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ब्रह्मवैवर्त पुराण के अध्याय 3 में जानिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या और सृष्टि के पहले विद्रोह की अनसुनी कथा! जब भगवान श्रीकृष्ण के आदेश पर ब्रह्मा जी ने मानस पुत्रों का सृजन किया, तब सनत्कुमारों और देवर्षि नारद ने सृष्टि विस्तार से इनकार क्यों किया? पिता और पुत्र के बीच हुआ वह कौन सा भीषण संवाद था जिसने ब्रह्मा जी को अत्यंत क्रोधित कर दिया और उन्होंने अपने ही प्रिय पुत्र नारद को एक ऐसा श्राप दिया जिसने तीनों लोकों को हिलाकर रख दिया? देखिए सृष्टि रचना, रुद्र का प्राकट्य, और देवर्षि नारद के श्राप का महा-रहस्य।

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Transcript
00:00ब्रह्मा के नेत्रों में अपने पुत्र के लिए जो वादसल्य था, वह स्रिष्टी के स्रिजन के गौरव और आने वाले
00:06उत्तरदायत्व का मिश्रित भाव था।
00:10विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ अपने हृदय की धड़कन में नारत के संगीत को स्विकार किया, जैसे वे स्वय
00:17उस संगीत के माध्यम से स्रिष्टी का भाग्य लिख रहे हूं।
00:22नारत की वीना से निकले सुर अब ब्रहमांड की सीमाओं को लांध कर उन गुह्य रहसियों को उजागर करने लगे
00:29थे, जिन्हें स्वयंकाल ने भी छुपा रखा था।
00:33आकाश में सितारे जैसे थिरकने लगे और उस संगीत की लएने शूनि में व्याप्त समस्थ उर्जाओं को एक सूत्र में
00:40पिरोना आरंभ कर दिया।
00:43ब्रह्मा के मानस पुत्र के रूप में नारद की उपस्थिती ने स्रिष्टी को वह वानी दी, जिसके बिना समस्थ जीव
00:50केवल मूख साक्षी बनकर रह जाते।
00:54देवर्शी नारद ने अपनी आखों को बंद किया और विश्णु के चर्णों का ध्यान धरते हुए एक ऐसा स्वर अलापा,
01:01जिसने काल के चक्र को भी कुछ क्षणों के लिए रोक दिया।
01:06उस महान दिव्य स्वर के कमपन से वैकुंठ के स्वर्ण कमल और भी अधिक चमक उठे, मानो वे भी उस
01:13संगीत का आनंद ले रहे हो।
01:15स्रिष्टी के इस प्रारंभिक उत्सव में, नारद के स्वर ने प्रथमबार नारायन नाम की वह गूंज उत्पन्न की, जिसने संपून
01:24ब्रहमांड को एक नया उत्देश दिया।
01:27ब्रहमा की वह द्रिष्टी अब नारद के भविश्य की जटिलताओं को देख पा रही थी, जहां उन्हें देव और दानव
01:35दोनों के मध्य सेतु बनना था।
01:38नारद ने धीरे से अपनी वीना नीचे की और ब्रहमा के सम्मुख नत्मस्तक होकर ज्यान की उस पहली दीक्षा को
01:45स्विकार किया।
01:47उनके हृदय में अब एक ऐसी तड़क थी, जो केवल भक्ती और सेवा के माध्यम से ही त्रिप्थ होने वाली
01:54थी, जो उन्हें एक साधारन मुनी से देवर्शी बनाने वाली थी।
01:59वैकुंठ का वह शांत वातावर्ण अब किसी गहन परिवर्तन की आहट से गूझ रहा था, जैसे कोई बड़ा अध्याय आरंभ
02:07होने को हो।
02:09नारद की यह चेतना केवल एक मुनी की नहीं थी, बलकि यह संपूर्ण ब्रहमांड के चेतना का एक छोटा और
02:17सुन्दर अंश थी।
