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पद्म पुराण के इस रोमांचक अध्याय में देखिए लंका के तट पर हुए भीषण युद्ध का आरंभ। जब राम की वानर सेना और रावण की राक्षसी सेना आमने-सामने हुईं, तो धरती कांप उठी। अंगद की दूत बनकर लंका में चुनौती और रावण के अहंकार का वो विनाशकारी रूप, जिसे देखकर देवता भी भयभीत हो गए। क्या विभीषण के परामर्श के बाद भी युद्ध टल पाएगा? जानिए इस महागाथा के 25वें भाग में। #PadmaPurana #Ramayan #LordRam #Ravana #Mythology #IndianScriptures #Hinduism #RamSetu #Yuddh #AncientIndia
Transcript
00:00सुबेल परवत की उँची चोटियों पर भगवान राम की वानर सेना का विशाल डेरा जम गया है और समुदर की
00:06गर्जना वहां के वातावर्ण को और भी अधिक ओजस्वी बना रही है
00:12भगवान विश्णु अपने दिव्य स्वरूप में सुदूर बैकुंठ लोक से वानर सेना के साहस और राम के संकल्प को देखकर
00:20मंदमंद मुस्करा रही है
00:23सुग्रीव और हनुमान चट्टानों के उपर खड़े होकर लंका की भौगोलिक स्थिती और राबन के दुर्ग की सुरक्षा व्यवस्था का
00:31बारीकी से निरीक्षन कर रही है
00:34सुबेल परवत की चोटियों पर धलते सूरज की लालिमा ऐसे प्रतीत हो रही है
00:40मानो स्वयं प्रकृती युद्ध से पूर्व के सन्नाटे का अभिनंदन कर रही हो
00:46वानर सेना के मुख्यर अन्नीतिकार नल और नील रेत पर लंका के प्रवेश द्वार के सटीक नक्षे उकेर कर अपनी
00:53अगली चाल को अंतिम रूप दे रहे है
00:57देवर्शी नारद वीना बजाते हुए इस दिव्य युद्ध की आहट को अनुभव कर रहे हैं और देवताओं के समक्ष राम
01:05की विजय का गान कर रहे हैं
01:08हनुमान अपनी पूँच को लपेट कर युद्ध की व्यूह रचना को समझने के लिए परवत के सबसे उचे शिखर पर
01:15ध्यानमगन अवस्था में बैठे हैं
01:19सुबेल परवत की शीतल हवाएं वानर योध्धाओं के उच्साह को बढ़ा रही हैं और चारों और शंकनात की गुंच सुनाई
01:26पड़ रही है
01:29राम के चहरे पर गंभीर्ता और करुना का अनूठा मेल है जो इस महायुध के परिनाम की भव्यता को स्वय
01:36में समेटे हुए है
01:39भगवान शिव कैलाश की एकांत शांती में बैठे हुए अपने तीसरे नेत्र से लंका के अधर्म के विनाश का संकेत
01:46दे रहे हैं
01:49सुग्रीव अपनी विशाल सेना के विभिन दलों को निर्देश दे रहे हैं कि कैसे लंका के चारों द्वारों पर घेराबंदी
01:56की जानी चाहिए
01:58रात के सन्नाटे में सुबेल परवत की गुफाओं से गूंजती वानरों की गर्जना लंका की नीम को हिला देने का
02:05संकल्प व्यक्त कर रही है
02:09विभीशन ने राम के समक्ष आकर लंका की गुप्त सुरंगी और कमजोरियों को विस्तार से समझाया जिससे रणनीती और भी
02:17स्पष्ट हो गई
02:19गरुर देव अपनी विशाल पंखों से सुबेल परवत के उपर चक्कर लगा रहे हैं मानों वे विजय का संकेत लेकर
02:26आये हो
02:27नल और नील ने वानर सेना के लिए पत्थरों के ऐसे आयुध तयार किये हैं जो युद्ध में अचुप प्रहार
02:35करेंगे
02:36परवत के चारों और सुरक्षा चक्र खींचते हुए वानर सेना अब पूरी तरह से युद्ध की पहली चेतावनी के लिए
02:44तयार है
02:46राम ने अपने धनुष की प्रत्यंचा को चढ़ाया तो सुबेल परवत की चट्टाने भी मानो उस दिव्य उर्जा के प्रभाव
02:53से काम उठी
02:55देवी सीता का ध्यान करके राम ने अपनी प्रतिग्या को दोहराया कि वे लंका के अहंकार को धराशाई कर ही
03:03दम लेंगे
03:04वानर सेना का हर एक योध्धा अपनी वीर्ता और अनुषासन का परिचय दे रहा है जो राम के प्रति उनकी
03:12अटूट श्रद्धा को दर्शाता है
