इस एपिसोड में जानिए कैसे गंधर्वराज उपबर्हण ने अपनी विलासिता के कारण अप्सराओं के नृत्य में अपनी सुध-बुध खो दी और कैसे उन्हें ब्रह्मा जी के गणों द्वारा भीषण श्राप का सामना करना पड़ा। क्या नारद का अंश अपनी भक्ति को पुनः प्राप्त कर पाएगा? ब्रह्मवैवर्त पुराण के रहस्यों को जानने के लिए देखें यह पूरा वीडियो। #BrahmavaivartaPurana #NaradaMuni #Mythology #SanatanDharma #Upabarhana #SpiritualMystery #HindiMythology
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00:00गंधर्व लोग के वैभवशाली प्रांगण में उपबरहन अपनी विलासिता के मद में चूर होकर एक दिव्य उत्सव का आयोजन कर
00:08रहा है।
00:09भगवान विश्नु बैकुंट के अपने परमधाम से इस मायावी मोह को देख कर चिंतित हो रहे हैं।
00:17उपबरहन मदिरा और संगीत की मधोशी में अपनी पत्नी मालवती के साथ सिनहासन पर विराजमान होकर नृत्य का आनंद ले
00:26रहा है।
00:28स्वर्ण महल की दिवारों पर लगी दिव्य मनिया नृत्य करती अपसराओं के प्रतिबिंद को और भी अधिक मोहक बना रही
00:35हैं।
00:37गंधर्वों की सभा में गूझता मधोर संगीत उपबरहन के हृदय से क्रिश्न भक्ती के स्थान को धीरे-धीरे मिटा रहा
00:45है।
00:47देवर्शी नारत का वह तेजस्वी अंश उपबरहन अपनी इंद्रियों के वशी भूत होकर करतवय का विस्मरण कर बैठा है।
00:56महल के प्रांगण में सुगंधित पुष्पों की वर्शा हो रही है, जिससे वातावर्ण में मादक्ता का संचार बढ़ता जा रहा
01:03है।
01:05आकाश में तैरते हुए गंधर्व लोग के शिखर मानो साक्षात स्वर्ग की विलासिता को चुनौती दे रहे हूं।
01:13उपबर्हन अपनी विलासी जीवनशैली में इतना खोया है कि उसे कालों के काल की आहट भी सुनाई नहीं दे रही।
01:22गरुर देव भी उचे आसमान से गंधर्व लोग की इस विडंबना को देख कर अपनी आखे फेर रहे हैं।
01:31मालवती की सुन्दर्ता और उसके श्रिंगार का मोह उपबर्हन के विवेक पर एक गहरा काला परदा डाल रहा है।
01:39दर्बार की चमक धमक में फंसा उपबर्हन अब नारायन के नाम का स्मरण तक करना भूल गया है।
01:47पूरी गंधर्व नगरी में एक कृत्रिम उल्लास का वातावर्ण है जो सत्य के प्रकाश को ढकने का प्रयास कर रहा
01:54है।
01:56विश्नु का शांत स्वरूप इस मिथ्या वैभव के पतन की प्रतीक्षा में द्रिट बना हुआ है।
02:03उपबरहन का अहंकार अब इतना बढ़ चुका है कि वह स्वया को देवताओं से भी श्रिष्ट समझने लगा है।
02:11महल के स्वर्ण स्तंभों पर अनकित गंधर्व गाथाए अब केवल वैभव का प्रतीक बनकर रह गई हैं।
02:19गंधर्व लोग के बगीचों में खिले दिव्य पुष्प भी अब उपबरहन की विलासिता के साक्षी बन रहे हैं।
02:27स्वया भगवान की प्रेणा से अब परिस्थितिया बदलने के संकेट मिलने लगे हैं।
02:34उपबरहन के विलासी महल के चारों और का वातावर्ण अब एक शांत तूफान की चेतावनी दे रहा है।
02:43नारत का वह अंश अपनी अध्यानता की पराकाश्था पर खड़ा होकर विनाश को आमंतरन दे रहा है।
02:50ब्रहमा की सभा में गूंजते वेद मंतरों के बीच उपबरहन की इंद्रिया नर्तकियों के मादक निरित्य की ओर भटकने लगी
02:58हैं।
03:00भगवान विश्नु का दिव्य स्वरूप अपने आसन से देखते हुए उपबरहन की गिर्ती चेतना पर मौन चिंता व्यक्त कर रहा
03:08है।
03:09उपबरहन की आखें अब मंतरों की पवित्रता को छोड़ कर नर्तकी के घुंधरूँ की जंकार में खो चुकी हैं।
03:18वातावर्ण में संगीत का स्वर तेज होता जा रहा है और कर्तव्य का बोध धीरे-धीरे धुंधला पड़ रहा है।
03:27नर्तकीयों की देह्यश्टी और उनके आभूशनों की चमक ने उपबरहन की बुद्धी को पूरी तरह से मतिभ्रम में डाल दिया