02:19ब्रहमां ने नारद को आशिरवाद देते हुए कहा कि तुम्हारी वानी ही इस स्रिष्टी के लिए धर्म और कर्म का
02:26मार्ग दिखाएगी।
02:28संगीत, भक्ती और बुद्धी का त्रिवेनी संगम नारद के रूप में अब पूर्ण था प्रस्पुटित हो चुका था, जिसे काल
02:35भी कभी मिटा नहीं सकेगा।
02:38स्रिष्टी के पहिये ने अपनी गती तेज कर दी और नारद अपने उसी संगीत को लेकर अब अनन्त यात्रा पर
02:45निकलने को तक पर थे।
02:48ब्रहमाजी ने अपनी चतुर्भुज काया से उठकर स्रिष्टी के विस्तार हेतु नारत को ग्रिहस्थ जीवन की मर्यादा स्विकार करने का
02:56आदेश दिया
02:58पिता के मुख से निकले सांसारिक उत्तरदायत्व के शब्दों को सुनकर नारत का हृदय एक क्षण के लिए स्तब्ध रह
03:05गया
03:07नारत ने विनमरता पूर्वक सिर जुका कर अपने भीतर की उस अगनी को प्रकट किया जो केवल कृष्ण प्रेम में
03:14जलती थी
03:16संपूर्ण ब्रहमांड के उस भव्य दर्बार में स्वर्ण में आभा और गेहन सन्नाटा नारत के मौन से थर्रा उठा
03:24ब्रहमाजी ने अपनी गूंजती हुई वानी में कहा कि स्रिष्टी की रचना और प्रजा का स्रिजन तुम्हारा परम कर्तव्य है
03:33विष्णू स्वरूप ब्रहमा के इन आदेशों ने नारत की चेतना को जैसे एक कठिन परीक्षा के घेरे में डाल दिया
03:41नारत ने अपनी वीना के तारों को छुआ जिससे निकलने वाला स्वर श्री कृष्ण की प्रेमधुन में विलीन हो गया
03:49स्वर्ण महल की दीवारों पर नारत की भक्ती का प्रतिविंग एक दिव्य प्रकाश के रूप में उभरने लगा
03:57ब्रहमा ने पुनय गर्जना की की यदि तुमने मेरी आग्या नहीं मानी तो यह स्रिष्टी अपनी गती खो देगी
04:05नारत का चहरा धीर गंभीर था उन्होंने कहा कि हे पिता मेरी आत्मा के लिए संसार के बंधन बेडिया मात
04:12रहें
04:14नारत के तरकों को सुनकर ब्रहमा के चहरे पर क्रोध के स्थान पर एक अनिश्चित्ता का भाव जन्म लेने लगा
04:22आकाश के दिव्यरतों और देवताओं के आगमन से सभा में एक विचित्र हल्चल और उच्सुकता व्याप्त हो गई
04:31ब्रहमा जी ने अपना हाथ उठा कर ब्रहमांड के विस्तार का संकेत दिया परंतु नारत का ध्यान केवल श्री कृष्न
04:38की लीलाओं पर था
04:41देवर्शी ने अपनी वीना के तारों से ऐसा राग छेड़ा जिससे ब्रहम लोग का वातावर्ण भी भाव विभोर हो उठा
04:49वीना की ध्वनी का कमपन ब्रहमा जी के क्रोध को कम कर रहा था किन्तु उनका आदेश अभी भी अटल
04:56था
04:58दिव्यवातावर्ण में एक ऐसी मौन गूंज उठी जो स्रिष्टी के रचिता और भक्त के बीच की दूरी को और बढ़ा
05:04रही थी
05:06ब्रहमा जी ने फिर कहा कि यदि तुम ग्रिहस्थ नहीं बनोगे तो यह चराचर जगत अपनी सार्थकता खो देगा
05:14नारद ने उठकर अपने नेत्रों को बंद कर लिया और क्रिष्ण के स्वरूप का आहवान किया जो उनके रोम्रोम में
05:21व्याप्थ था
05:23उनके अंतर्मन में कृष्ण की छवी और सामने ब्रहमा का विराठ व्यक्तित्व नारद के लिए धर्मसंकट की पराकाश था थी
05:32ब्रहमा की दृष्टी में वह श्राप का बीज पर रहा था जो नारद को हमेशा के लिए घुमन्तु बना देने
05:39वाला था
