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इस एपिसोड में देखिए हनुमान की अद्भुत यात्रा! जब लक्ष्मण के प्राण संकट में थे, तब हनुमान ने कैसे समय को मात देते हुए संजीवनी बूटी प्राप्त की। क्या काल लक्ष्मण को ले जा पाएगा? जानिए पद्म पुराण का यह रहस्यमयी और रोमांचक प्रसंग। #PadmaPurana #Hanuman #Ramayana #Mythology #Sanjeevani #Laxman #AncientIndia #HinduMythology
Transcript
00:00लंका के भीशन रणक्षेत्र में लक्षमन के अचेत शरीर को देख राम का हृदय विदीर्ण हो रहा है और चारों
00:07और निराशा का अंधकार छा गया है
00:10राम के विलाप को सुनकर विभीशन की व्याकुलता बढ़ जाती है और वे सुशेन वैध्य के परामर्ष का स्मरण कराते
00:18हुए संजीवनी का मार्ग प्रशस्त करते हैं
00:23हनुमान के विशाल और तेजस्वी स्वरूप का वर्णन करते हुए वे वायू के वेग से हिमालय की और एक बिजली
00:30की गती के समान प्रस्थान करते हैं
00:34आकाश के विस्तार में तैरते हुए हनुमान के पीछे मेगों का एक गहरा-गहरा बन गया है जो समय की
00:40गती को और भी तीवर बना रहा है
00:44विशाल परवत मालाओं के बीच हनुमान की दृष्टी उस संजीवनी परवत को खोजने के लिए व्याकुल है जो प्राणों की
00:51रक्षा का एक मात्र साधन है
00:55देवराज, इंद्र और अन्य देवतागन हनुमान के इस महा प्राक्रम को देखकर अपने स्वर्णिम रथों से श्रधा पूर्वक निहार रहे
01:03हैं
01:05हिमाले की गगंचुम्बी चोटियों के बीच हनुमान की उचाई और उनका तेज वातावर्ण को स्वर्णिम आभा से भर देता है
01:15समय निरंतर बीत रहा है और काल का चक्र लक्षमन के जीवन पर अपना शिकंजा कस्ता जा रहा है
01:23हनुमान के हरिदय में केवल राम के प्रती प्रेम है जो उन्हें इस कठिन यात्रा में थकान से कोसों दूर
01:30रखता है
01:32इधर कैलाश पर भगवान शिव के नेत्रों में भी वानर श्रिष्ट की इस निस्वार्थ सेवा के प्रती एक मूख स्विकृती
01:39है
01:41हनुमान की गर्जना से हिमालय की कंदराएं गूँज उठी है जैसे प्रकृती भी उनके इस महान कार्य में सहियोग दे
01:49रही हो
01:50शुन्य और आकाश के मिलन स्थल पर हनुमान ने अब परवत श्रेनियों के रहस्यों को भेदना प्रारंभ कर दिया है
01:59लंका में वानर सेना का धैर्य अब तूटने की कगार पर है किन्तु राम का विश्वास अभी भी हनुमान की
02:06गती पर टिका है
02:09देवर्शी नारद आकाश मार्ग से हनुमान का मार्ग दर्शन कर रहे हैं जिससे उनकी यात्रा और अधिक सुगम हो रही
02:17है
02:18हनुमान अब उस दिव्यस्थान के निकट हैं जहां संजीवनी का प्रकाश अंधकार को चीर कर चारों और फैल रहा है
02:27प्रकृती के तत्व हनुमान का सम्मान कर रहे हैं ठंडी हवाएं उन्हें गती दे रही हैं और बर्फ की चादरें
02:35उनके मार्ग को सुशोभित कर रही है
02:39लक्षमन का शरीर अब निस्तेज हो रहा है जिससे राम की चिंता में और अधिक वृध्धी हो गई है
02:47भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा से हनुमान के इस संकल्प को देख रहे हैं और उनके मुख पर एक मंद
02:54मुस्कान है
02:56हनुमान ने अब अपनी शक्ती का पूर्ण विस्तार कर लिया है और वे संजीवनी की खोज में परवत को ही
03:03अपनी भुजाओं में उठाने को तत्पर है
03:07काल के मुख से लक्षमन को बाहर लाने का हनुमान का यह अद्भुत संकल्प अब सिध्धी के द्वार पर खड़ा
03:14है
03:16हनुमान के विराट रूप लेते ही हिमालय के शिखर अपनी कांती खोने लगे और देवलोक में हलचल मच गई
03:24भगवान विश्णु ने अपनी योग निद्रा से नेत्र खोले और हनुमान की इस सेवा भावना को देख कर उनके चहरे
03:31पर दिव्य संतोष के भाव उभरे
03:34हनुमान के विशाल चरण जब परवत पर पड़े तो पहाड की शिलाए किसी खिलोने की भानती चूर-चूर होकर गिरने
03:42लगी