03:16सुबेल परवत अब मात्र एक शिविर नहीं बलकि धर्म की विजय का केंद्र बन चुका है जहां से महायुध का
03:23शंकनाद होने ही वाला है
03:26राम ने शांत और गंभीर मुद्रा में वानर सेना के बीच अपने दूद का चयन करने के लिए द्रिष्टी दोडाई
03:34गरुर के समान वेगवान और बाली के पुत्र अंगद को सम्मुख पाकर राम का मस्तक गर्व से उचा हो गया
03:42अंगद ने राम के चर्णों को स्पर्श करते हुए लंका जाकर शांती प्रस्ताव रखने के उस कठिन कार्य को स्वीकार
03:50किया
03:51आकाश में देवताओं ने इस महान दूट के साहस की प्रशंसा की और अपनी दिव्य आभा से मार्ग प्रशस्त किया
03:59अंगद अपनी विशाल चलान के लिए तयार हुए जिससे समुद्र का जलस्तर भी उनके प्रभाव से कामपने लगा
04:08भगवान राम ने अंगद के मस्तक पर अपना आशिर्वाद दिया जिसे पाकर वानर राजकुमार का तेज सूर्य के समान चमक
04:16उठा
04:17अंगद ने एक ही छलान में आकाश को चीरते हुए लंका के स्वर्ण द्वारों को पार किया
04:24अंगद के लंका प्रवेश करते ही चारों और एक दिव्य सन्नाटा चा गया
04:29मानों लंका की दिवारे भी उसके प्रताप से थर्थरा गई हो
04:34अंगद सीधे रावन की राजसभा की और बढ़ने लगे जहां राक्षसों की भीड उसे देखकर चकित रह गई
04:42रावन के सैनिकों ने अंगद को रोकने का दुस्सा हस किया, किन्तु उसके तेज ने उन्हें पीछे धकेल दिया
04:50अंगद ने बिना किसी भय के राजसभा के मध्य में अपने पैर जमा लिये, जैसे वह लंका की नीम को
04:57चुनौती दे रहा हो
04:59अंगद का यह निडर व्यक्तित्व रावन के दर्बार में एक अलौकिक द्रिश्य प्रस्तुत कर रहा था
05:06रावन ने अपने सिनहासन से अंगद को घेना और अहंकार के साथ देखा, जिसके मुख पर क्रूर मुस्कान तैर रही
05:14थी
05:15अंगद ने राम का संदेश सुनाते हुए कहा कि अब भी समय है कि रावन अपना अहंकार त्याग दे
05:24रावन के दर्बार में मौन छा गया, मानो हर कोई राम के इस दूत की वानी में नहित सत्य को
05:30सुन रहा हो
05:32अंगद का प्रत्येक शब्द रावन के लिए एक चेतावनी के समान था, जो सीधे उसके हृदय पर प्रहार कर रहा
05:39था
05:40रावन ने व्यंग्य करते हुए अंगद की वीर्ता का उपहास किया, किन्तु उसकी वानी में छिपा भैस पश्ट दिखाई दे
05:48रहा था
05:49अंगद ने रावन के शब्दों को तुछ समझते हुए उसे चेतावनी दी की राम का कोप अब लंका को भस्म
05:56कर देगा
05:58रावन ने अपनी तलवार पर हाथ रखा, लेकिन अंगद की अटल द्रिष्टी ने उसे क्षण भर के लिए रोक दिया
06:06अंगद ने लंका के स्वर्ण सिनहासन के सामने राम के संदेश का मान रखते हुए अपनी धर्मपता का फहरा दी
06:14लंका के स्वर्ण प्रांगण में अंगद की धर्मपता का फहराते ही, वहां उपस्थित राक्षसों की सेना में एक भयावा खलबली
06:23मच गई
06:24कैलाश परवतपर महादेव ने अपनी ध्यान मुद्रा से आखे खोली और लंका के आकाश पर मंदराते विनाश के बादलों को
06:32देख मुस्कुरा उठे
06:35अंगद ने अपने गदा के प्रहार से सिनहासन के निकट लगे एक विशाल स्वर्नस्तंभ को खंडित कर दिया जिससे पूरी
06:43सभा काम्प उठी
06:45रावन के दर्बार के उपर का आकाश अचानक गहरे लाल रंग में बदल गया जो किसी महायुध के आने का
06:52संकेत था
06:54स्वर्न लंका की दीवारों पर अंगद के पच्चिनहों से ऐसी ज्वाला भड़की की राक्षसों की चौकिया स्वतही जलने लगी
07:03भगवान विश्णू ने वैकुंठ में शेशनाग पर विराज मान होकर अपनी माया से इस युद्ध की रूपरेखा को और अधिक
07:10तीवर कर दिया
07:12अंगद के एक पैर के भार से लंका की धर्ती डग्म का गई जिससे रावन के सिहासन के रत्न बिखरने
07:19लगे