05:40ब्रह्मा की सभा में अचानक सन्नाटा चा गया जब नारद ने अपनी वीना एक ओर रखकर पिता की आखों में
05:48सीधे देखते हुए प्रश्न उठाने का साहस किया
05:52नारद की वानी में वह तल्ख सच्चाई थी जिसने ब्रह्मा के निर्मान के अहंकार को भीतर तक जखजोर कर रख
05:59दिया
06:00नारद ने अपनी तरजनी उठाते हुए कहा कि संसार की यह माया केवल आत्माओं को बंधन में डालने का एक
06:08क्रूर जाल है
06:10ब्रह्मा के भव्य महल के खमभ़ों में गुंजति नारद की आवाज ने सृष्टी के नियमों पर एक गहरा प्रहार किया
06:18नारद ने स्पश्ट किया कि प्रजापती की संताने केवल मोह के सागर में डूगने के लिए नहीं जन्मी है बलकि
06:25मुक्त होने के लिए है
06:28ब्रहमा का क्रोध उनके चार मुखों पर लालिमा के रूप में उभरने लगा, क्योंकि उनका पित्रित्व आज चुनौती के कटखरे
06:36में खड़ा था
06:38नारद की तर्कपूर्ण बातों ने संसारी सुखों की मिथ्या व्याख्या को ब्रहमा के सामने एक सत्य के दर्पन की तरह
06:45रख दिया
06:47महल के स्वर्ण कल्षों से परावर्तित होती दिव्य आभा ने नारद के उस ओजस्वी भाशन को और भी प्रभावशाली बना
06:55दिया
06:56नारद ने कहा कि पिता का प्रेम यदी मोह का कारण बन जाएं तो वह संतानों के आध्यात्मिक मोक्ष में
07:03सबसे बड़ी बाधा है
07:06ब्रहमा की द्रिष्टी में अब प्रेम का स्थान उस कठोर अनुशासन ने ले लिया जो किसी भी विद्रोही को वश्मे
07:13करने के लिए आवश्चक था
07:16नारत के शब्द तीर की भांती ब्रहमा की उस धार्ना को भेद रहे थे जिसने संसार को केवल उत्पत्ती के
07:23केंद्र के रूप में रचा था
07:25पूरे ब्रहमांडिय महल के वातावर्ण में एक विचित्र कमपन होने लगा जैसे नारत के सत्य ने प्रकृती के नियमों को
07:33जगजोर दिया हो
07:35ब्रहमा ने अपनी दाई भुजा उठाई और एक क्षण के लिए उस दिव्य मौन को धारन किया जो किसी बड़े
07:43निर्नाय का संकेत था
07:45नारद अडिग रहे उन्होंने अपने जीवन को उसक्षन समर्पित कर दिया था जहां भौतिक पिता से उपर उनका आध्यात्मिक धर्म
07:53था
07:55ब्रहमा की सभा में बैठे अन्य देवगन भी इस अध्भुत समवाद को सुनकर स्तब्ध रह गए क्योंकि आज एक पुत्र
08:03पिता को सत्य का पाठ पढ़ा रहा था
08:06महल की स्वर्ण दिवारों पर अनकित मंत्रों की पंक्तिया भी आज इस विवाद को सुनकर मानो सजीव हो उठी थी
08:14ब्रहमा ने धीरे से अपना मुख नारत की ओर घुमाया उनकी आखों में वह तेज था जिसने युगो युगो से
08:21स्रिष्टी का निर्मान किया था
08:24माया की व्याख्या करते हुए नारत ने कहा कि जो सुख क्षनिक है वह वास्तव में आत्मा के लिए सबसे
08:32बड़ा बंधन है
08:34पिता और पुत्र के बीच का यह वैचारिक संधर्ष अब उस चरम बिंदु पर पहुँच चुका था जहां से वापसी
08:41संभव नहीं थी
08:43ब्रह्मा ने गहरी सांस ली और उनका मुख अब श्राप देने के लिए तैयार हो गया था क्योंकि उन्होंने नारत
08:51के अहंकार में शिश्य का पतन देख लिया था
08:54ब्रह्मा का क्रोध सत्यलोक की सीमाओं को पार कर अंतरिक्ष में गूंजने लगा और उनके चारों मुखों से जलती हुई
09:02ज्वालाय प्रस्फुटित होने लगी
