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पद्म पुराण के इस नए अध्याय में, भगवान श्रीराम और लक्ष्मण, हनुमान के साथ मिलकर किष्किंधा के वानर राज सुग्रीव से भेंट करते हैं। क्या यह मित्रता सीता की खोज का मार्ग प्रशस्त करेगी, या इसके लिए एक और महान योद्धा का बलिदान देना होगा? सुग्रीव की व्यथा, बालि का अजेय पराक्रम, और राम के उस निर्णायक बाण का रहस्य जो किष्किंधा के भाग्य को बदल देगा। धर्म और नियति के इस जटिल खेल में, क्या राम का निर्णय न्यायपूर्ण था? इस रोमांचक गाथा में जानिए कैसे एक मित्रता ने एक साम्राज्य की दिशा बदल दी और सीता के पुनर्प्राप्ति की नींव रखी। #PadmaPurana #Ramayan #Sugriva #ValiVadh #Kishkindha #RamSugrivaFriendship #HinduMythology #EpicStories #LordRama #Hanuman
Transcript
00:00सीता के विरह में व्याकुल श्री राम और लक्षमन रिश्यमुक परवत की घनी वादियों में एक शांत जील के किनारे
00:07से होते हुए गहन वन के भीतर प्रवेश करते हैं, जहां नेती का एक नया अध्याय उनकी प्रतीक्षा कर रहा
00:14था।
00:15दूर वैकुंठ में श्रीहरी विश्नु अपने अनंत शयन पर विराजे ब्रहमांड के इस महत्वपूर्ण संगम को अपनी असीमित चेतना से
00:24सुक्षमता से अवलोकन कर रहे थे।
00:45गेहन सन्नाटा पसरा था, जहां हर पत्ती की सरसराहट भी आने वाले महान परिवर्तनों की पूर्व सूचनासी प्रतीत हो रही
00:53थी।
00:54श्रीराम ने अपनी पहचान प्रकट करते हुए हनुमान को अपने वनवास और सीता हरण की करुण कथा सुनाई, जिससे हनुमान
01:03का हृदय करुणा और भक्ती से भर उठा।
01:07सत्य का यह प्रक्ती करण स्रिष्टिकर्ता ब्रह्मा को भी आनंदित कर रहा था, जो अपने लोग से इस दिव्य मिलन
01:14को एक अलौकिक द्रिष्टी से देख रहे थे।
01:18ततपश्चात हनुमान ने विनमरतापूर्वक श्रीराम और लक्षमन को अपने कंधों पर बिठाया और उन्हें लेकर रिश्यमुक परवत की एक गुप्त
01:27गुफा की ओर प्रस्थान किया, जहां वानर्राज सुग्रीव अपने भाई बाली के भाय से छिपकर निवास कर �
01:35गुफा के प्रवेश्ध द्वार पर छिपकर बैठे सुग्रीव के हृदय में एक तीवर आशंका उत्पन हुई, जैसे किसी अद्रिश्य खत्रे
01:43की आहट ने उन्हें घेर लिया हो।
02:03साथ ध्यानमग्न अवस्था में भी इस धर्ती के महत्वपूर्ण क्षणों का आभास कर रहे थे, उनके चहरे पर एक गंभीर
02:11शांती चाई थी।
02:33से हवा में एक अनकहा तूफान मंदरा रहा हो।
02:37हनुमान ने अपने स्वामी के संशय को भापते हुए, आगे बढ़कर विनमरता पूर्वक श्री राम और लक्षमन की दिव्य प्रकृती
02:46और उनके सच्चे उद्देश के बारे में सुग्रीव को आश्वस्थ करना आरंभ किया।
02:52गरुर्त वैकुंट में अपने प्रभु विश्नु के चर्नों में बैठे, इस प्रित्वी पर घटित हो रहे समवाद को ध्यानपूर्वक सुन
02:59रहे थे, उनकी पैनी द्रिष्टी में भविश्य की जलक साफ दिख रही थी।
03:05हनुमान के मधुर और ग्रिड वचनों ने धीरे-धीरे सुग्रीव के मन में व्याप्त भय के अंधकार को दूर किया,
03:12और उनकी आखों में अविश्वास की जगह, आशा की एक किरन चमक उठी।
03:18गुफा के अंदर की हवा में पहले का तनाव अब एक अजीब सी शांती में बदल गया था, जैसे कोई
03:25पुराना बोच धीरे-धीरे उतर रहा हो।
03:28हनुमान के सतत प्रयासों और श्री राम के शांत करोनामय व्यक्तित्व ने अंत्ह सुग्रीव का हृदय जीत लिया और उन्होंने
03:36अपने स्थान से उठकर श्री राम का आदर पूर्वक अभिवादन किया।
03:41देवराज इंद्र भी अपने स्वर्गिय आसन से इस नूटन मैतरी के निर्मान को देख रहे थे, जिसके परिणाम में आसुरी
03:50शक्तियों का विनाश नहित था।
03:53श्री राम ने अपनी सौमय वाणी में सुग्रीव को सांत्वना दी और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे उनकी सहायता करने
04:01आये हैं, जिससे सुग्रीव के मन का अंतिम संशय भी मिट गया।
04:06और इस प्रकार रिश्यमूग परवत की पवित्र भूमी पर एक अटूट मित्रता की नीव रखी गई, जो आगे चलकर धर्म
04:14की स्थापना और अधर्म के विनाश का मार्ग प्रशस्त करने वाली थी।