03:34है।
03:36गरुर देव भी उपबरहन की इस दैनिय स्थिती को देख कर अपनी विशाल पंखों को सिकोड कर भगवान की आज्या
03:43की प्रतीक्षा में है।
03:46नर्तकी की प्रक्तेक मुद्रा उपबरहन के हृदय में कामवासना की अगनी को और अधिक प्रजवलित कर रही है।
03:55चारो और व्याप्त दिव्य सुगंध और फूलों की वर्षा भी अब उपबरहन को मोक्ष की ओर नहीं, बलकी मोह की
04:02ओर ले जा रही है।
04:05महल के स्वर्ण स्तंभों पर पड़ती प्रकाश की किरने उपबरहन के अंतर्मन में चल रहे संधर्ष को और गहरा करती
04:12है।
04:14भगवान विश्णु के साथ बैठे हुए देवता भी इस द्रिश्य को देखकर स्तब्ध हैं कि एक रिशी का अंश ऐसा
04:21आचर्ण कैसे कर सकता है।
04:25उपबरहन अपने ही विचारों के चक्रव्यूह में फंसकर अब सुधबुध खोकर नर्तकी की ओर बढ़ने का साहस कर रहा है।
04:34दिव्य सभा के भीतर उपबरहन की यह मूर्खता एक काले बादल की भांती फैलती जा रही है।
04:41स्वर्ग की नर्तकिया भी उसकी इस आसकती को देख कर आपस में मंदमंद मुस्कुरा रही है।
04:49भगवान विश्नों के मुख पर एक गंभीर मौन है जो आने वाले भारी संकट की पूर्व सूचना सा प्रतीत हो
04:56रहा है।
04:58उपबरहन ने अपना वह माला का जब छोड़ दिया है जिसे वह अपने साथ रखा करता था।
05:06ब्रहमांड की शांती अब केवल उपबरहन के उस पतन की प्रतीक्षा में थमी हुई सी लग रही है।
05:13महल का हर कोना अब विलासिता के रंग में डूबा हुआ है, जैसे उपबरहन के पतन का उत्सव मनाया जा
05:20रहा हो।
05:22रिशी नारद का वह अंश जो स्वय भक्ती का मार्क गर्शक था, आज स्वय ही भटक गया है।
05:29नर्तकी के घुंधरूओं की ध्वनी अब उपबरहन के मस्तिश्क में वेद मंत्रों की ध्वनी को पूर्णत्या मिटा चुकी है।
05:38इतिहास का वह काला अध्याय लिखने के लिए नियती ने उपबरहन को इस मायावी चक्र में पूरी तरह जकड लिया
05:45है।
05:46ब्रहमाजी के पार्षदों का दल स्वर्गलोग की स्वर्ण में सीमाओं को लांग कर उपबरहन के वैभवशाली महल के समक्ष जा
05:55पहुँचा।
05:56पार्षदों की तेजस्वी उपस्थिती ने महल के विलासी वातावर्ण में एक असहज शान्ती का संचार कर दिया।
06:04उपबरहन ने अपनी कामुक मदिरा के पात्र को मेज पर पटत दिया और पार्षदों की ओर अपनी तिरस्कृत द्रिष्टी डाली।
06:13महल के द्वारों पर छाया हुआ वह दिव्य प्रकाश उपबरहन के अंधकार पूर्ण मन के विरुध एक मौन चेतावनी का
06:21प्रतीक बन गया।
06:22पार्षदों में से एक ने आगे बढ़कर उपबरहन को उसके पूर्व स्वरूप और नार्दत्व के महान उत्तरदायत्व की याद दिलाई।
06:32भगवान विश्णों के दूट के रूप में उन्होंने विनमरता पूर्वक उपबरहन को सांसारिक मोह के मायाजाल से बाहर निकलने का
06:40आदेश दिया।
06:42उपबरहन ने उफास्पूर्ण हंसी बिखेरते हुए पारशदों को अपने निजी सुखों के बीच आने पर अपमानित किया।
06:50आकाश में खशन भर के लिए बिजली कौनधी मानो स्वय देवर्शी नारत का वह अंश अपनी अवन्ती पर शोक व्यक्त
06:58कर रहा हो।
07:00महल की नर्तकियों ने अपने घुंघरू थाम लिये, जैसे स्वय माया ही उन पारशदों के तरकों को कुचलने के लिए
07:07सजग हो गई हो।
07:09एक पारशद ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से उपबरहन के हृदय में पनप्रहे अहमकारी बीज को स्पष्ट पढ़ लिया।
07:17उपबरहन ने अपनी पत्नी मालवती की ओर देखा और उसके स्पर्ष से अपनी शक्ती को फिर से जुटाने का व्यर्थ
07:25प्रयास किया।
07:39वह अपना समझ बैठा है। वह क्षन भंगुर है और शीघर ही धूल में मिल जाएगा।