09:05ब्रह्मा के इस रौद्र रूप को देख कर देवर्शी नारत का हरिदय काम उठा किन्तु उनकी बुद्धी अभी भी अपने
09:12पिता के निर्णय को चुनौती दे रही थी
09:16शुन्य में गूंजती हुई ब्रह्मा की वजर जैसी आवाज ने नारत को संबोधित करते हुए कहा कि ज्ञान का अहंकार
09:23ही अज्ञानी का सबसे बड़ा पतन है
09:27ब्रह्मा के चार हाथों से दिव्य उर्जा का संचार हुआ और उन्होंने अपनी उंगली से एक शापित रेखा खीचते हुए
09:35नारत को संसार की ओर धकेल दिया
09:38देवर्शी नारत की दिव्य देह से उनका स्वर्गिये तेज धीरे-धीरे फीका पड़ने लगा मानों वे किसी भारी कर्म के
09:46बोच तले दब रहे हुँ
09:48विश्नु भगवान ने आकाश से इस द्रिश्य को देखा और करुणा से भर गए परन्तु उन्होंने ब्रह्मा के विधान में
09:56हस्तक्षेप करना उचित नहीं समझा
09:59ब्रह्मा ने अपनी दाई भुजा उठाई और आकाश्वानी करते हुए घोशना की की नारत को अब गंधर्व लोक में राग
10:07और अनुराग की बेडियों में बंधना होगा
10:10श्राप के प्रभाव से देवर्शी नारत के वीना के स्वर अब भक्ती से हटकर लौकिक प्रेम और संगीत की लहरियों
10:18में बदलने लगे थे
10:20ब्रहमा का श्राप एक अटूट जंजीर बन गया जो नारत को ब्रहम लोक से नीचे गिरा कर संसार की क्षणभंगुर
10:27माया के केंद्र में ले गया
10:30देवी सरस्वती ने भी ब्रहमा के क्रोध को शांत करने का प्रयास किया लेकिन उसक्षण समय का चक्र अपनी गती
10:38बदल चुका था
10:40नारत का आत्मग्यान अब उस संसार के आकर्शन में उलज गया था जहा प्रेम और विरह ही संगीत का एक
10:47मात्र आधार बन गये थे
10:50यह श्राप मात्र एक गंड नहीं था बलकि वह कर्मक्ती थी जिसके माध्यम से नारत को भक्ती के नए स्वरूपों
10:58का अनुभव करना था
11:00गंधर्व लोक के मधुर वाध्य यंत्रों की गूंज ब्रह्मा की सभा में सुनाई देने लगी मानो नारत के आगामी जन्म
11:08की तयारी हो रही हो
11:10ब्रह्मा का मुख अब शान्त हो गया था लेकिन उनकी आखों में वह स्थिर वैराग्य था जो नारत के भविश्य
11:17को पहले ही देख चुका था
11:20नारत का शरीर धीरे धीरे उस लोक से उज़ल होने लगा उनके हाथ में अब भी वीना थी जो अब
11:27भी दैविय संगीत बिखेर रही थी
11:30दिव्य सभा के देवतागन इस अभूत पूर्व द्रिश्य को देख स्तब्ध थे क्योंकि उन्होंने पहली बार ब्रह्मा के मुख से
11:38इतना कठोर आदेश सुना था
11:41श्राप की उर्जा ने नारद के चारों और एक सुरक्षा कवच बना दिया था जो उन्हें सांसारिक राग के बीच
11:48भी भक्ती से जोड़े रखने वाला था
11:51नारद ने जाते-जाते ब्रह्मा को प्रणाम किया उनका मौन स्विकारोक्ती का प्रतीक था कि पिता का श्राप ही उनका
11:59नयामार्ग है
12:01ब्रह्मा लोग की स्वर्ण में आभा नारत के पीछे छूट गई और एक नयायाम का द्वार उनके लिए धीरे-धीरे
12:09खुलने लगा
12:09इस प्रकार एक महान रिशिवर का सांसारिक यात्रा का आरंभ हुआ जहां संगीत ही उनकी प्रार्थना और प्रेम ही उनकी
12:19भक्ती बन गया

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