सीता की खोज का महाअभियान शुरू! 🏹 हनुमान अपनी जन्मजात शक्तियों को कैसे भूल गए थे? इस एपिसोड में, बालि के वध के बाद, सुग्रीव अपने वचन के अनुसार श्रीराम की सहायता के लिए विशाल वानर सेना को एकजुट करते हैं। सीता की खोज में वानर सेना चारों दिशाओं में निकल पड़ती है, लेकिन सागर तट पर पहुंचकर उनके सामने आता है एक ऐसा असंभव कार्य जो उन्हें हताश कर देता है। क्या हनुमान अपनी खोई हुई शक्ति को पहचान पाएंगे और विशाल समुद्र को लांघकर लंका तक पहुंच पाएंगे? जानिए पद्म पुराण के इस रोमांचक अध्याय में हनुमान के महापराक्रम का रहस्य! #PadmaPurana #Hanuman #SitaKiKhoj #Ramayana #Kishkindha #LankaDahan #पौराणिककथाएं #रामायण #हनुमान #विष्णु #पद्मपुराण #महाभारत #हिंदूधर्म #संस्कृति #हनुमानजी
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00:00किशकिंधा नगरी बाली के अत्याचारों से मुक्थ होकर अब उत्सव और नवजीवन की आहट से गुँज रही थी, जहां सुग्रीव
00:08के राज्याभिशेक ने वानर सामराज में एक नई आशा का संचार किया।
00:13महलों के एक शांत कक्ष में, मर्यादा पुरुशोत्तम श्री राम अपनी पत्नी सीता के वियोग में गहरे चिंतन में लीन
00:21थे, उनके चहरे पर करुणा और द्रिड़ता का अध्भुत संगम झलक रहा था।
00:26तभी हनुमान जिनके हृदय में भक्ती और सेवा का सागर लहराता था, अत्यंत विनमृता से श्री राम के सम्मुख उपस्थित
00:35हुए, उनके मुख पर असीम श्रधा और आदर का भाव था।
00:40उनकी आखों में सीता की खोज का संकल्प लिये हुए, पवन पुत्र ने अपनी भुजाओं को आगे बढ़ाया, मानो संपूर्ण
00:48ब्रहमांड को अपनी शक्ती का प्रदर्शन करने को आतुर हूँ।
00:52सुग्रीव, जिन्होंने श्रीराम की कृपा से अपना राज्यपुना प्राप्त किया था, अपने सिनहासन पर विराजमान थे, उनके चारों और वफादार
01:01वानर सैनिक गौरवशाली किशकिंधा के भव्य दर्बार में एकत्र थे।
01:07राज्या भिशेक के पश्चात, सुग्रीव का मन अब केवल अपने परम मित्र श्रीराम के प्रती कृतग्यता और सीता की खोज
01:15के संकल्प से भरा हुआ था, जिसकी जहलक उनके प्रफुलित मुख पर स्पष्ट दिख रही थी।
01:21उन्होंने अपने सबसे विश्वस्निय सेनाप्तियों और मंत्रियों को आदेश दिया कि वे ततकाल सभी वानर दलों को सीता की खोज
01:30के लिए संगठित करें, जिनकी वानी में अटल द्रिड़ता थी।
01:35दर्बार में उपस्थित प्रत्येक वानर योध्धा की आखों में एक नई स्पूर्ती और अटूट समर्पन का प्रकाश चमक उठा, जो
01:43सीता की मुक्ती के लिए किसी भी चुनोती का सामना करने को तयार थे।
01:49किशकिंधा के विशाल मैदानों में, हजारों हजार वानर अपनी अपनी टुकडियों में जुटना शुरू हो गए, जिनकी संख्या और उर्जा
01:57उस अथा सागर के समान थी, जो तटों को छूने को आतुर हो।
02:02लक्षमन जो सदैव श्री राम के साथ साय की तरह रहते थे, इस संगठित होते हुए बल को देखकर संतुष्ट
02:10थे, उनके मुख पर आशा और श्री राम के प्रती निष्ठा का भाव था।
02:15युवा अंगद जो अपनी शक्ती और नेत्रित्व के लिए विख्यात थे, अपनी वानर सेना को व्यवस्थित करते हुए दिखाई दिये,
02:24उनकी हर आग्या एक गड़गडाहट के समान थी।
02:28वानरों के शस्त्रों की चमक और उनके युद्ध घोश से आकाश गूंज उठा, जो रावन के विरुद्ध एट आसन्न और
02:35प्रचंड युद्ध की घोशना कर रहे थे।
02:39श्रीराम और सुग्रीव एक उच्छ परवत शिखर पर खड़े होकर नीचे विशाल वानर सेना के संगठन को देख रहे थे,
02:47जिनकी आखों में गहन चिंता और भावी योजनाय स्पष्ट थी।
02:52श्रीराम ने सुग्रीव की ओर देखा, उनके नेत्रों में एक मौन कृत अग्यता और सीता को वापस लाने की तीवर
02:59इच्छ जलक रही थी, जिसकी गहराई को शब्द व्यक्त नहीं कर सकते थे।
03:05सुग्रीव ने अपने हाथ जोड कर श्रीराम को आश्वस्त किया कि उनकी वानर सेना प्रित्वी के हर कोने में सीता
03:13का पता लगाने के लिए निकलेगी, उनके स्वर में अटल निष्ठा थी।
03:18उस पल सूर्य की अंतिम किरने उन दोनों पर पड़ी, जो उनके पवित्र गठ बंधन और आने वाले महायुद्ध की
03:25भीशन अगनी का प्रतीक थी।
03:28हनुमान, अंगद, नल, नील जैसे प्रमुख सेनापती अलग-अलग दिशाओं में वानर टुकडियों को नियुक्त करने लगे, जिनकी रणनीतिक शमता
03:37अतुलनिय थी।
03:39श्री राम ने हनुमान को अपने पास बुलाया, उनके मुख पर एक विशिष्ट निर्देश देने का भाव था, जिससे हनुमान
03:47का हृदय गौरव से भर उठा।
03:50उन्होंने हनुमान को अपनी बहुमूल्य अंगूठी दी, जो सीता के लिए पहचान का प्रतीक थी, एक ऐसा क्षन जिसने आने
03:58वाले बड़े कार्य की नीव रखी।