03:43काल की सीमाओ को चुनोती देता हुआ हनुमान का यह स्वरूप ब्रहमांड में एक नए संकल्प का संचार कर रहा
03:50था
03:52हिमाले की दुर्गम गुफाओं से उठने वाली बरफीली आंधिया हनुमान के मार्ग को अवरुध करने का विफल प्रयास कर रही
04:00थी
04:01देवराज इंद्र ने आकाश मार्ग से हनुमान की इस अविचल भक्ती को देख नतमस्तक होकर उनका अभिनंदन किया
04:10हनुमान की तीवर गती के कारण हवाओं में भी गूंज उत्पन हो गई थी जैसे स्वयन पवन देव अपने पुत्र
04:17के साथ चर रहे हूँ
04:19अटल हिमालय का यह द्रिश मानो साक्षात भगवान शिव की तपस्या का जीवन्त रूप हो जो हनुमान के चर्णों की
04:27धूल से धन्य हो गया
04:29मार्ग में खड़ी गंधर्व सेना ने हनुमान के शौर्य को पहचान कर उनके सम्मान में अपने पुश्पों की वर्षा शुरू
04:37कर दी
04:38गरुर देव ने हनुमान के वेग को देख कर अपनी गती धीमी कर ली ताकि वे इस वीर वानर के
04:45दर्शन कर सके
04:47हनुमान की एक गर्जना मात्र से हिमस्खलन की लहरें थम गई और प्रकृती ने भी उनके संकल्प के सामने मौन
04:55धारन कर लिया
04:57यह वह स्थान था जहां की दिव्यता ने समय को भी एक पल के लिए थाम लिया था ताकि संजीवनी
05:03की खोच पूर्ण हो सके
05:06हिमाले की उची चोटियों से जाकती हुई अलौकिक शक्तिया हनुमान के पराक्रम को देखकर भैभीत और चकित थी
05:15ब्रहमाजी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की बूंदे इस परवत पर गिराई जिससे औशधियों की चमक और भी तीवर
05:22हो गई
05:24हनुमान ने अपने विशाल हाथों से उस परवत को स्पर्श किया जहां संजीवनी की दिव्य सुगंध व्याप्त थी
05:32हिमाले का यह गौरवशालीक्षन मानो इतिहास के पन्नों पर अंकित हो रहा था कि कैसे एक भक्त ने काल को
05:39पराज़त किया
05:42प्राकृतिक बाधाओं को अपनी भक्ती के बल पर पार करते हुए हनुमान अब उस शिखर के समीप पहुँच गए थे
05:49जो संजीवनी का वास्त स्थान था
05:52देवर्शी नारद ने वीना बजाकर इस पावन घटना का गायन किया जिससे पूरे ब्रहमांड में हनुमान की जैजैकार होने लगी
06:02हनुमान ने अपनी भुजाओं के बल से संजीवनी परवत को ही धारन करने का निश्चय किया ताकि लक्षमन का प्राण
06:09बचाया जा सके
06:11हिमालय के उस दिव्य श्रिंगार के बीच हनुमान की यह विजय गाथा संजीवनी के साथ नई चेतना बन कर उभरने
06:19लगी
06:20हनुमान अपनी गती के वेग से हिमालय की उत्तुम चोटियों को लांगते हुए उस मायावी आश्रम के समीप पहुँचे जहां
06:28कालनेमी ने साधु का वेश धारन कर रखा था
06:32देवर्शी नारद ने उपर से द्रिश को देखते हुए अपनी वीना के तारों को छेड़ा जैसे वे ब्रहमांड को इस
06:39धोखे के बारे में सावधान कर रहे हुँ
06:43कालनेमी ने एक शांत सरोवर के किनारे बैठ कर भक्ती का ढोंग रचाया मानो वह प्रभुश्री राम का ही भक्तो
06:52प्रकृती के उस शांत वातावर्ण में कालनेमी का मायावी आभा मंडल धीरे धीरे एक अधर्म की काली छाया में बदलने
07:00लगा जो उस पवित्र परवत की शुद्धता को दूशित कर रहा था
07:05हनुमान ने अपने सुख्ष्म नेत्रों से उस सरोवर की गहराई को निहारा और उन्हें उस साधु के वेश में राक्षसी
07:12कमपन का आभास हुआ
07:15विश्णु भगवान ने वैकुंठ के द्वार से इस लीला को देखते हुए मंद मुस्कान बिखेरी जैसे वे हनुमान की परीक्षा
07:22और कालनेमी के अंत को देख रहे हुँ
07:26हनुमान ने अपनी गदा को थामे हुए उस छद्म साधु के समीप जाकर विनमर्ता का स्वांगरचा और उनकी आग्या मांगी
07:35हिमाले की बरफीली हवाएं मानो उस छल के प्रती हनुमान को चेतावनी देने के लिए और अधिक तीवर गती से
07:43बहने लगी
07:44कालनेमी ने मीठी बातों से हनुमान को सरोवर में सनान करने और विश्राम करने का प्रलोभंदिया ताकि समय व्यतीत हो
07:52सके
07:54भगवान शिव ने कैलाश परवत से अपनी तीसरी आख खोली और उस मायावी राक्षस के कपट पर क्रोध की एक