04:19हनुमान अपनी अदमे भक्ती और दूरदर्शिता के साथ, श्रीराम और सुग्रीव के समक्ष एक छोटी पवित्र अगनी प्रजवलित करने के
04:28लिए आवश्यक सामगरी एकत्र करने लगे, जिससे उनकी मित्रता का पावन बंधन संपन्न हो सके।
04:35देवराज इंद्र भी अपने स्वर्गिय आसन से इस नूटन मैत्री के निर्मान को देख रहे थे, जिसके परिणाम में आसुरी
04:44शक्तियों का विनाश नहित था।
04:46रिश्यमूग की पवित्र भूमी पर श्रीराम अपनी शांत मुद्रा में और सुग्रीव उच्सुकता व आशा के साथ अगनी के सम्मुख
04:55बैठे, उनके नेत्रों में एक नए अध्याय का संकल्प स्पष्ट था।
05:00उनके मध्य रखी गई वह छोटी अगनी वेदी, अभी तक शांत थी, किन्तु अपने भीतर एक ऐसे शक्तिशाली बंधन की
05:08ज्वाला को समेटे थी, जो भविश्य में महान परिवर्तनों का अग्रदूत बनने वाली थी।
05:15हनुमान ने मंत्रो चार के साथ अत्यंत श्रद्धा पूर्वक अगनी को प्रजवलित किया, जिससे पवित्र धूमर आकाश की ओर उठने
05:23लगा, मानो ब्रहमांड को इस दिव्य मिलन का संकेत दे रहा हो।
05:28ब्रहम देव अपने चतुर मुखी स्वरूप में ब्रहम लोग से इस पवित्र अनुष्ठान को देख रहे थे, उनके चारों मुखों
05:36पर एक शांत और स्रिजनात्मक मुस्कान थी, जो आने वाले युग परिवर्तन को दर्शाती थी।
05:43अगनी के समक्ष श्री राम ने अपना हाथ आगे बढ़ाया, एक अटल और निश्चई मुद्रा में सुगरीव को उनकी खोई
05:51हुई प्रतिष्ठा और सामराज्य लोटाने का मौन आश्वासन देते हुए।
05:57पवित्र अगनी की लप्टें आकाश की ओर उठ रही थी, मानों उन दोनों की प्रतिग्याओं को अपनी उश्णता से सीच
06:04कर और भी सुद्रिढ कर रही हों, उनके मिलन की गाथा लिख रही हों।
06:10श्रीराम ने अपनी सौमय और गंभीर वानी में सुग्रीव से कहा कि वे उन्हें बाली के अन्याय से मुक्ती दिलाकर
06:17उनका राज्य और सम्मान पुनह स्थापित करेंगे, एक सच्चा मित्र होने का प्रमान देते हुए।
06:24इसी क्षण, गंधर्व और अपसराय भी अपने स्वर्गीय लोकों से इस असाधारन मित्रता के साक्षी बन रहे थे। उनके मधुर
06:32संगीत की गूंज हवा में घुल रही थी, जो इस दिव्य संधी को और भी पवित्र बना रही थी।
06:39श्री राम के वचनों को सुनकर सुग्रीव की आखों में जल भराया, वर्षों की पीड़ा और निराशा अब आशा के
06:47स्वर्णिम प्रकाश में बदल रही थी, उनके चहरे पर एक नई द्रिड़ता का उदे हुआ।
06:54एक स्वर्णिम आभा श्री राम के चारों और प्रकट हुई, जो उनके दिव्य संकल्प और अजे शक्ती का प्रतीक थी,
07:01जिसने सुग्रीव के मन में पूर्ण विश्वास भर दिया।
07:05इसके प्रत्युप्तर में सुग्रीव ने भी श्री राम को वचन दिया कि वे अपनी समस्त वानर सेना के साथ सीता
07:13की खोज में तनमंधन से सहयोग करेंगे, कोई कसर नहीं छोडेंगे।
07:18स्वयन देवराज इंद्र अब अपने स्वर्गिय सिनहासन पर बैठे, इस एतिहासिक पल के साक्षी बन रहे थे, उनके चहरे पर
07:27एक संतुष्टी की मुस्कान थी, जैसे कि उन्हें ब्रहमांड के संतुलन की पुनहस्थापना की जहलक मिल रही हो।
07:34हनुमान और लक्षमन दोनों ही इस पवित्र गठ बंधन को अपलक निहार रहे थे, हनुमान के नेत्रों में गौरव और
07:43लक्षमन के चहरे पर गेहन प्रतिग्या का भाव स्पष्ट था।
07:46एक शक्तिशाली उर्जा का प्रवाह अगनी के चारों और घूमने लगा, जैसे दोनों की प्रतिग्याओं की शक्ती मिलकर एक नए
07:55यूग की शुरुवात कर रही हो, जो अधर्म पर धर्म की विजय का पत प्रशस्त करेगा।
08:01अगनी साक्षी में श्रीराम और सुग्रीव ने एक दूसरे के हाथ थामे, एक अटूट बंधन में बंधते हुए, जिसकी नीमग
08:09धर्म, न्याय और निष्ठा के सिध्धानतों पर रखी गई थी।
08:13कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी समाधी से उठकर इस क्षन को देखा, उनके तीसरे नेत्र में एक सुक्ष्म
08:22चमक थी, जो नेती के जटिल खेल को समच रही थी।
08:27उनके नेत्रों में पवित्र अगनी की लपतें सपष्ट रूप से प्रतिबिम्बित हो रही थी, जो उनके हृद्यों में जल रही
08:34द्रिडता और संकल्प की अगनी का प्रतीक थी।
08:38और इस प्रकार रिश्यमूग परवत की पवित्र भूमी पर एक अटूट मित्रता का अध्याय समाप्थ हुआ, जिसने ब्रहमांड के लिए