04:01हनुमान ने अंगूठी को अपनी चाती से लगाया, उनकी आखों में एक नया संकल्प चमक रहा था, जैसे वह जानते
04:09थे कि सागर पार की यह यात्रा ही उनके जीवन का परम उद्देश है।
04:15श्रीराम से मिली प्रेणा और अंगूठी के स्पर्ष से उरजावान होकर हनुमान अब विशाल वानर सेना के साथ सुग्रीव के
04:24भव्य सभास्थल में एकत्रित हो चुके थे, जहां एक महत्वपून घोशना की प्रतीक्षा थी।
04:30वानर राज सुग्रीव ने अपने स्वर्नच्टित सिनहासन से उठकर तेजस्वी वानी में सभा को संबोधित किया।
05:00हजारों वानर योध्धा, जिनकी आखें आशा और भक्ती से चमक रही थी, अपने राजा के प्रत्येक शब्द को गेहन एकागरता
05:08से सुन रहे थे, मानो हर ध्वनी उनके हृदय में एक नई ज्वाला प्रजवलित कर रही हो।
05:30पूर्व दिशा के लिए उन्होंने विनीच शुक, बलशाली शरब और अनुभवी दधिमुख जैसे वीरों को चुना, जिनहें सागरतटों और परवतों
05:39के रहस्यमय मारगों का अनवेशन करना था।
05:42पश्चिन की ओर सुशेन, धूमर और नील जैसे पराक्रमी वानरों को भेजा गया, जिनहें गहन वनों और मरुस्थलों के पार
05:50अस्ताचल के निकट तक सीता की खोज करनी थी।
05:54उत्तर दिशा के दुर्गम हिमाली शिखरों और बरफीले प्रदेशों के लिए सुग्रीव ने शक्बली, गवाय और गवल जैसे साहसी वीरों
06:03का चयन किया, जिनके नेत्रों में अदमय साहस और द्रिडता थी।
06:07अंत में सुग्रीव ने अपनी द्रिष्टी दक्षिनी दिशा की और केंद्रित की, जहां लंका के राक्षस राज रावन द्वारा सीता
06:16को ले जाने की आशंका सर्वाधिक थी, और इस दल के लिए उन्होंने सबसे विश्वसनी वीरों का चयन किया।
06:23सुग्रीव ने हनुमान, जामबवान और युवराज अंगत की ओर मुड कर अत्यंत गंभीरता और विश्वास के साथ इस सबसे कठिन
06:33और महत्वपून अभियान का नेत्रित्व उन्हें सौपा।
06:37सुग्रीव का मुखमंडल गंभीर था, उनकी आखें हनुमान पर टिकी थी, मानोवे मौन रूप से उन्हें इस अकल्पनिय यात्रा के
06:46लिए अपनी समस्थ शक्ती का स्मरण करा रहे हूं।
06:50हनुमान ने अपनी भुजाओं को देखा, फिर श्रीराम की अंगूठी को स्पर्श किया, और उनके भीतर एक अज्यात उर्जा तरंगित
06:59हुई, जैसे सागर पार करने की उनकी गुप्त शक्ती स्वयं को प्रकट करने को तत्पर थी।
07:05तभी रिशी तुल्य जामबवान, जिनकी आखों में सदियों का ज्यान समाया था, आगे बढ़े अपने अनुभव और बुद्धिमत्ता से वानर
07:14दल का मार्ग दर्शन करने के लिए तत्पर।
07:18युवराज अंगद, जिनके मुख पर वीर्ता और उच्साह का तेज था, अपने पिता बाली के पराक्रम की विरासत को धारण
07:25किये, अपनी युवा भुजाओं से इस महान कार्य को सिध्ध करने की प्रतिग्याली।
07:32सुग्रीव ने उन्हें एक माह की समय सीमा दी, चेतावनी दी की इस अवधी में सीता का पता न लगने
07:38पर गंभीर परिणाम होंगे, परंतु सफलता के लिए अप्रिमित पुरसकारों का भी वचन दिया।
07:45उनकी वानी में राजा का अधिकार और मित्र के प्रती दायत्व दोनों का मिश्रण था, जिसने समस्त वानर सेना में
07:52एक साथ भय और आशा की लहर गोडाई।
07:56सुग्रीव के उद्बोधन के पश्चात समस्त वानर सेना ने एक गर्जना की जो परवतों में गुंज उठी, मानो प्रत्येक वानर
08:05ने सीता को खोजने का अटल संकल्प ले लिया हो।
08:09हनुमान अंगद और जामबवान ने एक साथ विनमरता पूर्वक सुग्रीव और श्री राम के चर्णों में शीश नवाया, उनके हृदय
08:17में अपने स्वामियों के प्रती अटूट श्रधा और कार्य पूरा करने की प्रतिग्या थी।
08:24दक्षिनी दिशा में जाने वाले दल के प्रमुख अपने अपने शस्त्रों और आवशक सामगरी को व्यवस्थित करने लगे, उनके मुखों
08:32पर आने वाली चुनोतियों का सामना करने का उच्साह स्पष्ट था।
08:37सूर्य की अंतिम किरने उन पर पढ़ रही थी। जब दक्षिनी दल एक नए अध्याय की शुरुवात करने के लिए
08:44अज्यात सागर पार की यात्रा पर निकल पढ़ा, उनके पच्चिहन एक महान गाथा की ओर बढ़ते हुए।
08:52दल के अन्यवानरों के साथ हनुमान भी आगे बढ़ रहे थे। उनके भीतर एक अज्यात शक्ती का जागर्ण हो रहा
08:59था, जो अभी तक स्वयं उनसे भी उजल थी।
09:03श्री राम जिनकी आखें वानर समुह के भीतर अग्रिश धागे से हनुमान पर टिकी थी, एक गहन संकल्प और दिव्य
09:12आभा से परिपूर्ण थे।
09:14श्री राम ने शांत स्वर में हनुमान को अपने समीप बुलाया, उनकी वानी में न केवल आग्या थी, बलकि एक
09:22गहरा विश्वास और स्नेभी था।
09:25एक अंदेखी प्रेणा से खिंचकर हनुमान ने दल से हटकर अपने आराध्य श्री राम की ओर कदम बढ़ाये, उनके हृदय
09:33में एक अपूर्व उत्साह उमड रहा था।
