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पद्म पुराण (पाताल खण्ड) के इस रोमांचक अध्याय में देखिए: लवणासुर वध के बाद जब शत्रुघ्न अयोध्या लौटे, तो राजदरबार में महर्षि वशिष्ठ और अगस्त्य ने श्रीराम को अश्वमेध महायज्ञ आयोजित करने का परामर्श दिया। लेकिन जब ऋषियों ने कहा कि बिना पत्नी के यह यज्ञ असंभव है, तब मंत्रियों ने श्रीराम को दूसरा विवाह करने का प्रस्ताव दिया! क्या था श्रीराम का क्रोध और प्रतिज्ञा? जानिए कैसे बनी स्वर्ण सीता और क्यों छूटा श्यामकर्ण अश्वमेध घोड़ा! #PadmaPurana #Ramayan #AshwamedhaYajna #SwarnaSita #LuvKush #Ayodhya
Transcript
00:00मथुरा के विजी शंखनाद के साथ शत्रुगन ने अयोध्या के भव्यद्वार पर विजय का पच्चिहन रखा, जहां प्रजा उनकी प्रतीक्षा
00:08में पल के बिछाय खड़ी थी
00:11अयोध्या के सिनहासन पर विराजमान प्रभु श्री राम ने जब शत्रुगन को देखा, तो उनकी दिव्यद्रिष्टी में वह विचलित भाव
00:19स्पष्ट दिखाई दिया जो वन के बालकों ने उत्पन किया था
00:24शत्रुगन ने अपनी विजय पता का श्री चर्णों में समर्पित की, किन्तु उनके हाथों में कापती हुई मुठ्थी और उनके
00:31चहरे पर अनकित उल्जन ने सभा में एक सन्नाटा पैदा कर दिया
00:36महल के प्रांगण में जलते हुए मशालों की लौ में शत्रुगन की परचाई एक ऐसे रहस्य का पीछाकर्ती प्रतीत हो
00:44रही थी, जो उनके साहस को बार-बार चुनौती दे रहा था
00:49अयोध्या के द्वार पर खड़ा होकर शत्रुगन को अचानक वही वन का तपोवन याद आया, जहां उन्होंने उन दो बालकों
00:57को साक्षात काल के रूप में देखा था
01:00श्रीराम ने मंद मुस्कान के साथ शत्रुगन के कंधे पर हाथ रखा, जैसे वे बिना कहे ही उस अदमय पराक्रम
01:08के रहस्य को पहले से ही जानते हों
01:11शत्रुगन के मन में बार-बार वही द्रिश घूम रहा था, जहां उन बालकों के हाथों से चला तीर हवा
01:18को चीरते हुए अचूप निशाने पर लगा था
01:22अयोध्या के गगन्चुंबी शिखर पर लहराती हुई पता का मानो उन दो बालकों की अनकही गाथा को पूरी स्रिष्टी में
01:29फैलाने का संकेट दे रही हो
01:32शत्रुघन की आँखों में वह विस्मय अब भी था, जब उन्होंने वालमीकी के आश्रम में उन बालकों के तेज से
01:39सूर्य की चमक को भी फीका पड़ते देखा था
01:43प्रभु श्री राम के मुखमंडल पर एक शांत गंभीर ताचा गई, जैसे वे जानते थे कि नियती ने एक ऐसी
01:51परीक्षा की रचना की है, जिसका उत्तर केवल समय ही दे पाएगा
01:56शत्रुघन ने कापती वानी में कहा कि महाराज मैंने उन बालकों के रूप में साधारन मनुष्य नहीं, बलकि स्वयनकाल की
02:04प्रतिध्वनी को देखा है
02:07महल की दीवारों पर बने स्वर्न चित्रों में, जैसे देवताओं का मौन भी इस आने वाले महासंकल्प की गवाही देने
02:15के लिए उपस्थित हो गया हो
02:18बाहर अश्वों की हिन्हिनाहट और सैनिकों के कौतुहल के बीच, शत्रुघन का मन अभी भी उस तपोवन के एकांत में
02:25ही खोया हुआ था
02:28श्रीराम ने अपने आखे बंद कर ब्रहमांड की अनन्त गहराईयों में उस रहस्य का स्रोत खोजना शुरू कर दिया था
02:35जो आज शत्रुघन के हिरिदय पर भारी था
02:39अचानक अयोध्या की वायू में एक दिव्य सुगंध का संचार हुआ, मानो प्रकृती खुद उस रहस्य को स्विकार करने की
02:46तयारी कर रही हो
02:49शत्रुघन को महसूस हुआ कि अयोध्या की ये भव्य दिवारें अब उनके लिए एक घेरे जैसी हैं, क्योंकि उनके भीतर
02:57का योध्धा उन बालकों के शौर्य के रहस्य को जानना चाहता है
03:02महल की गलियारों में टहलते हुए शत्रुघन के पच्चाप केवल उन सवालों की प्रतिध्वनी थे जो बालमिकी के तपोवन से
03:10शुरू हुए थे
03:12प्रभु श्री राम के सामने एक स्वर्ण कलश रखा था, जिसका तेज अयोध्या की पूरी सभा में सबसे अधिक चमक
03:20रहा था
03:21पूरे राज्य में एक अजीब सी खामोशी चा गई थी, जैसे सारा संसार उस महा संकल्प के घोशित होने का
03:29प्रतीक्षा कर रहा हो
03:31शत्रुघन ने जैसे ही प्रभु श्री राम के सम्मुख नतमस्तक होकर अपना मस्तक जुकाया, अयोध्या के इतिहास में एक नए
03:39युक्का सूत्रपात हो गया
03:42अयोध्या के विशाल कक्ष में शत्रुघन के शब्द गूंज रहे थे, किन्तु श्री राम की द्रिष्टी दूर स्थित एक शूने
