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पद्म पुराण के 36वें अध्याय में देखिए लंका युद्ध का सबसे विध्वंसक मोड़! जब मेघनाद के वध के बाद स्वयं रावण महाक्रोध में भरकर रणभूमि में उतरा और वानर सेना में हाहाकार मच गया। देखिए कैसे देवराज इंद्र ने श्रीराम की सहायता के लिए मातलि और अपना दिव्य रथ भेजा, और आरंभ हुआ ब्रह्मांड का सबसे भयंकर महायुद्ध राम-रावण द्वंद्व!

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Transcript
00:00लंका की स्वर्णमे प्राचीरें आज शोक की गहरी काली छाया में डूबी हैं, जहां रावन का कोध्र अब ज्वाला मुखी
00:07बनकर फूटने को व्याकुल है.
00:10व्यकुंट के शांत लोक में भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर गंभीर मुद्रा में बैठे हैं, मानो विस रिष्टी के
00:18अंतिम विनाश को अपनी योगमाया से देख रहे हूं.
00:23रावन ने मेघनाद की चिता की राख को अपने मस्तक पर लगाया और अपने विशाल लौह रत को लंका के
00:30मुख्य द्वार की ओर मोर दिया.
00:32प्रकृती का चक्र मानो ठहर गया है और आकाश में रक्तवर्णी बिजली की कड़कडाहट लंका के विनाश का उद्गोश कर
00:40रही है.
00:42लंका की गलियों में असुरों की सेना का हुजूम एक काले सागर की तरह उमर पड़ा है, जिन में अब
00:49भय नहीं बलकी प्रतिशोध की अगनी धधक रही है.
00:54कैलाश के शिखरों पर महादेव ने अपनी तीसरी आख को किंचित खोल कर इस महा संग्राम की भीशनता को भांप
01:01लिया है.
01:03रावन के रत के घोडों की हुंकार से धर्ती थर्रा उठी है और लंका के द्वारों पर लगे स्वर्णमे कपाट
01:10स्वय ही विदीर्ण होने लगे हैं.
01:13यह वहक्षन है जब नेती ने रावन को रनभूमी की वेदी पर बली देने के लिए स्वय निमंत्रित किया है.
01:22असुर सेनाप्तियों का गर्व आज रावन के उस दहार के नीचे दब गया है, जिसे सुनकर काल का चक्र भी
01:29सहम उठा है.
01:31भगवान विश्णों के नेत्रों में करुणा और कठोर्ता का अध्भुत मिलन है, क्योंकि वे जानते हैं कि धर्म की रक्षा
01:39हेतु अधर्म का अंत अनिवार्य है.
01:42रावन का रथ अब उन गलियों से गुजर रहा है, जहां कभी मेघनाद की विजय घोशनाएं गूंजती थी, आज वहां
01:50केवल सन्नाटा है.
01:53अंधकार के उस वातावर्ण में लंका के द्वारपालों के रूप में खड़े बोरहेडेड असुर एक अजीब सी विभीशिका फैला रहे
02:01हैं.
02:03रनभेरी का स्वर गूंचते ही लंका के समस्थ असुरों ने अपनी तलवारें आसमान की ओर उठाली हैं.
02:11नारद मुनिक जो अपनी वीना पर विनाश के सुर छेड रहे हैं, आकाश मार्ग से इस विनाशकारी द्रिश को निहार
02:18रहे हैं.
02:20रत की धुरी से निकलने वाली चिनगारियां लंका की काली धरा पर आग की लकीरें खींच रही हैं.
02:28रावन ने अपनी दस भुजाओं को आकाश में उठा कर काल को चुनौती दी और उसकी आबाज ने लंका की
02:35पूरी धरा को हिला दिया.
02:38समस्त वानर सेना भी इस गर्जना को सुनकर सचेत हो गई है. मानो उन्हें संकेट मिल गया हो कि अब
02:45साक्षात मृत्युरंभूमी की ओर बढ़ रही है.
02:50देवलोग के देवताओं ने भी अपनी द्रिष्टी लंका की ओर कर ली है क्योंकि उन्हें विदित है कि आज का
02:57युद्ध स्रिष्टी का भाग्य तै करेगा.
03:00रावन का रत लंका के अंतिम द्वार को तोड़ कर बाहर निकर रहा है और उसके साथ ही लंका का
03:07पतन भी आरंभ हो गया है.
03:10युद्ध भूमी अब तयार है जहां राम की मर्यादा और रावन के अहंकार का अंतिम संघर्ष लंका की राख पर
03:17लिखा जाएगा.