09:37अनुशासित भक्ती और गहन श्रद्धा के साथ हनुमान ने अपने मस्तक को श्री राम के चरण कमलों में नवाया, उनकी
09:45आत्मा अपने प्रभु के आदेश की प्रतीक्षा कर रही थी।
09:49श्री राम ने अपने कमल जैसे हस्त को उठाया और हनुमान की ओर देखा, उनके नित्रों में एक असीन करुणा
09:57और आगामी चुनौती का बोध स्पष्ट था।
10:01फिर श्री राम ने अपनी अनामिका से अपनी बहुमूल्य अंगूठी, जो उनकी पहचान का प्रतीक थी, उतार कर हनुमान की
10:09हथेली पर रखी।
10:11जैसे ही अंगूठी हनुमान के स्पर्ष में आई, एक दिव्य प्रकाश चारों और फैल गया, उनके भीतर एक अद्रिश्य उर्जा
10:20का संचार हो रहा था।
10:22श्री राम ने स्नेह पूर्वक हनुमान के मस्तक पर अपना हाथ रखा, उन्हें अपने असीम आशिरवाद और अटूट विश्वास से
10:30परिपूर्ण कर दिया।
10:32श्री राम ने हनुमान को उनकी अद्भुत शक्तियों और अटूट भक्ती पर विश्वास रखने के लिए प्रेरित किया, याद दिलाया
10:40कि वेस्वय ही असंभव को संभव कर सकते हैं।
10:45उन्होंने द्रेड़ता से कहा कि केवल हनुमान ही इस कठिन और असंभव लगने वाले कार्य को पूर्ण करने में सक्षम
10:52हैं। उनकी भक्ती ही उनकी सबसे बड़ी शक्ती हैं।
10:57श्रीराम के वचनों से हनुमान के भीतर शक्ती का एक ऐसा प्रचंड जवार उम्रा, जिसने उनके समस्थ संदेहों को धोकर
11:05उन्हें एक नई उर्जा से भर दिया।
11:09नए संकल्प और अदमय साहस से परिपूर्ण हनुमान ने श्रीराम के चर्णों में एक बार फिर शीश नवाया, अपने प्रभु
11:17के प्रती असीन कृतग्यता व्यक्त करते हुए।
11:21श्रीराम ने अपने कमल जैसे हाथों से हनुमान को उठाया और उन्हें अंतिम बार उत्साह पूर्वक देखा, उनके नेत्रों में
11:29विजय का स्पष्ट आश्वासन था।
11:32इस दिव्य भेंट के बाद हनुमान ने तुरंत दक्षिनी दल की ओर प्रस्थान किया, अब उनका हर कदम एक अटूट
11:40संकल्प से भरा था।
11:42कुछ ही क्षणों में हनुमान अपने दल के साथ मिल गए, उनकी उपस्थिती ने समुह में एक नई उर्जा और
11:49आत्म विश्वास का संचार कर दिया।
11:52दक्षिनी दल निरंतर आगे बढ़ता रहा, हर व्रिक्ष और धारा एक नए भव्य अभियान के मुख गवाह बन रहे थे।
12:02चलते चलते हनुमान ने अपनी हथेली पर रखी श्री राम की अंगूठी को निहारा, उसके सुक्षमस पर्ष में अपने प्रभो
12:09के अटूट विश्वास को महसूस किया।
12:13उनके मन में श्री राम के वचन गूठ उठे, जिन्होंने उन्हें अपनी शक्तियों पर विश्वास करने और स्वयन को अजे
12:20समझने के लिए प्रेरित किया था।
12:23एक अदमे उर्जा उनके रोम रोम में समा गई, जैसे किसी प्राचीन बीज को दिव्य जल से सीचने पर वह
12:31विशाल व्रिक्ष में बदल जाता है।
12:34हनुमान की नई उर्जा से उतप्रोत वानर दलने दक्षिनी वनों की गहराईयों में अपनी अथक खोज जारी रखी, हर पेड
12:42और चट्टान को सीता के सुराग के लिए सावधानी से खंगालते हुए।
12:48उधर वैकुंठ में भगवान विश्नु ने अपने गंभीर ब्रहमान्डिय नेत्रों से वानरों के अथक प्रयास और हनुमान के भीतर जलती
12:56अटूट आशा की लौको धैर्य पूर्वक देखा।
13:00अंगद अपनी युवावस्था के जोश के बावजूद द्रिडता से साथियों को प्रेरित करते हुए विशाल पत्थरों के नीचे और घनी
13:08जाडियों के भीतर सीता के अद्रिश्य चिन्हों की तलाश कर रहे थे।
13:13जैसे जैसे दिंधला और संध्या की लालिमा घने वरिक्षों के पीछे छिपने लगी, समय रेट की तरह उनकी मुठी से
13:21फिसलता जा रहा था और निराशा की छाया गहराने लगी।
13:26अगले कई दिनों तक वानरों ने दुर्गम पहाडों की चोटियों और गहरी रहस्यमई घाटियों को पार किया, जहां जंगली जानवरों
13:34का राज था और सूर्य की किरने मुश्किल से पहुच पाती थी।
13:39कैलाश परवतपर गहन समाधी में बैठे महादेव शिव ने अपनी तीसरी ज्यानने तरसे वानरों के संधर्ष को निहारा, उनके मन
13:48में करुणा और सृष्टी के जटिल चक्र के प्रती गहन ज्यान उमड रहा था।
13:54जामबवान अपनी व्रिद्ध हाखों से हर दिशा को सतरकता से स्कैन करते हुए, अपने प्राचीन ज्यान और अटूट अनुभव के
14:01साथ डल को सही और सुरक्षित मार्ग पर बनाए रखने का अथक प्रयास कर रहे थे।
14:07हर गुजरते पल के साथ समय की अद्रिश तलवार उनकी नियत अवधी को निर्दैता से काट रही थी और विफलता
14:15का भय एक भारी अद्रिश बोज बनकर उनके कंधों पर छा रहा था।
14:20घने दलदलों और विशैली जाडियों से गुजरते हुए वानर सेना ने अपनी अनवरत यात्रा जारी रखी उनके वस्त्रफ फटे हुए
14:30और शरीर ठकावट से चूर थे फिर भी वे आगे बढ़ते रहे।
14:34ब्रहम लोक में चतुर मुखी ब्रहमा ने अपने दिव्य आसन से प्रित्वी पर वानरों की बढ़ती असफलता की संभावना को