03:49बिंदु पर टिकी हुई थी
03:52शत्रुघन ने जैसे ही प्रभु का हाथ थामा, उन्हें उस थंडेपन का आभास हुआ जो श्री राम के भीतर बसी
03:59गहरी पीड़ा को बया कर रहा था
04:02शत्रुघन की वीर गाथाओं के बीच उनके नेत्र श्री राम के चहरे पर अनकित उस रेखाओं को पढ़ रहे थे
04:09जो मौन त्याग का प्रमाड थी
04:12कमरे की दीवारों पर जलते हुए दीपों की लौ श्री राम के हृदय में उठ रहे विरह की अगनी के
04:18सामने फीकी पड़ रही थी
04:21प्रभु श्री राम जानते थे कि धर्म की रक्षा के लिए लिया गया निर्नय उनकी अपनी निजी खुशियों की बली
04:28मांग चुका है
04:41की से आती ठंडी हवा ने श्री राम के वस्त्रों को चू लिया जैसे प्रकृती भी उनके दोहक में भागिदार
04:47बन रही हो
04:49स्वर्ण कलश की आभा से पूरा कक्ष प्रकाशमान था पर श्री राम के नेत्रों में उस स्वर्ण सीता की छवी
04:56धुंधली होती जा रही थी
04:59शत्रुघन ने लज्जा और व्याकुलता के साथ अपना सिर जुकाया वे सत्य को जानते थे पर उसे प्रकट करने की
05:07अनुमती नहीं थी
05:09प्रभु श्री राम की मुस्कान में एक कठोर प्रतिग्या छिपी थी जिसे केवल युगों का काल ही समझ सकता था
05:17अयोध्या की शान्त रात में अश्वमेध के महा संकल्प की गूंज हर पत्थर से टकरा कर लोट रही थी
05:25शत्रुघन ने धीरे से श्री राम के चरण चुए और उनके स्पर्ष से एक अज्यात विद्युत सी श्री राम के
05:32पूरे शरीर में दोड़ गई
05:34श्री राम ने अपनी आखे बंद की और अपने हिदय के भीतर बसी उस वाटिका की कल्पना की जहां सीता
05:42के पच्चिनह आज भी सुरक्षित थे
05:46दीवारों पर लगी प्राचीन कलाकृतियां श्री राम के पूर्वजों की गाथा कह रही थी जो आज स्वय इस संकट के
05:53गवाह बने थे
05:56शत्रुग्न उठे और धीमी गती से कक्ष से बाहर निकलने लगे लेकिन हर कदम पर उन्हें श्री राम की पीड़ा
06:03का भार महसूस हो रहा था
06:06अश्वमेध के लिए चुने गए स्वर्ण अश्व के खुरों की ध्वनी पास के अस्तबल से आ रही थी जो आने
06:12वाले युद्ध का संकेट दे रही थी
06:16श्री राम के कक्ष की खिलकी से दीखता आकाश आज कुछ अधिक गहरा और रहस्यमें प्रतीत हो रहा था
06:23प्रभु ने एक गहरा श्वास लिया और स्वयं को उस महा संकल्प के लिए और अधिक अडिक बना लिया
06:31शत्रुगन ने अंतिम बार पीछे मुर कर देखा श्री राम की आकरिती एक अकेले ध्रुव तारे के समान खड़ी थी
06:40अयोध्या की सीमाव पर खामोशी का सामराज्य था और नेती अपने अगले अध्याय को लिखने के लिए तैयार हो रही
06:47थी
06:49अयोध्या के विशाल राजभवन के स्वर्णद्वार खुले और रिशियों का दिव्य समूह एक शांत किन्तु गंभीर आभा मंडल के साथ
06:57सभा कक्ष में प्रवेश कर गया
07:00ब्रहमर्शी वशिष्ठ और अगस्त्य मुनी के चहरे पर ब्रहम तेज की दिव्य चमक थी, मानोवे ब्रहमांडिय संतुलन के किसी गोपनिय
07:08संदेश को अपने भीतर समेटे हुए हो
07:12श्रीराम ने अपने आसन से उठकर उन महान संतों का पादप्रक्षालन किया, जिससे पूरे राजदर्बार में भक्ती और मर्यादा का
07:21एक अद्रिश प्रवाह उमड़ पड़ा
07:24हवा में चंदन की सुगंधी और मंत्रो चार की गूंज ने सभा के वातावर्ण को वैकुंठ जैसी पावन और अलौकिक
07:32दिव्यता प्रदान कर दी थी
07:34महर्शी वशिष्ठ ने अपनी गंभीर वानी में जम्बूद्वीप के चारों और मंदराते नकारात्मक उर्जा के बादलों की और संकेत करते
07:43हुए राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न उठाया
07:47भगवान विश्णु का अंश होने के नाते श्रीराम ने उस शान्ती को स्थिर करने के लिए संतों की इच्छा को
07:53ही इश्वर की आग्या मानकर स्विकार किया
07:57रिश्यों ने एक स्वर में उस महा संकल्प का प्रस्ताव रखा जो धर्ती के अधर्म को नश्ट कर उसे पुनह
08:04धर्म की धुरी पर स्थापित कर सकता था
08:08अश्वमेध यग्य का नाम सुनते ही जैसे पूरे राजमहल की भित्तियों में एक दिव्यस पंदन दोड़ गया जो प्राचीन गौरव
08:16का प्रतीक था
08:18अगस्त्य मुनी ने कहा कि यह यग्य केवल एक अनुष्ठान नहीं बलकि समस्थ संसार को यह बताने का माध्यम है
08:25कि अयोध्या का धर्म कभी खंडित नहीं हो सकता