03:19रावन के दस सिरों से निकलते अगनिबानों ने रणभूमी के आकाश को काले धुएं के गुबार से ढख दिया है,
03:27जहां से गिरते जलते हुए अंगारे पूरी वानर सेना को राख में तबदील कर रहे हैं.
03:33देव लोक में भगवान विश्नु अपनी शेश्या पर स्थित क्षीर सागर के दिव्य महलों से इस विनाश को देखते हुए
03:41अपने शांत और स्थिर नेत्रों से आगामी परिनामों का आकलन कर रहे हैं.
03:47रावन के बानों की गूंच से धर्ती काम उठी है और उसके धनुष की प्रत्यंचा से निकलती ध्वनी ने बड़े
03:54-बड़े वानर योध्धाओं के कानों को बहरा कर दिया है.
03:59आकाश में असुरों के तांडव का द्रिश ऐसा है जैसे नरक का द्वार खुल गया हो, जहां रक्त और राख
04:06के बीच केवल विनाश का संगीत सुनाई दे रहा है.
04:10वानर सेना के मुख्य सेनाप्ती नील ने अपनी गदा उठाकर रावन के रत को रोकने का साहस किया है, परंतु
04:18असुर समराट की मायावी गती के आगे उनका बल फीका पड़ गया है.
04:24देवर्शी नारद अपनी वीना को थामे हुए, अपने दिव्य मुख पर एक गंभीर चिन्ता की लकीर लिए, मेघनाद के वद
04:31के बाद रावन के इस अंतिम उनमाद को देख रहे हैं.
04:36रावन ने एक भयानक अस्त्र का आहवान किया है, जिससे लंका की हवा जहरीली हो गई है, और चारों ओर
04:44से काले कीटों का एक बवंडर उठकर वानरों को निगल रहा है.
04:49यह युद्ध अब केवल शस्त्रों का नहीं, बलकी मर्यादा और अधर्म के बीच का अंतिम महा प्रलय बन चुका है,
04:57जिसके साक्षी स्वयम ब्रहमांड के देवता भी हैं.
05:01वानर सेनाप्ती सुग्रीव ने अपनी विशालकाय शक्ती का प्रदर्शन करते हुए एक परवत को उठाकर रावन के रत की ओर
05:09फेंका है, जिससे असुरों की सेना में भगदर मच गई है.
05:15भगवान शिव कैलाश की एकांत शांती में बैठे हुए अपनी तीसरी आख को हलका सा खोल रहे हैं, जैसे वे
05:22रावन के अंकार के अंतकाक्षन देख रहे हुँ.
05:27रावन ने हंस्ते हुए अपने दस हाथों में दस अलग-अलग दिव्य अस्त्रधारन कर लिये हैं, जो लंका की रक्षा
05:34के लिए अंतक लड़ने का संकल्प ले चुके हैं.
05:38अंधेरे और विनाश के बीच लंका के द्वार पर ही अब मृत्यु का तांडव हो रहा है, जहां हर पल
05:45एक नया वीर धराशाई हो रहा है.
05:49रावन के क्रूर प्रहारों के सामने वानरों की बहादूरी भी अब डग्मगाने लगी है, और केवल राम के नाम का
05:56स्मरण ही उन्हें पुनरजीवित करने का बल दे रहा है.
06:01देवतागन रावन की आसुरी शक्तियों को देख कर चकित हैं, क्योंकि उसने अपनी साधना के बल पर ब्रहमांड के सभी
06:08नियमों को चुनौती दे दी है.
06:11एक गड़गडाहट के साथ रावन के रत का पहिया लंका की गहरी खाईयों में फस गया है, और इसी क्षन
06:18से उसके भाग्य का चक्र उलटने लगा है.
06:22रावन के चहरे का अहंकार अब धीरे-धीरे क्रोध और चिंता की रिखाओं में बदल रहा है, क्योंकि उसने पहली
06:30बार अपने भीतर भय को महसूस किया है.
06:34असुर सेना के शेश बचे सैनिक अपनी जान बचा कर भाग रहे हैं, लेकिन रावन उन्हें अपनी माया से रोक
06:41कर मरने के लिए विवश कर रहा है.
06:44पूरे आकाश में एक अजीब सी खामोशी छा गई है, जैसे प्रकृती स्वया राम और रावन के अंतिम आमना सामने
06:52के लिए सांस रोक कर खड़ी हो.
06:55रावन अपने तूटे हुए रत से उतर कर अब पैदल ही रनभूमी के मध्य में खड़ा है और उसके साथ
07:02पूरी लंका की नेती दाव पर लगी है.
07:06अब समय आ गया है जब मर्यादा पुरुशोत्तम और अहंकारी दसकंधर का आमना सामना लंका के इस्ट मशान में होकर
07:14रहेगा.