14:42चिंतित और गंभीर द्रिश्टी से देखा।
14:46कुछ वानर सैनिक एक विशाल प्राचीन व्रिक्ष के नीचे हताशा में बैठ गए, उनके चहरे पर गहरी ठकान थी और
14:54उनकी आखों में आशा की अंतिन किरन भी बुझती दिख रही थी।
14:59अब पत्तों की सरसराहट भी उन्हें एक दर्गनाक फुस्फुसाहट लग रही थी, जैसे प्रकृती भी उनके बढ़ते दुख और निराशा
15:07का प्रत्यक्ष प्रमान दे रही हो।
15:10अंतह कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक विशाल नीले समुद्र के तट पर पहुँचे जहां भूमी समाप्थ हो
15:18रही थी और क्षितिज अनंत जलराशी में विलीन हो रहा था।
15:23देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर स्वरों के साथ ब्रहमांड में घूमते हुए इस महत्वपूर्ण मोर को देख रहे थे,
15:30जहां नेती एक नए और अप्रत्याशित अध्याय की ओर मुर रही थी।
15:36समस्त वानरों ने भाय और विस्मे से उस अथां सागर को घूरना शुरू किया। यह जानकर की सीता का अफरन
15:43करता संभवत है इस पार नहीं बलकि उस पार किसी अज्यात ग्वीब पर छिपा है।
15:50विशाल लहरेंग गरच्ती हुई तट से टकरा रही थी। उनकी गरजना वानरों की निराशा को और बढ़ा रही थी। जैसे
15:58कोई अद्रिश्य और दुर्जे शक्ती उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही हो।
16:03हनुमान अपने मन में उमरते तूफान के बावजूद, शांत और अडिक खड़े थे। उनकी दृष्टी उस पार के अनिश्चित क्षितिच
16:11पर टिकी थी जहां आशा की एक खीन किरण चमक रही थी।
16:16शीर सागर में देवी लक्ष्मी ने अपनी कमल जैसी आखों से हनुमान की अविचल द्रिड़ता को देखा, उनके हृदय में
16:24प्रभु के कार्य के सफल होने का अटूट विश्वास प्रबल था।
16:29जामबवान ने गहरी सांस ली और अंगद की ओर देखा, उनके चहरे पर चिंता की गहरी लकीरे थी क्योंकि श्रीराम
16:37द्वारा दी गई समय सीमा अब बिलकुल समाप्थ होने को थी।
16:41अब उन सभी वानर वीरों को एक असंभव कार्य का सामना करना था, इस विशाल और अथाह महासागर को पार
16:49करना और वह भी बिना किसी सपष्ट साधन या सहायता के।
16:53कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है।
16:58अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
17:06जूजना पड़ता है।
17:08गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
17:17स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुन्या में
17:25ले आती हैं
17:27कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
17:32अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
17:40जूजना पड़ता है
17:42गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती है
17:51स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
17:59ले आती है
18:01कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
18:05अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है जहां उन्हें प्यास और भूख से
18:13जूजना पड़ता है
18:15गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं
18:24स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
18:32ले आती हैं
18:34कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
18:39अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
18:47जूजना पड़ता है
18:49गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भूजन और जल प्रदान करती हैं
18:58स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
19:06ले आती हैं
19:18जहां उन्हें प्यास और भूख से जूजना पड़ता है।
19:48वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से जूजना पड़ता है।
19:56गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
20:05स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
20:13ले आती हैं।
20:15कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है।
20:20अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
20:27जूजना पड़ता है।
20:29गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
20:39स्वयम्प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में ले
20:47आती हैं।
20:49कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है।
20:53अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
21:01जूजना पड़ता है।
21:03गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
21:13स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
21:20ले आती हैं.
