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ब्रह्मवैवर्त पुराण के चौथे एपिसोड में जानिए देवर्षि नारद द्वारा ब्रह्मा के शाप को स्वीकार करने के बाद की दिव्य घटनाओं का रहस्य। कैसे नारद ने भक्ति के मार्ग को चुना और ब्रह्मांड में आगे की सृष्टि का विस्तार हुआ। देखिए एक हाई-रिटेंशन पौराणिक यात्रा। #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #LordBrahma #HinduMythology #PuranicSecrets #SpiritualAwakening
Transcript
00:00ब्रहमा के क्रोध की भीशन अगनी से पूरा ब्रहम लोग कांप उठा जब उन्होंने नारत को संसार में भटकने का
00:07कठो श्राप दिया।
00:09भगवान विश्नु अपने दिव्य आसन पर विराज मान होकर ब्रहमा के इस तीवर आवेग को शांत भाव से देख रहे
00:16थे।
00:18देवर्शी नारत ने बिना किसी प्रतिशोध के अपने हाथों में वीना थामे हुए ब्रहमा के श्राप को एक दिव्य आदेश
00:26मान कर स्विकार कर लिया।
00:28ब्रहम लोग की स्वर्ण आभा उसक्षन धुंधली पड़ गई, जैसे स्वयन प्रकृती भी उस पितापुत्र के वियोग की साक्षी बनी
00:36हो।
00:37ब्रहमा का मुख मंडल क्रोध से रक्तवर्ण हो रहा था और उनकी दाढ़ी कांप रही थी, मानो स्रिष्टी की स्थिर्ता
00:45ही डामवाडोल हो गई हो।
00:47गरुर देव इस अलौकिक ग्रिष्य को देख विचलित हो गए और उन्होंने अपना सिर जुका कर विश्नु से मार्ग गर्षन
00:55की प्रार्थना की।
00:57नारद ने अपनी वीना के तारों को धीरे से छेड़ा, जिससे एक करोन स्वर गूंज उठा जो समस्त लोकों की
01:04सीमाओं को पार कर गया।
01:07ब्रहमलोक के उचे स्तंभों के बीच एक अजीब सी ठंडी हवा दोड गई जो आने वाले समय के परिवर्तनों का
01:14संदेश दे रही थी।
01:16श्राप के प्रभाव से नारद के चर्णों में एक अद्रिश्य उर्जा उत्पन हुई जो उन्हें अब प्रित्वी की नश्वर्ता की
01:24ओर खीच रही थी।
01:26भगवान विश्णू ने धीने स्वर में ब्रह्मा को संबोधित किया, उनकी वाणी में सागर जैसी गहराई और शांती समाहित थी।
01:36नारद ने अपनी वीना को कंधे पर रखा और ब्रह्मा को अंतिम बार नमन कर शूने की दिशा में प्रस्थान
01:43करने लगे।
01:44ब्रह्म लोग की स्वर्ण महराबें उस समय किसी दुखत धुन की प्रतिध्वनी कर रही थी, जो नारद की विदाई का
01:52संगीत थी।
01:54ब्रह्मा का क्रोध धीरे धीरे गलानी में बदल रहा था, क्योंकि वे स्रिष्टी के प्रथम रचनाकार होने के साथ साथ
02:01एक पिताभी थे।
02:03विश्नु का शांत चहरा ब्रह्म लोग की दिव्यशान्ती का प्रतीक था, उन्होंने इस घटना को समय की गती माना।
02:11नारत की छवी अब ब्रह्म लोग की सीधियों पर धुंधली होने लगी थी, मानो वे ब्रह्म लोग के अस्तित्व से
02:18ही मिट रहे हों।
02:20एक विशाल स्वर्ण कलश से दिव्यशल बह रहा था, जो समय की उस धारा को दर्शा रहा था, जिसमें नारत
02:27को उतरना था।
02:30ब्रह्मा ने अपना सिर्थाम लिया, मानो उन्हें अब उस खालीपन का आभास हो रहा था, जो नारत के जाने के
02:37बाद उत्पन हुआ था।
02:39गरुर ने अपने पंक फैला कर एक सुरक्षा धेरा बनाया, जिससे ब्रह्म लोग की पवित्रता और अधिक सुरक्षित हो गई।
02:48नारत के जाने के साथ ही, ब्रह्म लोग के पुश्प बिना किसी कारण के ही मुर्जाने लगे, जो इस विचो
02:55का मौन प्रमान थे।
02:57अंतह नारत ब्रह्मान्ड के उस अज्यात मार्ग पर निकल पड़े, जहां से उनके महा विद्रोह और नई स्रिष्टी का आरंभ
03:05होना था।
03:06ब्रह्मान्ड के अनंत अंधकार में प्रवेश करते ही नारत के चर्णों की ध्वनी से नक्षत्र काम्प उठे और उन्होंने अपना