08:29श्री राम ने अपनी स्वर्णमे द्रिष्टी को सभा के द्वार की ओर घुमाया जहां नेती के रत के पहियों की
08:36गुंच सुनाई देने लगी थी
08:39संतों ने स्पष्ट किया कि जम्बू द्वीब के उन कोनों में भी प्रकाश की आवश्षकता है जहां आज भी अंधकार
08:47अपनी जड़े जमाय बैठा है
08:50सभा कक्ष मे स्थित भगवान विश्णू की एक विशाल प्रतिमा पर सूर्य की पहली किरण पड़ी मानोस्वय नारायन इस यग्य
08:58के साक्षी बनने को ततपर हो
09:01श्री राम की स्वीकृती मिलते ही राजगुरु ने यग्य की वेदी के निर्मान का शिलान्यास करने का निर्देश दिया जिससे
09:09दिशाएं और भी मुखर हो उठी
09:12श्री राम के मुख पर वह तेज था जो उस महा संकल्प के भार को धारन करने के लिए पूर्णता
09:18द्रेड और अडिक दिखाई दे रहा था
09:22अश्वमेध के लिए चुने गए दिव्य अश्व की खोज की घोशना ने अयोध्या के सैनिकों में एक नई वीर्ता और
09:29गौरव का संचार कर दिया
09:31यग्य की पवित्र अगने के लिए विशेश समिधाओं का संचय करने हेतु रिशियों की एक तोली हिमालय की और प्रस्थान
09:39करने के लिए तैयार खड़ी थी
09:42पूरे राज्य में शंकनाद की ध्वनी गूंज उठी जो इस बात का उद्गोश थी कि अयोध्या एक महायग्य के लिए
09:49जागरत हो चुकी है
09:52श्रीराम ने सभा में बैठे समस्त राजाओं को आमंत्रित करने का संदेश भेजने का आदेश दिया ताकि यह यग्य संपूर्ण
10:00भारतवर्ष का महामिलन बन सके
10:03अयोध्या के आकाश में देवताओं की उपस्थिती के संकेट मिलने लगे थे, पुष्प वर्षा की हलकी बहार ने बातावर्ण को
10:11सुगंधित कर दिया था
10:14नेती की लकीरें अब अश्वमेध के उस महा संकल्प के चारों और सिमट रही थी, जो इतिहास में धर्म के
10:21पुनर्स्थापन का स्वर्णिम अध्याय बनने वाला था
10:26अयोध्या की भव्य यग्यशाला में उच्साह का वातावर्ण तब अचानक सन्नाटे में बदल गया, जब कुलगुरु वशिष्ठ ने वेदों के
10:34उस अटल विधान को सभा के समक्ष दोहराया
10:38महर्शी वशिष्ठ की गंभीर वानी गुंजी की यग्यवेदी पर आहुती देने हेतु पत्नी का वामभाग में उपस्थित होना अनिवार्य है,
10:46अन्यथा यह महासंकल्प पूर्ण नहीं हो सकता
10:51श्रीराम ने शांत मुद्रा में अपना मस्तक जुका लिया, जैसे ही गुरु के शब्दों ने उनके हृदय में दबी हुई
10:57सीता के विरह की पुरानी पीडा को पुनह जीवित कर दिया
11:02सभा में बैठे राजाओं और मंत्रियों के चहरों पर असमंजस की लकीरें उभराईं, क्योंकि अयोध्या के इतिहास में यह पहली
11:10बार था कि एक राजा के सामने पत्नी के बिना धर्म संकट खड़ा हुआ था
11:16वशिष्ट के इन शब्दों ने अयोध्या के भव्य स्वर्ण प्रासाद में मानो एक गहरा अंधकार भर दिया हो, जहां हर
11:23कोई अब राजा के अगले निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा था
11:28देवराज इंद्र ने स्वर्ग से इस द्रिश को देखते हुए चिंता व्यक्त की, क्योंकि श्री राम के इस यग्य के
11:35विफलता की स्थिती में असुरों का आतंग पुना बढ़ने का भय था
11:40अयोध्या के सेनाप्ती और मंत्री एक दूसरे की ओर देखने लगे, क्योंकि विधी का यह कठोर नियम किसी भी सांसारिक
11:48शक्ती से उपर था
11:51अग्निहोत्र की पवित्र अग्नी, जिसे प्रजवलित करने की तैयारी थी, मानो इस संकट को भापकर थोड़ी मध्धम पड़ गई हो
12:00श्रीराम की चुप्पी सभा के लिए एक प्रश्न बन गई थी, क्या वे दूसरा विवास विकार करेंगे या अपने धर्म
12:07का कोई अन्यमार्ग धूढेंगे
12:10तभी एक दिव्य संकेट के स्वरूप महर्शी वालमीकी के आश्रम से एक दूट के आने की सूचना दर्बार को प्राप्थ
12:18हुई
12:19दूट के मुख पर एक अलौकिक तेज था, मानो वह अपने साथ भविश्य के किसी समाधान का संदेश लाया हो
12:28रिशिगन आपस में चर्चा करने लगे कि क्या वालमीकी की कुटिया से कोई ऐसा मार्ग निकलेगा, जिससे पत्नी के बिना
12:36भी यग्य संभव हो सके
12:38श्री राम के नेत्रों में एक क्षण के लिए सीता की स्मृतियों का एक ज्वार उमड़ आया, जिसे उन्होंने अपने
12:45असीन धैर्य से नियंत्रित कर लिया
12:48सभा का वातावर्ण तनाव पूर्ण था, जहां धर्म की रक्षा के लिए एक कठिन परीच्षा के बादल मंदरा रहे थे