21:22कहानी का यह हिस्सा अध्भुत और रहस्यमई है.
21:27अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
21:35जूजना पड़ता है
21:37गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती है
21:46स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
21:54ले आती है
21:56कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
22:00अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है जहां उन्हें प्यास और भूख से
22:08जूजना पड़ता है
22:10गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं
22:19स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
22:27ले आती हैं
22:29कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
22:34अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
22:42जूजना पड़ता है
22:44गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं
22:53स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
23:01ले आती हैं
23:03कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
23:07अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
23:15जूजना पड़ता है
23:17गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भूजन और जल प्रदान करती हैं
23:27स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
23:34ले आती हैं
23:47जहां उन्हें प्यास और भूख से जूजना पड़ता है।
24:16वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से जूजना पड़ता है।
24:25गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
24:34स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
24:41ले आती हैं।
24:44कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है।
24:48अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
24:56जूजना पड़ता है।
24:58गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
25:07स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
25:15ले आती हैं।
25:17कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है।
25:22अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
25:30जूजना पड़ता है।
25:32गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
25:41स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
25:49ले आती हैं।
25:51कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है।
25:55अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
26:03जूजना पड़ता है।
26:05गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
26:14स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती है और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
26:22ले आती है
26:24कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
26:29अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है जहां उन्हें प्यास और भूख से
26:37जूजना पड़ता है
26:39गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं
26:48स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
26:56ले आती है
26:58कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
27:02अपनी खोज के दौरान वानर दल एक विशाल अंधेरी गुफा में प्रवेश करता है, जहां उन्हें प्यास और भूख से
27:10जूजना पड़ता है
27:12गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भूजन और जल प्रदान करती हैं
27:21स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
27:29ले आती हैं
27:41जहां उन्हें प्यास और भूख से जूजना पड़ता है।
27:46गुफा के भीतर वे एक तेजस्वी तपस्विनी स्वयम प्रभा से मिलते हैं, जो उन्हें भोजन और जल प्रदान करती हैं।
27:55स्वयम प्रभा अपनी तपस्या के प्रभाव से वानरों को गुफा से बाहर निकालती हैं और उन्हें वापस बाहरी दुनिया में
28:03ले आती हैं।
28:05गुफा के अंधकार से बाहर निकलते ही, वानर दल ने अपनी आखों के सामने एक ऐसा द्रिश्य देखा जिसने उनकी
28:13आत्माओं को हिला दिया, अथा, अनन्त और गर्जना करता हुआ महासागर, जिसकी लहरें दूर क्षितिच तक फैली हुई थी
28:22देवलोक में भगवान विश्णु ने अपने शेशनाग शया पर विराजे हुए, इस क्षन को अपनी दिव्यद रिष्टी से देखा, वानरों
28:30के संकट को महसूस करते हुए उनके मुख पर हलकी चिन्ता की रेखाए उभराई
28:37उनकी आखे भय और अविश्वास से चौड़ी हो गई, जैसे ही उन्होंने समझा कि यह सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि
28:44वह अथा सागर था जो उन्हें लंका से अलग करता था, जहां उनकी प्रिय सीता माता को रावन ले गया
28:51था
28:53सागर की गर्जना मानों उनके कानों में एक दरावना सत्य फुस्फुसा रही थी, कि यह दूरी सामान्य प्रयासों से नहीं
29:00नापी जा सकती, यह एक असंभव चुनौती थी
29:05जैसे जैसे सूर्यक्षितिच की ओर बढ़ने लगा, वानर सेना की आशाय भी उसी तरहे डूबने लगी, उनकी विशाल टुकडी अब
29:13इस अथा जलराशी के सामने हताशा में बिखरी हुई थी
29:18दूर कैलाश परवत पर भगवान शिव और देवी पारवती ने ध्यानपूर्वक इस द्रिश्य को देखा, जहां वानरों की सामुहिक निराशा
29:27एक गेहन प्रतिध्वनी पैदा कर रही थी
29:30प्रधान वानर योध्धा, अंगद अपने माथे पर चिंता की गहरी लकीरों के साथ क्रोध और असहायता के मिश्रन से उबलते
29:39हुए जमीन पर अपनी मुठी पटकता है
29:43सूरज धीरे-धीरे विशाल सागर में डूग रहा था, उसकी अंतिन किरने पानी पर एक रक्तरंजित निशान छोड़ रही थी,
29:51जो वारों की बढ़ती हुई निराशा और हार को दर्शा रहा था
29:56रात के आगमन के साथ ठंडी हवा ने वानरों की हताशा को और गहरा कर दिया, जब वे समुह में
30:03बैठकर इस अकलपनिय बाधा को पार करने के तरीकों पर निरर्थक चर्चा कर रहे थे
30:09ब्रह्म लोक में चतुर मुखी ब्रहमा अपने दिव्य सिनहासन पर आसीन थे और अपनी चार आखों से स्रिष्टी के इस
30:17नाजुक शन को गंभीरता से निहार रहे थे
30:21वानरों के जेश्ट और बुद्धिमान जामबवान अपने पुराने कंधों पर भारी बोज लिए निराशा से अपने साथियों की ओर देखते
30:30हैं, उनके शब्दों में कोई समाधान नहीं था
30:34एक अकेला समुदरी पक्षी, उसकी चीखें हवा में गुंजती हुई, विशाल सागर के उपर उड़ रहा था, उसकी उड़ान वानरों
30:42को उनकी छोटी सी दुनिया और असीमित दूरी का एहसास दिला रही थी