08:01सुक्ष्म लेहर दोड़ गई
08:04हनुमान ने जल की ओर देखा जहां मायावी रूप से कालनेमी ने एक भयानक जल राक्षस छिपा रखा था
08:12परवत की उन शिखरों के बीच का वातावर्ण अचानक भारी हो गया जैसे सत्य का भार उस माया के जाल
08:19को तोड़ने को आतुर था
08:22हनुमान ने मुस्कुराते हुए अपनी सुक्ष्म द्रिष्टी का प्रयोग किया और एक ही पल में उस साधु की वास्तविक राक्षसी
08:30आक्रिती को पहचान लिया
08:32गरुर देव ने आकाश में पंक फैलाए और कालनेमी की माया को नश्ट करने के लिए पवन के वेग से
08:39गरजना की
08:41कालनेमी घबरा गया और उसने अपने हाथों से विशैले मंत्रों का उच्चारण करना शुरू किया ताकि वह हनुमान को रोक
08:49सके
08:50हिमाले की बरफीली शिलाओं पर अगनी का एक वृत्त बन गया जो राक्षस के मायावी जाल को ढखने लगा
08:59हनुमान ने एक हुंकार भरी और उनकी शक्ती से वह पूरा मायावी आश्रम कांप उठा जैसे भूकंप ने उस छद्म
09:07शांती को छिन्न भिन कर दिया हो
09:10देवी सती का रूप धारण किये एक दिव्यचाया ने आसमान से इस सत्य के विजय का आशिर्वाद दिया
09:18कालने में अपनी वास्तविक राक्षसी काया में प्रकट हुआ उसके हाथ में विशाल त्रिशूल था जो हिमालय की पवित्रता को
09:26चुनोती दे रहा था
09:28हनुमान ने अपने पवन पुत्र होने का प्रमान दिया और एक क्षण में उस राक्षस के सम्मुख खड़े हो गए
09:35संजीवनी के लिए समाय का चक्र अब और भी तेज घूमने लगा
09:40हनुमान के विशाल पच्चाप से कैलाश की हिमाच्छादित चोटिया थर्थरा उठीन मानो स्वयं प्रकृती इस निरनायक द्वंदव को देखने के
09:49लिए रुख गई हो
09:51वैकुंट के स्वर्ण कमलों पर विराजमान भगवान विश्णु ने अपनी योगनिद्रा से नेत्र खोले और इस संधर्ष को अपनी दिव्यद्रिष्टी
10:00से निहारा
10:02कालनेमी ने अपने भयानक त्रिशूल को घुमाया और पवनपुत्र हनुमान की छाती को लक्षे बना कर उसे पूरी शक्ती से
10:09हवा में फेंका
10:12अंधकार और प्रकाश के इस मिलन बिंदु पर वायुमंदल में एक भीशन लालिमा छा गई जो आने वाले विनाश का
10:19संकेत दे रही थी
10:22हनुमान ने एक ही छलांग में उस त्रिशूल को हवा में ही पकड़ कर चकनाचूर कर दिया और उनका मुख
10:28क्रोध से तमतमा उठा
10:31भगवान शिव अपने ध्यान को भंग करते हुए सुक्षम रूप से हनुमान की वीर्ता और कालनेमी की दुष्टता के साक्षे
10:38बने रहे
10:40कालनेमी ने अपनी माया का विस्तार करते हुए दस भुजाएं प्रकट की और चारों और से हनुमान पर अस्त्रों की
10:47वर्षा शुरू कर दी
10:50पर्वत की घाटियों में जैसे काल का चक्र थम गया केवल हनुमान के गर्जन और कालनेमी की अटहास की गूँच
10:57सुनाई पड़ रही थी
11:00हनुमान ने अपने गदा को घुमा कर एक चक्रवात उत्पन किया जिसने कालनेमी की सभी माया भी अस्त्रों को हवा
11:07में ही भस्न कर दिया
11:09स्वर्ग के देवता विमानों पर सवार होकर इस युद्ध का अवलोकन कर रहे थे उनके मुख से सत्य की जीत
11:17के लिए प्रार्थनाए निकर रही थी
11:20हनुमान के गदा प्रहार से कालनेमी के कवच के टुक्रे होने लगे और राक्षस की घ्रेनित काया लड़ खडाने लगी
11:28धूल और बर्फ के गुबार के बीच से हनुमान का तेज एक सूर्य की भांती चमक रहा था जो अधर्म
11:35के अंधकार को चीर रहा था
11:38कालनेमी ने अंतिम प्रयास में हनुमान के गले को जकड़ने के लिए अपनी राक्षस भुजाएं बढ़ा दी पर पवनपुत्र का
11:46धैर्य अटूट था
11:48गरुर देव ने बादलों के उपर से गर्जना की जिससे हनुमान को और अधिक शक्ती प्राप्थ हुई और उन्होंने एक
11:55निरनायक प्रहार किया
11:58गदा के एक भीशन प्रहार ने कालनेमी के मस्तक को भेद दिया जिससे उस दुष्ट का माया भी अस्तित्व सदा
12:05के लिए समाप्थ हो गया
12:08कालनेमी के अंट के साथ ही हिमालय की चोटियों पर व्याप्त भाय का वातावर्ण मिट गया और शांती का पुनह