03:14पहला पक क्रिमिभोजन की भयावह सीमा पर रखा।
03:18स्वया भगवान विश्णु ने वैकुंट के अपने दिव्य सिनहासन से नारत की इस कठिन यात्रा को देखकर मंद मुस्कान के
03:26साथ अपना आशिरवाद भेजा।
03:29नारत ने एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली तान छेड़ दी, जिससे क्रिमिभोजन के उस दुर्गंधित वातावर्ण में भी भक्ती की
03:37सुगंध फैलने लगी।
03:40दिव्य ध्वनियों के कमपन से उस घ्रेनित दलदल के उपर एक सुनहरा प्रकाश चक्र निर्मित हुआ, जो नारत के संकल्प
03:47की अखंडता का प्रतीक था।
03:50अपनी यात्रा को जारी रखते हुए नारत अब अयाहपान के उस धधकते क्षेत्र में पहुँचे जहां तामबे की कड़ाईों में
03:57गर्म धातूँ की गर्जना हो रही थी।
04:01ब्रहमांड के रक्षक भगवान शिव ने कैलाश परवत से अपनी तीसरी आख खोली और नारत के इस कठिन मार्ग का
04:08अवलोकन किया।
04:10नारत ने अयाहपान के उस भीशन अगनिक शेत्र में खड़े होकर अपनी वीना के तारों को इतना जंकृत किया कि
04:18पिघली हुई धातूएं संगीत की ताल पर नित्य करने लगी।
04:22उस धधक्ती अगनि के बीच से नारत के मुख से निकला कृष्ण नाम का एक छोटा सा शब्द एक दिवे
04:29ढाल बनकर उनके चारों और फैल गया।
04:33अपनी तपस्या के अगले चरण में नारत रौरव के उन अंधेरे खाईयों की ओर बढ़े जहां आत्माओं का रुदन वातावर्ण
04:41को भारी कर रहा था।
04:43गहवर की गहराई में उतरते हुए नारत के तेजस्वी व्यक्तित्व ने उस घोर अंधकार को अपनी किर्णों से चीर दिया।
04:52अंधकार के उस निवासियों ने जब नारत के कंट से निकली मधुर वीना सुनी तो उनकी पीडा कम होने लगी
04:59और वे शांती से सुनने लगे।
05:02यह वहक्षन था जब रौरव के पाशान स्तंभों नारत की भक्ती के सामने जुपकर अपनी कठोरता त्याग दी थी।
05:10अचानक नारत का मार्ग सुकरमुख के उस शेत्र से होकर गुजरा जहां वराह मुख वाले पहरेदार अपनी गदाओं के साथ
05:18पहरादे रहे थे।
05:20ब्रह्मा के उन कठोर द्वारपालों ने नारत को देखकर अपनी गदाएं नीचे जुका ली क्योंकि वे उनके भीतर स्थित क्रिश्न
05:29के तेज को पहचान गए थे।
05:31नारत ने अपनी आखे मुंद कर वराह रूपी भगवान का स्मरण किया, जिससे पूरे सुकर्मुक शेत्र में एक दिव्य गर्जना
05:39सुनाई दी।
05:41पूरे ब्रहमांड ने नारत की इस यात्रा को एक नए युग के उदे के रूप में महसूस किया, जो केवल
05:48विनाश का नहीं, अपितु भक्ती का विस्तार था।
05:52पुयोद की विशाक्त और दुरगंधित नदियों के तड़ पर पहुँचकर नारत ने अपने कमंडल से पवित्र जल की कुछ गूंदे
05:59वहां छिड़क दी।
06:01नारत का यह छोटा साकृत्य पूरे ब्रहमांड के पुनुरुद्धार की एक गुप्त शुरुवात बन गया, जिसकी भनक ब्रहमा को भी
06:10नहीं थी।
06:11नारत की वीना की प्रत्येक तान अब ब्रहमांड के कंकन में कृष्ण प्रेम के मंत्र को घोल रही थी, जिससे
06:18स्रिष्टी के नियम परिवर्तित हो रहे थे।
06:21अपने महाविद्रोह को पूर्णता देते हुए नारत ने ब्रहमांड के अंतिम छोर पर पहुँचकर घोष्णा की की अब कोई भी
06:29जीव कृष्ण की भक्ती से वंचित नहीं रहेगा।
06:33ब्रहमा का स्रिजन लोक आज सन्नाटे में डूबा था, जहां वे अपनी ही रची हुई शून्यताओं को देखकर विचलित हो
06:41रहे थे।
06:42विश्णु का ध्यान जो ब्रहमांड की धड़कन को नियंत्रित करता है, इस क्षण में ब्रहमा की बेचैनी को भांप गया
06:50था।
07:09ब्रहमा ने गहरी सास ली और उनके भीतर की स्रिजन की ज्वाला फिर से देहक उठी, जिससे चारों दिशाएं जग्मगा