07:46विश्नु के दूतों की वानी में छिपी कठोरता ने उपबरहन को एक पल के लिए भीतर तक जखजोर कर रख
07:53दिया।
07:54किन्तु माया के प्रभाव ने अगले ही क्षन उसे पुनह उसी मिथ्या अहंकार के जाल में जकड लिया।
08:02वातावर्ण में एक रहस्यमेई कमपन उत्पन हुआ, जो स्वर्ग और प्रित्वी के बीच की मर्यादित दूरी के तूटने का संकेत
08:10था।
08:11पार्षदों ने अपना अंतिम संदेश सुनाया और उपबरहन को सचेत किया कि उसका पतन अब बस कुछ ही क्षणों की
08:19दूरी पर है।
08:21महल के भीतर की सुक्सुविधाय अब उपबरहन को एक कारागार की भांती सिमट्ती हुई प्रतीत होने लगी।
08:30उपबरहन का वह अंश जो कभी भक्ती का प्रतीक था, अब पूरी तरह से विलासिता के कीचड में धन्स चुका
08:36है।
08:38नियत समय की सुई घूम चुकी थी और अब उपबरहन के महाप्तन की गाथा का अगला अध्याय प्रारंभ होने जा
08:46रहा था।
08:47गंधर्व लोग के मध्यमेस्थित स्वण मंडित सभा भवन के द्वार पर उपबरहन ने देवर्शी नारत के कर्तवियों को विस्मृत कर
08:55रागरं के उत्सव का आहवान किया।
08:59स्वयम ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से जब यह देखा तो उनका मस्तक लज्जा से जुक गया और उन्होंने उपबरहन
09:07को बुलाने हेतु दूतों को भेजने का विचार किया।
09:11विलासिता में डूबे उपबरहन ने संगीत की धुन पर नृत्य करते हुए देवताओं के निमंतरन को धता बताते हुए एक
09:18अभधर उपहास किया।
09:21आकाश के मध्य में एक आएक काले मेग धिरने लगे जो गंधर्वों के उस अनैतिक कृत्य पर ब्रहमांडिय क्रोध का
09:28प्रतीक बन गए।
09:30उपबरहन का वह गौरवशाली व्यक्तित्वक जो कभी भक्ती का परियाय था अब कामुक्ता के भार से विचलित होने लगा।
09:50आसी रागिनी गाते हुए यह घोषणा की की उसके लिए प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है और कोई भी विधान
09:56उससे उपर नहीं है।
10:20ब्रहमा जी की वानी गुंजी जिसमें चेतावनी के साथ साथ एक महान भविश्य की त्रास्दी की स्पष्ट गंध समाहित थी।
10:30उपबरहन ने अपने अहंकारवश ब्रहमा जी को ही चुनोती दे डाली जो उसके पतन का अंतिम और निर्नायक च्षन सिध्ध
10:37हुआ।
10:39संपूर्ण गंधर्व नगर में सन्नाटा पसर गया और चारों और की सुन्दर्ता एक भयानक धुंधलेपन में विलीन होने लगी।
10:48नारद का वह अंश जो उपबरहन बनकर खेल रहा था, अब अपनी दिव्य पहचान की विस्मृती के अंतिम छोर पर
10:55खड़ा था।
10:57ब्रहमा जी की उंगलियों से एक दिव्य अगने रेखा खिंची गई, जिसने उपबरहन के चारों और एक लक्षमन रेखा के
11:05समान अवरोध पैदा कर दिया।
11:08उस घेरे के भीतर उपबरहन के वस्त्र और आभूशन अपनी चमक होने लगे और वे धीरे-धीरे मलिन होने लगे।
11:17सत्य और असत्य के बीच का द्वंद्व अब एक ऐसे बिंदु पर था, जहां से वापसी का मार्ग पूरी तरह
11:23बंध हो चुका था।
11:25महल की दीवारें अब पत्थर के समान भारी होने लगी और गंधर्व संगीत का स्थान सन्नाटे ने ले लिया।
11:34ब्रहमा जी का तेज अब एक प्रचंड रूप धारन कर चुका था, जो किसी भीक्षन उपबरहन पर अपना निर्णय सुनाने
11:42वाला था।
11:43उपबरहन के नेत्रों में अब विलासिता का नशा उतर चुका था और वहां केवल मृत्यू जैसा सन्नाटा शेश रह गया
11:51था।
11:52ब्रहमा जी ने अपने मुख से वह अभिशाप उच्चारित किया, जिसने उपबरहन के उस जन्म को शापित कर ब्रहमांडी इतिहास
12:00की धारा बदल दी।
12:03ब्रहमा जी के मुख से निकले शाप के शब्द एक वजर की भानती गुंजे, जिससे संपूर्ण ब्रहम लोग की स्वर्ण
12:10आभाक्षन भर के लिए मलान पड़ गई।