08:46एक नए भविश्य की नीव रखी, जो धर्म की विजय और अधर्म के विनाश का मार्ग प्रशस्त करेगा।
08:53रिश्यमूग परवत के शांत वातावर्ण में, जहां पवित्र जरने बह रहे थे और प्राचीन व्रिक्षों की चाया गहरा रही थी,
09:02सुग्रीव ने अपने हृदय का बोज हलका करते हुए अपनी दुखत कथा सुनानी आरंभ की।
09:09उनकी आखों में अतीत के घाव स्पष्ट दिख रहे थे, जैसे की हर शब्द उनके भीतर दबी हुई पीडा को
09:16उजागर कर रहा हो, जिसे श्रीराम और लक्षमन ध्यानपूर्वक सुन रहे थे।
09:22सुग्रीव ने बताया की कैसे एक समय में उनके और उनके भाई बाली के बीच अटूट प्रेम था और वे
09:29किशकिंधा के राज्य पर मिलकर शासन करते थे, शक्ती और सम्मान का प्रतीक थे।
09:35किन्तु यह सोहार्ध अधिक समय तक नटिक सका, क्योंकि नेती के कपटपूर्ण खेल ने उनके भाग्य में एक ऐसा मोड
09:43लिखा था जिसने सब कुछ बदल दिया।
09:46यह सब तब शुरू हुआ जब मायावी नामक एक शक्तिशाली राक्षस ने किशकिंधा को चुनौती दी, जिसके बाद बाली और
09:54वह गहरे वनमे स्थित एक भयानक गुफा में प्रवेश कर गए।
09:59बाली ने क्रोध में भरकर राक्षस का पीछा किया, जबकि सुग्रीव को गुफा के द्वार पर तब तक प्रतीक्षा करने
10:07का आदेश दिया गया, जब तक वह विजी होकर न लोटें।
10:11गुफा के भीतर से भयंकर युद्ध की गरजनाये और राक्षसों का चीतकार सुनाई दे रहा था, जो किशकिंधा के वीरों
10:19के हृदय को भी कमपा रहा था।
10:22दिन सप्ताह में और सप्ताह महीनों में बदलते गए, पर बाली का कोई अतापता नहीं था, और गुफा से केवल
10:30भयानक गरजनाओ और रक्त की गंध आती रही।
10:34अत्तह एक दिन गुफा के भीतर से बाली का भयानक चीतकार सुनाई दिया, जिसके बाद केवल राक्षसों की विजोलास भरी
10:42अटहास गूंजने लगी, जिससे सुग्रीव का हृदय तूट गया।
10:47उन्हें विश्वास हो गया कि बाली मारा गया है, और अपने लोगों की रक्षा के लिए उन्होंने भारी पत्थरों से
10:54उस गुफा का मुख बंद कर दिया, ताकि कोई राक्षस बाहर न आ सके।
11:00किश्किंधा लोटकर सुग्रीव ने अपने लोगों के बीच बाली के निधन की घोशना की और राज्य के सिनहासन पर बैठ
11:07गए, क्योंकि वे ही एक मात्र योग्य उत्तराधिकारी थे।
11:12किंटु नियती का खेल अभी समाप्त नहीं हुआ था, क्योंकि बाली जो वास्तव में जीवित था, एक महीने बाद वापस
11:20लोटा और उसने सुग्रीव को विश्वासधाती घोशित कर दिया।
11:25बाली का क्रोध ज्वाला मुखी की तरह फट पड़ा, उसने सुग्रीव पर गुफा का द्वार बंद करके उसे मरने के
11:32लिए छोड़ने का आरोप लगाया, जिससे राज्य में भय और अराजकता फैल गई।
11:38क्रोध की आग में जलते हुए बाली ने सुग्रीव को सिनहासन से बेदखल कर दिया और उन्हें राज्य से निर्वासित
11:46कर दिया, जिससे उनके जीवन में अंधकार छा गया।
11:50इतना ही नहीं, बाली ने सुग्रीव की प्रिय पत्नी रूमा का भी अफ़रन कर लिया, जिससे सुग्रीव का दुख और
11:57भी गहरा हो गया।
11:59रुमा के अभरण और राज्य से निश्कासन के बाद सुग्रीव को बाली से अपनी जान का खत्रा महसूस हुआ, क्योंकि
12:07बाली उन्हें मृत्यू का भय दिखा रहा था।
12:29निरंतर खत्रा बना हुआ था। उनकी यात्रा उन्हें रिश्यमूग परवत्तक ले आई, जहां महर्शी मतन के श्राप के कारण बाली
12:38प्रवेश नहीं कर सकता था, और उन्हें अंत्य थोड़ी शांती मिली। और इस प्रकार रिश्यमूग की पवित्र भूमी पर वह
12:47अपन
12:59सुग्रीव ने अपने दुखों की गाथा समाप्त करने के बाद श्रीराम की ओर देखा, जहां उनके मन में आशा की
13:06नई किरन जागे होने के साथ साथ बाली के प्रचंड बल को लेकर गहरा भय भी बना हुआ था।
13:13सुग्रीव ने विनीत भाव से सिर जुकाते हुए कहा कि श्रीराम की मित्रता उनका परमभाग्य है, किन्तु बाली के वर्दान
13:21और उसकी अतुलनिय शक्ती के आगे कोई भी टिक नहीं सकता।
13:26बाली के पराक्रम का वर्णन करते हुए सुग्रीव ने बताया कि वह प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व चारों दिशाओं के समुद्रों