12:15संचार हुआ
12:17हनुमान ने पुनह संचीवनी की खोज में अपने कदम आगे बढ़ाए क्योंकि लंका में लक्षमन की सांसें अब केवल उनकी
12:25प्रतीक्षा में थी
12:27ब्रहमा जी ने अपने लोकों से इस निश्ठा को देखा और मुस्कुराते हुए हनुमान की इस यात्रा को सफल होने
12:35का आशिरवाद दिया
12:37पवन देव स्वयं वायू बनकर हनुमान के साथ चल रहे थे ताकि उन्हें मार्ग की बाधाउं से रक्षा मिल सके
12:45समय का चक्र अब हनुमान की गती के साथ तालमेल बिठा रहा था, संजीवनी की प्राप्ती के लिए अंतिम पड़ाव
12:53निकट था
12:55गगन्चुम्बी हिमाच्छादित शिकरों को चीरते हुए पवनपुत्र अंत्त्य दिव्य द्रोनागिरी परवत के उस अलोकिक छेत्र में प्रविष्ठ हुए, जहां देवाश्धियों
13:04का निवास था
13:07हिम्शिलाओं पर उतरते ही वीर हनुमान ने अपने तेजस्वी नेत्रों से उस पावन भूमी को नमन किया, जहां प्रभु लक्षमन
13:14के जीवन की संजीवनी छिपी थी
13:17सुशेन वैध्यद्वारा बताये गए लक्षनों को स्मरण करते हुए हनुमान ने उस वनस्पति भूल परवतसकंध पर अपनी खोजी द्रिश्टी दोडाई
13:28किन्तु उस पावन शिखर पर एक ऐसा रहस्य में द्रिश्य उपस्थित था, जिसने स्वयन पवन पुत्र की तीक्षन बुद्धी को
13:35भी विस्मय में डाल दिया
13:38द्रोनागिरी की प्रत्येक घाटी और शिलाखंड पर उगी सहसरों औशधिया एक समान दिव्य जोती से जग्मदा रही थी, मानो समूचा
13:47परवती प्रकाश का सागर बन गया हो
13:49मृत संजीवनी, विशल्यकर्णी, संधान कर्णी और सुवर्ण कर्णी के विशिष्ट भेदों को पहचानना इस असीन प्रकाश जाल में असंभव सा
13:59प्रतीत होने लगा
14:02हनुमान एक पादप के समीप जुके और उसकी पत्तियों का स्पर्ष किया, किन्तु उसके साथ ही समीप वर्ती सभी पौधे
14:10उसी प्रकार दिव्य उर्जा से स्पंदित होने लगे
14:13काल चक्र की गती अत्यंत तीवर थी और लंका में सूर्योदय से पूर्व पहुँचने की प्रतिग्या हनुमान के हृदय में
14:21अगनी बनकर धधक रही थी
14:24परवक की दिव्य उश्धियों ने किसी अज्यात भय अथवा मायावश अपनी वास्तविक पहचान को इस अलौकिक प्रकाश के पीछे छिपा
14:32लिया था
14:34व्याकुल होकर महाबली हनुमान ने दोनों हाथ जोड कर द्रोनागिरी की अधिश्ठात्री शक्तियों से प्रार्थनाकी की वे सुमित्रानंदन के प्रान
14:43रक्षार्थ संजीवनी को प्रकट कर दें
14:47किन्तु आश्धियों का वह प्रकाश्चल तनिक भी न घटा बलकि संपूर्ण पर्वत और भी अधिक प्रखर और एक समान आभा
14:55से जग्मगा उठा
14:57हनुमान के कानों में सुषेन वैध्य की चेतावनी गूंज उठी की यदि सूर्य की पहली किरन फूटने तक आश्धी न
15:04पहुँची तो लंका में लक्ष्मन का लोटना असंभव हो जाएगा
15:10वानर्श्रिष्ट ने पुनह एक एक पत्ती का सूक्ष्म परीच्षन करने का यत्न किया परन्तु हर पौधा अपने भीतर संजीवनी के
15:18ही गुन और आभा को प्रदर्शित कर रहा था
15:21समय की प्रत्येक बीत्ती सांस के साथ हनुमान के अंतर्मन में भ्रात्रिवियोग से पीडित प्रभु श्री राम का करोन मुख
15:29उभर रहा था
15:31उन्होंने अनुभव किया कि इन आउश्धियों के इस मायावी मौन और भ्रमजाल में उलजे रहने का अर्थ काल के हाथों
15:39पराजय स्विकार करना होगा
15:42पवन्पुत्र के नेत्रों में अब संशय का स्थान एक अभूत पूर्व और अदमे संकल्पने ले लिया जिसने संपूर्ण हिमालय को
15:50थर्थरा दिया
15:51यदि जड़ीबूटिया स्वयन चलकर लक्षमन के प्राण बचाने को ततपर नहीं है तो उन्हें विवश करना ही अब एक मात्र
15:59विकल्प शेश था
16:02हनुमान ने अपने विशाल वक्ष में वायू को भरा और अपने दिव्यवानर रूप को उस परवत के आकार के अनुरूप
16:09विराट करने का निश्चय किया
16:12उन्होंने अपनी दोनों बलशाली भुजाओं को द्रोनागिरी की आधार शिलाओं की ओर बढ़ाया और उनका स्पर्ष होते ही संपूर्ण परवत
16:20शिखर काम्प उठा