07:20लंका की रक्षा करने वाले राक्षसों के शस्त्र अचानक अपना तेज खोने लगे जैसे वे स्वयन श्री राम की शक्ती
07:28को पहचान गए हो
07:30समूची लंका नगरी के स्वर्ण गलियारों में अंगद के गर्जन की गूँच सुनाई दी जिसने राक्षसों के हृदय में भय
07:38का संचार कर दिया
07:40ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बूंदें आकाश में छोड़ी जो लंका के उपर एक रक्षा कवच
07:47के रूप में फैल गई
07:50अंगद ने रावन की ओर चुनोती भरी द्रिष्टी से देखते हुए उसे अपने ही अहंकार के बोज तले दबे रहने
07:57का श्राप दे दिया
07:59रावन के मुकुट की चमक फीकी पड़ गई जैसे उसकी समस्त आसुरी शक्तिया उस स्वर्ण सिनहासन के साथ ही बिखर
08:07रही हो
08:08वानर सेना ने समुद्र के उस पार से एक साथ जैश्री राम का जैगोश किया जिससे लंका की नीमवे तक
08:16हिल गई
08:18देवराज इंद्र ने अपने दिव्यरत से लंका के उपर छाय हुए घने काले अंधकार को देख अपना वजर तयार कर
08:25लिया
08:26अंगद ने लंका के केंद्र में खड़े होकर अपनी गदा को घुमाया जिससे वायुमंडल में बवंदर जैसा द्रिश उत्पन हो
08:34गया
08:35पूरे लंका द्वीब के उपर एक रक्तलाल आभा फैल गई जो यह संकेत दे रही थी कि अब समवाद का
08:43समय समाप्थ हो चुका है
08:46स्वर्ण द्वारों पर लगे विशाल अस्त्रशस्त्र अपने आप ही जमीन पर गिर कर तूट गए जैसे वे भी युद्ध के
08:53लिए तयार नहीं थे
08:55शिव के गणों ने नंदी के साथ मिलकर लंका की अधर्मी शक्तियों के विनाश का आहवान करते हुए डमरु का
09:02नाद किया
09:04अंगद के शरीर से निकलती दिव्य उर्जा की किरने लंका की तामसिक दीवारों को भेदती हुई आकाश तक पहुँच गई
09:13अंतह लंका की शांती एक भयानक सन्नाटे में बदल गई जिसके बाद केवल युद्ध का शंकनाध ही सुनाई देने वाला
09:20था
09:22लंका के स्वर्ण द्वार को लांगते हुए अंगद का विराट रूप रावन के वैभवशाली दर्बार की विशालता को भी छोटा
09:29सिद्ध कर रहा था
09:31रावन अपने स्वर्ण सिन्हासन पर विराज मान होकर अहमकार के सागर में डूबा था उसकी द्रिष्टी में अंगद के लिए
09:39केवल तिरसकार का भाव था
09:42अंगद ने द्रेड स्वर में भगवान राम का अंतिन संदेश सुनाते हुए सभा में खड़े होकर अधर्म के विनाश की
09:49घोशना की
09:51अंगद की वानी के धमक से रावन के दर्बार की तामसित दीवारे कामप उठीन मानो सत्य का प्रकाश स्वया अंधकार
09:59को चुनाती दे रहा हो
10:01रावन ने ठहा का लगाते हुए अंगद का उपहास किया मानो उसे अपने दसों सिरों के बल पर पूरे ब्रहमांड
10:08को जुकाने का भ्रम हो
10:11अंगद ने चेतावनी दी कि रावन का यह गर्व ही उसके कुल के नाश का कारण बनेगा क्योंकि राम का
10:18बान काल बनकर लंका की दहलीज पर खड़ा है
10:22रावन के क्रोधी राक्षसों ने अपने शस्त्र निकाल लिये जिससे पूरे दर्बार में लोहे और स्वर्ण के टकराने की तीखी
10:30ध्वनी गूझ उठी
10:32अंगद ने अपनी शक्ती का प्रदर्शन करते हुए दर्बार के स्तंभ पर अपना पैर जमा दिया जिसे हिलाने में रावन
10:39के सबसे शक्तिशाली योध्धा भी असमर्थ रहे
10:44लंका का पूरा दुर्ग अंगद के पैर के प्रहार से डोलने लगा जिससे रावन के सिनहासन की जड़े भी हिल
10:50गई
10:52रावन अपनी मर्यादा भूल कर स्वया अंगद को धकेलने के लिए आगे बढ़ा पर उसका अहंकार अंगद के द्रिड संकल्प
11:00के सामने बौना पड़ गया
11:02अंगद ने व्यंग्य करते हुए कहा कि यदी मुझसे ही नहीं जीत सकते तो राम के बाणों का सामना करने
11:09का स्वपन छोड़ दो