07:17उठी गरुर के पंखों की फड़फडाहट ने वैकुंठ के शांतिपून वातावर्ण को तरंगित कर दिया, जो भगवान विश्णु के किसी
07:26गु
07:31प्रसर होते हुए ब्रहमा ने अपने मानस पुत्रों की कमी को अनुभव किया और अपनी तपस्या को और भी कठोर
07:38बना लिया। ब्रहमा की तपो भूमी के ऊपर एक रहस्य में ओसकी बूंद गिरी जो स्वय कृष्ण के आशिर्वात का
07:47प्रतीक थी।
08:01से उन्हें यह आभास हुआ कि स्रिष्टिकर्ता ने अपने कार्य में नया प्राण फूंक दिया है। ब्रहमा ने अपनी द्रिष्टी
08:10से ब्रहमांड के सुक्षम तत्वों का आहवान किया और शूने से नक्षत्रों का जन्म होने लगा। श्रेजन के महासागर में
08:18अब एक
08:19नई लहर दोड रही थी जो ब्रहमा के संकल्प के वेग को दर्शा रही थी। ब्रहमा के चार मुखों से
08:27चार वेदों का गुंजन प्रतिध्वनित होने लगा जिसने पूरे शूने को मंत्रों से भर दिया। भगवान शिव कैलाश की एकांत
08:36उंचाईयों पर बैठे ब्रह
08:48की नीम्व सुद्रिध होने लगी। प्रकृती का संतुलन अब ब्रहमा के हाथों में था, जो किसी भी चूक की अनुमती
08:56नहीं देना चाहते थे। ब्रहमा ने एक गहरी दृष्टी डाली और सृष्टी के प्रथम व्रिक्षों का अंकुरन अपनी इच्छा से
09:05संपन्न किय
09:07वैकुंट से विश्णू ने एक इशारा किया, जिससे स्रिजन की प्रकृया में और अधिक दिव्यता का संचार हो गया।
09:37ब्रहमा की मानस शक्तियों से एक दिव्य प्रकाश पुंज निकला, जो देखते ही देखते शांत और शीतल जल के बीच
09:44चमकने लगा। विश्णू ने मंद मुस्कान के साथ गरुड की पीट से देखा, मानों वे इस आधिसरिजन की प्रतीक्षा युगों
09:53से कर रहे थे।
09:55ब्रहमा ने अपना ध्यान केंद्रित किया और मंत्रों के उच्चारण से उन दिव्य उर्जाओं को आकार देना प्रारंभ कर दिया।
10:04ब्रहमांड के शूने में एक दिव्यध्वनी गूंजी जो आने वाली मात्रिशक्तियों के आगमन का मंगल संकेत थी।
10:13ब्रहमा के बाए भाग से एक तेजोमय नारी स्वरूप प्रकट हुआ, जिसकी कांती चंद्रमा के समान शीतल थी।
10:21विश्नु ने उस प्रकट हुई शक्ती को देख कर अपना हाथ उठाया, जिससे उस स्वरूप में प्राणों का संचार हो
10:28गया।
10:29उस नारी शक्ती ने ब्रहमा के सम्मुक हाथ जोड कर प्रणाम किया, और सृष्टी को गती देने के लिए अपनी
10:36सहमती दी।
10:38ब्रहमांड का विस्टार होने लगा और आकाश में नए सितारों की एक श्रिंखला चमक उठी।
10:45ब्रहमा ने पुनह ध्यान लगाया और उनके दक्षिन भाग से एक और तेजस्वी देवी का प्राकट्य हुआ।
10:53गरुड के पंकों की फड़फडाहट ने ब्रहमांड में एक नई उर्जा का संचार कर दिया, जिससे प्रजाप्तियों के लिए मार्ग
11:01प्रशस्थ हो गया।
11:02नई उर्जाओं के मेल से स्रिष्टी में भौतिक रूप लेने की प्रक्रिया का बीज अंकुरित होने लगा।
11:10स्रिष्टी की हर दिशा में गूंजती हुई वेदों की रिचाएं अब भौतिक पदार्थ का रूप लेने के लिए ततपर थी।
11:18ब्रह्मा ने प्रजाप्तियों का आहवान किया, जो अब तक अपने सुक्ष्म रूप में ब्रह्म लोग की सीमाओं पर प्रतीक्षा कर
11:25रहे थे।
11:27विश्णु ने ब्रह्मा को संकेट दिया कि अब समया गया है कि इन उर्जाओं को भौतिक बंधन में बांधा जाएं।
11:47प्रजवलित हो उठे जैसे स्रिष्टी किसी बड़े उत्सव की तयारी कर रही हो। प्रजाप्तियों की पत्नियों के रूप में इन
11:56शक्तियों ने अपना स्थान ग्रहन किया और स्रिष्टी का चक्र और भी द्रिढ हो गया।
12:01शिव का कैलाश परवत से ध्यान तूटा और उन्होंने अपनी त्रिटिय नेत्र की द्रिष्टी से इस नए निर्मान को आशिरवाद