13:34की परिक्रमा करता है और विशाल परवतों को खिलोने की भांती तोर देता है।
13:40अपनी शंका को दूर करने के लिए सुग्रीव रिश्यमुप परवत की घाटी में पड़े एक विशाल काए सफेद परवत जैसे
13:48दानव के कंकाल की ओर संकेत करते हैं।
13:52सुग्रीव बताते हैं कि यह विशाल अस्थिपंजर दुन्दुभी नाम के असुर का है जिसे बाली ने युद्ध में मार कर
14:00अपने बाहुबल से कई योजन दूर फेंक दिया था।
14:04सुग्रीव ने श्रीराम से कहा कि यदि वे इस भारी भरकम कंकाल को अपने पैर से दूर हटा सकें तो
14:11उनके मन को बाली का सामना करने का थोड़ा विश्वास हो सकेगा।
14:16श्रीराम ने सुग्रीव के बाल सुलब संदे और संकोच को देख कर मंद मंद मुसकराते हुए उनके प्रती अगात करुणा
14:24और वातसल्य व्यक्त किया।
14:26बिना किसी प्रयास या अभिमान के मर्यादा पुरुशोत्तम राम शांत चाल से दुन्दुभी के विशाल अस्थिपंजर के समीग पहुँचे।
14:36श्री राम ने केवल अपने पैर के अंगूठे के एक हलके आघात से उस विशाल परवत समान कंकाल को दस
14:43योजन दूर आकाश में उछाल दिया।
14:47गगन में उरते हुए उस भारी कंकाल को देखकर सुग्रीव और लक्षमन अवाक रह गए और वातावर्ण राम के इस
14:55चमतकार से स्तंभित हो गया।
14:57परंतु सुग्रीव के मन का भय इतना गहरा था कि उसने पुनह संकोच से कहा कि जब बाली ने इसे
15:04फेंका था तब इसमें मास और रक्त का भारी भार भी शामिल था।
15:10सुग्रीव ने तब परवत की एक धलान पर पंक्तिबध खड़े साथ विशाल और प्राचीन ताल के व्रिक्षों की ओर संकेत
15:17किया।
15:19उन्होंने बताया कि बाली अपनी प्रचंड शक्ती के प्रदर्शन के लिए इन साथों व्रिक्षों को एक साथ हिला कर उनके
15:26समस्त पत्ते जड़ा देता था।
15:29सुग्रीव ने प्रार्थना की की यदि श्रीराम अपने एक ही बान से इन में से केवल एक ताल व्रिक्ष को
15:36भी भेद सकें तो उन्हें बाली के अंत का पूर्ण विश्वास हो जाएगा।
15:41सुग्रीव की शंका का निवारन करने के लिए श्रीराम ने मुस्कुराते हुए अपने महान को दंड धनुष को उठाया और
15:49तुनीर से एक दिव्यबान निकाला।
15:52श्रीराम ने प्रत्यंचा को अपने कान तक खीच कर जैसे ही बान साधा संपूर्ण रिश्यमुख परवत एक अलोकिक तेज और
16:00गर्जना से गूझ उठा।
16:03धनुष से छूटते ही वह दिव्यबान कालचकर की भांती प्रचंड गती से आगे बढ़ा और एक ही पल में सातों
16:10विशाल ताल व्रिक्षों को भेदता चला गया।
16:14सातों व्रिक्षों, परवत की शिलाओं और पाताल लोग को स्पर्श करने के पश्चात वह अलोकिक बान पुनह श्रीराम के तुनीर
16:22में लोट आया।
16:24इस अकलपनिय और अलोकिक द्रिश को देखकर सुग्रीव का सारा संदेह भस्म हो गया और वह अत्यंत व्याकुल होकर श्रीराम
16:32के चरण कमलों में गिर पड़ा।
16:35श्रीराम ने सुग्रीव को प्रेमपूर्वक उठा कर अपने हृदय से लगा लिया और वचन दिया कि अब बाली के अन्याय
16:42का अंत बहुत निकट है।
16:45सुग्रीव ने गदगद कंट से श्रीराम के पराक्रम की स्तुती करते हुए उनके समक्ष नत्मस्तक होकर अपने पूर्ण समर्पन की
16:54घोशना की।
16:55श्रीराम ने सुग्रीव को आश्वस्त करते हुए किश्किन्धा की ओर प्रस्थान करने का निर्देश दिया ताकि बाली के अत्याचारों का
17:04तत्काल अंत किया जा सके।
17:05ध्राता लक्षमन और पवनपुत्र हनुमान भी श्रीराम और सुग्रीव के साथ सम्मिलित होकर इस धर्मयुध की अंतिम रणनीती बनाने लगे।
17:15चारों दिव्य योध्धा रिश्यमुप परवत के सुरमय वनों को पार करते हुए स्वर्णिम संध्या की छाया में किश्किन्धा की सीमाओं
17:24की ओर बढ़े।
17:26किश्किन्धा के विशाल प्रवेश द्वार के निकट पहुँचकर सुग्रीव ने अपने बाहुबल का परिचय देते हुए आकाश को कमपा देने
17:34वाली प्रचंड सिह गर्जना की।
17:37अपने धव्यस्वन महल में विश्राम कर रहे बाली ने जब सुग्रीव की ललकार सुनी तो क्रोध से उसकी लाल आखे
17:45धधक उठी।
17:47बुद्धिम्ती महारानी तारा ने भैभीत होकर बाली का हाथ पकड़ लिया और श्रीराम के साथ सुग्रीव की मित्रता का समरन
17:55कराते हुए युद्ध न करने की प्रार्थना की।
