:54स्थापित करने हेतु सक्रिय हो गई हो
08:58ब्रहमाने एक लंबी गहरी सांस छोड़ी है, जिससे उनके मुख से निकले शब्दों ने पूरी स्रिष्टी को एक नए धर्म
09:05के मार्ग पर चलने का संकेत दिया है
09:09अब समय आ गया है कि वे दक्ष की पुत्रियों के माध्यम से स्रिष्टी के अगले चरण की नीव रखें,
09:16जो उनके पूर्वजों की मर्यादा के अनुरूप हो
09:20सत्यलोग के दिव्य प्रांगण में अब कोई कोलाहल नहीं है, केवल एक दिव्य शान्ती है, जो ब्रहमा के संकल्प को
09:27और अधिक सुद्रिड बना रही है
09:31ब्रहमा की एक आगरता अब और भी अधिक गहरी हो गई है, जैसे वे अपने अंतर्मन में श्री कृष्ण के
09:37उन लीलाओं को देख रहे हों, जो भविश्य में घटित होंगी
09:42उनके चारों चेहरों के उपर अब एक नया तेज विद्यमान है, जो उनके द्वारा स्विकार किये गए इस नय और
09:49कठिन कर्तव्य का प्रतीक है
09:53स्रिष्टी का यह रच्चिता अब एक साधारन रिशियों के समान स्वयं को समर्पित कर चुका है, जिससे ब्रहमान में देवत्व
10:01का एक नया प्रवाह प्रवाहित हो रहा है
10:05अंत्य ब्रह्मा ने अपनी स्रिष्टी को एक नए साचे में ढालने का निर्णय लिया है, जहां श्राप भी एक वर्दान
10:12बनकर नई परमपराओं को जन्न देगा
10:16ब्रह्मा का यह स्विकारोक्ती भरा मौन आने वाली स्रिजन यात्रा के लिए उस बीज के समान है, जो एक विशाल
10:23वट व्रिक्ष बनने की क्षमता रखता है
10:27ब्रह्मांड के शून्य में स्थित उस शाश्वत तट पर देवर्शी नारद ने अपनी लौकिक चेटना को स्थिर कर लिया है
10:35विश्नु ने अपने नीले कमल के समान नेत्रों से देखा कि देवर्शी ने सांसारिक मोह के अंतिम रेशे को भी
10:43तोड़ दिया है
10:45नारद का मानस्पुत्र स्वरूप एक दिव्य प्रकाश पुंच के रूप में धीरे धीरे उनके नश्वर शरीर से अलग होने लगा
10:52है
10:54ब्रह्मांड की धाराएं उस तेजस्वी उर्जा को सोख रही हैं जैसे कोई पवित्र नदी किसी महासागर में बिलीन हो रही
11:02हो
11:03गरुर ने अपनी विशाल स्वर्ण पंखों को फड़फडाते हुए आकाश में उस दिव्य आत्मा के मार्क को प्रशस्त किया
11:12भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ उस परम चेतना को आशिरवाद दिया जो अब गंधर्व लोक की ओर बढ़
11:19रही है
11:21जैसे ही नारत की आत्मा भौतिक शरीर से मुक्त हुई उनके वस्त्रों की भानती वह जड़ शरीर वही तटपर स्थिर
11:28हो गया
11:30अंतरिक्ष के उन अद्भुत वर्टेक्स में नारत की चेतना एक नक्षत्र की भानती चमकती हुई गतिमान है
11:39गंधर्व लोक के प्रवेश द्वार पर संगीत और गंध की एक अध्भुत तरंग ने इस तेजस्वी यात्री का स्वागत किया
11:47भगवान शिव ने कैलाश की बर्फानी चोटियों से अपनी तीसरी आख खोली और उस दिव्य परिवर्तन को साक्षी भाव से
11:55निहारा
11:57नारद की आत्मा अब गंधर्व लोक के उस उच्चतर तल में प्रविष्ठ हो रही है जहां राग और द्वेश का
12:03अभाव है
12:06स्रिष्टी के इस रहस्य में संक्रमन को देख कर गंधर्वों ने अपने दिव्य वाद्यों से एक मधुर स्वरलहरी उत्पन्न की