11:11सभा में उपस्थित मंदोदरी ने रावन को चेताया कि यह युद्ध स्वयंकाल के साथ है जिसमें अधर्म का टिकना असंभव
11:20है
11:22अंधकार और प्रकाश की वह रन्भूमी जिसे लंका का दर्बार कहा जाता था अब एक ऐसे युद्ध का साक्षी बनने
11:29वाली थी जिसे इतिहास कभी नहीं भूल पाएगा
11:33रावन के दसों मुखों से एक साथ हुंकार निकली जो लंका के पत्थरों को चीरती हुई आकाश तक जा पहुँची
11:42अंगद ने शान्ती से अपनी दाहिनी भुजा उपर उठाई और लंका का वातावर्ण अचानक दिव्य उर्जा से आलोकित हो गया
11:51अंगद की आभा देखकर राक्षसों की भीड पीछे हट गई जैसे वे स्वया अगनी के सामने खड़े होने से भयभीत
11:59हो रहे हुँ
12:01रावण ने अपनी खड़ग निकाली किन्तु उसका हाथ कांप रहा था क्योंकि वह समझ चुका था कि राम का दूद
12:08कोई साधारन जीव नहीं है
12:11अंगद ने अंतिम चेतावनी दी की अब लंका के विनाश का सूर्य उदे हो चुका है और रावण के पास
12:18केवल पश्चाताप का मार्ग शेश है
12:22अंगद दर्बार से उचल कर सीधे राम की सेना की ओर चल पड़े पीछे छोड़ आए वे सुलकते अंगारे जो
12:29अब युद्ध की ज्वाला बनने वाले थे
12:32लंका की शांत गलियों में अब केवल मृत्यू की पच्चाप सुनाई देने लगी थी क्योंकि युद्ध का बिगुल बजने ही
12:40वाला था
12:41रावन के महल का विशाल प्रांगन अब एक ज्वाला मुखी की तरहा देहक रहा था जहां रावन का अहंकार उसके
12:49दस मुखों से अगनी बनकर बरस रहा था
12:52क्रोध में अटहास करते हुए रावन ने सभा में बैठे अपने असुर सेनाप्तियों को आदेश दिया कि वे इस वानर
13:00दूद को बंदी बनाकर उसके गर्व को चूर-चूर कर दें
13:05रावन के संकेट मिलते ही छै बल्शाली राक्षस अंगद की ओर जप्ते जैसे भूखे शिकारी अपने शिकार पर धावा बोल
13:13रहे हों
13:15अंगद ने स्थिर खड़े होकर अपने पैर को जमीन में मजबूती से जमा दिया मानोवे स्वय अचल हिमालय का अंश
13:22बन गये हों
13:34सभा में उपस्थित मंदोदरी चिंतित भाव से रावन को देख रही थी, जानते हुए कि यह अहंकार ही लंका के
13:42विनाश का मार प्रशस्त करेगा
13:45अंगद ने उन राक्षसों की ओर तिरसकार भरी द्रिष्टी से देखा और अपने पैर से लंका की धर्ती को हिला
13:52दिया
14:11अंगद ने शानती से रावन को चुनोती दी कि यदी वहया उसके वीर इस पैर को तनिक भी हिला सकें
14:18तो वे राम के सामने अपनी पराजय स्विकार कर लेंगे
14:22रावन के सबसे शक्तिशाली सेनाप्ती प्रहस्त ने पूरी शक्ती लगा कर अंगद के पैर को हिलाने का असफल प्रयास किया
14:31जैसे ही प्रहस्त ने जोर लगाया उसका शरीर कांप उठा और उसकी पकट धीली पड़ गई जिससे पूरी सभा में
14:39सन्नाटा चा गया
14:41रावन का चहरा क्रोध से तम्तमा उठा और उसने अपनी दुष्टता को पराकाश्ठा पर ले जाते हुए स्वया अंगद को
14:49ललकारा
14:50रावन ने अपनी पूरी दैट्य शक्ती का प्रयोग किया परन्तु अंगद का पैर लंका की धर्ती में कील की तरह
14:57धनसा हुआ था
14:59अंगद ने उफास करते हुए कहा कि रावन यदी राम के चर्णों में गिर जाएं तो ही उसका कल्यान संभव
15:07है
15:08महल की छटों से पत्थर के टुकडे नीचे गिरने लगे मानो लंका का आधार ही अंगद की चुनोती के सामने
15:16जुकने लगा हो
15:17असुर सभा के राक्षस अब दर से कामपने लगे थे क्योंकि उन्होंने अंगद की इस शक्ती के सामने अपने राजा
15:25की विफलता देखी थी
15:27रावण ने अपनी तलवार निकाली और अंगद पर वार करने का कुछ सिप प्रयास किया जिसे देखकर सभा के शुबचिन
15:35तक स्तब्ध रह गए
15:37अंगद ने एक लंबी छलांग लगाई और महल के उपर आकाश में विलीन हो गए रावण को अपने अपमान के