16:23औश्धियों की इस अंतिन पहेली को सुलजाने के लिए पवनपुत्र हनुमान ने संपूर्ण परवत को ही उसकी जड़ों से उखाड
16:30कर लंका ले जाने का एतिहासिक निर्णय ले लिया
16:34हनुमान के विराट रूब का विस्तार होते ही द्रोनागिरी परवत की चट्टाने गड़गड़ा कर तूटने लगी और संपूर्ण परवतमाला की
16:43नीम हिल गई
16:44कैलाश परवत पर समाधिस्थ भगवान शिव ने अपने त्रिनेत्र खोले और पवनपुत्र की इस अभूत पूर्व शक्ती को देखकर मंदमंद
16:53मुस्कुराते हुए उन्हें आशिरवाद दिया
16:57हनुमान ने अपने दोनों पैरों को धरातल में मजबूती से गाड़ा और अपनी विशाल भुजाओं के बल से पूरे द्रोनागिरी
17:05को एक खिलोने की भांती जड़ से उखाड लिया
17:08पर्वत के उखरते ही आकाश में एक दिव्यकंपन उत्पन हुआ जिससे देवगणों ने पुष्प वर्षाकर पवनपुत्र के इस महासंकल्प को
17:17नमन किया
17:19संपूल्ण पर्वत अब हनुमान के एक कंधे पर स्थिर था जिसकी आभासे सूर्य की किरने परावर्तित होकर चारों और स्वर्ण
17:28में प्रकाश फैला रही थी
17:31भगवान विश्णु अपनी क्षीर सागर की शया पर लेटे हुए शेशनाग के फन के नीचे से इस द्रिशे को देख
17:38रहे थे और हनुमान की अटूट भक्ती की सराहना कर रहे थे
17:43पर्वत के भार से हनुमान की गती तनिक भी धीमी नहीं हुई वे एक उलकापिंड की भानती तेजी से अंतरिक्ष
17:50की ओर प्रस्थान करने लगे
17:53पर्वत के गर्भ में स्थित संजीवनी और अन्य दुरलब औश्धिया अपने दिव्य प्रकाश से संपूर्ण दिशाओं को प्रकाशित कर रही
18:01थी
18:03नीचे हिमालय की चोटियों पर खड़े रिशिमुनियों ने इस अलौकिक द्रिश को देखा और स्थब्ध होकर पवनपुत्र के तेज को
18:10अपनी आखों में बसा लिया
18:13देवराज इंद्र ने अपने दिव्य रत से हनुमान की यात्रा को सुरक्षित करने के लिए मार्क की बाधाओं को अपने
18:20वजर की चमक से हटा दिया
18:23हनुमान के कंधे पर स्थित परवत से ज़रते हुए जलप्रपात हवा में बिखर कर मोतियों की तरह चमक रहे थे,
18:30जैसे आकाश गंगा नीचे गिर रही हो
18:34इस दिव्यभार को ढोते हुए हनुमान के मस्तक पर पसीने की बूंदे नहीं, बलकि उनकी भक्ती और संकल्प का तेज
18:42चमक रहा था
18:44हनुमान के विराट रूप को देखकर वायुदेव ने अपने वेग को बढ़ा दिया ताकि उनका पुत्र समय रहते संजीवनी लेकर
18:52लंका पहुँच सके
18:54भगवान कार्ति के अपने मयूर वाहन पर सवार होकर हनुमान के मार्ग को दिशा दिखाते हुए उनके साथ चलने लगे
19:03ताकि कोई अमंगल न हो
19:05परवत के भीतर छिपी औश्धियों की सुगंध ने संपून वातावर्ण को महका दिया और हनुमान के चारों और दिव्य पुष्पों
19:13की वर्षा होने लगी
19:16यह यात्रा केवल एक परवत को ले जाने की नहीं बलकि लक्ष्मन के प्राणों और राम के विश्वास को बचाने
19:23की महायात्रा बन गई थी
19:26हिमाले की गगंचुम्बी चोटियों को पीछे छोड़कर हनुमान अब दक्षिन की और लंका के समुद्र तटकी और तीवर गती से
19:34बढ़ने लगे
19:36ब्रहमा जी ने अपने कमंडल से पवित्र जल की फुहारें छोड़ी ताकी हनुमान के मार्ग में कोई भी ताप या
19:42थकान उत्पन्न न हो
19:45हनुमान के हर एक डग में ब्रहमांड की गती समाहित थी और उनकी द्रिष्टी केवल लंका के उस रणभूमी पर
19:52केंद्रित थी जहां उनके स्वामी प्रतीक्षा कर रहे थे
19:57पर्वत सहित हनुमान का वह विराट स्वरूप बादलों को चीरता हुआ लंका के समीक पहुँचने ही बाला था और आकाश
20:05उनके स्वागत में गूँच उठा
20:07लंका के प्रासाद की उची मीनारों पर रावन अपनी अधर्म की विजय का स्वपन सजाते हुए लक्षमन की प्राणहीन देह
20:15को निहारने के लिए अपनी कुटिल द्रिष्टी दौडाता है
20:20रावन ने अपनी दस भुजाओं को आकाश की ओर फैला कर अट्थास किया और उसकी आखों में अहंकार का वहजवर
20:28था जो धर्म के पतन का संकेट दे रहा था