12:13भगवान विश्नु अपनी शांत द्रिष्टी से उपबरहन की ओर देखते हुए, स्रिष्टी के संतुलन को बनाय रखने के लिए इस
12:21कठोर निर्णय को स्विकार करते हैं।
12:25उपबरहन के दिव्य गांधर्व वस्त्र देखते ही देखते धूमिल पड़ने लगे और उसकी देह से निकलने वाली अलोकिक सुगंध एक
12:33तीखी और अप्रिय गंध में बदलने लगी।
12:37ब्रहमांड के आकाश में बिजली की एक विशाल लकीर कौंधी जो मानो उपबरहन के पतन और उसके आने वाले अंधकार
12:45में भविश्य का प्रतीक बन गई।
12:48गांधर्व लोक की स्वर्ण नगरी में हलचल मच गई और उपबरहन के साथ ही जो अब तक उसके व्यभव के
12:55साक्षी थे भैभीत होकर पीछे हटने लगे।
13:00महर्शी नारद के अंश के रूप में उस उपबरहन ने अपनी अशुध द्रिष्टी से जब उपर देखा, तो उसे ब्रहमाजी
13:07के मुख पर तनिक भी करुणा नहीं दिखाई दी।
13:11उसका शरीर जो कभी दिव्य संगीत की गूँच से स्पंदित होता था, अब एक भारी और जड़ पदार्थ की भांती
13:18भारी होने लगा, जैसे प्रिथवी का आकर्शन उसे खीच रहा हो।
13:24आकाश से गिरते हुए पुष्प अब राख के काले कणों में परिवर्तित हो रहे थे, जो उसके गांधर्व अस्तित्व के
13:31अंत की सूचना दे रहे थे।
13:34सभा के अन्य देवगन स्तब्ध होकर इस द्रिश्य को देख रहे थे, क्योंकि एक तेजस्वी गांधर्व का इस प्रकार मानवियस
13:42तर पर गिरना असंभव प्रतीत होता था।
13:45भगवान शंकर, जो दूर कैलाश पर समाधी में थे, ने भी अपनी तीसरी आख खोली और ब्रहमांड की इस उथल
13:53पुथल को अपनी योगद्रिश्टी से अनुभव किया।
13:57उपबरहन का मुख जो पहले कृष्ण भक्ती के तेज से दमकता था, अब वासना और मोह की गहरी काली रेखाओं
14:04से ढख गया था।
14:06एक काले धुआसा उसके चारों और लिपटने लगा, जो वास्तव में उसके संचित कर्मों का भार था, जिसे वह अब
14:14नकार नहीं सकता था।
14:16स्रिष्टी के इस निनय के साथ ही गांधर्व लोग के द्वार उपबरहन के लिए सदा के लिए बंध हो गये
14:23और वहां का संगीत भी मौन हो गया।
14:27ब्रहमा जी की वानी पुनह गूंजी, जिसने उपबरहन के आने वाले जन्म के लिए एक कठोर नेती की रूपरेखा खीच
14:34दी।
14:36पृत्वी लोग की धूल और माया के बंधन उसे अपनी ओर आकर्षित करने लगे, जहां उसे अब अपनी वासनाओं का
14:44मूल्य चुकाना था।
14:46समय का चकरत हम गया, और उपबरहन का दिव्य अस्तित्व एक मृत प्राय स्मृती की तरह धुन्धला पड़ गया।
14:54देवता गंड जो कभी उसके मित्र थे, अब अपनी द्रिष्टी फेर चुके थे, क्योंकि सत्य के मार्ग से भटकना स्वर्ग
15:02में अक्षमय अपराध था।
15:04उपबरहन को अब अनुभव हुआ कि जिस विलासिता को उसने अपना जीवन मान लिया था, वह केवल एक शनभंगुर भ्रम
15:12था।
15:14ब्रहमांड की शक्तिया अब उसके विरुद्ध संगठित हो रही थी और उसका दिव्यपद पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया।
15:22अंतिम बार जब उसने उपर देखा, तो उसे केवल रिक्ट आकाश मिला, जहां एक समय उसे देवर्शी नारत का आशिरवाद
15:31प्राप्त था।
15:33ब्रहमांड के विशाल रिक्ट स्थान में अचानक काला साया छा गया और उपबरहन को उन पार्शदों का सामना करना पड़ा
15:40जो उसके कर्मों का दंड सुनाने हेतु उपस्थित हुए थे।
15:45पार्शदों ने अपनी दिव्यवानी से घोशना की की जिस इंद्रियों के मोह में उसने स्वयन को खोया है, वही मोह
15:52अब उसके पतन का कारण बनेगा।
15:55उनका वजर जैसा स्वर गूंजा की उपबरहन को अब अपने दिव्य शरीर का परित्याग करना होगा और पाताल लोग की
16:03गहराईयों में विलीन होना होगा।
16:06अंधेरे और विनाश के प्रतीक के रूप में चारों ओर के पत्थर हिलने लगे और एक डरावना सन्नाटा चा गया