12:10दिया।
12:11स्रिष्टी की नीमब अब केवल संकल्प नहीं बलकि प्रेम और कर्तव्य के मिलन का एक स्थाई आधार बन चुकी थी।
12:20ब्रह्मा ने गहरी सास ली क्योंकि आज उन्होंने वह कर दिखाया था जो कृष्ण के आशिरवाद के बिना असंभव था।
12:29ब्रह्मा के हृदय से एक दिव्य तेज का पुंज निकला जिसने ब्रह्मान्ड के रिक्त स्थान को सुनहरी आभा से भर
12:36दिया।
12:37उस दिव्य प्रकाश के बीच से दक्ष प्रजापती का प्रादुर्भाव हुआ, जिनके मुख पर संसार के विस्तार का कठोर संकल्प
12:45अनकित था।
12:46दक्ष के ठीक बगल में रिशी मरीची ने आकार लिया, जिनकी आखों में समस्त वेदों और नक्षत्रों का शांत ज्यान
12:54समाहित था।
12:57आकाश के विस्तार में एक दिव्य अगनी जागरत हुई, जिसने इन नवीन रचिताओं का अभिशेक किया।
13:04ब्रह्मा ने अपनी दाएं भुजा से दक्ष को निर्देशित किया कि वे प्रजा की वृध्धी हेतु धर्म और मर्यादा का
13:11मार्ग प्रशस्त करें।
13:13दक्ष ने मस्तक जुका कर पिता ब्रह्मा के आदेश को शिरोधार्य किया, उनका गौर्वपूर्ण व्यक्तित्व स्रिष्टी के भार को वेहन
13:21करने के लिए तैयार था।
13:24मरीची ने अपने तप के बल से समय के चक्र को गती प्रदान की, जिससे स्रिष्टी की जैविक विविधता का
13:31बीज बोया गया।
13:33ब्रह्मांड के शूने में सुक्ष्म कमपन हुआ, मानो प्रकृती स्वया अपना नया स्वरूप धारन करने के लिए प्रतीक्षारत हो।
13:42ब्रह्मा की आध्या पाकर दक्ष ने अपनी रचनात्मक ग्रिष्टी से प्रजाओं की प्रथम श्रेनी का आहवान किया।
13:50रिशी मरीची ने वेदों का मर्म समझाते हुए दक्ष को विवाह और वन्ष परमपराओं के विधान बताएं।
13:57दक्ष ने आकाश में नक्षत्रों को अपना स्थान ग्रहन करने का निर्देश दिया, जिससे ब्रह्मांड में दिशाओं का बोध हुआ।
14:06स्रिष्टी का यह नवोदय अब ब्रहमा के संकल्प और प्रजाप्ती के कारियों के मेल से एक ठोस आधार ले चुका
14:13था।
14:15विश्नु का ध्यान जो ब्रहमांड की रक्षा के लिए सदातत पर था, इस नए विकास पर स्थिर रहा।
14:21गरुर ने अपनी विशाल पंखों को फड़फडाया, जिससे स्वर्ग में एक शीतल और पवित्र वायू का संचार हुआ।
14:30ब्रहमा ने एक लंबी सांस ली और उस श्वास से अंगिनत सुक्षम जीव और वनस्पतियां अस्तित्व में आने लगी।
14:39यह स्रिष्टी अब केवल एक स्वपन नहीं, बलकि एक जीवन्त सत्य के रूप में विक्सित हो रही थी।
14:47दक्ष ने गर्व से ब्रहमा को प्रणाम किया, उनका मन अब सामराज्य विस्तार की योजनाओं में लीन था।
14:54मरीची ने मंद मुस्कान के साथ दक्ष के बढ़ते अभिमान को देखा, मानोवे भविष्य के किसी अनिष्ट का संकेत पाचुके
15:02हो।
15:04ब्रहमा की तपो भूमी पर एक दिव्य प्रकाश की वर्षा हुई, जिसने स्रिष्टी के इस नए युग का अभिशेक किया।
15:12प्रकृती के कनकन में अब ब्रहमा के संकल्प की गूँच थी और स्रिष्टी का चक्र अब रुकने वाला नहीं था।
15:20नारद ने अपनी वीना के तारों को छेडा और ब्रहमांड की सीमाओं को लांगते हुए पाताल लोग के अंधकार में
15:27प्रवेश द्वार की ओर बढ़ गए।
15:30श्रीहरी के तेज से दीप्त नारद को देख बैकुंट के द्वारपालों ने श्रद्धा पूर्वक मस्तक जुका कर उन्हें पाताल की
15:38ओर प्रस्थान की अनुमती दी।
15:41वीना की मधूर ध्वनी ने सुकरमुख के कठोर ग्रेनाइट पत्थरों में भी एक अग्यात स्पंदन पैदा कर दिया जहां वराहमुख
15:49वाले रक्षक पहरा दे रहे थे।