17:59अंकार में अंधे बाली ने तारा की चेतावनी को पूरी तरह से अंसुना कर दिया और भयंकर गर्जना करते हुए
18:06राजसभा से बाहर निकल गया
18:09विशाल व्रिक्षों से घिरे खुले प्रांगण में आकर बाली ने सुग्रीव को अत्यंत नीची द्रिश्टी से देखा और अपनी विशाल
18:17छाती ठोक कर चुनोती दी
18:20दोनों वानर भाई प्रचंड वेग से एक दूसरे पर तूट पड़े और उनके बीच एक विनाशकारी तथाधर्ती को हिला देने
18:28वाला मल्युद्ध प्रारंभ हो गया
18:31श्रीराम और लक्षमन व्रिक्षों के जुर्मुट के पीछे छिपकर बाली पर बान चलाने हेतु पूरी सजक्ता के साथ बान संधान
18:39करने लगे
18:40किन्तु युद्ध में बाली और सुग्रीव का रूप, वेशभूशा और शक्ती इतने समान थे कि श्रीराम भ्रमित हो गये और
18:48अपना बान नहीं चला सके
18:51बाली के अमानविय प्रहारों से रक्तरंजित होकर सुग्रीव अत्यंत व्यथित हुआ और प्रान बचाने के लिए पुनह रिश्यमुख परवत की
18:59ओर भाग खड़ा हुआ
19:02रिश्यमुख परवत पर श्रीराम के चर्णों में गिरकर सुग्रीव रुदन करने लगा और दुरक भरे स्वर में बान न चलाने
19:09का कारण पूछने लगा
19:12श्रीराम ने सुग्रीव के आसु पोँचते हुए स्नेह पूर्वक समझाया कि दोनों भाईयों का रूप एक समान होने के कारण
19:20वे अंजाने में सुग्रीव पर बान चलाने से डर रहे थे
19:24ध्राता लक्षमन ने तुरंत वन की बेलों से चमकती हुई गजपुषपी की एक दिव्य जंगली पुषपमाला तयार की
19:33लक्षमन ने उस सुगंधित और चमकीली पुषपमाला को सुग्रीव के गले में पहना दिया ताकि श्री राम दूर से ही
19:40उसकी स्पष्ट पहचान कर सके
19:43गले में दिव्य माला धारन करते ही सुग्रीव के भीतर नवजीवन और श्री राम की अमोख क्रिपा का अध्भुत संचार
19:50होने लगा
19:52श्री राम ने सुग्रीव के मस्तक पर हाथ रख कर आशिरवाद दिया और प्रतिग्याकी की इस बार उनका बान बाली
19:59के वक्षस्थल को अवश्य बींध देगा
20:03नवजा साह और अटूट विश्वास से भरा सुग्रीव श्री राम के अभायदान के साथ उन्ह बाली को अंतिम युद्ध की
20:10ललकार देने किश्किंधा की ओर बढ़ चला
20:14नवजा से ओतप्रोथ सुग्रीव ने किश्किंधा के विशाल द्वार की ओर कदम बढ़ाए जहां बाली का अहंकारी सामराज्य फैला हुआ
20:22था
20:24शीरसागर में विराजमान भगवान विश्णू ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से घटित हो रही नेती के इस महत्वपूर्ण अध्याय को निहारा
20:33किश्किंधा के द्वार पर पहुँचकर सुग्रीव ने अपनी पूर्ण शक्ती से गर्जना की बाली को द्वंद्व युद्ध के लिए सीधी
20:41चुनोती देते हुए
20:43सुग्रीव की ललकार सुनकर बाली के भीतर क्रोध का ज्वाला प्रचंड रूप से भड़क उठी जिसने उसकी आखों में प्रतिशोध
20:51की अगनी प्रजवलित कर दी
20:54बाली अपने अदमेबल और अहंकार से भरा किशकिंधा के दुर्गम द्वार से बाहर निकला युद्ध के लिए पूरी तरह से
21:02ततपर
21:03कैलास परवत पर भगवान शिव ने अपनी योग निद्रा से उठकर ब्रह्मांड की इस महत्वपून घटना को शांत भाव से
21:11देखा
21:13दोनों बलशाली भाई, बाली और सुग्रीव किशकिंधा के खुले मैदान में एक दूसरे के सम्मुख खड़े हुए, जिनकी आखों में
21:21दशकों का वैमन से जलक रहा था
21:24युद्ध की आसनता से वातावर्ण में एक अजीब सी खामोशी छा गई, जैसे प्रकृती भी इस भ्रात्रियुद्ध के परिणाम का
21:32इंतजार कर रही हो
21:35पलक जपकते ही, दोनों भाई एक दूसरे पर तूट पड़े, उनके प्रहारों से प्रित्वी काम उठी और आकाश बुंजायमान हो
21:43गया
21:44अपने कमल पर आसीन ब्रहमाजी ने स्रिष्टी के साक्षी के रूप में इस अप्रत्याशित युद्ध के प्रत्येक पल का अवलोकन
21:52किया
21:54पास की पहाडी पर स्थित श्रीराम ने धनुष पर बान चड़ाया, बाली को निशाना साथते हुए, उसकी प्रतिज्याका सम्मान करने
22:02के लिए
22:04बाली और सुग्रीव की शारिरिक समानता ने श्रीराम को पल भर के लिए भ्रमित कर दिया, जिससे उनके हाथ में
22:11बान क्षन भर के लिए रुप गया
22:14श्री राम के भ्रमित होने के क्षन का लाब उठा कर बाली ने अपनी पूरी शक्ती से सुग्रीव पर प्रहार
22:20किया, उसे पीछे धकेलते हुए