07:16रनभूमी की राख के बीच सुग्रीव ने अपनी गर्जना से वानर सेना में नया प्रान फूंक दिया और लंका की
07:23ओर पत्थरों का सैलाब उमड पड़ा.
07:26स्वर्ग से देखते हुए देवराज इंद्र अपने दिव्यरत की स्वर्ण आभासे राम के विजय संकल्प को और भी प्रखर कर
07:34रहे हैं.
07:36अंगद ने एक विशाल परवत शिखर को अपनी भुजाओं पर उठा लिया है और उसे काल के ग्रास के रूप
07:43में लंका के द्वार पर दे मारा.
07:46आकाश में तैरते हुए वो पहाड किसी उलकापिंड की भांती लग रहे हैं, जो रावण के अहंकार को कुचलने के
07:53लिए सीधे मृत्यू की ओर बढ़ रहे हैं.
07:57रावण ने अपनी अट्थास भरी हंसी के साथ एक दिव्य अस्त्र का संधान किया, जिससे वो विशाल परवत हवा में
08:05ही राख के धेर में बदल गए.
08:08भगवान विश्नु बैकुंट के अपने पावन धाम से इस धर्मधर्म के अंतिन द्वंद्व को एक मूख साक्षी के समान देख
08:15रहे हैं.
08:17वानर सेना के अदमय साहस को देख कर रावन का क्रोध सात्वे आसमान पर है और वह अपने असुर सैने
08:25बल को पूर्ण विनाश का आदेश देता है.
08:29मैदान में उठने वाली यह धूल और राख की आंधी काल के उस चक्र को दर्शाती है जो अब लंका
08:36के विनाश का समय लिख चुका है.
08:40सुग्रीव की गर्जना से लंका की धर्ती काम उठी है और वानर सैनिकों ने अब असुरों को अपने घेरे में
08:47लेना शुरू कर दिया है.
08:50शिव जी कैलाश के शिखर पर अपनी समाधी से बाहर आए हैं, उनकी त्रिनेत्र की ज्वाला इस रनभूमी के परिनाम
08:57को पहले ही देख चुकी है.
09:00असुर सैनिकों के तीखे अस्त्रों ने वानर सेना को रोकने का प्रयास किया, परंतु राम के अनुयाईयों का उत्साह किसी
09:08भी अस्त्र से उचा है.
09:11धूमिल आकाश में रावन की दहाड एक वजर के समान सुनाई दे रही है, जो पूरी लंका में भय और
09:18विनाश का संदेश फैला रही है.
09:21राम के चहरे पर उस मर्यादा की शांती है, जो अधर्म के अंत के लिए आवश्यक उस महा संग्राम का
09:28आगास करने को तयार है.
09:31देवतागन आकाश में एकत्रित होकर इस महा संग्राम को देख रहे हैं, मानोस्वय भाग्य अपनी लेखनी लेकर लंका की अंतिम
09:40घडी की प्रतीक्षा कर रहा है.
09:43अंगद ने अपनी शक्ती से असुरों के एक बड़े दल को तितर बितर कर दिया है, जिससे लंका की रक्षा
09:50दिवार अब धीरे-धीरे ढहने लगी है.
09:54लंका के उस्ष्मशान रूपी शया पर अब केवल रक्ष और राख का सामराज्य है, जहां दसकंधर का अहंकार अपनी पराकाश्था
10:02पर पहुँच चुका है.
10:05सुग्रीव के नेत्रित्व में वानर सेना अब रावन के उस स्थान तक पहुँच चुकी है, जहां उसे अपनी भूल का
10:12एहसास अंतिन समय में होगा.
10:15इंद्र का दिव्यरत जो रावन की अट्थास को शांत करने आया है, अब उसकी चमक से लंका का अंधकार दूर
10:22होने लगा है.
10:25वानर और असुरों के बीच का यह संघर्ष अब उस बिंदु पर आ गया है, जहां से केवल एक ही
10:31सत्य का उदे संभव है.
10:34अंतिम प्रहार की पूर्व संध्या पर आकाश में बिजलियों की गड़-गड़ाहट यह संकेत दे रही है कि अब रावन
10:42के पतन का सूर्य अस्थ होने को है.
10:46रणभूमी के क्षितिच पर रावन का अहंकार और लक्षमन का क्रोध एक दूसरे के सम्मुख खड़े होकर ब्रहमांडिय उर्जा का
10:53संतुलन बिगाड रहे हैं.
10:57कैलाश परवत पर शांत बैठे भगवान शिव ने अपनी त्रिनेत्र की ज्वाला से इस भीशन युद्ध के अंत का संकेत
11:04दिया है.
11:06लक्षमन ने अपनी धनुष की तंकार से संपून असुर सेना को कमपा दिया और बिजली की गती से रनभूमी की
11:13ओर दौर पड़े.