20:32रावन के कुरूर आदेश पर लंका के राक्षस रक्षक अपनी मशाले जलाकर लक्षमन के निश्परान शरीर के चारों और घेरा
20:40बनाने के लिए निकल पड़ते हैं
20:44काले बादलों के बीच से लंका की आभा एक मरुस्थल की भांती वीरान और मृत्यू की आहट से भरी प्रतीत
20:51हो रही थी
20:53रणभूमी के एक शांत कोने में भगवान राम ने अपने नेत्रमूंद कर दिव्य उर्जा का आहवान किया जिससे लक्षमन का
21:01शरीर एक स्वर्णिन प्रकाश के कवच में सुरक्षित हो गया
21:06स्वय भगवान विश्णू अपने दिव्य धाम वैकुंट से इस संघर्ष को देख रहे थे
21:11उनकी आखों में एक गहरी गंभीरता थी जो धर्म की रक्षा के लिए तत्पर थी
21:18भगवान के तेज से लक्षमन के चारों और की भूमी का अंधकार छंटने लगा और एक दिव्य सुरक्षा घेरा निर्मित
21:25हो गया
21:26यह सुरक्षा चक्र न केवल लक्षमन के शरीर को बचा रहा था बलकि आने वाली किसी भी शत्रुता को भस्म
21:34करने में समर्थ था
21:36लंका के भीतर मंदोदरी भी अपने महलों की खिडकियों से इस अनिष्टकारी सन्नाटे को देखकर भयभीत थी जैसे उसे किसी
21:45बड़े अनर्थ का आभास हो रहा हो
21:48रावन की सभा में बैठे राक्षस सेनाप्ती इस सन्नाटे से व्याकुल होकर अपनी तलवारे चमका रहे थे क्योंकि वे राम
21:56की शक्ती को भाम्प नहीं पा रहे थे
22:00अचानक लक्षमन के शरीर पर पड़ा दिव्य प्रकाश और तीवर हो गया जैसे कोई दैविय सत्ता उन्हें पुनर जीवित करने
22:08के लिए स्वया अग्रसर हो
22:10आकाश में नक्षत्र भी मानो थम गए और समय ने स्वया को राम की उस प्रतीक्षा में एकाग्र कर लिया
22:18लंका की प्राचीरों पर खड़ी मायावी शक्तियों को यह दिव्य सुरक्षा का घेरा एक चमकते हुए सूर्य के समान कष्टकारी
22:26लग रहा था
22:28विभीशन जो इस स्थिती को समझ रहे थे अपनी आखों में आसूलिये राम की उस भक्ती में मगन थे जो
22:35संसार का कल्यान कर सकती थी
22:39हवाए भी अब लंका के चारों और स्तब्ध खड़ी थी मानो वे भी हनुमान के लोटने की प्रतीक्षा कर रही
22:46हो
22:47धैर्य और प्रतीक्षा का वहपल लंका के लिए काल के मुख के समान भयानक हो गया था
22:54रावन अपनी स्वर्ण सिनहासन से उतर कर नीचे आया उसकी चाल में अब भी वही अहंकार था पर उसकी आखों
23:02में पहली बार अनश्चित्ता की रेखाए थी
23:05उसने गर्जना की और अपनी माया से लंका के चारों और एक काली परचाई का जाल बुनना चाहा ताकि लक्षमन
23:13की रक्षा भेज सके
23:15किन्तु राम की दिव्य इच्छा के आगे रावन की वह काली माया एक सूखे पत्ते के समान उर गई
23:23लंका का पूरा वातावर्ण एक दिव्य संघर्ष के केंद्र में बदल गया था, जहां संजीवनी की प्रतीक्षा में काल स्वया
23:31रुक गया था
23:33हनुमान ने द्रोनागिरी परवत को अपनी हथेली पर ऐसे धारन किया जैसे कोई भक्त अपने आराध्य के चर्णों में पुष्प
23:40अर्पित करता है
23:43देवलोग के द्वार पर खड़े होकर देवराज इंद्र ने हनुमान के उस संकल्प को देखा और मस्तक जुका कर उनके
23:50वेग को नमन किया
23:53वायुपुत्र के तीवर वेग से आकाश के बादल जैसे रुई के फाहे बनकर इधर उधर बिखरने लगे और सूर्य की
24:00किरने उनके पीछे एक स्वर्णपत बनाने लगी
24:04काल के पहिये मानो हनुमान की गती के सामने थम गए और ब्रह्मांड का स्पंदन एक शन के लिए मौन
24:11हो गया
24:12इधर श्रिंग वेरपूर के तटपर भरत राम की व्याकुलता के स्मरण में अपनी तपस्या में लीन थे तभी उन्हें आकाश
24:21में एक विशाल छाया दिखाई दी
24:24अपने राज्य की रक्षा हेतु भरत ने तुरंत धनुष उठाया यह सोचकर की यह कोई मायावी असुरलंका का कोई गुप्त
24:32अस्त्र लेकर आया है
24:35भरत के धनुष की प्रक्त्यंचा से निकला हुआ वह बान अगनी की लप्टों के समान गर्जना करता हुआ आसमान की
24:42ओर बढ़ चला
24:44आकाश में वह तीर जैसे ही हनुमान के निकट पहुँचा उसकी अगनी ने भक्त की भक्ती के ताप के सामने