12:57वालमीकी का संदेश आने के साथ ही, राम ने एक महान निर्नय लेने का संकल्प मन ही मन धारन कर
13:04लिया
13:06स्वर्ण की सीता बनाने का विचार जैसे ही उनके मन में कौन धा, उन्होंने अपनी धर्म प्रायनता को एक नए
13:13शिखर पर स्थापित करने की ठानी
13:16राजा का अपना अर्धांगिनी के बिना यज्यन न करने का अटल निश्चय अब इतिहास के पन्नों में एक आदर्श बनने
13:23वाला था
13:25देवता भी उसक्षन को देख रहे थे, जहां पुरुशोत्तम श्री राम एक बार पुनह अपनी व्यक्तिगत भावनाओं को त्याग कर
13:33धर्म के मार्ग पर चलने जा रहे थे
13:37अयोध्या के आकाश में अब एक अलौकिक आभाचा गई, मानो साक्षात सत्य का प्रमान देने के लिए प्रकृती भी रुक
13:44गई हो
13:46श्री राम ने मौन तोरते हुए घोशना की की वे विधी के विरुद्ध नहीं जाएंगे, किन्तु वे दूसरे विवाह के
13:53स्थान पर स्वर्ण प्रतिमा से यग्य की पूर्ती करेंगे
13:57अयोध्या के विशाल राजदर्बार में स्वर्णस तंभो के बीच एक अजीब सी स्तब्धता चा गई, जहां सभास्दों की मतिभ्रम ने
14:06धर्म की सीमा को लांग दिया था
14:09महर्शी वशिष्ट और अन्यमंत्रियों की उपस्थिती में एक व्रिद्ध महामंत्री ने हाथ जोड़कर श्री राम के समक्ष राजपुल की मर्यादा
14:17का हवाला देते हुए दूसरा विवाह करने का अनुचित प्रस्ताव रखा
14:22श्री राम के मुख पर जो शान्ती विराज रही थी वह अचानक एक तीवर भाव में बदल गई जैसे शान्त
14:30सागर में भीशन बवंडर उठने वाला हो
14:34राजदर्बार की छट पर लगी दिव्यमनिया श्री राम के क्रोध की उष्णता से थर्थराने लगी
14:40मानो समस्त ब्रहमांड उनके मुख आक्रोश का साक्षी बन रहा हो
14:45श्री राम का सिनहासन से उठना किसी जलते हुए सूर्य के उदे होने जैसा प्रतीत हुआ
14:51जिसे देख सभा में बैठे सभी ज्यानी पुरुष भय से कांप उठे
14:56देवराज इंद्र ने आकाश से इस द्रिश्य को देखा और स्तब्ध रह गए
15:01क्योंकि उन्होंने इस से पूर्व श्री राम का ऐसा उग्र और रौद्र रूप कभी नहीं देखा था
15:08श्री राम ने अपनी तर्जनी उठाते हुए कहा कि सती सीता केवल एक नाम नहीं बलकि मेरी आत्मा का अविभाज
15:16अंग हैं जिसे कोई दूसरा विवाह कभी मिटा नहीं सकता
15:21उनकी गर्जना से दर्बार की दीवारें गूझ उठीन, मानो स्वयन धर्मराज ने ही असत्य के प्रस्ताव को दंडित करने के
15:29लिए अपना मुख खोल दिया हो
15:32श्रीराम के तेज से चारों और एक स्वर्ण आभा फैल गई, जिससे उस अनुचित प्रस्ताव को रखने वाले मंत्रियों की
15:39आखें चकाचौंध हो गई
15:42देवी सरस्वती ने भी उसक्षन श्रीराम की वानी में समाहित होकर उस सत्य को उजागर किया जो केवल प्रेम के
15:50मार्ग पर चलने वाले ही समझ सकते थे
15:53श्रीराम ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि मेरा विवाह उस स्वर्ण प्रतिमा के साथ हो चुका है, जिसे
16:01मैंने धर्म की रक्षा हेतु स्विकार किया है
16:05दर्बार के मध्य एक स्वर्णत लश से दिव्य प्रकाश प्रस्फुटित हुआ, जो श्रीराम के संकल्प की पवित्रता को प्रमानित कर
16:13रहा था
16:14मंतरी लज्जा से सिर जुकाए खड़े थे, क्योंकि उन्हें यह बोध हो चुका था, कि उन्होंने पुरुशोत्तम के प्रेम और
16:22निष्ठा पर संशय करके बड़ी भूल की है
16:26भगवान विश्णु का सूक्ष्म स्वरूप इस द्रिश्य को देखकर गौर्वान विथ हुआ, क्योंकि उनके अवतार ने प्रेम की मर्यादा का
16:34सर्वोत्तम उदाहरन स्थापित किया था
16:37श्री राम ने पुनह अपनी द्रिश्टी को शांत किया, किन्तु उनके संकल्प में कोई भी तनिक मात्र का बदलाव नहीं
16:45आया
16:46दर्बार की वायू में एक दिव्य सुगंध का संचार हुआ, जो इस बात का प्रतीक थी कि धर्म और प्रेम
16:53का मिलन सदैव सफर रहता है
16:56श्री राम ने घोशना की कीवे अपने राजधर्म के साथ साथ अपनी पत्नी सीता के प्रती किये गए उस वचन
17:04को भी निभाएंगे, जिसे उन्होंने केवल हृदय से स्विकार किया है
17:09सभा के कोने में बैठा एक राजगुरु अवाक रह गया, क्योंकि उसने देखा कि श्री राम का साया उस स्वर्ण
17:17प्रतिमा के साथ एक रूप हो रहा था
17:20श्री राम ने अपनी मुठिया धीरे-धीरे धीली की और राजमहल का वातावर्ण फिर से एक सौमय और शांत अनुष्ठानिक
17:28उर्जा से भर गया