22:24देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर स्वरों के साथ आकाश से इस नाटकिय मोर को देख रहे थे, नेती के
22:32गूड रहस्यों पर विचार करते हुए
22:35बाली के लगातार प्रहारों से घायल होकर, सुग्रीव ने विवश होकर युद्ध भूमी से पीछे हटना शुरू कर दिया, उसके
22:43विश्वास में ख्षनिक दरार आ गई थी
22:46बाली ने विजी गर्जना की, उसकी शक्ती और अहंकार एक बार फिर सिद्ध हो गए, जबकि किशकिंधा के वन उसकी
22:54जैकार से गुंज गुठे
22:57पराजित और आहत सुग्रीव लंगड़ाते हुए श्री राम की ओर भागा, अपने गुरु की शरण और सहायता की तलाश में
23:06स्वर्गिय अपसराएं और गंधर्व देवलोक में एकत्रित होकर इस अप्रत्याशित परिणाम पर कानाफूसी कर रहे थे, नेती के खेल को
23:15समझते हुए
23:17अत्तह सुग्रीव श्री राम के सम्मुख पहुचा, अपनी हार का दुख और श्री राम के बान न चलाने का प्रश्न
23:24उसकी आखों में था
23:26श्रीराम ने सुग्रीव को शांत रहने का संकेत दिया
23:30उनके गहरे नित्रों में बाले सुग्रीव की पहचान के भ्रम की स्मृती अभी भी कौन्ध रही थी
23:37श्रीराम ने नमरता पूर्वक अपनी विवश्टा प्रकट करते हुए सुग्रीव से कहा कि दोनों भाईयों की एक जैसी कांती और
23:45रूप के कारण वेबान चलाने में असमर्थ रहे
23:49रगुकुल श्रिष्ठ राम के सत्यनिष्ठ वचनों को सुनकर सुग्रीव के मन का सारा संशय और विशात पल भर में समाप्थ
23:57हो गया
23:58श्री राम ने अत्यन्त स्नेह से सुग्रीव के रक्तरंजित कंधों पर अपना वर्देहस्त रखा और उसकी चोटों को अपनी दिव्य
24:06समवेदना से शांत किया
24:09समीप ही खड़े वीर लक्षमन ने भावी धर्मयुद्ध के लिए नेती के इस अनुठे विधान को शांती पूर्वक निहारा
24:17लक्षमन ने वन की हरीभी लताओं से सुगंधित गच पुषपी और नाक के सर के प्रफुलित फूलों को आदर पूर्वक
24:24एकत्र किया
24:26भगवान राम ने उन दिव्य पुषपों को अपने पवित्र हाथों से पिरोकर एक विशाल और जग्मगाती हुई माला तयार की
24:35श्रीराम ने वह सुशोभित पुषपमाला सुग्रीव के गले में पहना दी ताकि युद्ध की भीशनता में पहचान का कोई भ्रम
24:43न रहे
24:45सुग्रीव के वक्षस्थल पर सुशोभित वह माला केवल एक आभूशन नहीं बलकि श्रीराम के अभायदान और विजय का प्रतीक बन
24:53गई
24:54रिश्यमूग परवत के सुरमय वन में फैली दिव्यकिर्णों के बीच सुग्रीव के भीतर नवजीवन और असीम उत्साह का संचार हुआ
25:04वानर राज सुग्रीव ने भक्तिभाव से श्रीराम के चर्णों में मस्तक जुका कर पुनह बाली का सामना करने की द्रिड
25:11प्रतिग्या की
25:13श्रीराम ने अपने महा विनाशक को दंड धनुष की प्रत्यंचा चड़ाई और सुग्रीव को निर्भय होकर बाली को पुकारने का
25:20आदेश दिया
25:22धनुष की टंकार से पूरा जंगल गूँज उठा जो अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना की घोशना कर रहा
25:30था
25:31पुनह आश्वस्थ होकर सुग्रीव तीवर गती से किशकिंधा की विशाल पाशान गुफाओं और दुरगम घाटियों की ओर बढ़े
25:40किशकिंधा के भव्य स्वर्ण गवार के समीप पहुँचकर सुग्रीव ने चट्टान पर पैर जमाए और सिंग के समान हुंकार भरी
25:49सुग्रीव ने अपनी समस्थ शक्ती को एकत्रित करके बाली के नाम का ऐसा प्रचंट गर्जन किया की दिशाय काम उठीन
25:57वह भीशन हुकार किशकिंधा के राजप्रासाद की उची दीवारों और स्वर्ण शिखरों से टकरा कर प्रतिध्वनित होने लगी
26:07राजप्रासाद की विशाल सभा में अपने रत्नजडित सिनहासन पर विराजमान बाली उस अप्रत्याशित ललकार को सुनकर चौक पड़ा
26:16पराजप्रासाद सुग्रीव का ऐसा दुस्साहस देखकर बाली के नेत्रलाल हो गए और उसका संपूर्ण शरीर क्रोध से कामपने लगा
26:25क्रोध में उबलते हुए बाली ने अपनी विशाल गदा उठाई और अपनी छाती ठोकते हुए गरजना की
26:33काल के समान भयंकर प्रतीत होता बाली सुग्रीव का अंत करने के उद्देश से तीवर गती से महल के द्वार
26:40से बाहर निकलाया
26:43किशकिंधा के मुख्यद्वार के समीप दोनों शक्तिशाली वानर भ्राता बाली और सुग्रीव आपस में भिड़ गए जिससे संपूर्ण वन शेत्र
26:51कामप उठा