24:51अपना तेज़ खो दिया
24:53हनुमान ने धीरे से उस बान को अपने दूसरे हाथ में थाम लिया और एक करुनामई मुसकान के साथ नीचे
25:01की ओर देखा
25:03भरत ने जब उस शक्तिशाली वानर के मुख पर श्री राम का नाम सुना तो उनका हृदय भक्ती और लज्जा
25:10से भर उठा
25:12भरत तुरंत नतमस्तक होकर हनुमान के चर्णों में गिर पड़े मानों उन्हे स्वयन साक्षात राम का संदेश मिल गया हो
25:21हनुमान ने भरत को आलिंगन में भर लिया और उस मिलन से संपूर्ण ब्रहमाण में सात्विक उर्जा का संचार हो
25:28गया
25:29हनुमान ने भरत को लंका के संकट और लक्षमन की उस अचेत अवस्था के बारे में संक्षिक्त में बताया
25:37भरत की आखों में राम के प्रती अगाध प्रेम छलका और उन्होंने हनुमान को अपने कंधे पर रखकर उन्हें तीवर
25:45गती से लंका भेजने का प्रस्ताव रखा
25:49हनुमान ने भरत के प्रेम को सहर्ष स्वीकार किया, परंतु अपना समय बचाने के लिए वे पुन्ह आकाश की ओर
25:56उर्चले
25:57समय बीत रहा था और संजीवनी की प्रतीक्षा में लक्षमन की सासे जैसे रुकने की कगार पर खड़ी थी
26:06आकाश अब पूरी तरह से स्वनमय हो गया था, क्योंकि हनुमान की भक्ती का प्रकाश चारों दिशाओं में फैल चुका
26:13था
26:14रावन के सैनिकों ने जब उपर देखा, तो उन्हें आकाश में एक विशाल दिव्य जोती आती हुई प्रतीत हुई
26:22काल के मुख से लक्षमन को बाहर लाने का अंतिम चरण प्रारंभ हो गया था और हनुमान की गती अब
26:29ब्रह्मांडी हो गई थी
26:32राम ने दूर से अपने भक्त को आते देख अपना मस्तक उठाया और उनके चहरे पर एक अलोकिक मुस्कान आ
26:39गई
26:41हनुमान के आगमन से लंका का युद्ध शेत्र एक अलोकिक दिव्य आभा से भर गया और संजीवनी की तेज महेक
26:48ने वातावर्ण के विशाक्त प्रभाव को नश्ट करना प्रारंभ कर दिया
26:53सुषेन वैध्य ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से हनुमान के हाथ में स्थित संजीवनी परवत के अंश को देखा और उनके
27:01मुख से एक संतोषपूर्ण मुस्कान फूट पड़ी
27:05वानर सेना में एक नई उर्जा का संचार हुआ और वे सभी उत्साह के साथ उस औशधिय परवत की ओर
27:12हाथ जोड़े देखने लगे
27:15आकाश में तैरते हुए उस परवत का प्रतिबिंब नीचे स्थित जल राशियों में एक चमकते हुए नक्षत्र की तरहे दिखाई
27:22देने लगा
27:24हनुमान ने धीरे से संजीवनी के उस विशिष्ट अंश को सुषेण वैध्य के सम्मुख हर्पित किया जिससे संपूर्ण क्षेत्र में
27:32शीतल सुगंध का प्रसार हुआ
27:35वैध्य सुषेण ने अपनी विशेश जड़ी बूटियों का सम्मिश्रन तयार करते हुए मंत्रों का गुंजन किया जिससे संजीवनी की शक्ती
27:43और अधिक तीवर हो गई
27:46लक्षमन के अचेट शरीर पर उस दिव्य ओश्धी का लेप लगते ही उनके मस्तक पर जमे मृत्यू के काले बादल
27:53छंटने लगे
27:55यह द्रिश देखकर राम की आखों से आनंद के आसू छलक पड़े जो उनके मस्तक से गिरकर धर्ती को पवित्र
28:03कर रहे थे
28:05औश्धी का प्रभाव इतना तीवर था कि लक्षमन की रगों में रुधिर की गती पुनह सामान्य हो गई और उनके
28:12हृदय की धड़कने तेज होने लगी
28:15वानर सेना ने जयकारों के साथ आकाश को गुजाय मान कर दिया जिससे लंका की दीवारों में भी कमपन होने
28:22लगा
28:24सुशेन वैध्य ने अपनी आखें खोली और लक्षमन के शरीर में आ रहे परिवर्तनों को देख कर एक दिव्य आश्वासन
28:32की मुद्रा में राम की ओर देखा
28:35लक्षमन की उंगलियों में सुख्ष्म कमपन हुआ जो इस बात का संकेत था कि काल का पाश तूट रहा है
28:43ब्रहमांड की शक्तिया एक बार फिर लक्षमन के प्राणों को वापस शरीर में धारन करने के लिए लामबंद हो गई
28:51लक्षमन ने धीरे धीरे अपनी पलकें खोली और सबसे पहले सामने अपने प्रियभ्राता राम के दर्शन किये
28:59राम के चहरे पर जो शान्ती थी, वह संपूर्ण स्रिष्टी के सुख का प्रतीक बनकर उभर रही थी