12:14नारद का वह त्यागा हुआ शरीर एक दिव्य स्वर्ण प्रतिमा के समान तट पर चमक रहा है
12:21ब्रह्मा ने अपनी स्रिजन कला के माध्यम से उस दिव्य आत्मा के नए गंतव्य को पूर्व ही भांप लिया था
12:29देव लोग के समस्त वासी इस द्रिश्य को देख विस्मित है कि कैसे एक मुनी ने स्वेच्छा से देह का
12:36त्याग किया
12:38ब्रहमांड की हर दिशा में एक दिव्य गूंच सुनाई दे रही है जो इस त्याग की महिमा का गुनगान कर
12:44रही है
12:47नारद का वह सुक्ष्म रूप अब गंधर्व लोग की उर्जाओं के साथ एकाकार हो चुका है
12:54भगवान विश्नु ने अपने शंक को बजा कर इस महान परिवर्तन की स्वीकृती दी
13:00कैलाश के शांत वातावर्ण में शिव का डमरू एक लैबध ध्वनी उत्पन कर रहा है
13:07इस प्रकार देवर्शी नारद का वह मंजनित स्वरूप एक नए ब्रहमांडिय उद्देश के लिए रूपांतरित हो गया है
13:16गंधर्व लोग की स्वर्णिम आभा के बीच महारानी कलावती के गर्भ से एक तेजस्वी बालक का प्रादुर्भाव हुआ
13:24जिसने संपूर्ण दिशाओं को अपनी अलोकिक कांती से आलोकित कर दिया
13:29महाराज चित्ररत अपने ननहे पुत्र को गोद में लेकर भाव विभोर हो गये
13:34मानो साक्षात संगीत का अधिश्ठाता स्वयं उनके कुल में अवतरित हो गया हो
13:40ननहे उपबरहन ने जन्म लेते ही मधुर ध्वनी में प्रथम क्रंदन किया
13:45जो किसी साधारन शिशु का रुदन नहीं बलकी ब्रहमांडिय वीना के प्रथम तार के जंकार के समान था
13:53राजमहल की छटों पर बैठे पक्षी भी उस बालक के आगमन पर मौन हो गए
13:58जैसे वे भी उस महान आत्मा की वीनाध्वनी का स्वागत कर रहे हो
14:04समय का चक्र तेजी से घूमा और उपबरहन का शैशव काल क्षणों में ही व्यतीत हो गया
14:10मानोवे साक्षात समय की गती को नियंत्रित करने आये हो
14:15बालक उपबरहन के मुख से निकलने वाले प्रथम शब्द भी संगीत के सब्तक के समान मधुर और प्रभावशाली थे
14:22जिसने राजमहल के वातावर्ण को दिव्य बना दिया
14:27राजदर्बार में एकत्रित सभी गंधर्व और अपसराएं उस बालक के असाधारन तेज को देखकर विस्मय और भक्ती से नत्मस्तक हो
14:35गई
14:37उपबरहन ने अपनी कोमल उंगलियों से हवा में ही अद्रिश वीना के तारों को छेड़ा जिससे संपून लोक में एक
14:44अलोकिक संगीत की लहर डौड गई
14:48यह संगीत कोई साधारन कला नहीं थी अपितू यह उस अनन्त भक्ती का उद्गोश था जो आने वाले समय में
14:55संपून ब्रहमांड को आंदोलित करने वाली थी
14:59बालक उपबरहन का ओज इतना प्रखर था कि राजवैद्य भी उनके स्वास्थ्य और विकास की गती को देखकर अचम्भित रह
15:07गए
15:09कलावती और चित्ररत ने अपने पुत्र के इस विलक्षन विकास को साक्षात इश्वर का वर्दान माना और उसे संगीत के
15:17श्रिष्ट आचारियों को सौंपने का निश्चय किया
15:21गंधर्व लोग के सबसे बड़े संगीत अग्यों ने जब उस बालक को वीना धारन करते देखा तो वे अपनी आखे
15:28खुली की खुली रह गई
15:31उपबरहन ने पहली बार गंधर्व विद्या में निपुन्ता का प्रदर्शन किया और सभी आचारियों को मंत्र मुग्ध कर दिया