16:14जो केवल पतन की ध्वनी का संकेत था।
16:18पारशदों की आखों में किसी भी दया का भाव नहीं था क्योंकि उन्होंने उसे केवल उस नियम की याद दिलाई
16:24जिसे वह विलासिता के मद में भूल चुका था।
16:29उकबरहन ने कापते हुए हाथ जोडे लेकिन उसके अहंकार का कवच अब पूरी तरह से धूल में मिल चुका था।
16:37श्राप के प्रभाव से उसके दिव्य वस्त्रफट गए और वह धर्ती के एक शूद्र गर्भ में जन्म लेने हेतु विवश
16:44कर दिया गया।
16:46उसका दिव्य वैभव एक धुए की तरह विलीन हो गया और वह अब एक साधारन नश्वर जीव की पीड़ा को
16:53महसूस करने लगा था।
16:55पार्षदों ने पुनह गर्जना की की उसे अब रिशियों की सेवा में अपना संपून जीवन व्यतीत करना होगा ताकि उसका
17:03अहंकार नश्ट हो सके।
17:06उसकी आत्मा उस गहन अंधकार में उतरने लगी जहां प्रकाश की एक किरण भी पहुँचने में असमर्थ थी।
17:14प्रत्येक शब्द जो शाप के रूप में निकला वह उसके अस्तित्व की गहराईयों को छलनी करता चला गया।
17:22उसके कानों में गूंजती हुई वह प्रतिध्वनी अब उसे बार-बार याद दिला रही थी कि भक्ती के मार्ग से
17:28भटकने का परिणाम क्या होता है।
17:31उपबरहन ने देखा कि उसके हाथ अब अपनी दिव्यताख हो चुके थे और वे एक साधारन श्रमिक जैसे दिखने लगे
17:40थे।
17:41पारशदों की आग्या के अनुसार काल चक्र ने अपनी गती तेज कर दी और उसे पाताल की ओर धकेल दिया।
17:49उसका पतन इतना भीशन था कि स्वयं कापते हुए आकाश के तारे भी अपने स्थान से विचलित हो गए।
17:58नारद का वह अंश अब पूरी तरह से उस विलासिता के भ्रम से मुक्त हो चुका था, लेकिन इस मुक्ती
18:04की कीमत बहुत अधिक थी।
18:07शूद्र गर्ध में जाने का वह श्राप अब एक अटल सत्य बनकर उसके भाग्य के ललाट पर अंकित हो गया
18:14था।
18:15पार्शदों ने अपनी द्रिष्टी हटा ली और उपबरहन को उसके कर्मों के कठोर अंधकार में अकेला छोड़ दिया।
18:23अंतिम बार उपबरहन ने उपर देखा जहां उसका पुराना वैभव अब केवल एक धुन्धली याद बनकर रह गया था।
18:32अब पतन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी और प्रित्वी का वह शूद्र गर्भी उसका एक मात्र भविश्य बन गया
18:39था।
18:40विशाल ब्रहमांड के मध्य में स्थित रौरव नरक्की दहक्ती हुई आग अब उपबरहन की चेतना को अपनी लप्टों में समाहित
18:48करने के लिए लपलपा रही थी।
18:51वैकुंट के उचे स्वर्ण सिन्हासन पर विराजमान भगवान विश्नु के नयन उपबरहन के इस दारोन पतन को देखकर करुणा और
19:00न्याय के मिश्रक भावों से भर गए।
19:03अद्रिश्य धागों के माध्यम से काल की गती ने उपबरहन को भौतिक संसार के उन अंधेरे गलियारों की ओर धकेलना
19:11शुरू कर दिया, जहां से लोटना असंभव था।
19:15ब्रहमांड के शूने में तैरता हुआ वह दिव्य अंश अब अपनी स्वर्णिम आभाख होकर एक भारी और मलिन आवर्ण में
19:22लिपटता जा रहा था।
19:25रौरव के विशाल कालचक्र के नीचे दपते ही उकबरहन को उन सभी सुखों का भान होने लगा जो अब उसकी
19:32पकड़ से कोसों दूर हो चुके थे।
19:35गरुर देव अपनी स्वर्णमे पंखों को समेटे हुए शान्त भाव से इस पतन के साक्षी बने जैसे वे नेती के
19:42अटूट नियमों की व्याख्या कर रहे हूँ।
19:46उकबरहन के अस्तित्व में अब मोह और अहंकार का वह गहरा रंग चड़ने लगा था, जिसने उसकी द्रिष्टी से ब्रहमा
19:53का प्रकाश उजल कर दिया।
19:56आकाश में गूंजती हुई गर्जना के साथ ही रौरव का धधक्ती ज्वालाओं वाला द्वार उकबरहन के स्वागत में पूरी तरह
20:03खुल गया।