15:52अंधेरे और भारीपन से भरे उस लोक में नारत का आगमन एक ऐसी धवल जोती के समान था जिसने सदियों
15:59से जमे सन्नाटे को चीर दिया।
16:02नारत जैसे ही क्रिमिभोजन के दलदलीक शेत्रों में पहुँचे वहां की जहरीली गैसे भी उनके मंत्रों की गूंच से पवित्र
16:10होने लगी।
16:12भगवान विश्नु का स्मरण करते हुए देवर्शी ने उन पापी आत्माओं के कश्टों को दूर करने का संकल्प लिया जो
16:19इन निम्नलोकों में भटक रही थी।
16:23वीना के हर तार से निकली ध्वनीने कीरों और दुरगंध युक्त वाश्प को एक क्षण के लिए स्थिर कर दिया।
16:29मानो स्रिष्टी भी इस संगीत को सुन रही हो।
16:33यह द्रिष्य किसी भी सांसारिक नेत्र के लिए असहनिय था, क्योंकि जहां केवल वेदना थी, वहां अब करुणा की गंगा
16:41बह रही थी।
16:43देवर्शी अब अयाहपान के भीशन क्षेत्रों में थे, जहां पिघले हुए कांस्य के कड़ाहे दमक रहे थे और चिंगारिया चारों
16:52ओर उड़ रही थी।
16:53नारद ने अपनी आखे मूंदी और नारायन के उस नाम का उच्चारण किया, जिसने पिघले हुए लोहे की भीशन गर्मी
17:02को भी शीतल बना दिया।
17:03पिघले हुए धातु के कड़ाहे शांत होने लगे और वे रक्षक जो यातना के प्रतीक थे, नारद की और आश्चर्य
17:12से देखने लगे।
17:14अयापान की उस्तप्त भूमी पर अब पहली बार भक्ती का अमरित गिरा, जो किसी के भी अहंकार को पिघलाने में
17:22सक्षम था।
17:24नारद का मार्ग अब प्यूयोद की ओर मुडा, जहां सडी हुई गंध और घने राख के कोहरे ने रास्ता रोक
17:30रखा था।
17:31देवर्शी की उपस्थिती मात्र से ही उन कालकोठरियों में कैद आत्माओं को नारायन के स्मरण का बोध हुआ, जिससे उनकी
17:40पीडा कुछ कम हुई।
17:42वीना की जंकार एक रक्षक की तरहे उन आत्माओं के चारों और एक सुरक्षा कवच की भांती घूमने लगी, उन्हें
17:50अंधकार से मुक्ती का मार्ग दिखाती हुई।
17:54यह वहक्षन था जब पाताल की गहराई में भी सत्य की पहली लहर पहुँची और ब्रह्माण का संतुलन धीरे-धीरे
18:01बदलने लगा।
18:03अंत में नारद रौरव के भीशन नरक की दहलीज पर खड़े थे, जहां लोहे के खंभों पर अगनी के लप्टे
18:10दहाड रही थी।
18:11रौरव के रक्षक जो अपनी कठोर्ता के लिए विख्यात थे, नारद की शांती के सामने स्थब्ध होकर अपने स्थान पर
18:20जड़ हो गए।
18:22नारद ने जोर से नारायन का जयगोश किया, जिसकी प्रतिध्वनी रौरव की गहराईयों में किसी वजरपात के समान गुजगुठी।
18:31निचले लोकों का यह रुपांतरण मात्र एक शुरुवात थी, क्योंकि नारत का महा विद्रोह अब सीधे ब्रहमा के बनाए स्रिष्टी
18:39के विधान को चुनौती देने वाला था।
18:42ब्रहमा के मन से उत्पन प्रजापतियों की सभा ब्रहमलोक के स्वर्ण शिखरों पर सजी, जहां स्रिष्टी के विस्तार का महायग्य
18:50आरंभ होने जा रहा था।
18:53चतुर्मुख ब्रहमा ने अपने तपोबल से मरीची, अत्री, अंगिरा और पुलस्त्य जैसे तेजस्वी रिशियों का आहवान किया, जिनका तेज सूर्य
19:02के समान प्रकर था।
19:04नारद ने सभा के मध्य पहुँचकर अपनी वीना के जंकार से वातावर्ण में एक प्रशन खड़ा कर दिया, जिसने स्रिजन
19:12की प्रक्रिया को कुछ क्षणों के लिए रोक दिया।
19:15ब्रहमांड के इस महा सन्योजन में ब्रहमा ने पहली बार मैथुनी स्रिश्टी का विधान प्रस्तावित किया, जिसे सुनकर रिशियों की
19:24सभास तब ध्रह गई।
19:25दक्ष प्रजाप्ती का आगमन हुआ, जिनके मस्तक पर राजसी मुकुट और नेत्रों में संसार को वश्मे करने की तीवर लालसा
19:35स्पष्ट दिख रही थी।