30:48सभी के बीच हनुमान, शक्तिशाली वायुपुत्र, सागर के किनारे शांत खड़े थे, उनकी गहरी आखें उस असीमित नीले विस्तार को
30:57भेदने का प्रयास कर रही थी, जिसमें एक गुप्ट आशा की चिंगारी जड़ रही थी
31:04बैकुंठ धाम में भगवान विश्नु अपनी अगाध क्रिपा के साथ शेशनाग शया पर लेटे हुए थे, जबकि उनके वाहन, गरुर,
31:12विनमर्ता से उनके समक्ष खड़े थे, दोनों वानरों की अगनिप्रीच्षा को देख रहे थे
31:19कई वानर अब रेट में ही मूर्चित होकर बैठ गए थे, उनके सिर जुके हुए थे, मानों उन्होंने अपनी नेती
31:27और इस असंभव कार्य को स्विकार कर लिया हो
31:31सागर की सतह अनंत तक फैली हुई, चंद्रमा की रोशनी में चांदी की तरहें चमक रही थी, जो उन्हें अपनी
31:38विशालता और दुरगमता का निरंतर स्मरण करा रही थी
31:43जैसे जैसे रात गहरी होती गई, वानरों का मौन और भी भारी होता चला गया, एक भयानक सन्नाटा जो उनकी
31:51सामुहिक निराशा और असहायता को व्यक्त कर रहा था
31:55नारगमुनी अपनी वीना के शान्थ स्वरों के साथ देवलोग से इस दुहखद ग्रिश्य को देख रहे थे, उनकी आखे संसार
32:04के कर्मों की गहनता को समझ रही थी
32:07अन्य प्रमुख वानर सेनाप्ती भी अपनी शक्तियों और वीर्ता को याद करते हुए अपनी असहायता व्यक्त करने लगे, हर किसी
32:15ने सागर को पार करने को एक असंभव सपना मान लिया था
32:20और फिर सभी की निराशा के बीच हनुमान की आखों में एक अद्रिश्य चमक पैदा हुई उस असीन सागर को
32:28देखते हुए, जैसे उसमें कोई गुप्त शक्ती जागरित हो रही हो
32:33वानरों की हताशा को चीरते हुए, वयोवरिध जामबवान, जिनका अनुभव सदियों का था, धीर गंभीर मुद्रा में आगे बढ़े, उनकी
32:42द्रिश्टी में अटूट संकल्प चमक रहा था
32:46देवलोक में नारद मुनी, अपनी वीना के शान्थ स्वरों के साथ, प्रित्वी के इस महत्वपूर्ण क्षन को गहन एकागरता से
32:54देख रहे थे, उनकी आखें भविश्य की घटनाओं का पूर्वाभास कर रही थी
33:00जामबवान ने हनुमान की ओर देखा, जिनकी आखों में अभी भी निराशा की हलकी परचाई थी, और एक गहरे विश्वास
33:08से भरे शब्दों से उन्हें संबोधित करने लगे
33:12उनकी आवाज में युगों का ज्यान और अटूट प्रेना गूंज रही थी, जिससे निराश वानर सेना में एक नई आशा
33:20की तरंग सी दोड़ गई
33:23जामबवान ने अपनी वानी में प्रभु श्री राम और सुग्रीव के उन पर रखे गए अटूट विश्वास को पिरोया, जो
33:30हर वानर के मन में गूंज उठा
33:33इंद्र अपने दिव्य सिनहासन पर आसीन, पृत्वी पर घट रही इस महत्वपून घटना को अपने हजार नेत्रों से देख रहे
33:41थे, उनके चहरे पर गंभीरता और उच्सुक्ता का मिश्रण था
33:46उन्होंने वानरों को याद दिलाया कि कैसे उनकी वीरता और निष्ठा ने श्रीराम को उन पर विश्वास करने का साहस
33:53दिया था
33:55सूर्यास्त की सुनहरी किरने उनकी गंभीर वानी के साथ मिलकर वानर दल के चहरों पर एक नई द्रिड़ता का चित्र
34:03उके रही थी
34:05जामबवान ने अपनी बात जारी रखते हुए, उन्हें याद दिलाया की श्रीराम की सहायता का वचन देने के बाद, पीछे
34:13हटना उनके धर्म के विरुद्ध होगा
34:16वैकुंठ में भगवान विश्नु, शेशनाग पर विराजमान, इस नश्वर जगत की घटनाओं को अपनी असीम क्रिपा और ज्यान से देख
34:25रहे थे, उनके चहरे पर एक शांत मुस्कान थी
34:29वानर सेनापतियों के चहरे पर विचार और आत्मनरीक्षन के भाव स्पष्ट रूप से उभरने लगे, जैसे वे अपनी प्रतिज्याओं को
34:38पुनह स्मरण कर रहे हो
34:40उनकी प्रेणादायक वानी ने वातावर्ण में एक अद्रिश्य उर्जा भर दी, जिससे सागर की लहरे भी उनकी द्रिड़ता का सम्मान
34:49कर रही थी
34:51अंत्र जामबवान ने अपनी बात का सार हनुमान की ओर मोर दिया, उनकी आखों में एक विशेश चमक और गहनता
34:58थी
35:11उन्होंने हनुमान को उनकी जन्मजात, असीमित शक्ती और देवत्व का स्मरण कराया, जिसे वे बचपन की एक घटना के कारण
35:19विस्मृत कर चुके थे
35:22एक पल के लिए हनुमान की आखों के सामने उनके बचपन की धुन्धली छविया कौन्ध गई, जब उन्होंने सूर्य को
35:29फल समझ कर निगलने का प्रयास किया था
35:33जामबवान ने हनुमान को उनके पवनपुत्र होने की दिव्य पहचान और अजे शक्तियों की याद दिलाई, जो उनके भीतर सुप्ट
35:41पड़ी थी
35:43ब्रहमा, ब्रहमान्ड के निर्माता, अपने चार मुखों से प्रित्वी पर घट रही इस लीला को देख रहे थे, उनके चहरे
35:51पर सृष्टी के अध्भुत रहस्य का भाव था
35:55हनुमान की आखों में धीरे धीरे एक अध्भुत चमक जागरित हुई, जैसे सदियों की निग्रा के बाद कोई प्राचीन शक्ती
36:02स्वयं को पहचान रही हो
36:14हनुमान की नसंस में एक दिव्य उर्जा का संचार होने लगा, जैसे उनके भीतर सोई हुई प्राचीन नदिया अब सागर
36:22से मिलने को व्याकुल हो उठी हो
36:25ब्रहमा, स्रिष्टी के नियामक अपने चार मुखों से इस अग्भुत क्षण को देख रहे थे, उनके चहरे पर एक गंभीर
36:33संतुष्टी का भाव था
36:35उनकी आखों में अब वह अदमय बल झलक रहा था, जो पवन्देव के पुत्र के रूप में उनकी जन्मजात पहचान
36:43थी
36:44समुद्र की लहरें जो पहले उग्र थी, अब एक लैबध गर्जना में बदल गई, जैसे वे स्वया हनुमान की शक्ती
36:52को नमन कर रही हो
36:55जामबवान के प्रेणादायक शब्दों ने उनके मस्तिष्क में गूंचते हुए, उन्हें उनके भूले हुए अतीत की गहराईयों तक पहुचाया
37:04शीरसागर में विराजमान भगवान विश्नु अपने अनंत शयन पर लेटे हुए, इस असाधारन लीला के साक्षी बने
37:13उन्हें अपनी इच्छा से आकार बदलने की शक्ती का स्मरण हुआ, जैसे वायू स्वया उनके भीतर सिमट गई हो
37:21तेज हवाएं चलने लगी, पेड़ों की शाखाएं जूमने लगी, जैसे प्रकृती भी उनके भीतर जागरित हो रही शक्ती का उत्सव
37:30मना रही हो
37:32विशाल सागर की असीम गहराया उनके समक्ष चुनौती बनकर खड़ी थी, फिर भी उनके मन में कोई भय न था
37:40कैलाश परवत्पर भगवान शिव अपने नेत्रों को बंद किये हुए भी इस दिव्य संकल्प को अनुभव कर रहे थे
37:48प्रत्येक श्वास के साथ उन्हें अपनी अजे बलशाली का बोध हो रहा था, जैसे पहाडों को भी हिलाने की शक्ती
37:56उनमें समाहित हो
37:58उनके बचपन की शरार्तें, जिनमें उन्होंने सूर्य को फल समझकर निगलने का प्रयास किया था, अब उन्हें अपनी असीमित क्षमता
38:07का प्रमान लग रही थी
38:10सूर्यास्त का अंतिन प्रकाश सागर पर सुनहरी चादर बिछा रहा था, जैसे आने वाली महान यात्रा का स्वागत कर रहा