15:39वह वीना जो वर्षों के अभ्यास से बज्ती थी बालक उपबरहन के स्पर्ष से स्वयं ही जीवन्तो उठी और रागों
15:47की वर्षा करने लगी
15:49संपूर्ण आकाश में गंधर्वों का गायन गूंज उठा और ऐसा लगा जैसे स्वर्ग के द्वार स्वयं खुल गए हो
15:58उपबरहन के मुख से निकलने वाली हर धुन में प्रकृती का प्रतेक कंस्पंदित हो रहा था
16:05गंधर्व लोग की हर गली और हर कोना संगीत की इस महिमा से भर गया जिससे सभी निवासियों के हिर्दय
16:12में एक अलोकिक शान्ती का संचार हुआ
16:15वीना की तान इतनी गहरी और पवित्र थी की मानो वह साक्षात नारायन के चर्णों की स्तुती कर रही हो
16:24उपबरहन के रूप में संगीत का एक नया युग प्रारंब हो चुका था जिसे आने वाले युगों तक स्मरन रखा
16:31जाना था
16:33राजमहल के गगन्चुंबी शिकरों पर सूर्य की किरने उपबरहन के संगीत के साथ निरित्य कर रही थी जिससे एक अविस्मनिय
16:41गाथा का सूत्र पात हुआ
16:44स्वर्गलोग की विशाल सभा में उपबरहन की वीना से निकले सुर्मानो अंतरिक्ष के हरकन को एक दिव्यस पंदन से भर
16:52रहे थे
16:53भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर इस अलौकिक संगीत को सुनकर मंद मुस्कान के साथ उपबरहन की एकागरता को निहार
17:02रहे हैं
17:04उपबरहन अपनी तनमयता में डूबा हुआ उन सुरों को ढूण रहा है जो उसके हृदय के किसी गुप्त कोने में
17:11गोलोग की स्मृती बनकर दबे हुए हैं
17:15संगीत की लहरें इतनी तीवर थीं कि साक्षात देवराज इंद्र भी अपने सिनहासन से उठकर मंत्रमुग्ध होकर इस अद्वितिय स्वरलहरी
17:24को सुनने लगे
17:26हिमालय की बरफीली चोटियों के बीच भगवान शिव के कानों तक जब यह दिव्य संगीत पहुँचा तो उनकी समाधी में
17:34भी एक मधुर हल्चल उत्पन हो गई
17:38भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख को थोड़ा शांत करते हुए उपबरहन के हृदय में छिपी उस गोलोक की तड़क
17:45को पहचान लिया
17:47उपबरहन के उंडलियों के स्पर्ष मात्र से वीना के तारों से वह अनाद नाद निकलने लगा जो स्रिष्टी की उत्पत्ती
17:55के पूर्व की शांती का प्रतीक था
17:58संपूर्ण ब्रहमांड एक क्षण के लिए ठहर सा गया और हर देवता, हर अपसरा ने अपनी गती रोक कर इस
18:05संगीत के रसका पान किया
18:08विस्त्रत आकाश के नीचे जहां उपबरहन बैठा था, वहां की उर्जा का रंग बदल कर गहरा नील और स्वर्णिम आभा
18:16में परिवर्तित हो गया
18:18नारद मुनीक जो दूर से यह द्रिश देख रहे थे, उन्होंने मुस्करा कर उपबरहन के इस अलोकिक परिवर्तन को अपनी
18:26बीना के सुरों से स्वीकृती दी
18:29उपबरहन की आवाज में वह करुणा और गहराई आ गई थी, जिसे सुनकर प्रकृती के पशुपक्षी भी अपनी चंचलता छोड़कर
18:38स्थेर हो गए
18:40संगीत के उस सागर में उपबरहन को एक पल के लिए गोलोक का वह दिव्यद्वार दिखाई दिया जहां प्रेन ही
18:47एक मात्र भाशा थी
18:49विष्णु लोग के वैभव के बीच उपबरहन ने अनुभव किया कि उसका यह संगीत वास्तव में नारायन के चर्णों का