19:37दक्ष ने ब्रहमा के चर्णों में जुककर स्रिश्टी के विस्तार हेतु अपनी सामर्थ्य और संकल्प को समर्पित करने का वचन
19:44दिया।
19:46नारद ने व्यंग्य करते हुए पूछा की क्या यह विवश्टा है या कोई नई विधा जिसने ब्रहमचर्य के मार्क को
19:53छोड़कर माया के जाल को चुन लिया है।
19:57ब्रहमा का तेज और अधिक प्रकर हो उठा जब उन्होंने नारत को समझाया की काल के चक्र को चलाने के
20:04लिए स्रिश्टी के निरंतर प्रवाह की आवश्शक्ता है।
20:09स्रिश्टी के इस प्रथम मिलन की वेदी पर अगनी के स्थान पर ब्रहमा के संकल्प की जवाला प्रजवलित हुई, जिसने
20:16दिशाओं को प्रकाशित कर दिया।
20:18दक्ष की संतानों के लिए ब्रहमा ने जिन स्त्रीपुरुष तत्वों का स्रिजन किया, वे मानवी रूप में स्वयन की आभा
20:26के साथ वहां प्रकट होने लगे
20:29नारद ने उन नववत्पन जीवात्माओं के नेत्रों में जाग कर देखा, जहां भविष्य की जटिलताओं और माया के बंधन का
20:37बीज पहले ही अंकुरत हो चुका था
20:40ब्रहमांड का यह सात्वा चरण पूल्ण हुआ, जहां मन की उत्पत्ती अब देह की उत्पत्ती में रुपांतरित हो रही थी,
20:48जिससे काल का नया युग प्रारंभ हुआ
20:51दक्ष प्रजापती ने अपने अधिकार को स्वीकारते हुए पहली बार स्रिष्टी के मान्चित्र को अपनी द्रिष्टी से मापा और उसके
20:59मन में महत्वा कांख्षा ने जन्म लिया
21:03ब्रह्मा के मुख से निकले मंत्रों ने उस स्थान को पवित्र कर दिया, जहां अब जीव और जीव का मिलन
21:09एक नए बंधन की नीम रखने वाला था
21:13नारद ने मौन धारण किया, किन्तु उनकी वीना के तारों में अब भी विद्रोह की वह गूंज बाकी थी जो
21:20ब्रह्मा के विधान को चुनौती दे सकती थी
21:24ब्रह्मा के इस निर्णय ने वैकुंठ के प्रभू के रहस्यमय मुस्कुराते हुए मुख को और भी अधिक गंभीर बना दिया,
21:31क्योंकि वे जानते थे कि अब क्या घटने वाला है
21:36प्रजाप्तियों के मध्य एक अद्रिश्य रेखा खिंच गई, जहां कुछ ने ब्रह्मा का मार्ग चुना और कुछ नारत के वैराग्य
21:43की ओर मुढने का साहस कर रहे थे
21:46दक्ष प्रजाप्ति के पच्चहनों से ब्रह्म लोग की स्वर्णिम भूमी पर जैसे कोई नया भार पड़ गया, जिसका अर्थ स्रिष्टी
21:54का विस्तार और उसका बोज दोनों था
21:58आकाश में नक्षत्रों ने अपनी चाल बदल ली, जैसे ही ब्रह्मा ने अपनी इस नई स्रिजन योजना पर अंतिन मुहर
22:05लगा दी, जिसे ब्रह्मांड के इतिहास में युग परिवर्तन कहा गया
22:10नारद ने सभा से प्रस्थान किया, उनके जाते ही ब्रह्म लोग की स्वर्ण आभा और अधिक प्रखर हो गई, किन्तु
22:17भविष्य के गर्भ में एक भारी संकट पलने लगा था
22:22ब्रह्म लोग की स्वर्ण शिलाओं पर माया के सुक्ष्मकन अब कोहरे की भांती फैलने लगे हैं, जिससे स्रिष्टी के कंकन
22:29में मोह का प्रथम बीज अंकुरित हो रहा है
22:34शीरसागर के तटपर शेशनाग की शयापर विराजमान भगवान विष्णु ने अपनी कमलन्यन खोल कर माया के इस विस्तार को देखा
22:42और मंद मुस्कान के साथ चक्र को संकेत दिया
22:46विष्णु के ध्यान केंद्रिप करते ही, माया के धागों ने ब्रहमा के स्रिजित जीवों के हृदय में अहं और मं
22:53की नई ग्रंथियां बनानी आरंभ कर दी
22:57वातावर्ण में एक रहस्यमई गूंच तैरने लगी, मानो ब्रहमांड स्वया अपनी ही बनाई हुई माया की बेडियों के बजने का
23:05संगीत सुन रहा हो
23:07ब्रहमा के मानस पुत्रों के त्याग के बाद माया ने अब दक्ष प्रजापती के मन में संसार को बसाने की
23:14तीवर और अदमय लालसा का संचार किया
23:18दक्ष प्रजाप्ती ने अपने राजसी वस्त्रों को और अधिक सुसज्जित किया