38:17हो
38:19देवी पार्वती कैलाश पर शिव के साथ बैठी, हनुमान के द्रिढ निश्चे पर मुस्कुरा उठी
38:26उनकी दिव्यता और उस महान उद्देश का बोध उन्हें स्पष्ठ हो रहा था जिसके लिए उनका जन्म हुआ था
38:34पूरी प्रित्वी एक सुक्ष्म कमपन के साथ उनके भीतर जागरित हो रही असीम शक्ती का अनुभव कर रही थी
38:43वानरों की सेना अपने राजा सुग्रीव के साथ हनुमान की और आशा भरी नजरों से देख रही थी उनकी आखों
38:51में एक नई उम्मीद जग्मगा रही थी
38:54देवर्शी नारद अपनी वीना पर एक मधुर धुन छेड़ते हुए इस एतिहासिक शन को अपनी दिव्य आखों से देख रहे
39:02थे
39:03एक अंतिन गहरा श्वास लेते हुए हनुमान ने अपनी यात्रा के लिए स्वयन को तैयार किया उनकी आखों में अब
39:11अटल संकल्प था
39:13समस्त वायुमंडल में एक अभूत पूर्व उर्जा का प्रवाह हुआ जैसे पवन्देव स्वय अपने पुत्र को उडान भरने का आहवान
39:22कर रहे हुँ
39:24कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
39:28अपनी शक्तियों का पूर्णत स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं
39:36उनका आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
39:40उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
39:45वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
39:53परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
39:56कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
40:01अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
40:09आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
40:13उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
40:18वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
40:27परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
40:30कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
40:35अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
40:43आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
40:46उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
40:52वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
41:00परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
41:03कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
41:08अपनी शक्तियों का पूर्णता स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
41:16आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
41:20उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
41:25वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
41:33परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
41:36कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
41:41अपनी शक्तियों का पूर्णत है स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं
41:49उनका आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
41:53उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
41:58वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
42:07परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
42:10कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
42:14अपनी शक्तियों का पूर्णता स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
42:23आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
42:26उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
42:32वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मांस पेशियों को कस्ते हैं और एक
42:39विशाल परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
42:43कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
42:48अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
42:56आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
43:00उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
43:05वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
43:13परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
43:16कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
43:21अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
43:29आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
43:33उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
43:38वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
43:46परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
43:50कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
43:54अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
44:03आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
44:06उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
44:12वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मांसपेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
44:20परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
44:23कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
44:28अपनी शक्तियों का पूर्णत है स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं
44:35उनका आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
44:40उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
44:45वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मांस पेशियों को कस्ते हैं और एक
44:53विशाल परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
44:56कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
45:01अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
45:09आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
45:13उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
45:18वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
45:26परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
45:29कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
45:34अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
45:43आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