17:31अश्वमेध यज्य का संकल्प अब एक अगनी परीक्षा के समान था, जिसमें श्री राम ने स्वयं को तपाकर इतिहास के
17:38पन्नों पर सत्यका स्वर्णिन हस्ताक्षर कर दिया
17:42राम के सम्मुख बैठी स्वर्णसीता की आभा से पूरा यज्य मंडप दैविय प्रकाश से भर उठा, जहां समय की गती
17:50मानो ठहर सी गई हो
17:52भगवान विश्णु अपनी वैकुंट की गद्धी से उठकर श्री राम की इस अटल निष्ठा को देखकर मुस्कुराते हैं और गरुर
18:00को उनकी द्रिर्टा का साक्षी बनने का संकेत देते हैं
18:05श्री राम ने अपनी गूंजती हुई आवाज में घोशना की कीवे किसी अन्यस्त्री को अपनी धर्म पत्नी का स्थान देने
18:13के बजाए राजसी यग्य का परित्याग करना अधिक श्रेयसकर समझते हैं
18:19अगनी की लप्टे मानो श्री राम के संकल्प के साथ तालमिल बिठाते हुए और अधिक प्रखर और दैविय हो उठी
18:28सभा में उपस्थित सभी रिशी और मुनी श्री राम के इस एकपत नीवरत के अमर उदाहरन को देखकर नत्मस्तक हो
18:35गए
18:37गरुर की विशाल द्रिश्टी आकाश से इस द्रिड संकल्प को निहार रही है जैसे वे स्वय इस एतिहासिक सत्य के
18:44गवाह बन गए हो
18:46श्री राम की अंगुलियों ने धीरे-धीरे उस स्वन प्रतिमा को स्पर्श किया जिससे वे धातु की जड़ता में भी
18:53समवेधना का संचार कर रहे थे
18:57वायुमंडल में उठती हुई सुगंधित धूम्र की लकीरे अब एक दिव्य छत्र का रूप ले रही थी जो श्री राम
19:04के सत्य के मार को सुशोभित कर रही थी
19:08राजगुरु वशिष्ठ ने अपनी आखे मूंदली और अंतर्मन में उस अटूट बंधन को देखा जो काल और मृत्यू की सीमाओं
19:16से परे है
19:18श्री राम ने सभा की ओर मुड कर कहा कि उनके सिनहासन पर केवल जानकी का अधिकार है और यह
19:25अधिकार युगो-युगो तक अक्षुन रहेगा
19:28उस विशाल सभा में सन्नाटा ऐसा था कि मानो स्वयंकाल भी श्री राम के शबदों की गंभीरता को सुनने के
19:36लिए रुप गया हो
19:38स्वर्ण प्रतिमा के नेत्रों में मानो एक क्षन के लिए सजीवता की चमक उभर आई हो जो श्री राम के
19:45प्रती सीता की निस्वार्थ भक्ती का प्रमाण थी
19:48श्री राम ने पुनह अपनी मुठिया बांधी और एक राजसी संकल्प के साथ वे यग्य वेदी की परिक्रमा के लिए
19:56आगे बढ़े
19:58यग्य की अगनी का रंग अब धीरे धीरे शुद्ध नीला और श्वेत हो चला था जो सत्य की परम सिध्धी
20:05का प्रतीक था
20:07वेकुंठ के द्वार से आने वाली एक मंध सुगंध ने पूरे महल को सुर्भित कर दिया मानो देवता स्वयन श्री
20:14राम की इस परीक्षा पर पुष्प वर्षा कर रहे हो
20:18श्री राम का व्यक्तित्व उसक्षन हिमालय की भांती अडिक था जो अपने सिध्धान्तों से इंच भर भी विचलित होने को
20:26तयार न था
20:28सभा के कोने में बैठा हुआ एक द्वारपाल भी अपने आसु नहीं रोप पाया क्योंकि उसने धर्म का एक ऐसा
20:36रूप देखा था जो इतिहास में कभी नहीं लिखा गया
20:40अश्वमेध के उस महा संकल्प का ताप अब केवल यग्य तक सीमित न रहकर संपूर्ण सामराज्यकी चेतना को शुद्ध कर
20:48रहा था
20:49जब राम ने अंतिम आहुती दी तो चारों दिशाओं में एक गूंच सुनाई दी जो उनकी एकात्मता का ब्रहमांडी उद्धोश
20:58थी
20:59यग्य के अंत में शांती का ऐसा सन्नाटा पसरा कि मानो श्री राम का एक पतनीवरत स्वयंकाल के कपाल पर
21:06अनकित हो गया हो
21:09महर्शी वशिष्ट ने यद्यवेदी के समीप खड़े होकर श्री राम की उस विरहव्यथा को देखा जिसने संपून ब्रहमांड को एक
21:17मूख वेदना में डुबो दिया था
21:20मुनिवर के मुख से निकले वेदों के गूड श्लोक उस दैविय समाधान का संकेत दे रहे थे जो राजा के
21:27धर्म और पतनीवरत के बीच से तू बनने वाला था
21:31श्री राम ने अपनी आखें खोली और वशिष्ट जी के उस दिव्य प्रस्ताव को सुना जो उनके हृदय के खालीपन
21:39को एक प्रतिमा के माध्यम से भरने वाला था
21:43यग्यशाला के उस स्तब्ध वातावर्ण में महर्शी वशिष्ट के शब्द जैसे भविश्य की स्वर्ण गाथा लिखने के लिए ब्रहमनात बनकर
21:51गुंच उठे
21:53स्वर्णकलाकारों को राजादेश दिया गया कि वे माता सीता के स्वरूप को शुद्ध स्वर्ण में ढालकर उनकी उपस्थिती को जीवन्त
22:01कर दें
22:03शिल्पकारों ने अपनी पूरी निष्ठा के साथ देवी के मुखमंडल को गढ़ा जैसे स्वयन विधिविधान ने पत्थर से प्राण फूंकने