23:22जैसे माया का प्रभाव उनके अहंकार को एक उचे स्वर्ण सिनहासन पर आसीन कर रहा हो
23:30जैसे ही उन्होंने प्रजा के विस्तार का संकल्प लिया
23:33उनके चारों और सुक्षम मायावी प्रतिबिन्बों का एक चक्र निर्मित हो गया
23:38जो उन्हें भ्रम्मे रखने के लिए परियाप्त था
23:42स्वर्ण महल की दीवारों पर माया की छायाएं निरित्य करने लगी
23:46जिससे ब्रहम लोग का नैसर्गिक प्रकाश थोड़ा धुंधला और मोहक हो गया
23:52स्रिष्टी के विस्तार के इस मोर पर ब्रहमांड के नियंता ब्रहमा का मन भी पहली बार माया की इन तरगों
23:59से विचलित हुआ प्रतीत होता था
24:02भगवान शिव ने कैलाश की उचाईयों से अपनी तीसरी आख को हल्का सा सिकोड़ा जैसे वे इस मायावी खेल की
24:09विद्रोही संभावनाओं को पहले ही भांप चुके हो
24:14कैलाश के हिमशिखर पर जमी बर्फ माया के प्रहार से कामपने लगी मानो प्रकृती स्वयें इस आने वाले मोह के
24:21चक्र को नकार रही हो
24:24वातावर्ण में एक शीतलता का प्रसार हुआ जो शिव के वैराग्य और माया के मायावी प्रभाव के बीच एक मौन
24:31युद्ध का संकेत था
24:34इधर ब्रहम लोक में नारद के रिक्ट स्थान को भरने के लिए ब्रहमा ने अब अन्यमानस पुत्रों को जन्म देने
24:41का निर्णय लिया जो माया के नियमों का पालन करेंगे
24:45ब्रहमा के चिंतन की अगनी से नए प्रजाप्तियों की उत्पत्ती हुई जिनके भीतर संसार के मोह और पालन का गहरा
24:53संस्कार अनकित था
24:55इन नए जीवों के हृदय में माया का प्रभाव इतना प्रबल था कि उन्होंने जन्म लेते ही सांसारिक उत्तरदायत्वों को
25:03स्विकार कर लिया
25:05ब्रहम लोग की शोभा इन नए वंश्जों के आने से बढ़ गई किन्तु सत्य का वह प्रखर प्रकाश जो पहले
25:12था अब माया के सुन्हरे आवर्ण में छित गया
25:16माया की शक्ती इतनी व्यापक थी कि स्वयं ब्रहम लोग के आकाश का रंग भी अब शुद्ध श्वेच से बदल
25:23कर एक मखमली सुन्हरे रंग में ढल चुका था
25:27गरुर के पंखों की फड़फडाहट ने इस सुन्हरे आकाश में एक ऐसी तरंग उत्पन की जिससे माया का प्रभाव थोड़ा
25:35और प्रगाड हो गया
25:37गरुर के उड़ान के साथ ही सृष्टी के विस्तार का कार्य और तीवर गती से आगे बढ़ा और अब माया
25:44के बंधन और भी मजबूत होने लगे
25:48ब्रहमांड के इस युग परिवर्तन के मोर पर माया अब पूर्णता स्थापित हो चुकी थी जो भविश्य के महासंग्राम की
25:55आधारशिला बन गई
25:58ब्रहमा ने स्वयं को शूने के विस्तार में पाया जहां स्रिजन का भार उनकी चेतना को कमपित करने लगा था
26:06अपनी चार भुजाओं को जोड कर उन्होंने परमेश्वर की स्तुती में अपने नेत्र बंद किये ताकी ब्रहमांडिय संतुलन बना रहे
26:15ब्रहमा ने मंत्रों का उच्चार किया जिससे अंतरिक्ष में 33 स्वर्ण बिंदुए एक लैबध धनरित्य करने लगी
26:23उनकी प्रार्थना का तेज एक स्वर्णिम प्रकाश स्तंभ बनकर बैकुंठ के द्वार तक जा पहुँचा
26:30बैकुंठ की स्वर्णमनियों के बीच भगवान विश्णु अपनी अनंत शेश शया पर एक दिव्य मुस्कान के साथ उठे
26:39महा विश्णु ने गरुड को संकेत दिया जिसके पंखों की फड़फडाहट से बैकुंठ में सुखद लहरें उत्पन हुई
26:47विश्णु का विराट स्वरूप बैकुंठ के स्वर्ण आकाश को अपने दिव्य नीले प्रकाश से भर रहा था
26:54पूरे ब्रहमांड में उस समय एक अद्भुत शान्ती का संचार हुआ जैसे समय स्वय ठम गया हो
27:02ब्रहमा को अपने ध्यान में साक्षात श्री कृष्ण की निराकार सत्ता का अनुभव होने लगा