18:57ही एक सुक्ष्म अंश है
19:00भगवान विष्णु ने अपनी दिव्य मुस्कान के साथ उपबरहन की ओर देखते हुए संकेत दिया कि यह संगीत ही उसे
19:08मोक्ष के मार्ग पर ले जाएगा
19:11उपबरहन ने अपनी वीना को हरिदय से सटा लिया और उसके भीतर से निकल रहे सुरों में गोलोक की स्मृतिया
19:18और अधिक तीवर हो गई
19:20वह एक ऐसा संगीत था जिससे संपूर्ण ब्रहमांड का कंकन पुलकित होकर इश्वर की स्तुती में लीन हो गया
19:29ब्रहमांड के हर लोक में संगीत की वह गूंच पहुँची जिससे असुरों के हृदय में भी अनजाने ही शान्ती का
19:36संचार होने लगा
19:38उपबरहन ने जब अंतिन स्वर छेडा तो पूरा स्वर्ग लोक एक दिव्य चमक से नहा उठा जैसे सूर्य का उदे
19:45हुआ हो
19:47संगीत की वह गाथा अब इतिहास बन चुकी थी जिसने उपबरहन के भीतर के साधारन गंधर्व को एक उच्छ कोटी
19:55के भक्त में रूपांतरित कर दिया
19:58ब्रह्मान शांत था परंतु उस संगीत की गूंज हर जीव के भीतर नारायन के प्रेम को जगाने के लिए सदा
20:05के लिए अनकित हो गई
20:08गंधर्वराज चित्रसेन की राजधानी में मालवती ने उस संगीत की गूंज को अपने हृदय की धड़कन बना लिया था
20:16देवी सरस्वती की प्रतिमा के सम्मुख खडी राजकुमारी मालवती की आखों में उपबरहन के प्रती भक्ती का दिव्य प्रकाश जलक
20:25रहा था
20:26मालवती ने अपनी कोमल हथेलियों को जोड कर ब्रहमांड की आदी शक्ती के चर्मों में अपना मस्तक जुका दिया
20:35दिव्य आभासे परिपून उस स्वन कक्ष में राजकुमारी की प्रार्थना का स्वर समस्ट दिशाओं में गूंज उठा
20:43मालवती के मुख से निकले हर शब्द में उपबरहन के प्रती अटूट प्रेम और समर्पन का सागर हिलोरे मार रहा
20:50था
20:51भगवान विश्नु का दिव्य स्वरूप अपने चतुर्भुज रूप में अंतरध्यान होकर मालवती की निष्ठा को देख मंदमंद मुस्कुरा उठे
21:01राजकुमारी ने अगनी को साक्षी मान कर यह प्रण लिया कि वह उपबरहन के अतरिक्ट किसी और को अपना स्वामी
21:08नहीं मानेगी
21:10उसके प्रण की गूंच से कैलाश की बरफीली चोटियों तक जैसे एक नई उर्जा का संचार हो गया
21:18गंधर्वराज की पुत्री के इस पवित्र संकल्प ने स्वर्गलोग के वातावर्ण में दिव्य सुगंध भर दी
21:26स्वयंगरुर्देव ने पंक फैला कर आकाश में उस संकल्प की पवित्रता को नमन किया
21:32मालवती का मन पूरी तरहे से उपबरहन की भक्ती की धुन में तल्लीन हो गया था
21:39स्रिष्टी के कणकण में मालवती के समर्पन का प्रभाव अंकित हो गया जैसे किसी पाशान पर नकाशी
21:46आधी शक्ती ने मालवती के निश्चल भाव को स्वीकार कर उसे दिव्य आशिर्वाद से अलंकृत कर दिया
21:54देवी की वह कृपा मालवती के चारों और एक सुरक्षा कवच बनकर विद्यमान हो गई
22:00अब मालवती का आध्यात्मिक भाग्य सीधे उपबरहन के साथ जुर चुका था जिसे कोई भी शक्ती अलग नहीं कर सकती
22:08थी
22:10ब्रहमांड की शक्तिया मालवती के इस द्रिढ निश्चय के सामने मस्तक जुका रही थी
22:17उपबरहन का नाम मालवती के अध्यों पर एक पवित्र मंत्र की भांती अनकित हो गया था