11:15लक्षमन के रौद्र रूप को देखकर लंका का आकाश भी काले बादलों में लिपट गया है, मानो प्रकृती स्वय इस
11:23महायुध की गवाह बन रही हो.
11:26रावन के दिव्य रत के सामने लक्षमन ने अपना विजय धनुष तान लिया है, जिसे देखकर राक्षसों के हृदय में
11:33भय व्याप्थ हो गया है.
11:36देवराज इंद्र ने स्वर्णिम रत के उपर से लक्षमन के इस साहस को देखकर आशिरवाद स्वरूप दिव्य प्रकाश की वर्षा
11:44की है.
11:46लक्षमन के एक ही बाण ने रावन के दस मुखों वाली ध्वजा को रनभूमी में धराशाई कर दिया.
11:53ध्वजा के गिरने के साथ ही लंका के दुर्गों से उठने वाला गर्जना का स्वर एकाएक सन्नाटे में बदल गया.
12:01रावन का धनुष जिसे वह अपनी शक्ती का प्रतीक मानता था, लक्षमन के बानों के प्रहार से एक जटके में
12:09तूट गया.
12:10लक्षमन की ललकार सुनकर रावन का अहंकार क्रोध में बदल गया और उसने अपनी गदा उठा ली.
12:18रणभूमी अब दो महाशक्तियों के व्यक्तिगत द्वंद का अखाडा बन गई है, जहां केवल कौशल का ही मूल्य है.
12:26आकाश में खड़े गरूर देव इस एतिहासिक युद्ध के प्रत्येक्षण को अपनी तीक्षन द्रिष्टी से निहार रहे हैं.
12:35रावन ने अपनी मायावी शक्तियों का आहवान किया, जिससे रणभूमी में विशैले जीव और काली चायाएं उभरने लगी.
12:44लक्षमन ने अपनी दिव्यास्त्र विद्या के बल पर रावन की उन मायावी चायाओं को बानों के प्रहार से नश्ट कर
12:51दिया.
12:53दोनों के बीच होने वाला यह द्वंद अब एक तीवर वेग और गती ले चुका है, जिसे देखना साधारण मानव
13:00के लिए असंभव है.
13:03ब्रह्मा जी अपने लोक से इस धर्म युद्ध के अंतिम चरण की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जहां अधर्म का पूर्ण
13:10विनाश निश्चित है.
13:13लक्षमन की हर एक फुर्तीली चाल रावन के दस सिरों के अहंकार को चुनोती दे रही है.
13:20युद्ध क्षेत्र के उस पाताल लोक के निकट, धधक्ती हुई अग्नियों से उठने वाली लप्तें इस संधर्ष की तीवरता को
13:27और बढ़ा रही है.
13:30रावन ने पुनह अपनी माया का विस्तार करते हुए आस्मान को पूरी तरह से रक्तलाल रंग में रंग दिया है.
13:39परंतु लक्षमन के संकल्प की अग्नी के सामने यह माया अब लुप्त होने लगी है और सत्य का मार्ग प्रशस्थ
13:46हो रहा है.
13:48लक्षमन के निरंतर और अचूप प्रहारों से तिल्मिलाए हुए लंकापती रावन के भीतर का क्रोध अब अपनी समस्त सीमाओं को
13:56लांध कर एक भयानक प्रलै का रूप ले चुका था.
14:00क्रोध की चरम सीमापर पहुँचकर उस महाबली राक्षस ने पाताल लोग की असीम शक्तियों को अपनी ओर आकर्शित करना आरंभ
14:08कर दिया.
14:10माया दानव द्वारा प्रदत उस अलोकिक और आदिम अंधकार की शक्ति का स्मरण करते ही रावन के हाथों में एक
14:18महाविनाशक अस्त्र प्रकट हुआ.
14:20वह अस्त्र साधारन धातु का नहीं, अपितु ब्रहमांड की समस्त नकारात्मक उर्जाओं और मायावी अस्त्रों का संघटन था जो दसों
14:29दिशाओं को डरा रहा था.
14:32समूचे युद्धक्षेत्र में उस मायावी अस्त्र के प्रकट होते ही सूर्य का तेज भी उस भयानक अंधकार के आगे क्षीन
14:40पड़ने लगा.
14:42देवलोक में बैठे देवताओं की सांसे थम गई और उन्होंने इस आसन्न संकट से बचने के लिए अपने इश्ट देवों
14:49का स्मरण करना शुरू कर दिया.
14:52रावन ने अपनी दसों भुजाओं से उस प्रजवलित अस्त्र को उपर उठाया और उसके भीतर के पाताल लोक के मंत्रों
15:00का उच्चारण किया.