15:45जलते हुए अंगारों के बीच छोड़ गए
15:48लंका की सीमा पर राम की सेना के पास लोटते हुए अंगद का आगमन मानो काल के आगमन का प्रतीक
15:55बन गया था
15:57लंका के तट पर खड़ी वानर सेना के समक्ष अंगद ने राम को रावण के अहंकार और उसकी क्रूरता का
16:04साक्षात वृत्तांत सुनाया
16:07भगवान राम ने अपनी करुणा भरी आखों से दूर लंका की स्वर्ण नगरी को देखा और शांत स्वर में कहा
16:14कि अब शांती का समय समाप्थ हुआ
16:17राम के आदेश मिलते ही सुग्रीव ने अपनी विशाल गदा उठाई और वानर सेना में एक अभूत पूर्व गर्जना गूंज
16:25उठी
16:26आकाश में देवताओं की भीड जमा हो गई और पूरी स्रिष्टी इस महा संग्राम की प्रतीक्षा में थम गई
16:34लंका की प्राचीर पर खड़े रावन ने जब वानर सेना के जयगोश को सुना तो उसका हृदय प्रतिशोध की अगनी
16:42से जल उठा
16:44रावन ने अपनी दस भुजाओं से दसों हतियारों को एक साथ ठाम लिया और युद्ध के लिए लंका के द्वार
16:51खोलने का आदेश दिया
16:53वानरों की विशाल सेना ने एक साथ समुद्र तट से लंका की ओर कदम बढ़ाए जिससे प्रित्वी कांप उठी
17:01धूल के गुबार और युद्ध के शोर के बीच काल की काली परचाईया लंका के द्वारों पर मंदराने लगी
17:10हनुमान ने एक लंबी चलान लगाकर लंका के मुख्य द्वार पर प्रहार किया जिससे पूरी स्वर्ण नगरी थर्थरा गई
17:18ब्रहमा जी और अन्य देवगन अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस युद्ध के प्रथम चरण का अवलोकन कर रहे थे
17:26लंका के राक्षसों की सेना ने एक साथ अपने भयंकर अस्त्रशस्त्रों को बाहर निकाला और वारों पर जपट पड़ी
17:35युद्ध का बिगुल बजते ही शान्ती का आखिरी अध्याय समाक्त हो गया और रक्त की नदिया बहने की भूमिका तयार
17:42हो गई
17:44नल और नील ने अपनी अध्भुत चतुराई से लंका की रक्षा पंक्ती को तोड़ने का बीड़ा उठाया
17:51राम के चहरे पर एक धीर गंभीर भाव था जैसे वे भविश्य के उस विनाश को देख रहे हों जो
17:58अधर्म का अंत करने वाला था
18:01अंगद ने रावन के सेनाप्ती पर अपनी भारी गदा से ऐसा वार किया कि शत्रु का रत चकनाचूर हो गया
18:09युद्ध के मैदान में गूजती मृत्यू की पुकार से लंका का आकाश भी काला पड़ने लगा था
18:16रावन की सेना का वह विनाशकारी प्रहार वानरों पर बरसने लगा जिससे रनभूमी एक भयानक अखाडे में बदल गई
18:25लक्षमन ने अपना धनुष साधा और एक साथ कई बान छोड़कर राक्षसों की प्रक्ती को रोक दिया
18:33पूरी लंका अब एक महा प्रलय के केंद्र बिंदु की तरह धधक रही थी
18:39अंत्र धर्म और अधर्म का वह महा संग्राम अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था
18:44जहां से बापसी का कोई मार्ग नहीं था
18:48लंका के स्वर्ण में द्वारों से राक्षसी सेना का विशाल सैलाब किसी उफनते हुए काले समुद्र की भांती बाहर उमड
18:56पड़ा
19:08नल और नील ने गरस्ते हुए अपनी वानर वाहिनी को ललकारा और चट्टानों को हतियारों की तरह उठाकर राक्षसों पर
19:16तूट पड़े
19:18रणभूमी की धूल और राक्षसों के क्रोध से वातावर्ण में एक भीशन अंधकार छा गया जो अधर्म के पराभव का
19:26संकेत दे रहा था
19:28सुग्रीव ने अपनी विशाल गदा घुमाते हुए राक्षसों की अग्रिम पंक्ती को एक ही प्रहार में धूल चटा दी
19:36भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपनी समाधी से एक शण के लिए जागरित हुए उनकी तीसरी आख से दिव्य
19:43उर्जा का संचार हुआ
19:46वानरों की फुर्ती ने राक्षसों के भारी भरकम हथियारों को व्यर्थ कर दिया और वे हवा में उच्छल कर प्रहार