22:23स्वर्ग के देवता भी उस कन्या के त्याग और निश्ठा को देखकर विस्मित थे
22:30मालवती का अंतर्मन अब पूरी तरह उपबरहन के दिव्य संगीत के साथ एक रूप हो चुका था
22:37पवित्रता की यह गाथा ब्रहमा के इस युग की सबसे अनूठी प्रेम कथा के रूप में अमर हो गई
22:44स्वर्ग के स्वर्ण शिकरों पर गंधर्व लोग का वैभव आज एक दिव्य उत्सव के रूप में उमर पड़ा है जहां
22:51चारों दिशाय पुष्प वर्षा से भर गई है
22:55देवराज इंद्र अपने एरावत पर आरूढ होकर इस दिव्य विवाह के साक्षी बनने हेतु सप्रिवार सभा में पधारे
23:04उपबरहन ने अपनी वीना के उन स्वरों को छेड़ा जिससे संपूर्ण वातावर्ण कृष्ण भक्ती के दिव्य संगीत से गुंजायमान होक
23:12उठा
23:14हवाओं के जोकों के साथ आकाश से पारिजात के पुष्प बरस रहे हैं जो इस युगल के अटूट बंधन को
23:21आशिर्वाद प्रदान कर रहे हैं
23:24विस्तरत गंधर्व सभा के मध्य में सुसजित यग्यवेदी का निर्मान हुआ है जहां अग्निदेव की साक्षिता में पवित्र मंत्रों चार
23:33गुंज रहे हैं
23:35भगवान विश्णोगरोर पर विराज मान होकर इस मिलन को मंगलमय बनाने हेतु अपनी सुक्षम द्रिष्टी से अवलोकन कर रहे हैं
23:45मालवती का श्रिंगार उसकी पावंता का प्रतीक है जो मोतियों और रत्नजडित आभूशनों की कांती के साथ चमक रहा है
23:54ब्रहमांड के सभी दिशाओं से सुर्मई तरंगे इस विवास थल पर केंद्रित होकर एक दिव्य उर्जा का निर्माण कर रही
24:02हैं
24:04गंधरवराज उपबरहन ने अपनी वीना के तार पर अंतिम मधुर आलाप लिया और पूरी सभा शांत होकर उस दिव्य संगीत
24:12में लीन हो गई
24:14देवर्शी नारत भी इस अध्भुत मिलन को देख कर मुस्कुरा रही हैं क्योंकि यह भक्ती और प्रेम का एक अनुठा
24:22संगम है
24:24विवा के पवित्र बंधन में बंधते हुए उपबरहन ने मालवती का हाथ थामा और दोनों के बीच एक अलौकिक तेज
24:32का उदे हुआ
24:34पवित्र अगनी के चारों और भूमते हुए यह युगल स्रिष्टी के कल्यान और प्रेम की अमर गाथा को पुनह जीवित
24:41कर रहा है
24:43गंधर्व सभा के वाध्ययंत्रों की गूंच से सातों लोक आज पुलकित हो उठे हैं और चारों और मंगल गीत सुनाई
24:51दे रही हैं
25:02अगनी के मस्तक पर सिंदूर लगाते ही उपबरहन के व्यक्तित्व में एक नया दिव्य आत्म विश्वास और तेज समाहित हो
25:09गया
25:11अद्रिष्य देवगन भी इस विवाह की भव्यता का अनुभव कर रहे हैं और दिव्य पुष्पों की वर्षा कर रहे हैं
25:19यग्य के अंत में जब पूर्णा हुती दी गई तो गंधर्व लोक के द्वार स्वय देवों के स्वागत में खुल
25:26गए
25:27इंद्रदेव ने स्वर्ण सिंहासन से उठकर उपबरहन को आशिरवाद दिया और गंधर्व राजत्व का मुकुट उन्हें समर्पित किया
25:36यह मिलन न केवल दो आत्माओं का है बलकि यह प्रेम, संगीत और भक्ती के एक ऐसे सेतु का निर्मान
25:44है जो ब्रहमान को जोड़ता है
25:47पवित्र विवाह की यह गूंज अब काल के प्रवाह में अमर हो गई है, जिसे ब्रहमा के इस युग का
25:53सबसे अन्मोल धरोहर माना जाएगा