15:02वह अस्त्र एक विशाल उलकापिंड की भाती दमक उठा, जिससे उठने वाली चिंगारियों ने आसपास की भूमी को सुलगते हुए
15:10अंगारों में बदल दिया.
15:13वानर सेना के खेमे में अचानक एक सन्नाटा चा गया और सभी योध्धा इस आसन्न महाविनाश को देखकर स्तब्ध रह
15:21गए.
15:22रिशी महर्शी भी इस बात से भयभी थे कि यदि यह अस्त्र अपने लक्षे पर जागिरा, तो प्रित्वी का संतुलन
15:30पूरी तरह से बिगड़ जाएगा.
15:33रावन की अटहास गूंज उठी और उसने अपने समस्थ अहमकार को समेट कर उस घातक हथियार को लक्षे की ओर
15:40जटकने का उपक्रम किया.
15:43हवा में चीखती हुई आंधिया उठने लगी और धर्ती का हर एक कन उस महान शक्ती के भार से कांप
15:50उठा.
15:51उस भयानक प्रहार की उर्जा इतनी तीवर थी कि अंतरिक्ष के तारे भी मानो अपनी जगह से हिलने लगे थे.
16:00देवराज इंद्र ने अपने दिव्यरत पर खड़े होकर इस भयंकर ग्रिश को देखा और भगवान श्री राम का स्मरण किया.
16:09रावन ने अपनी संपूर्ण असुर्शक्ती का आहवान करते हुए उस महास्त्र को पाताल लोग की बची हुई उर्जा से त्रिप्त
16:17किया.
16:18अस्त्र की सतह से निकलने वाली लप्टें इतनी गर्म थी कि आसपास की चट्टाने पिघल कर लावा में बदलने लगी
16:26थी.
16:27राक्षस राज की यह अंतिम और सबसे भयानक चाल पूरे ब्रहमांड को एक नए विनाश के मुहाने पर ले आई
16:34थी.
16:36ब्रहमांड के सभी संरक्षक देवता इस संकट की घड़ी में एक तक उस भयानक अस्त्र की गती को देख रहे
16:43थे.
16:44रावन ने अपने पागलों जैसी हंसी के बीच उस अस्त्र को अपनी पूरी दानवी ताकत से आस्मान की तरफ लक्षित
16:52कर दिया.
16:53एक कान फार देने वाले धमाके के साथ वह मायावी अस्त्र रावन के हाथों से छूट कर सीधे युद्ध भूमी
17:01के उपर मंदराने लगा.
17:03युद्ध भूमी के उपर मंदराते उस मायावी अस्त्र से निकली भयंकर ज्वालाएं पूरे आकाश को एक रक्तवन काली चादर में
17:12लपेटने लगी
17:14स्वर्गलोक में देवराज इंद्र अपने दिव्यरत पर विराज मान होकर चिंतामगन द्रिष्टी से उस विनाशकारी द्रिष्य को निहार रहे थे
17:23तभी श्रीराम ने अपनी कोदंड धनुष को धारण किया और उनके शरीर से प्रस्पुटित दिव्यतेज ने उस दानवी अंधकार को
17:32क्षण भर में चीर दिया
17:34श्रीराम की उपस्थिती मात्र से रनभूमी की थर्थराहट शान्त हो गई और एक दिव्यन नीलिमा ने चारों ओर के भयंकर
17:42अगनिकुंडों को धक लिया
17:44रावन ने जैसे ही राम को सामने देखा उसकी अट्थास की गूंज रनभूमी की दिवारों से टकरा कर वापस उसी
17:52की ओर लोटने लगी
17:54भगवान विश्णुनेक शीरसागर के वैभव से उस महायुद्ध के अंतिन क्षणों को देखते हुए अपनी माया के विस्तार को एक
18:02नया मोर दिया
18:04श्री राम ने अपनी तरकश से एक ऐसा बान निकाला जो सूर्य की भांती तेजस्वी था और जिसने रावन के
18:12अस्त्र की उर्जा को सोखना प्रारंभ कर दिया
18:16रनभूमी के चारों और फैला हुआ वह तप्त लोहे का वातावर्ण श्री राम के आगमन से एक अलौकिक शितलता का
18:23अनुभव करने लगा
18:25पूरे ब्रहमांड की शक्तियां अब श्री राम के उस प्रहार की प्रतीक्षा में थी जो रावन के अहंकार के अन्तिम
18:33स्तंभ को गिराने वाला था
18:35ब्रहमाजी ने अपना कमल आसन छोड़ कर उस दैविय युद्ध के परिनाम के लिए सुक्ष्म ग्रिष्टी से सत्य को परखना
18:43शुरू किया
18:44रावन ने अपनी पूरी शक्ती का आहवान करते हुए उस मायावी अस्त्र को श्री राम की ओर छोड़ने के लिए
18:51अपनी भुजाएं पूरी तरह तान दी
18:55श्री राम ने अपने धनुष को पूरी निश्था से खीचा और वातावर्ण में एक गूंज उठी जो समस्त राक्षसी माया