20:05नरक के उन भयानक कष्टों का अनुभव करते हुए उकबरहन की स्मृती में बसी मालावती की मधुर छवी भी अब
20:13एक कड़वी वेदना में बदल गई थी।
20:16भगवान शिव अपनी समाधी में स्थिर रहकर भी ब्रहमांड में हो रहे इस परिवर्तन की तरंगों को अपनी तीसरी आख
20:23से देख रहे थे।
20:26उकबरहन की आत्मा अब अपनी देवत्व की चमक को खोकर प्रित्वी के उस शूद्र गर्भ में प्रवेश करने के लिए
20:33विवश होने लगी थी।
20:35अंधेरी रौरव घाटी में सन्नाटे को चीरती हुई कालों की वह गूंच केवल उकबरहन के पतन का संगीत बनकर रह
20:43गई थी।
20:44दहकते हुए लोहे के खंभों के बीच से गुजरते हुए उकबरहन का वह सुक्ष्म शरीर अब धीरे धीरे अपनी दिव्य
20:52पहचान खो रहा था।
20:54ब्रह्मा जी के मुख से निकले उस शराप के शब्द अब भी उकबरहन के अंतर्मन में हथोडे की भांती प्रहार
21:01कर रहे थे।
21:03मोह के माया जाल ने उसे चारों ओर से घेर लिया था, जिससे अब वह अपनी पिछली गंधर्व गाथाओं को
21:10भी भूल चुका था।
21:12रौरव की उस कालिमा में उकबरहन का अस्तित्व केवल एक तडपते हुए छाया चित्र के रूप में शेश रह गया
21:19था।
21:20नीचे पृत्वी की ओर देखते हुए उसे वह शूदर परिवार स्पष्ट दिखाई देने लगा था, जो अब उसके आगामी जीवन
21:29का केंद्र था।
21:31देवर्शी नारद के अंश के रूप में उकबरहन का वह गर्व अब चूर-चूर हो गया था, और केवल एक
21:37साधारन मनुष्य की लाचारी बाकी बची थी।
21:41नेती ने अपना अंतिम चक्र घुमा दिया था, और उपबरहन अब पूरी तरह से भौतिक संसार के उस अंधेरे गर्भ
21:49में गिरने के लिए तैयार था।
21:51रौरव के उस भयानत पतन के साथ ही, उपबरहन की अमर गाथा अब पृत्वी के धरातल पर एक शूद्र पुत्र
21:59के संधर्ष में बदलने वाली थी।
22:02रौरव के उस भयानत पतन के क्षण में, उपबरहन ने चारों और केवल तप्त लौह स्तंभों और धहकती हुई अगनी
22:10की लप्टों को देखा जो उसके अहंकार को भस्म करने के लिए ततपर थी।
22:15अद्रिश लोक से धर्मराज यम की गंभीर वानी गुंजी, जिसने उपबरहन के कर्मों के लेखा जोखा को अंतिन दंड के
22:23रूप में घोशित कर दिया।
22:44उपबरहन की आखों में केवल शूनिशेश रह गया।
22:49चारों और व्याप्त उस नरक के वातावण में मालवती की अनुपस्थिती ने उपबरहन के हृदय में एक ऐसा घाव कर
22:56दिया जिसे अब कोई भी विलासिता नहीं भर सकती थी।
23:01यमदूतों ने उस स्थान पर अपनी उपस्थिती दर्श कराई, उनके हाथ में जलते हुए पाश थे जो उपबरहन को उसके
23:08अगले जन्म की ओर घसीटने के लिए तयार थे।
23:13उपबरहन उस तप्त धर्ती पर घुटनों के बल गिर पड़ा, क्योंकि उसके भीतर का वह गंधर्व गौरव अब पूरी तरह
23:20से समाप्थ हो चुका था।
23:22हवाओं में केवल विलाप की गूंच थी, जो उस महाप्तन की गाथा को रौरव के उनकाली दिवारों पर अंकित कर
23:30रही थी।
23:31नेती की इस कठोर परीच्षा ने उपबरहन को यह बोध करा दिया, कि प्रेम भी जब बंधन बन जाएं, तो
23:38वह पतन का कारण बनता है।
23:41तभी एक दिव्यध्वनी गूंजी, जिसने उपबरहन को चेतावनी दी की उसके कर्मों का दंड अभी केवल आरंभ हुआ है, और
23:50मृत्यू उसका अंत नहीं है।
23:53उपबरहन ने कापते हुए हाथों से अपनी आखों को ढखा, क्योंकि दिव्यप्रकाश की तीवर्ता उसके लिए असहनिय हो रही थी।
24:02वह भयानक रौरव कुंड जिसके किनारे वह खड़ा था, अब उसके पतन का अंतिन गवाह बन रहा था।
24:10मालवती का वह मोह, जिसने उसे नारायन की भक्ती से दूर कर दिया था, अब उसी के मन में पश्चाताप
24:17के कांटे बन कर चुब रहा था।