26:53सुग्रीव ने श्रीराम द्वारा दी गई गस्पुषपी की माला धारन कर रखी थी जिससे बाली के भीशन प्रहारों के बीच
27:01भी उसकी पहचान स्पष्ट हो रही थी
27:04बाली ने क्रोध में अंधा होकर अपनी विशाल गदा से सुग्रीव पर प्रांधा तक वार करने के लिए उसे हवा
27:11में उठाया
27:13व्रिक्षों के घने जुर्मुट के पीछे छिपे भगवान श्री राम ने अपने दिव्य धनुष को दंड पर एक तीक्षन बांड
27:20चढ़ाया
27:21श्री राम के धनुष की प्रत्यंचा से छूटते ही वह सोने सा चमकता हुआ दिव्य बांड तीवर गती से बाली
27:29की ओर सनसनात हुआ बढ़ा
27:31वह प्रचंड बांड बाली के विशाल और वजर के समान कठोर हृदय को बेधता हुआ पार निकल गया
27:39बांड लगते ही बाली का संपूर्ण शरीर शिथिल पड़ गया और उसके मुख से एक भयंकर चीतकार निकली
27:47अमर्ता के वर्दान और असीन बल का अहंकार तूट जाने पर महाबली बाली प्रित्वी पर लहुलुहान होकर गिर पड़ा
27:56बाली के धराशाई होते ही संपूर्ण किश्किंधा वन में एक रहस्य में सन्नाटा चा गया और आकाश में काले बादल
28:03धिराएं
28:05व्रिक्षों की ओट से निकल कर मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम अपने अनुज लक्षमन के साथ शांट और गंभीर कदमों से
28:13बाली के समीप आए
28:15रक्ष से लथपत बाली ने अपनी धलती सांसों के बीच सामने खड़े श्री राम को क्रोध और आश्चर्य भरी द्रिश्टी
28:23से देखा
28:24बाली ने श्री राम को धिकारते हुए कहा कि रगुवंश के वीर राजकुमार होकर भी उन्होंने छिपकर कायरों की भाती
28:32बान क्यों चलाया
28:35बाली ने धर्म और न्याय पर प्रश्न उठाते हुए श्री राम से पूछा कि क्या किसी निर्दोश पर बिना युद्ध
28:41की चेताबनी दिये प्रहार करना उचित है
28:45श्री राम ने अत्यंत शांत और गंभीर वानी में बाली को उसके द्वारा अपने छोटे भाई सुग्रीव की पतनी का
28:53हरण करने का अक्षमय पाप स्मरण कराया
28:56श्री राम ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपने अनुच की भार्या पर कुद्रिष्टी डालता है उसे दंड देना ही
29:04राजा का परमधर्म है
29:06श्री राम के इन धर्म सम्मत और अकाट्य तरकों को सुनकर बाली का संपून अज्यान नश्ट हो गया और उसका
29:14हृदय गलानी से भर गया
29:16अपनी भूल स्विकार करते हुए बाली ने कापते हाथों से श्री राम के समक्ष हाथ जोड़े और उनसे अपने अहंकार
29:24के लिए क्षमा मांगी
29:26बाली ने अपने युवा पुत्र अंगत को अपने समीक बुलाया और उसका हाथ श्री राम के हाथों में सौंपते हुए
29:34उसकी रक्षा का वचन मांगा
29:37श्री राम ने अत्यंत वात्सल्य भाव से अंगत को स्विकार किया और बाली को आश्वस्त किया कि अंगत का सरवदा
29:45कल्यान होगा
29:47भगवान श्रीराम के स्वरूप का ध्यान करते हुए महाबली बाली ने अपने प्रान त्याग दिये, जिसके बाद देवों ने उस
29:54पर पुष्प वर्शा की
29:57महाबली बाली के देहावसान के पश्चात संपूर्ण किश्किंधा वन में एक गहरा और शोकमय सन्नाटा चा गया
30:05अपने पती की मृत्यू का समाचार सुनते ही रानी तारा व्याकुल अवस्था में घटना स्थल पर पहुची
30:12बाली के प्राणहीन देह को देखकर रानी तारा भूमी पर गिर पड़ी और अत्यंत करोन विलाप करने लगी
30:20धूल में पड़ा हुआ बाली का स्वर्णिम मुकुट संसार की नश्वर्ता और काल के चक्र की वोर संकेत कर रहा
30:27था
30:29समस्थवानर सेनाप्ती और प्रजाजन अपने पराक्रमी राजा के चले जाने से दुहक के अगाध सागर में डूब गए
30:37अपने भ्राता के मृत शरीर को देखकर सुग्रीव का हिदय तीवर पश्चाताप और शोक से भर उठा
30:45युवा राजकुमार अंगद अपनी माता तारा के साथ लिपट कर पिता के वियोग में बिल्ख बिलख कर रोने लगा
30:53चारों और चाईस तब्धता और व्रिक्षों से गिरते पुष्प नेती के इस निश्ठुर किन्तु अनिवार्य सत्य को दर्शा रहे थे
31:02भगवान श्री राम और लक्ष्मन मंद कद्मों से शोकाकुल तारा और अंगद के समीप आए
31:08श्री राम ने करुणा से परिपूर्ण वानी में तारा को संबोधित करते हुए आत्मा की अमर्ता का बोध कराया
31:17रानी तारा ने अश्रुपूरित नेत्रों से भगवान श्री राम की ओर देखा और उनके दिव्य ज्यानोपदेश से शांती प्राप्त की