19:53करने लगे
19:55युद्ध का शोर इतना तीवर था कि जैसे लंका के कंकन से मृत्यू की चीखें गूंजने लगी
20:02राक्षस सेनाप्ती अपने काले रथों पर सवार होकर राक्षसी हुंकार के साथ वानरों की घेराबंदी करने लगे
20:11नारद मुनी देव लोग से इस विनाशकारी द्रिश को निहारते हुए वीना पर एक चेतावनी भरास्वर छेड रहे थे
20:20नल ने अपनी कुशलता से भारी पाशाणों को एक सटीक क्रम में फेंक कर शत्रु के व्यू को खंडित कर
20:26दिया
20:28रणभूमी की अगनी और वानरों के उत्साह के बीच एक अजीब सी सामयता दिखाई दे रही थी जो विजय का
20:35आहवान कर रही थी
20:38राक्षसों ने विशैले बाणों की वर्षा शुरू की जिससे वानर सेना के चारों और एक घातक घेरा बनने लगा
20:46भगवान विश्नु के चहरे पर एक मंद मुस्कान थी जो इस महायुद्ध के अंत के अनिवार्य सक्त्य को दर्शा रही
20:54थी
20:55नील ने एक विशाल शिलाखंड पर छलांग लगाई और उसे शत्रू सेना के मध्य गिरा कर प्रलय मचा दिया
21:03लंका का पूरा तट अब रक्त और धूल के मिश्रन से एक भयावा रनक्षेत्र में तबदील हो चुका था
21:11राक्षस अब अपनी मायावी शक्तियों का उप्योग कर अद्रिश्य होकर वार करने का प्रयास कर रहे थे
21:19भगवान शिव ने अपनी द्रिष्टी को लंका की ओर केंद्रित किया जिससे संपूर्ण ब्रहमांड में एक अलौकिक कमपन फैल गया
21:28सुग्रीव के एक गर्जनापूर्ण प्रहार से लंका का मुख्य द्वार हिल गया और सेना में भगदर मच गई
21:36युद्ध का यह प्रथम चरण ही अधर्म के विनाश की एक स्पष्ट भूमिका बन चुका था
21:42लंका के दुर्ग की उँची प्राचीर पर खड़े विभीशन अपनी रक्तरंजित प्रजा को काल के ग्रास में जाते देख मौन
21:49हो गए हैं
21:52विभीशन के पास ही खड़े देवर्शी नारद ने उनकी उदास आखों में तैर रहे दुविधा के अश्रु को देख कर
21:59एक सुक्ष्म मुस्कान के साथ कहा कि अधर्म का नाश ही धर्म की विजय का आधार है
22:06विभीशन ने अपने ही भ्राता की सेना को लप्टों में घिरते हुए देख कर आह भरी लेकिन उनके हृदय में
22:13भगवान श्री राम के प्रती अटूट विश्वास प्रजवलित था
22:18अंधकार से घिरे हुए उस रौरव शेत्र के उपर नेती का चकर बड़ी तेजी से घूम रहा है जो लंका
22:24के पतन की घोशना कर रहा है
22:28विभीशन जानते हैं कि रावन का अहंकार ही उस वजर के समान है जो अंत्त उसे ही भस्न कर देगा
22:36विश्णु लोक के शयन से विचलित हुए भगवान शेशनाग ने अपने फनों से संपूर्ण धरातल को एक खशन के लिए
22:43थाम लिया मानों वे युद्ध की तीवरता को देख रहे हूँ
22:48एक वानर सैनिक के प्रहार से लंका के मुख्यद्वार का एक बड़ा हिस्सा धराशाई हो गया जिससे विभीशन के कानों
22:56में अपनी ही संस्कृती के ढहने की आवाज गूँच गई
23:00अधर्म के इस रौरव नर्क में रावन के सैनिकों की चीखें एक ऐसी प्रतिध्वनी बना रही हैं जिसे सुनकर विभीशन
23:08का मन इश्वर की शरण में और भी द्रेड हो गया
23:12विभीशन ने देखा कि लंका के गगंचुम्बी कंगूरों पर लगी स्वर्ण कल्शों की चमक धीरे-धीरे धुमिल होती जा रही
23:19है जैसे लंका का तेज अब शेश न रहा हो
23:24देवराज इंद्र ने आकाश से इस विनाश लीला को देखते हुए कहा कि यह समय केवल रावन की माया के
23:31अंतका नहीं अपित मानवता के उध्धार का है
23:36नीचे युद्ध क्षेत्र में राक्षसों की सेना इधर उधर भाग रही है मानो किसी प्रचंड तूफान ने पत्तों को बिखरने
23:43के लिए विवश कर दिया हो
23:46विभीशन के चहरे पर वेदना के गहरे भाव हैं क्योंकि उन्हें पता है कि रक्त का यह मूल्य ही लंका
23:53के पापों को धोपाएगा