19:03को नश्ट करने वाली थी
19:05युद्ध का विस्तार उन गहरी खाईयों तक पहुँच गया जहां से अब रावन की दानवी शक्तियों का अंतिन स्रोत निकल
19:13कर बाहर आने लगा था
19:15महादेव ने अपनी तीसरी आख के कुछ अंश से श्री राम को उस युद्ध में विजय का आशिरवाद दिया जिसे
19:22देख देवलोग भी आननदित हो उठा
19:26श्री राम के एक साधारन से बान ने रावन के अस्त्र को बीच में ही काट दिया जिससे पूरा आकाश
19:32स्वर्ण में चिंगारियों से भर गया
19:35इस द्रिश को देख कर वानर सेना में ऐसा उत्साह भर गया कि उनकी जैभोश की आवास पाताल के अंतिम
19:43छोर तक पहुँच गई
19:45रावन को पहली बार लगा कि उसका अजे होने का अहंकार अब श्री राम के चर्णों में गिरकर धूल चाटने
19:52को विवश है
19:55देवराज इंद्र ने अपने दिव्यरत की बागडोर थामी और मुस्कुराते हुए राम के पराक्रम की स्थुती करने लगे
20:03श्री राम की आखों में अब केवल धर्म की स्थापना का संकल्प था जिसने रावन के बचे हुए राक्षसी तेज
20:10को पूर्णता निस्तेच कर दिया
20:13युद्ध का यह चरन अब उस महाप्रलाई की ओरबढ चला था जहां से केवल सत्य का उदे ही एक माटरशेश
20:21परिनाम था
20:22Watching from the heaven's
20:25Lord Indra notices that Rāwna commands an aerial war chariot while Rama battles
20:32Indra immediately dispatches his divine charioteer Mathli with the celestial solar chariot
20:40Impenetrable armor
20:42and the heavenly bow
20:44watching from the heavens
20:46Lord Indra notices that Ravana commands an aerial war chariot while Rama battles
20:54Indra immediately dispatches his divine charioteer Matli with the celestial solar chariot
21:02impenetrable are more
21:04and the heavenly bow
21:06watching from the heavens
21:09Lord Indra notices that Ravana commands an aerial war chariot while Rama battles
21:16Indra immediately dispatches his divine charioteer Matli with the celestial solar chariot
21:24impenetrable are more
21:26and the heavenly bow
21:29watching from the heavens
21:31Lord Indra notices that Ravana commands an aerial war chariot while Rama battles
21:38Indra immediately dispatches his divine charioteer Matli with the celestial solar chariot
21:47impenetrable are more
21:49and the heavenly bow
21:52Rana Bhoomii के उपर आकाश में Indra का वह स्वणिन रत बादलों को चीरता हुआ बिजली की गती
21:58से अवत्रित हुआ जिससे पूरी लंका नगरी एक दिव्य आलोक से जगम का उठी
22:05देवराज इंद्र के सार्थी मातली जिनका तेज अगनी के समान प्रजवलित था
22:10ने रत की बागदोर थामकर प्रभु श्री राम को सादर नमन किया
22:15मातली ने अपनी गूंजती हुई वानी में कहा
22:18कि हे प्रभु यह रत इंद्र ने आपके विजय संकल्प को पूर्ण करने के लिए भेजा है
22:25प्रभु श्री राम ने रत की दिव्यता को देख कर उसकी परिक्रमा की
22:30मानो साक्षात सूर्य का रत धर्ती पर उतर आया है
22:35जैसे ही श्री राम ने एक पग रत पर रखा
22:48को आकाश की ओर उठा कर जयगोश किया, जिससे दसों दिशाएं गूज उठी हैं।
22:54रत के पहियों के टक्राने से उत्पन्न ध्वनी ने रनभूमी के वायुमंडल को शुद्ध कर दिया और राक्षसी माया का
23:02अंत होने लगा।
23:04आकाश में खड़े देवताओं ने पुश्प वर्शा की और वह रत प्रभू श्री राम की उपस्थिती में और भी अधिक