27:09भगवान ने ब्रहमा के हृदय में अपनी करुणा का अमरित प्रवाहित कर दिया ताकि स्रिजन का कार्य निर्बाध रहे
27:17स्रिजन के लिए आवश्यक दिव्य उर्जा का स्रोत अब स्वयन श्रीहरी के वर्दान से सिंचित हो गया
27:24पूरे आकाश में नक्षत्रों और ग्रहों का निर्मान एक व्यवस्थित संगीत के समान होने लगा
27:31विश्नु के संकेतों पर ब्रहमा ने अपनी आखें खोली जिन में अब अनंत स्रिष्टी की स्पष्टता थी
27:39ब्रहमा ने पुन्ह अपनी साधना में विलीन होकर स्रिजन की नई लहरों को दिशा दी
27:46बैकुंड से निकली वह दिव्यत अरंगें पूरे ब्रहमांड की नसंस में प्रवाहित होने लगी
27:53भगवान विश्णु ने अपनी सुदर्शन चक्र को एक हलकी सी गती दी जिससे समय का चक्र गती मान हुआ
28:01स्रिश्टी के माया जाल को अब एक नया बल मिला जिसे कोई भी देव या दानव भेद नहीं सकता था
28:09ब्रहमा ने मुस्कुराते हुए इस महा विस्तार की रचना को अपनी तपस्या का फल्माना
28:15ब्रहमांड की हर इकाई अब विश्णु की शक्ती से संचालित होने के लिए ततपर थी
28:22स्रिजन का कार्य सफल रहा और ब्रहमांड का पहिया एक नए युग की ओर चल पड़ा
28:28ब्रहमांड के विस्तार के साथ ही शूने में पहली बार नक्षतरों की गूंज एक दिव्य संगीत के रूप में सुनाई
28:36दी
28:37विश्णु ने अपनी मुस्कान बिखेरते हुए गरूर को संकेत दिया कि अब संदेश वाहक के रूप में नारत का समया
28:44गया है
28:46नारत ने अपनी वीना के तारों को छेडा और ब्रहमांड के हर कोने में भक्ती की प्रथम ध्वनी प्रवाहित हो
28:53गई
28:55ब्रहमांड की विशालता में नारत की उपस्थिती एक जलते हुए नक्षत्र के समान प्रकाशमान हो उठी
29:03ब्रहमा ने देखा कि संसार की गती अब स्वय संचालित होने के लिए तैयार हो चुकी है
29:10स्रिष्टी के इस नए चरण में ब्रहमा के मन में भविश्य के उन रहस्यों का आभास हुआ जो अभी गर्भ
29:17में थे
29:18नारत ने अपनी वीना के माध्यम से साथ लोकों के बीच एक अद्रिश सेतु का निर्मान किया
29:26ब्रहमान्ड के हर पर्मानु में अब विश्णू की शक्ती का स्पंदन एक लैबध धड़कन बन चुका था
29:33ब्रहमा ने एक लंबी सांस ली और स्रिष्टी के आधार स्तंभों को मजबूती से स्थापित किया
29:40विश्णू ने नारद की ओर देखते हुए कहा कि अब सत्य के गुप्त रहसियों का समय निकट है
29:48नारद ने वीना का तार और जोर से खीचा जिससे ब्रहमान्ड के रहसियों की एक अलोकिक गुंच सुनाई दी
29:56पूरे अंतरिक्ष में भक्ती का एक ऐसा आवर्ण छा गया जिसने स्रिजन के कारियों को एक पवित्रता प्रदान की
30:04ब्रहमा का मन अब नई चुनाउतियों के लिए तयार था क्योंकि उन्होंने भविश्य की धुन्धली परचाईयों को देखा
30:12विश्नु की आग्या पाकर नारद ने अपनी यात्रा का शुभारंब सितारों के उस्पार कर दिया
30:19नारद का स्वर अब उन रहसियों को खोलने लगा था जो इतने समय से ब्रहमांड के गर्भ में सोय हुए
30:26थे
30:27पूरे वैभव के साथ आकाश गंगाएं एक नई दिशा में घूमने लगी जैसे वे नारद के सुर्पर निर्ट्य कर रही
30:35हो
30:36ब्रहमा ने मुस्कुराते हुए इस महाविस्तार की रचना को अपनी तपस्या का पूर्ण परिनाम माना
30:44ब्रहमांड की हर इकाई अब विश्नो की शक्ती से संचालित होने के लिए पूरी तरह तत्पर थी
30:51स्रिजन का कार्य पूर्णता की ओर था और ब्रहमांड का पहिया एक नए युग की गती को प्राप्त कर चुका
30:58था
30:59नारत सितारों के बीच एक मशाल बनकर आगे निकल गए यह जानते हुए कि अब महाविद्रोह का समया आने वाला
31:07है

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