24:20ब्रहमा की वह वानी उसके कानों में पुनः गूंजी, जिसने उसे उस पतन के विशय में पहले ही सावधान कर
24:27दिया था।
24:29उकबरहन ने अपने उस भव्य महल और विलासिता को याद किया, जो अब केवल स्वपन की भाती उसके मन से
24:36उज़ल हो चुके थे।
24:39उसका पतन इतना गहरा था कि वह अब स्वर्ग और प्रित्वी के बीच की उस धुन्धली सीमा पर खड़ा था,
24:46जहां से बापसी का मार्ग बंध हो चुका था।
24:50यमदूतों ने अब उसके दोनों हाथों को जकड लिया था, और उसे उस अंधेरी घाटी की ओर खीचने लगे जहां
24:57शुद्रयोनी का संधर्ष प्रतीक्षा कर रहा था।
25:01रौरव की उनकाली चट्टानों ने जैसे उसकी नेती को स्विकार कर लिया हो और अगने की लप्टें उसके स्वागत में
25:08और अधिक तीवर हो उठी।
25:11अंत्ह उकबरहन ने अपनी हार स्विकार की और आखे बंद कर ली ताकि वह उस कर्मफल का सामना कर सके
25:19जो उसे मनुष्य के रूप में भोगना था।
25:22जैसे ही उसे उस गहरे रौरव में धकेला गया। उसका गंधर्व स्वरू पीछे छूट गया और एक नए संधर्शपून अस्तित्व
25:31का उदे होने वाला था।
25:34चेतना का वह पुंज अब रौरव के उन अनंत गहरे अंधकार और धधकती ज्वालाओं के बीच से गिरता हुआ। एक
25:41पतली नीली रेखा में परिवर्तित हो गया है।
25:45वैकुंठ के स्वर्ण सिनहासन पर विराजे भगवान विश्नु के नेत्रों में उसक्षन एक ऐसी करुणा उभरी जो ब्रहमांड की समस्त
25:53व्यथाओं को अपने भीतर समा लेने की शक्ती रखती थी।
25:57विश्नु की आग्या मिलते ही ब्रहमांडी उर्जा की लप्तें उसके चारों और लिपटने लगी। जैसे वह एक नया शारिरिक धाचा
26:07तयार कर रही हो।
26:09जैसे ही वह रौरव की काली धुआ भरी पर्तों को पार करता है, उसका गंधर्व रूप पूरी तरह नश्ट होकर
26:16राख में विलीन हो जाता है।
26:19अंधकार की उस गहरी घाटी के नीचे अब प्रित्वी लोग के भौतिक बंधन एक अद्रिश जाल की तरह उसका स्वागत
26:27करने के लिए ततपर थे।
26:29गरुड के विशाल पंखों की फड़फडाहट से उत्पन वायु का एक जोका उसे उस मायावी अंधकार से बाहर धकेलने लगा,
26:38जो उसके पिछले कर्मों का बोज था।
26:41उसके नए अस्तित्व का पहला स्पंदन एक छोटे बीज की भांती हुआ, जो अब उपजाओं मिट्टी की प्रतीक्षा में अंतरिक्ष
26:49की शून्यता में तैर रहा था।
26:52समय का चक्र अपनी धुरी पर घूम गया और आत्मा ने उन सभी एश्वरियों को पीछे छोड़ दिया, जो कभी
26:59उसकी पहचान का हिस्सा हुआ करते थे।
27:02अब चारों और केवल सन्नाटा और उस आने वाले संधर्ष की आहट थी, जो उसे एक साधारन मानव की दरिद्रता
27:11और भक्ती की अगनी के बीच खड़ा करने वाला था।
27:15शुन्य में खड़े महादेव के जटाओं से निकले एक सूक्षम प्रकाश ने उस भटकती आत्मा को एक दिशा दी, जिससे
27:23वह प्रित्वी की ओर प्रस्थान कर सके।
27:26उस आत्मा के चारों ओर लिप्टे हुए पुराने संस्कार, एक अद्रिश कवच की तरहे धीले पढ़ने लगे और अंत्ता विलीन
27:34हो गए।
27:35एक गड़गडाहट के साथ नेती का परदा उठा और उस आत्मा ने सांसारिक गर्भ की ओर अपनी अंतिम्यात्रा प्रारंभ कर
27:44दी।
27:45नीचे धरातल पर परवत मालाओं के बीच एक शांत उपत्य का उसे अपनी ओर खींच रही थी, जहां उसे अपना
27:54अगला जीवन व्यतीत करना था।
27:56स्वया भगवान ब्रह्मा ने उस सुक्षम जीव को वह दिव्य वर्दान दिया, जिससे वह आने वाले दुखों के बीच भी
28:04इश्वर की स्मृती को जीवित रख सके।
28:07अगनी की लप्टें जो अब तक उसका पीछा कर रही थी, अब शान्त होकर एक सुरक्षा चक्र में तबदील हो
28:15गई, ताकि वह सुरक्षित पृत्वी तक पहुँच सके।