23:11दैविय कांती से चमकने लगा।
23:14लंका के प्राचीरों पर खड़े राक्षस भयभीत हो गए क्योंकि उन्होंने राम के इस दिव्य रूप के सामने अपनी आसुरी
23:22शक्ती को क्षीन होते देखा।
23:24प्रभू ने दिव्य कवच धारण कर अपना वह धनुष हाथ में लिया जिसे स्वयं ब्रहमा जी ने निर्मित किया था।
23:32मातली ने बागदोर संभालते हुए घोरों को गती प्रदान की और वह रत वायू से भी तीवर गती से आगे
23:40बढ़ा।
23:40रत की गूंजरन भेरी के समान थी जो काल के चक्र को भी चुनोती देती हुई प्रतीत हो रही थी।
23:49राम के हाथों में धनुष का स्पर्श होते ही वातावर्ण में एक विद्युच्सी तरंग दोड़ गई और आकाश में बिजली
23:57चमक उठी।
23:58रावन के महल से एक भयावह गर्जना हुई जैसे स्वयंकाल उसे युद्ध के लिए आमंत्रित कर रहा हो।
24:07इंद्र का रत अब युद्ध क्षेत्र के केंद्र में था जहां स्वया राम अपनी विजय की प्रतिग्या पूर्ण करने के
24:13लिए ततपर थे।
24:15रत के चारों और एक सुरक्षा धेरासा बन गया था, जिसे कोई भी आसुरी माया भेदने में असमर्थ थी।
24:24मातली ने एक बार पुना शंकनाद किया, जिसकी आवाज से लंका की धर्टी हिल उठी और राक्षसों के हृदय कांप
24:31उठे।
24:33वानर सेना ने राम के समर्थन में अपनी विजय ध्वनी उठाई, जो पूरी लंका में एक गर्जना की भांती थैल
24:40गई।
24:41रत पर सवार प्रभुश्री राम की कांती चंद्रमा के समान शीतल परंतु सूर्य के समान प्रखर थी।
24:49अंतिम युद्ध का बिगुल बस चुका था और राम ने अपना धनुष खीच कर रावन के विनाश का संकल्प लिया।
24:57रणभूमी के मध्य में खड़े होकर रावन ने अपने हाथों से अस्त्रों का आहवान किया और आकाश में काले मेग
25:05छाने लगे।
25:07देवलोक में बैठे देवताओं की सांसे थम गई जब उन्होंने रावन के प्रचंड अहंकार से उत्पन हुए पहले प्रहार को
25:15देखा।
25:16रावन के संकेत पर उसके हाथों से छूटा हुआ अग्नियास्त्र एक प्रल्यकारी अग्निपुंच की भांती राम की ओर जप्ता।
25:25उस धधक्ती हुई अग्नि के चारों और लाल रंकी लप्ते नाच रही थी और पूरी रणभूमी का तापमान अचानक अत्यधिक
25:33बढ़ गया था।
25:35प्रभुश्री राम ने बिना किसी विचलिक भाव के अपने तरकश से जल तत्व से युक्त वरुनास्त्र को बाहर निकाला।
25:44ब्रहमांड के रक्षक भगवान विश्नु ने इस महायुद्ध के अगले चरण को देखकर मंद मुस्कान के साथ विजय का आशिरवाद
25:52दिया।
25:53राम द्वारा छोडा गया वरुनास्त्र नीले प्रकाश की एक विशाल लहर बनकर उस प्रज्वलित अगनी की ओर बढ़ चला।
26:02आकाश के पट पर जल और अगनी की यह भीशन भिंत एक अध्भुत और विस्मयकारी द्रिश्य प्रस्तुत कर रही थी।
26:10अगन्यास्त्र की भयंकर गर्मी वरुनास्त्र के ठंडे प्रहार से टक्रा कर ठंडी पढ़ने लगी और चारों ओर धुंद छा गई।
26:19रिशी मुनी और गंधर्व गण बादलों की ओट से इस अध्वितिय द्वंदव को देखकर आश्चर्यच कित होकर मंत्र मुग्ध हो
26:26रहे थे।
26:28क्रोध से बौक लाए रावण ने अपने बीस हाथों में एक साथ कई भयंकर दानवी अस्त्रों को धारण कर लिया।
26:36लंका का पूरा आकाश असुरों के काले जादू और भ्रमित करने वाली मायावी उर्जा से पूरी तरह ढख गया था।
26:45रावण के इस मायाजाल को भेदने के लिए प्रभु राम ने अपने दिव्य धनुष पर सूर्य अस्त्र का संधान किया।
26:53महर्शी नारद ने अपनी वीना रोक कर इस महाविनाशक अस्त्र के निकलने पर नारायन का स्मरण करना शुरू कर दिया।
27:02राम के धनुष से छूटते ही सूर्य अस्त्र ने सहसर सूर्यों के समान तीवर प्रकाश से पूरी रनभूमी को चकाचौंध
27:10कर दिया।