31:26प्रभु श्री राम का अभय हस्त और उनकी शांत मुद्रा ने संपून वातावर्ण को आध्यात्मिक दिव्यता प्रदान की
31:34ग्लानी से भरे सुग्रीव ने श्री राम के चर्णों में गिरकर अपने भ्रातावत के दुख पर क्षमा याचना की
31:42श्री राम ने सुग्रीव को उठा कर उसके भावी राजधर्म और अंगद के प्रती उसके दायत्व का स्मरण कराया
31:50पिता के अंतिम निर्देशों को स्मरण कर अंगद ने अपने अश्रु पोँछे और धर्म के मार्क पर चलने का संकल्त
31:57लिया
31:59वानर वीरों ने विशाल प्राचीन व्रिक्षों की छाव में राजा बाली के अंतिन संस्कार हेतु चंदन की काश्ट की चिता
32:06निर्मित की
32:08हनुमान और जामबवान सहित प्रमुख वानरों ने आदर पूर्वक बाली की देह को चिता की ओर प्रस्थान कराया
32:16सुग्रीव ने अत्यंत भारी हृदय से अपने जेश्ट भ्राता बाली की अंतेश्टी का पवित्र कार्य संपन्न किया
32:24प्रज्वलित अगनी की लप्तें और उठता हुआ स्वर्णिन धूमर बाली की आत्मा को सद्गती की ओर ले जाने लगा
32:33श्रीराम्त लक्ष्मन, सुग्रीव और अंगद ने उठती अगनी को देखते हुए भावी धर्मस्थापना का मौन संकल्प लिया
32:41अंतेश्टी के उपरांत श्रीराम के निर्देशानुसार समस्त वानर सेनापती और विशियों का समूह किश्किंधा के भव्यस्वर्ण द्वार की ओर अग्रसर
32:51हुआ
32:52नगर के मुख्य द्वार पर श्रीराम ने सुग्रीव का हाथ ठाम कर उन्हें राजधर्म और सत्य के मार्ग पर चलने
32:59का अंतिन उपदेश दिया
33:02सुग्रीव ने अत्यंत भावुक होकर श्रीराम के चर्णों का स्पर्ष किया और अटूट निष्ठा का वचन दिया
33:10रत्नष्टित स्वर्ण कलश और पवित्र वेद मंत्रों की ध्वनियों के साथ राज्या भिशेक की पावन तयारिया प्रारंभ हुई
33:18किशकिंधा का विशाल राजसभामंडप सुशोभित वानर वीरों और राज्य के नागरिकों के अपार हर्शोल लास से गुंध उठा
33:27वैदिक रिशियों ने सुग्रीव पर पवित्र तीर्थों का जल छिड़क कर मंत्रों चार के बीच उनका अभिशेक संपन्न किया
33:36राजगुरु ने सुग्रीव के शीश पर बाली का दिव्य स्वर्ण मुकुट सुशोभित करते हुए उन्हें किशकिंधा का नया राजा घोशित
33:43किया
33:45किशकिंधा के स्वर्ण सिनहासन पर विराज मान होकर महाराजा सुग्रीव ने अपने संपून राज्ज में धर्म के शासन का संकल्प
33:53लिया
33:54इसके पश्चात राजा सुग्रीव ने वीर अंगत को सभाप्ती के समक्ष बुलाया ताकि उन्हें भावी उत्तराधिकारी घोशित किया जा सके
34:04सुग्रीव ने बालिपुत्र अंगद के मस्तक पर युवराज का पच्चिन बांध कर उन्हें किशकिन्धा का युवराज घोशित किया
34:13ततपश्चात ज्यानी और स्वामी भक्त हनुमान जी को किशकिन्धा का मुख्य मंत्री नियुक्त कर उन्हें परामर्शमाला भेंट की गई
34:22हनुमान जी ने राजा और प्रजा के प्रती अपने संपूर्ण समर्पन का भाव व्यक्त करते हुए सिर्जुकाया
34:29राजा भिशेक उत्सव समाप्थ होते ही गगन में काले बादलों का आगमन हुआ और मुसलाधार वर्शा होने लगी
34:38श्री राम ने लक्षमन की ओर देखते हुए कहा कि वर्शा रितु के कारण मार्ग अवरुद्ध हो गए हैं आथ्व
34:45सीता की खोज कुछ समय के लिए स्थगित करनी होगी
34:49श्री राम ने सुग्रीव को विदा किया और कहा कि वे वर्शा रितु समाप्थ होने तक किश्किंधा का आनंद लें
34:56और तक पश्चात सीता की खोज आरंभ करें
35:00पर्वतों से गिरते विशाल प्रपातों और गरज्चती नदियों ने संपून किश्किंधा क्षेत्र को जल्मगन कर दिया
35:07श्री राम और लक्षमन ने वर्शा रितु बिताने के लिए प्रसरवन पर्वत की एक प्राकृतिक गुफा को अपना निवास स्थान
35:16बनाया
35:17गुफा के भीतर श्री राम सीता की मधुर स्मृतियों को याद कर गहरे वियोग में डूब गए और अश्रु बहाने
35:24लगे
35:26ध्राता लक्षमन ने श्री राम के समीक बैठ कर उन्हें धान्धस बंधाया और आने वाले समय में विजय का आश्वासन
35:33दिया
35:35घंगोर घटाओं की गड़गडा हट के बीच श्री राम ने शांत मन से अपनी प्राणप्रिया सीता के पुनर्मिलन और नेती
35:42के अगले चक्र की प्रतीक्षा की

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