22:11का साहस किया हो
22:13शिल्पकी हर रेखा में माता सीता की सौमयता और त्याग की गरिमा को स्वर्ण के माध्यम से साकार किया जा
22:20रहा था
22:22यग्यशाला के मध्यमें उस स्वर्ण सीता की स्थापना का समयाया तो वातावर्ण में दिव्य सुगंध और शांती का संचार हो
22:30गया
22:31महर्शी वशिष्ट ने वैदिक मंत्रों के साथ उस प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा का संकल्प लिया जिससे वह केवल स्वर्ण न
22:39रहकर माता का रूप बन गई
22:42श्री राम ने उस प्रतिमा को श्रद्धा से देखा जहां उन्हें सीता का वही रूप दिखाई दिया जो वन में
22:49उनकी प्रेणा का आधार था
22:52स्वर्ण सीता की उपस्थिती से अश्वमेध यग्य की पूर्णता का मार्ग प्रशस्थ हुआ और राजसभा में एक अलौकिक तेज छा
23:00गया
23:01यह वह अध्भुत क्षण था जब एक राजा ने अपने व्यक्तिगत त्याग को राज्य के धर्म के साथ जोड कर
23:08इतिहास में एक अमर उदाहरन स्थापित कर दिया
23:13प्रतिमा के सामने जुककर श्री राम ने जब दंडवत किया तो उपस्थित सभी रिशियों के मुख से जै श्री राम
23:19का उद्धोश गूंच उठा
23:22उस स्वर्ण प्रतिमा ने मानो श्री राम की वेदना को स्विकार कर लिया हो और उसकी आभा में माता सीता
23:29का वातसल्य और तेज पुनह जागरित हो गया
23:33यग्य की अगनी भी अब उस स्वर्ण तेज के साथ मिलकर एक अद्वितिय प्रकाश पुन्च का निर्मान कर रही थी
23:40जो आकाश तक जा पहुँचा
23:43महर्शी वशिष्ट मुस्तुराए क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि राजा का धर्म और उसका प्रेम एक दूसरे के पूरक बनकर
23:51ही सामराज्य की रक्षा करेंगे
23:54संपूर्ण अयोध्या उस स्वर्ण सीता की आभासे नहा उठी थी और लोगों को लगा कि माता स्वयं उनके बीच फिर
24:02से पधार आई हैं
24:04श्री राम अब उस यग्य की अगनी के साथ एकाकार हो चुके थे जहां उनके मन का द्वंद्व स्वर्ण प्रतिमा
24:12के रूप में शान्थ हो गया था
24:15अश्वमेद की वह अंतिम आहुती पूर्ण हुई और स्वर्ण सीता उस यग्य की साक्षिन बनकर सदैव के लिए श्री राम
24:22के धर्मपत की प्रतीक बन गई
24:25पद्म पुरान का यह अध्याय उस महान संकल्प की विजय का गवाह बना जिसने श्री राम को मर्यादा पुरुशोत्तम के
24:33रूप में और अधिक प्रखर कर दिया
24:35दिव्य शिल्पकारों की तूलिका से जन्मी स्वर्ण सीता की प्रतिमा मानो प्राणवन्थो उठी जिसमें देवी का लावण्य और राजसी गरिमा
24:44साक्षाक जलक रही थी
24:47भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से जागरित होकर उस दिव्य प्रतिमा को देख रहे हैं जिसके कंकन में माता सीता
24:55का वातसल्य और निष्ठा समाहित है
24:59स्वर्णसीता को राजसी आसन पर विराज मान किया गया जहां उनकी कांती से यग्य मंडप का हर कोना दैविय प्रकाश
25:07से जग्मगा उठा
25:09यग्यशाला के स्तंभमानों मौन होकर उस एतिहासिक खण की प्रतीक्षा में खड़े हैं जहां मर्यादा पुरुशोत्तम का एकांत प्रेम मुखरित
25:18होने वाला है
25:20सभा में उपस्थित रिशियों और जनसमोह के नेत्र उस द्रिश्य को देखकर सजल हो गए क्योंकि स्वर्ण में सीता का
25:28वास श्री राम की अटूट मर्यादा को प्रमानित कर रहा था
25:32श्री राम मंद गती से आगे बढ़े उनका हृदय अपनी धर्म पत्नी के विरह और कर्तव्य की पराकाश्था के बीच
25:40एक गहरे द्वंद्व का अनुभव कर रहा था
25:44प्रतिमा के सम्मुख पहुचते ही श्री राम की द्रिष्टी उस मुखाकृती पर ठहर गई जहां उन्हें आज भी अपनी जानकी
25:51का वही स्नेहल भाव द्रिष्टी गोचर हो रहा था
25:55समय का चक्र मानो थम गया और श्री राम ने उस स्वर्ण प्रतिमा के चर्णों का स्पर्ष किया जो उनके
26:02जीवन के सबसे कठिन त्याग का साक्षी था
26:06शुन्य सभा में केवल श्री राम के पच्चाप सुनाई दे रहे थे जो उस भारी मौन को चीर कर एक
26:13युग की वेदना को शब्दों के बिना ही बया कर रहे थे
26:17भगवान शिव अपने कैलाश शिखर से इस द्रिश को देख रहे हैं, जहां मर्यादा के पालन हेतु एक समराट का
26:25हृदय पिघल कर अश्रूओं के रूप में बह रहा था