27:11वह दिव्य प्रकाश इतना प्रचंड था कि रावन की सभी मायावी शक्तियां एक क्षण में ही नश्ट होने लगी।
27:19असुर राज रावन अपनी ही माया के खंडित होने पर पीछे की ओर हटा और उसका अहंकार हिल उठा।
27:27वानर सेना ने राम के इस पराक्रम को देख कर हरशोल लास के साथ जैश्री राम के जैकारे लगाने शुरू
27:35कर दिये।
27:36दसों दिशाओं में अस्त्रों के इस महा संग्राम की गूंज और गड़गडाहट से संपून ब्रहमांड कांप उठा था।
27:44यह वह निर्नायक्षन था जहाँ धर्म और अधर्म के बीच का अंतिन निर्नय केवल एक बान की दूरी पर था।
27:53राम के अर्धचंद्र बानों ने जैसे ही रावन के मस्तक को धड़ से अलग किया, चारों और एक भयानक सन्नाटा
28:00पसर गया।
28:02स्वय भगवान शिव ने कैलाश की उचाईयों से अपनी तीसरी आख खोल कर इस विचित्र युद्ध की गती को देखा
28:09और मूख वेदना में डूबे रहे।
28:12रावन के कटे हुए मस्तक के गिरते ही, उसकी जगह पलक जपकते ही नया मस्तक उगाया, जिसे देखकर वानर सेना
28:20के साहस का मनोबल तूटने लगा।
28:23दसों दिशाएं रावन के इस अभेद्य मायाजाल से कामप उठीन और वातावर्ण में एक अपवित्र अंधकार चाने लगा।
28:32राम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा को और भी जोर से खीचा, क्योंकि उन्हें भान हो चुका था कि रावन
28:39की अमर्ता का आधार उसके भीतर ही कहीं छिपा है।
28:44आकाश मार्ग से देख रहे देवताभी घबरा उठे और नारद मुनी ने भगवान विश्नु से इस रहस्य के भेद को
28:51खोलने की प्रार्थना की।
28:54प्रत्येक बान रावन के दसों सिरों को काट देता, किन्तु रक्त की बूंदे गिरते ही वे पुनह जीवित होकर गर्जने
29:01लगते।
29:02रनभूमी का वातावर्ण भारी हो गया और मिट्टी में मिल रहे रावन के कटे मस्तक एक दरावनी गूम्ज उत्पन्न कर
29:10रहे थे।
29:12राम की दृष्टी रावन की नाभी पर टिकी थी, जहां से उसे अमरित की शक्ती प्राप्थ हो रही थी, और
29:19यह सत्य उनके हृदय में बिजली की तरह कौंध गया।
29:23देवराज इंद्र ने अपने दिव्यरत से राम को संकेत दिया कि वे अब उस नाभी अमरित पर ही अंतिम प्रहार
29:30करें।
29:32जैसे ही राम का बान रावन की ओर बढ़ा, लंका के राक्षस भय से चिलाने लगे और सारा आकाश कमपायमान
29:40हो गया।
29:41रावन की भुजाओं की ताकत और अहंकार धीरे धीरे बान के ताप से गलने लगा और उसका घमंड ढहने के
29:48कगार पर आ गया।
29:51वानर सेना ने राम के उस बान को देखकर एक बार फिर जैगोश किया, जिससे पूरी लंका की नीम भिल
29:58गई।
29:59ब्रहमा जी ने स्वयं प्रकट होकर इस विनाशकारी द्रिश को निहारा, जानते हुए कि अब धर्म की पुनहस्थापना निश्चित है।
30:09राम का बान अब रावन के शरीर के बिलकुल करीब था, जो उसकी अमरता के अभिशाप को समाप्त करने के
30:16लिए उद्यत था।
30:18युद्ध का यह अंतिम प्रहार ब्रहमांड के संतुलन को बदलने वाला था, जहां अमरित और विश्का महासंग्राम चरम पर था।
30:27विभीशन भी दूर खड़े होकर अपने भाई के अंत को देख रहे थे, उनकी आखों में दुरक और न्याय की
30:34मिली जुली भावनाय थी।
30:37तीनों लोकों की आत्माय जैसे उसक्षन को थाम कर खड़ी थी, जब अधर्म के सबसे बड़े स्तंभ का पतन होने
30:44जा रहा था।
30:46रावन ने अंतिम बार अपना अटहास किया, जिसे सुनकर पाताल के निवासी भी काम उठे, परंतु उसका यह अहंकार अब
30:54अंत के करीब था।
30:57राम ने अपने मन को पूरी तरह एकागर किया और सत्य के उस अंतिम बान को रावन के हृदय पर
31:03छोड़ दिया।

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