25:57गंधर्व लोक के वैभवशाली प्रासादों के बीच उपबरहन अब कामदेव के प्रभाव में आकर उन विलासी भोगों में खो गया
26:05है, जो ब्रहमा के श्राप की नियती थे
26:09भगवान विश्णु अपने वैकुंठ लोक में स्थित स्वर्ण कमल पर विराज मान होकर उपबरहन के इस पतन को शांत चित्त
26:16से निहार रही है
26:19उपबरहन अपनी विलासी नर्तकियों के बीच मदिरा और संगीत के नशे में डूब कर स्वयं के उस पूर्व स्वरूप को
26:26भूल चुका है, जहां वह कभी तत्वग्यान की चर्चा किया करता था
26:32कामवासना का वह गहरा सागर अब उपबरहन के विवेक को पूरी तरह से निगल चुका है, जिससे उसके चारित्रिक वैभव
26:40पर विलासिता का एक गहरा परदा पड़ गया है
26:44गंधर्व लोक के उचे शिखरों पर जब गंधर्व संगीत की धुने बजती हैं, तो उपबरहन अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर
26:52और भी अधिक उनमादित हो उठता है
26:57देवर्शी नारत की भक्ती का मार्ग अब उपबरहन के लिए पूरी तरह धूमिल हो चुका है, क्योंकि वह सांसारिक मोह
27:04के जाल में मजबूती से जक्रा हुआ है
27:08सुवर्ण मुदराओं की जंकार और दासियों के निरित्य ने उपबरहन के मन के उस मंदिर को मलीन कर दिया है,
27:15जहां कभी ब्रहमा का वास हुआ करता था
27:18चारू और व्याप्त यह विलासिता का वातावर्ण एक मायावी जाल की भांती उपबरहन को उस सत्य से दूर ले जा
27:26रहा है, जो उसे पुन्ह मुक्त कर सकता था
27:30स्वर्ण मंदित स्टंभों के पीछे से उपबरहन अपनी प्रेसियों के साथ सुख के क्षणों को खोजता है, जैसे कोई प्यासा
27:38व्यक्ती म्रिगत्रशना के पीछे डौड रहा हो
27:42महादेव हिमालय की तुम चोटियों पर ध्यान मगन हैं, जानते हुए कि उपबरहन का यह पतन ब्रहमा के श्राप के
27:49चक्र को पूरा करने की अनिवार्य कड़ी है
27:53उपबरहन के मुख पर अब गर्व और विलासिता की रेखाएं स्पष्ट हैं, जो उसके उस वैराग्य के विप्रीत हैं, जिसे
28:01वह कभी ब्रहमा का प्रिय शिश्य होने पर धारण करता था
28:06सांसारिक सुखों की यह त्रिश्णा एक ऐसे कारागार का निर्मान कर रही है, जिसके द्वार उपबरहन के स्वयन के कर्मों
28:13से बंध हो चुके हैं
28:16गंधर्व नगर की शोभा देखने योग्य है, जहां हर स्थान पर स्वर्ण, मनिया और सुगंधित पुष्प उपबरहन की विलासिता को
28:24चार चांद लगा रही हैं
28:27गरुर देव अपनी विशाल पंखों के साथ आकाश में मंदराते हुए उपबरहन के इस सांसारिक मोह को अपने तीक्षन नेत्रों
28:36से देख रहे हैं
28:39उपबरहन का हर एक कदम अब वासना की ओर बढ़ रहा है, जैसे वह उस दलदल में धन्स रहा हो
28:45जहां से निकलना अब उसके वश के बाहर है
28:49ब्रहमा का श्राप अब गंधर्व लोग की हवाओं में घुल चुका है, जो उपबरहन को पलपल अधिक मोहित कर रही
28:56हैं
28:59प्रासादों की भव्यता और दावतों का शोर उपबरहन के कान में पढ़ कर उसके अंतर्मन की उस शांत ध्वने को
29:06पूर्णत दबा चुका है
29:09विश्नु की माया का यह खेल उपबरहन को और भी गहरे मोह में धकेल रहा है, ताकि वह अपने कर्मों