26:28श्री राम ने धीरे से अपना मस्तक प्रतिमा के चर्णों में जुकाया, मानो आज भी वे अपनी रानी के सम्मुख
26:36अपनी करबध क्षमा याचना कर रहे हूँ
26:40राजदर्बार की दीवारों पर प्रतिबिम्बित होती उन दोनों की चायाएं, युगों-युगों के उस अमर प्रेम का प्रमान बन गई
26:47जो भौतिक देह के परे था
26:50आकाश से देवता भी इस अभूत पूर्व समर्पन को देख कर स्तम्भित थे, क्योंकि धर्म की रक्षा के लिए किया
26:57गया यह त्याक किसी भी विजय से बढ़ा था
27:01माता सीता की उस स्वर्ण प्रतिमा से एक मंध दिव्य सुगंध प्रवाहित हुई, जिसने संपूर्ण सभा को भक्ती के एक
27:08अलोकिक आनंद से भर दिया
27:12शत्रुग्न और लक्षमन जो उस समय वहां उपस्थित थे, अपनी आखों के अश्रुओं को रोक नहीं पाए और श्री राम
27:19के सम्मुख नत्मस्तक हो गए
27:22यग्य के पवित्र अग्निकुंड की ज्वालाएं अब शान्त होकर एक स्वर्णिम आभा में परिवर्तित हो चुकी थी, जो उस महा
27:30संकल्प की पूर्णता का संकेट था
27:33श्री राम ने उठकर सभा की ओर देखा, उनके नेत्रों में अब एक स्थिर्ता थी जो धर्म के मार्प पर
27:40अड़िग रहने का संकल्प व्यक्त कर रही थी
27:43पद्म पुरान का यह अध्याय आज उस सत्य को स्थापित कर गया, जहां एक समराट ने सिनहासन से अधिक अपनी
27:51मर्यादा को महत्त्व दिया
27:53समय बीटता गया, किन्तु स्वर्नसीता की वह प्रतिमा सदैव अयोध्या के उस यग्य मंडप में श्री राम के त्याग का
28:01मूख संदेश देती रही
28:04श्री राम के उस अश्रु ने इतिहास को एक नई दिशा दी, जहां त्याग ही प्रेम की सबसे उची पराकाष्ठा
28:11बनकर अमर हो गया
28:13सर्यू तट की पावन धरा पर यग्य की भव्यता को देख प्रकृती भी मानोस्तब्ध है, जहां भविष्य के अश्वमेध यग्य
28:21के लिए दिव्य अनुष्ठान का आरंभ हो रहा है
28:25बैकुंठ धाम में भगवान विष्णु अपने शेशनाग पर विराजमान होकर इस महायग्य के प्रती श्रीराम के संकल्प को देख मुस्कुरा
28:33रहे हैं, क्योंकि यह केवल एक अश्वमेध नहीं अपितु धर्म की पुनरस्थापना है
28:40शाही अस्तबल के द्वारों पर एक दिव्य अश्व प्रकट होता है, जिसके शुभर शरीर पर काले कानों की अद्वितिय आभा
28:48उसे देवताओं का दूत सिद्ध करती है
28:52अश्व के मस्तत पर तेज का प्रतीक एक स्वर्ण पत्र अनकित है, जो तीन लोकों को श्रीराम की अपराजित विजय
28:59का मुख निमंत्रन दे रहा है
29:03रिश्यमुनियों के वेदमंत्रों के गूंजते स्वर के बीच, अश्व की शक्ती अयोध्या की सीमाओं को पार कर उत्तर दिशा की
29:10ओर अपनी विजय यात्रा आरंभ करती है
29:14गरुर देव उपर आकाश में मंदराते हुए इस दिव्य अश्व की रक्षा का दायत्व संभाल रहे हैं ताकि कोई भी
29:22अधर्मी इस पवित्र यात्रा में बाधा न डाल सके
29:26अश्व के खुरों के स्पर्ष से मार्ग की धूल भी स्वन के कणो जैसी चमकने लगी है मानो वसुंधरा स्वय
29:33उस्चक्रवर्ती समराट का सम्मान कर रही हो
29:37प्रकृती के कणकन में एक विचित्र स्पंदन है जो आने वाले युद्ध और महान परिवर्तन की आहट का संकेत दे
29:45रहा है
29:47अयोध्या के प्राचीर से श्रीराम इस अश्व की गती को अपनी दूरगर्शी द्रिष्टी से निहार रहे हैं
29:53उनके हृदय में एक समराट का कर्तव्य और एक पिता का द्वंदव निरंतर संधर्ष कर रहा है
30:01भगवान शिव कैलाश के शिखर पर शांत मुद्रा में बैठे हुए इस लीला के साक्षी बन रहे हैं और जानते
30:08हैं कि अंत्ता सत्य की ही विजय होगी
30:12अश्ववन की घनी छायाओं से गुजरता हुआ उनक्षेत्रों में पहुँचता है जहां आज भी प्राचीन रिशियों के तबकी सुगंध विद्यमान
30:20है
30:22अश्व के गले में बंधी विजबता का हवा के जोकों के साथ फहरा रही है जैसे वह पूरे ब्रहमांड को
30:29चुनौती दे रही हो
30:31यग्य की अगने कुंड में आहुतिया दी जा रही है जहां पुरोहितों के मंत्रों का बल अश्व की सुरक्षा के
30:38लिए एक सुरक्षा कवच बना रहा है
30:42माता लक्ष्मी वैकुंट के महल से उस स्वर्नसीता की प्रतिमा को देख कर करुणा और गर्व के भावों में डूबी
30:49हुई है
30:51अश्व के हर पच्चाप के साथ भूमी एक नया संदेश लिख रही है जहां धर्म के मार्ग पर चलने वाले
30:59को कोई नहीं रोक सकता
31:01अयोध्या की सीमाओं के बाहर की प्रकृती स्वयय इस अश्व के स्वागत में खिले हुए पुष्पों के साथ नतमस्तक हो