23:56चारो और फैली भयंकर आग और रावन के सैनिकों का क्रंदन विभीशन के अंतर्मन में एक वैराग्य की अगनी प्रजवलित
24:04कर रहा है
24:06भगवान शिव के त्रिशूल से निकली एक सुक्ष्म उर्जा की किरन रावन के महल की नीम को कमपायमान कर रही
24:13है
24:15राक्षस सेना के नायक अब अपनी पूरी शक्ती जोक रहे हैं लेकिन काल के विप्रीट चलना असंभव हो गया है
24:24वातावर्ण में तैरती राख और लंका की जली हुई स्वर्ण की गंध विभीशन को बार-बार यह स्मरण कराती है
24:31कि अधर्म का अंत सदैव विध्वन सक होता है
24:36दूरक्षितिच पर लंका का मुख्य प्रहरी अब बस्त हो चुका है और उसकी पराजय लंका के अंत का पहला संकेथ
24:43है
24:45विभीशन अपनी भुजाओं को बांधे एक गंभीर मुद्रा में उस नेती को स्विकार कर रहे हैं जिसे वे स्वयन कई
24:52वर्षों से टालने का प्रयास कर रहे थे
24:56युद्ध का शोर अब और भी तीवर हो गया है मानो पाताल लोक भी अपनी धुरी पर काम उठा हो
25:04लंका का वह विनाशकारी प्रहार जिसने अभी कुछ समय पूर्वी सेना में भगदर मचाई थी अब एक शांत अंधकार में
25:12परिवर्तित हो रहा है
25:15ब्रहमांड के सर्वोच शिखर से देवराज, इंद्रक और अन्य देवतागन विचलित होकर नीचे युद्ध भूमी की ओर अपनी दिव्यद्रिष्टी टिकाए
25:23हुए है
25:25देवराज इंद्रका गौरवशाली मुख मंडल चिन्ता और कौतुक के भावों से घिरा है जबकि उनके पास स्थित देवगुरु ब्रहस्पती शांतिपूर्ण
25:35ध्यान में लीन है
25:38अचानक एक तेजस्वी प्रकाश पुन्च से देवताओं के समक्ष आकाशवानी गूंजती है जो धर्म की विजय का उद्गोश करती है
25:47स्वर्ण में आकाश में देवों की सभा के चारों और एक अलौकिक प्रभा मंडल फैल गया है जो इस युद्ध
25:55के अंतिम परिनाम का साक्षी बन रहा है
25:59भगवान सूर्य अपने रत पर विराज मान होकर नीचे लंका के तटपर हो रहे इस महा संगराम को अपनी प्रखर
26:06किर्णों से देख रहे हैं
26:09वरुन देव सागर की लहरों को शांत करने का संकेत दे रहे हैं ताकि भगवान राम के पच्चेहन इस धर्ती
26:17पर न्याय के स्तंभ बन सकें
26:20समुद्र की उठती हुई लहरें अब धीरे-धीरे थम रही हैं मानो प्रकृती भी राम के इस महान संकल्प के
26:27आगे अपना शीष जुका रही हो
26:30आकाश के दिव्य लोक से अब पुश्पों की वर्षा होने लगी है जो राम की सेना के साहस को सम्मान
26:37प्रदान कर रही है
26:39ब्रहमाजी अपनी कमल की आशन पर विराज मान होकर इस युद्ध की नेती को देख रहे हैं और धर्म के
26:46पुनृत्थान की प्रार्थना कर रहे हैं
26:50देवर्षी नारद के मुख से वीना की एक गूंज निकलती है जो युद्ध के कोलाहल के बीच भी शान्ती का
26:57संदेश फैला रही है
27:00वीना के तारों से निकली तरंगे लंका के उनक्षेत्रों तक भी पहुँच रही है जहां अभी भी घोर अंधकार और
27:07हिंसा का वास है
27:19इंद्र के हाथों में सुशोभित वजर्चमक उठा है यह संकेत देते हुए की देवताओं का सहयोग अब राम के साथ
27:27है
27:29यमराज के प्रतिनिधी भी अपने नियत स्थान पर खड़े इस युद्ध के संतुलन को बड़ी बारीकी से देख रहे हैं
27:38वायुदेव मंद पवन का संचार कर रहे हैं जिससे राम की सेना का उत्साह और अधिक दोगुना हो गया है
27:46आकाश के गर्ब से दिव्य नक्षत्रों की एक पंक्ती चमक उठी है जो राम के विजय पत को आलोकित कर
27:53रही है
27:55देवताओं की इस अप्रत्यक्ष उपस्थिती ने वानर सेना में एक नवचेतना और अध्भुत उर्जा का संचार कर दिया है
28:04महादेव के प्रिय अनुचर भी कैलाश से इस धर्मयुद्ध के साक्षी बन रहे हैं उनकी आखों में न्याय की प्रतीक्षा
28:12की ज्वाला है