29:16का फल पूर्नत्या भोग सके
29:19उपबरहन अब विलासी वस्त्रों और आभूशनों के भार से लदा हुआ, अपने पद और प्रतिष्ठा के गौरव में अंधा होकर
29:26नृत्य की मधोशी में खो गया है
29:30ब्रहमांड का यह चक्र एक ऐसे बिंदु पर खड़ा है, जहां प्रेम और विलासिता का मिलाजुला रूप अब उपबरहन की
29:38नेती का अंतिम अध्याय लिख रहा है
29:41यमराज के दिव्यकक्ष में समय का स्वर्ण पात्र खाली होने की सूचना मिलते ही आकाश में भयानक गर्जना हुई
29:50महादेव ने अपनी तीसरी आख के स्पंदन से उपबरहन की आयू के अंतिम खशनों को एक अद्रिश रेखा में अंकित
29:57होते देखा
29:59यम्दूतों ने अपने हाथों में तप्त लोहे की बेडिया थाम ली हैं जो उपबरहन के अज्यान की बेडियों को तोड़ने
30:07के लिए तयार है
30:09नियमों का एक अद्रिश चक्र कालातीत आकाश में एक भयानक आंधी की तरह उमड रहा है जो सब कुछ निगलने
30:17को आतुर है
30:20विष्णू लोक के स्वर्ण कल्षों में कमपन होने लगा है मानु स्वयन ब्रह्मांड उपबरहन के पतन का साक्ष्य बनने के
30:27लिए सच गया हो
30:29गरुर देव ने अपनी विशाल स्वर्ण पंखों को सिकोड लिया है क्योंकि वे जानते हैं कि काल का चक्र अब
30:36किसी को नहीं छोड़ेगा
30:39यमदूतों के पैरों की आहट से पाताल लोग के गहरे गलियारे काप उठे जहां उपबरहन अभी भी नरित्य की धुन
30:46में लीन है
30:49नेती ने उपबरहन के मस्तक पर एक अद्रिश्य स्याही से मृत्यू का समय लिख दिया है जिसे अब कोई भी
30:56मिटा नहीं सकता
30:58यमलोग के वात्या चक्रों में अब सन्नाटा पसर गया है और मृत्यू का देवता कालदंड धारन कर द्वार पर खड़ा
31:05है
31:07यमराज की तीचन द्रिश्टी उस लोग की ओर है जहां उपबरहन अपनी विलासिता के मद में चूर होकर निरित्य कर
31:14रहा है
31:16उपबरहन के वस्त्रों के आभूशन अब फीके पढ़ने लगे हैं जैसे ही काल की छाया उसके अस्तित्व को छूने लगी
31:24है
31:26अंधकार की एक पतली रेखा पूरे ब्रहम लोग को घेर रही है यह चेतावनी है कि उपबरहन का समय समाप्त
31:33हो चुका है
31:36यमदूतों ने अपनी धधक्ती हुई मशाले बुझा दी है क्योंकि उपबरहन को अब अंधकार की अनंत यात्रा पर ले जाना
31:43है
31:45समय का पहिया रुप गया है और शूने में सन्नाटा चा गया है जो इस बात का प्रतीक है कि
31:51न्याय का समया गया है
31:54यमराच के मुख से निकला हुआ आदेश ब्रह्मलोग की निरवता को चीरता हुआ उपबरहन के कानों तक पहुँचने लगा है
32:03वह अट्थास जो उपबरहन के मुख पर था अब धीरे धीरे भय और विसमय में बदलने लगा है
32:12यमदूतों की खडाओं की आवाज अब उपबरहन के भवन के द्वार के बाहर सुनाई दे रही है
32:19परंपिता ब्रहमा की वह मौन सहमती अब उपबरहन के लिए एक कालदंड बन गई है जिसे कोई रोक नहीं सकता
32:28उपबरहन के पैरों के नीचे से भूमी खिसकने लगी है क्योंकि मृत्यू का सत्य उसे वास्तविक्ता के धरातल पर लाने
32:35के लिए तैयार है
32:38स्रिष्टी का यह नियम अटल है जो जन्मा है उसे काल के हाथों में समर्पित होना ही होगा