29:07लक्षमन ने उठने का प्रयास किया, तो हनुमान ने स्वया आगे बढ़कर उन्हें सहारा प्रदान किया
29:15हवाओं ने भी लक्षमन के पुनह जीवित होने का स्वागत अपनी शीतल गती के साथ किया
29:22लक्षमन की आखों में युद्ध का संकल्प पुनह जागरित हो गया, जो यह संदेश दे रहा था कि अन्याय का
29:29अंत अब निश्चित है
29:31राम ने अपने अनुच को गले लगा लिया और उनके मिलन की यह गाथा इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों
29:38में अंकित हो गई
29:41लंका के द्वार पर अब विजय की दुन्दु भी बजने वाली थी, क्योंकि लक्षमन की वापसी ने राक्षसों के होसले
29:48पस्त कर दिये थे
29:50लंका की रनभूमी में एक भयावह सन्नाट अचा गया है, जहां राक और रक्त के मिश्रन से धर्ती का रंकाल
29:57के समान गहरा हो गया है
30:00वैकुंट के स्वर्ण महलों में भगवान विश्नु शेशनाग की शया पर लेटे हुए, अपनी मंद मुस्कान से इस महायुध की
30:08दिशा का अवलोकन कर रही है
30:12सुग्रीव और अंगद ने अपनी वानर सेना के साथ लंका के विशाल द्वार को तोड़ने का प्रचंड हुंकार भरते हुए
30:19आगे कदम बढ़ा दिया है
30:22युद्ध का यह द्रिश ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे स्वयन नेती ने लंका के विनाश का लेखा जोखा तयार
30:29कर लिया हो
30:31कैलाश परवत की शांत बरफीली चोटियों के बीच भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख खोल कर लंका के अधर्म के
30:38अंत का संकेत दिया है
30:41इंद्रदेव अपने दिव्यरत पर सवार होकर आकाश मार्ग से इस अंतिन युद्ध के साक्षी बनने के लिए लंका की ओर
30:49प्रस्थान कर रही है
30:52राम ने अपने धनुष पर प्रत्यम चाचड़ाई और उनकी टंकार से लंका की धर्ती हिल उठी, मानो प्रित्वी स्वयं प्रलय
31:00की आहट सुन रही हो
31:02विजय का ध्वज राम के सार्थी के हाथों में फहरा रहा है, जो अधर्म के अंट और धर्म की विजय
31:09की घोशना कर रहा है
31:12लंका के प्राचीरों पर खड़े राक्षस सेनाप्ती अब भय से कांप रहे हैं क्योंकि उन्हें राम और लक्षमन के पुनर्मिलन
31:20की शक्ती का बोध हो गया है
31:23गरुर देव अपनी विशाल पंखों के साथ लंका के उपर मंदरा रहे हैं, मानों वे अधर्म के भक्षन की प्रतीक्षा
31:30कर रहे हूँ
31:33लक्षमन के नेत्रों से निकलती हुई तेजस्विता ने राक्षस सेना के मायावी अंधकार को छिन्न भिन करना शुरू कर दिया
31:40है
31:42स्वर्ग की अपसराएं अपनी दिव्यद रिष्टी से इस महान धर्म युद्ध का अवलोकन कर रही हैं और उनके हाथों में
31:49विजय का पुष्प है
31:52रावन के महल के स्तंभों से ज्वालाएं निकल रही हैं जो इस बात का प्रमान है कि काल अब रावन
31:59की दहलीज पर खड़ा है
32:02धनुष की प्रत्यंचा की गूंच से समुद्र की लहरें भी उत्तेजित होकर लंका के तटों से टकराने लगी हैं
32:10राम के चहरे पर अब कोई करुणा नहीं अपितू क्षत्रिय धर्म का वह रौद्र रूप है जो पाप को भस्म
32:17करने के लिए तत्पर है
32:20ब्रहमा जी अपनी कमंडल लेकर इस युप परिवर्तन का साक्षी बनने हेतु स्रिष्टी के केंद्र से लंका की ओर देख
32:27रहे हैं
32:30वानर सेना के नद और गर्जन से लंका के आकाश का रंग बदल गया है जो विजय के आने का
32:36संकेत दे रहा है
32:39नेती की इस घड़ी में रावन के स्वर्ण सिनहासन में दरारे पड़ गई हैं जो उसके सामराज्य के पतन की
32:46घोशना कर रही है
32:49लक्षमन का द्रिड संकल्प अब एक धाल बन चुका है जिससे टकराकर राक्षसों के सारे अस्त्रव्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं
32:58अंतिम युध का बिगुल बस चुका है और इतिहास का यह पन्ना अब राम और रावन के अंतिम आमना सामने
33:05के लिए तयार है

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