28:14राम के प्रती देवताओं का यह असीम्स ने इस बात का प्रमान है कि आने वाले समय में अधर्म का
28:21अंतनिश्चित है
28:24समूचा आकाश एक दिव्य उत्सव के रंग में रंगा हुआ है जो मानव और देवों के मिलन का अध्भुत साक्षी
28:31बन रहा है
28:33संध्या की लाली ने रंभूमी को ढख लिया है जहां सूर्य धीरे धीरे क्षितिच के पीछे उजल होकर पहले दिन
28:40के महासंगरान को विराम दे रहा है
28:44कैलाश के उन्नत शिकरों पर विराजमान महादेव ने अपनी ध्यानमगन नेत्रों को खोला उनकी द्रिष्टी में समय के चक्र की
28:52गती और भविश्य का गंभीर आभास पष्ट है
28:56वानर सेना का उच्साह सूर्यास्त के उपरान्त भी शान्त नहीं हुआ है वे अपनी विजय गाथाओं को गाते हुए समुद्र
29:04तट पर विश्राम करने की तयारी कर रहे हैं
29:09आकाश में देवगन अपने दिव्यरतों पर सवार होकर एक गहरी शान्ती के साथ इस द्रिष्य को देख रहे हैं
29:16मानो प्रकृती भी कल के महाविनाश के लिए सास रोक रही हो
29:21दूसरी और लंका की विशाल प्राचीरें अब अंधकार में डूबी हुई हैं जहां भय का साया गलियों में रिंग रहा
29:29है
29:30रावन के गुप्तचर भय से कापते हुए स्वर्ण महल के गलियारों में भाग रहे हैं
29:36उनके मुख से निकली सूचनाएं लंका के रक्षकों के साहस को खंडित कर रही है
29:43विभीशन अपनी कुटिया में बैठ कर राम की विजय का संकल्प ले रहे हैं
29:47जबकि उनकी अंतरात्मा लंका के विनाश को रोकने के लिए व्याकुल हो रही है
29:54अंधेरी गलियों में मशालों का धुंधला प्रकाश अधर्म के अंत की उस भयंकर रात का संकेत दे रहा है जो
30:01अभीशेश है
30:03समुद्र के किनारे राम अपने धनुष को म्यान में रखकर शांत सागर की लहरों को देख रहे हैं
30:10जैसे वे समुद्र से कोई गूर प्रशन पूछ रहे हूं
30:14देवराज इंद्र ने अपने दिव्य लोक से नीचे लंका की ओर देखा
30:19उनके चहरे पर एक गंभीर चिंता और न्याय के प्रती अटूट विश्वास का संगम है
30:26सुग्रीव और अंगद ने अपनी सेना के घावों को भरने का कार्य शुरू कर दिया है
30:31ताकि कल के युध के लिए हर सैनिक पूरी तरह तयार रहे
30:36रात के सन्नाटे में दूर से आती रावन की गर्जना लंका की नीम को हिला रही है
30:42मानो वह काल को स्वयन चुनोती दे रहा हो
30:46लंका के निवासियों के मन में यह आशंका घर कर गई है कि कल का सूर्योदय विनाश का एक नया
30:53अध्याय लेकर आएगा
30:55गरुर्देव आकाश में चक्कर काटते हुए धर्म की इस विजय यात्रा का परियवेक्षन कर रहे हैं
31:01उनके पंखों की फड़फडाहट में एक दिव्यध्वनी समाहित है
31:07हनुमान जी अपनी पूँच की लप्टों को शांत कर शांती के साथ ध्यान में लीन है
31:12उनका शरीर वजर जैसा कठोर और मन कमल जैसा कोमल है
31:18पूरी स्रिष्टी का भार अब इस युद्ध की परिंती पर टिका है
31:22जहां हर पल एक युग के समान भारी होता जा रहा है
31:27पवन देव ने धीरे से लंका के तटों को स्पर्ष किया
31:31जैसे वे युद्ध की गर्मी को कम करने और प्रकृती के संतुलन को बनाए रखने का प्रयास कर रहे हूं
31:39यमराज के अनुचर भी दूर से इस महा युद्ध की हलचलों को देख रहे हैं
31:44क्योंकि कल का दिन उनके लिए अनेक आत्माओं का मार्ग प्रशस्त करेगा
31:49शस्त्रों के टकराने की गूंज अभी भी हवाओं में जीवित है
31:53जो वानरों के साहस और राक्षसों के अहंकार के बीच की खाई को दर्शा रही है
32:00जैसे ही रात गहरी होती है
32:02लंका की रणभूमी एक अनिश्चित भविश्य की प्रतीक्षा में पूरी तरह मौन धारण कर लेती है

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