28:19एक अंतिम चमक के साथ वह दिव्य अंश भौतिक जगत की उस अद्रिश्य दहलीज को पार कर गया, जहां समय
28:26की गणना शुरू होती है।
28:29पृत्वी की वायू ने उसे स्पर्ष किया और उस आत्मा ने पहली बार उस नश्वर देह के गुरुत्वाकर्शन को अनुभव
28:37किया।
28:38उसके साथ कोई डैविय शक्तिया नहीं थी, बस एक गहन त्रिश्ना थी जो उसे बार-बार क्रिश्न की ओर मोडने
28:46का प्रयास करती थी।
28:48मिट्टी की सुगंध और वायू का वह शीतल स्पर्ष उसके लिए पिछले जन्म की विलासिता से कहीं अधिक शक्तिशाली सिध्ध
28:56होने वाला था।
28:58नारद का वह अंश अब पूरी तरह से इस नश्वर संसार में उतर चुका था, जहां संघर्ष और भक्ती की
29:05एक नई गाथा लिखी जानी थी।
29:08उपबरहन ने उस निर्जन स्थान पर अपने पुराने अस्तित्व की अंतिन धुंधली यादों को एक मिक्टी के दिये की भांती
29:16जलते हुए महसूस किया।
29:19सुदूर वैकुंट के स्वर्ण द्वारों पर भगवान विश्णु ने मंद मुस्कान के साथ उपबरहन के हृदय में जागते उस भक्ती
29:27के बीज को अपनी दिव्यद्रिष्टी से निहारा।
29:30उपबरहन ने उस अज्यात दिशा की ओर अपने पहले कदम बढ़ाए जहां से उसे किसी अद्रिश्य स्वर में कृष्ण के
29:38नाम का आहवान सुनाई दे रहा था।
29:40समय का चक्रधीमा पड़ गया था जैसे प्रकृती स्वया उपबरहन के आत्ममन्थन की इस कठिन यात्रा के साक्षी बनने के
29:49लिए ठहर गई हो।
29:51चारों और फैली सन्नाटे वाली पहाडियों के बीच उपबरहन को अब सासारिक मोह के बंधन कमजोर पड़ते हुए अनुभव होने
30:00लगे थे।
30:02आकाश में उदित होते तारों ने जैसे उसे उस प्राचीन सत्य की याद दिलाई जो उसके पूर्व जन्म के नारगंश
30:09में दबी हुई थी।
30:11उसने मिट्टी के एक पात्र को उठा कर अपना मस्तक नत किया, मानो वह अपने भीतर के अहंकार के विसरजन
30:19का संकल्प ले रहा हो।
30:21हवाओं में 33 सुगंधी ने उसके मन के विकारों को धुलने का कार्य किया, जो उसे भक्ती की ओर ले
30:28जाने वाला प्रथम सोपान था।
30:31दूर कहीं पहाडों के पार से एक शंकनाद की गूंज उठी, जिसने उपबरहन के सोय हुए अंतर्मन को भीतर से
30:38जखजोर कर रख दिया।
30:40गरुर के पंखों की आहट से आकाश में कमपन हुआ और वैकुंट के स्वामी ने एक और सुक्ष्म संकेत उपबरहन
30:48की ओर प्रेशित किया।
30:51उपबरहन ने अपनी आखों को मूद लिया, अब उसके सामने सांसारिक सुखों की जगह कृष्ण की वह निराकार छवी उभरने
30:59लगी थी।
31:01अंधकार और प्रकाश के इस द्वंदव के बीच उपबरहन का चित धीरे-धीरे शांती के एक स्थिर बिंदू की ओर
31:08अग्रसर होने लगा।
31:10प्रकृती के कणकण में उसे अब उस परमात्मा का वास अनुभव होने लगा था, जिसे उसने वर्षों से विस्मृत कर
31:17दिया था।
31:19ब्रहमाजी के मानस पुत्र का वह अन्श अब उस तपोभूमी को खोज रहा था जहां उसकी तपस्या उसे पुनह नारत
31:27के स्वरूप से मिला सके।
31:29उसके पैरों के निशानों के साथ साथ मिट्टी की नमी में मानो भक्ती की लकीरें खिंचती जा रही थी।
31:36वह शान्ती काक्षन जो उपबरहन के जीवन में पहली बार आया था। उसके संपूर्ण अस्तित्व को रुपांतरित करने के लिए
31:45परियाप्त था।
31:47पहाडों की चोटियों पर गिर्ती पहली सूर्य किरण ने उपबरहन की तपस्या के आरंभ की घोशना कर दी।
31:54शिव के निवास स्थान की नीलिमा से उतप्रोत उस वातावर्ण में उकबरहन ने अपना पहला मंत्र उच्चारित किया। उसके मुख
32:04से निकले उन पवित्र शब्दों ने जैसे चारों दिशाओं में एक नई उर्जा का संचार कर दिया।
32:10यह केवल एक व्यक्ती की तपस्या नहीं थी बलकि यह उस महान देवर्शी के पुनरागमन का प्रथम अध्याय था।