31:08रही है
31:11सामराज्य का वह स्वर्णपत्र जो अश्व के मस्तक पर सुशोभित है सूर्य की किर्णों से टक्रा कर एक दिवे चमक
31:18उत्पन कर रहा है
31:21रिश्यमुनी इस अनुष्थान के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि इस अश्व का लोटना ही अयोध्या के स्वर्णयुक
31:29की नई परिभाशा लिखेगा
31:32अश्व का विजयपत अब एक ऐसी यात्रा बन गया है जहां त्याग और वीर्टा का मिलन हो रहा है
31:40श्रीराम की यह मर्यादा और उनका यह संकल्प इतिहास के पन्नों पर एक अमर गाथा के रूप में अनकित होने
31:47के लिए तैयार है
31:50अयोध्या की स्वर्णमे प्राचीरों से निकल कर शत्रुगन के नेत्रित्व में अश्वमेध का यह विजय अश्वअब अग्यात और अंचुए प्रदेशों
31:58की सीमा पर अपने खुरों की ध्वनी से काल को चुनोती दे रहा है
32:04वैकुंट के स्वर्णलोटस महल में विराजमान भगवान विश्णु गरुर पर द्रिश्टी टिकाए हुए नेती के उस चक्र को देख रहे
32:11हैं जो अब इस अश्व के माध्यम से एक भीशन संग्राम की ओर बढ़ रहा है
32:18शत्रुघन ने अपनी धोजा को उचा करते हुए सेना को संकेत दिया कि वे उस रहस्यमेई वन की ओर बढ़े
32:25जहां हवाओं में भी किसी प्राचीन प्रतिशोध की गंध घुली हुई है
32:31अश्व के पच्चाप अब उस भूमी पर गूंज रहे हैं जहां काल ने अपनी मर्यादाओं को किसी धुन्धली स्मृती की
32:38तरहे पीछे छोड़ दिया है
32:41विजयरत का पहिया अब उन दुर्गम ख्षेत्रों में प्रवेश कर चुका है जहां की धरास्वय भी किसी भूली हुई गाथा
32:49के साक्षियों को दबाए बैठी है
32:52आकाश में देवताओं के दूत नारद मुनी वीना के तारों को जंकृत कर रहे हैं जैसे वे स्वय इस महा
32:59संकल्प के आगामी परिणामों की चेतावनी दे रहे हुँ
33:03शत्रुघन ने अपनी तलवार की मूठ को कसकर पकड़ा और अपने योध्धाओं को सतर्क रहने का आदेश दिया क्योंकि आसपास
33:12का सन्नाटा किसी तूफान के आने का पूर्वाभास था
33:16हवा में एक रहस्य में कमपन उत्पन हुआ जो यह दर्शाता है कि यह अश्वमेद का अश्व केवल एक सीमा
33:24नहीं बलकि सत्य और भ्रम के बीच की रेखा को लांग रहा है
33:30विस्त्रत भूमी पर दूर-दूर तक फैले हुए वे शिलाखंड जो कभी रिशियों के तपके साक्षी थे अब एक नई
33:37अगनी परीच्षा के लिए मौन खड़े हैं
33:41भगवान शिव अपने ध्यान की अवस्था में कैलाश के शिखर पर बैठे हैं उनके त्रिनेत्र के खुलने से ब्रहमांड के
33:48इस नेतिचक्र का वेग और भी बढ़ गया है
33:53शत्रुघन का अश्व अचानक एक ऐसी दिशा में मुड़ गया जहां का वातावर्ण अन्यस्थानों से भिन्न और अधिक तेजस्वी प्रतीत
34:01हो रहा था
34:03यह वह स्थान था जहां की मिक्टी में राम के त्याग की सुगंध आज भी जीवित थी जिसे केवल धर्म
34:10के रक्षक ही अनुभव कर सकते थे
34:13चारू और फैले उस बंजर और कठोर भूभाग पर शत्रुगन की सेना का अनुशासन एक अध्भुत द्रिश उत्पन्न कर रहा
34:21था
34:22गरुर के पंकों की फड़फडाहट की ध्वनी से आकाश का सन्नाटा भंग हुआ और उन्होंने शत्रुगन के मार्ग पर अपनी
34:29दिव्य द्रिश्टी डाली
34:32सैनिकों के पक्चिनहों से उस प्राचीन मिक्टी पर एक ऐसी लकीर खिंच रही थी जो आने वाले समय के युद्ध
34:39की नीम रख रही थी
34:42शत्रुगन ने अपनी द्रिश्टी से क्षितिच का अवलोकन किया उन्हें आभास हुआ कि वे एक ऐसे मोड पर हैं जहां
34:50से लोटना अब असंभव है
34:53वातावर्ण में एक अध्भुत शान्ती है लेकिन यह शान्ती उस आने वाले तूफान का संकेत है जो संपूर्ण पौरानिक गाथा
35:01को बदल कर रख देगा
35:04देवराज इंद्रभी स्वर्ग के जरोखे से इस अश्वमेध यात्रा को देख रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि इस अश्व
35:12का संकल्प केवल पृत्वी तक ही सीमित नहीं है
35:16शत्रुघन ने एक बार फिर अश्व की लगाम थामी और उसे आगे बढ़ने का निर्देश दिया
35:22उनके हृदय में श्रीराम के प्रती अगाध निष्ठा और संकल्प का ज्वार था
35:28अश्व अब एक विशाल शिलादवार के समीप है जिसके पीछे वह सत्य छपा है जिसे जानने के लिए स्वयन नेती
35:36भी उत्सुक है

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