45:46उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
45:51वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
46:00परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
46:03कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
46:08अपनी शक्तियों का पूर्णत है स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं
46:15उनका आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
46:20उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
46:25वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
46:33परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
46:36कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
46:41अपनी शक्तियों का पूर्णत हस्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
46:49आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
46:53उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
46:58वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
47:06परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
47:09कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
47:14अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
47:22आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
47:26उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
47:31वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
47:40परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
47:43कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
47:47अपनी शक्तियों का पूर्णतह स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
47:56आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
47:59उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
48:05वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
48:13परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
48:16कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
48:21अपनी शक्तियों का पूर्णता स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
48:29आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
48:33उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
48:38वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
48:46परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
48:49कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
48:54अपनी शक्तियों का पूर्णता स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
49:02आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
49:06उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
49:11वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मास्पेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
49:19परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
49:23कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
49:27अपनी शक्तियों का पूर्णत है स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं
49:35उनका आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
49:39उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
49:45वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तैयारी करते हुए अपनी मांस पेशियों को कस्ते हैं और एक
49:52विशाल परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
49:56कहानी का यह हिस्सा अद्भुत और रहस्यमई है
50:01अपनी शक्तियों का पूर्णता स्मरण होने पर हनुमान अपने शरीर को अकल्पनिय रूप से बढ़ा करना शुरू करते हैं उनका
50:09आकार परवत जैसा विशाल हो जाता है
50:13उनकी आखों में द्रिड संकल्प और शक्ती का तेज चमक उठता है
50:18वे महासागर को एक छलांग में पार करने की तयारी करते हुए अपनी मासपेशियों को कस्ते हैं और एक विशाल
50:26परवत शिखर पर चड़ जाते हैं
50:30हनुमान अपनी विशाल काया के साथ उस परवत शिखर पर खड़े थे जैसे स्वयं एक जीवित परवत ब्रहमांड की शक्ती
50:38को अपनी हर नस में समेटे हुए
50:41देवलोक में देवराज इंद्र अपने दिव्य वजर को थामे हनुमान की इस अद्भुत शक्ती को विस्मय भरी आखों से देख
50:49रहे थे उनका हृदय आशंका और प्रशंसा से भरा हुआ था
50:54अपनी सभी इंद्रियों को केंद्रित कर उन्होंने अपनी चाती में एक गहरा श्वास भरा और अपने भीतर की अनंत उर्जा
51:03को अपनी माल स्पेशियों में संचरित किया
51:06उनके पैरों के नीचे की भूमी पर हल्की दरारे पढ़ने लगी जैसे स्वयम प्रित्वी भी उस असीम शक्ती के भार
51:14को सहन करने में कठिनाई महसूस कर रही हो
51:17एक गर्जना हुई इतनी प्रचंड की वह केवल ध्वनी नहीं थी अपितु ब्रहमांड की आत्मा का आहवान थी जिसने आकाश
51:26को भेद दिया और दिशाओं को कमपकपा दिया
51:30भगवान विश्नु अपने शेशनाग पर विराजमान अपने शांत नेत्रों से यह अध्भुत ग्रिश देख रहे थे उनके चहरे पर एक
51:39सौमे मुस्कान थी जैसे वे आने वाले विजय को पहले से ही जानते हूँ
51:44उस गर्जना की प्रतिध्वनी से पर्वत की चट्टाने हिलने लगी और समुद्र में विशाल लहरें उठने लगी जो किनारे पर
51:53आघात कर रही थी
51:55हवा में एक अजीब सा खिंचाव महसूस हुआ जैसे प्रकृती स्वया उस आगामी महाचलान के लिए अपनी सासे रोक कर
52:04खड़ी हो
52:06अपनी संपूर्ण शक्ती को पैरों में समेटे हनुमान ने एक अंतिम क्षण का विचार किया और फिर एक प्रचंट बल
52:13से अपने पैर धर्ती पर जमाए
52:16कैलाश परवत पर भगवान शिव अपनी तपस्या में लीन थे किन्तु उनके तीसरे नेत्र में एक शनिक कमपन हुआ जो
52:25इस ब्रहमांडिये घटना का संकेत था
52:28एक भयंकर आघात के साथ उन्होंने आकाश की ओर छलांग लगाई जिससे परवत का शिखर एक भयानक धमाके के साथ
52:37चूर-चूर हो गया
52:39तूटे हुए परवत के अवशेश विशालकाई शिलाखंडों के रूप में महासागर में गिरने लगे जिससे जल में प्रचंड गर्जना और
52:47बवंडर उत्पन हुए
52:50अब हनुमान आकाश मार्ग में एक दिव्यतीर की भाती तीवर गती से लंका की ओर बढ़ रहे थे
52:57उनके पीछे हवा का एक प्रचंड बवंडर बन रहा था
53:02ब्रहमा अपने कमल सिनहासन पर विराजमान स्रिष्टी के इस अध्वितिय पराक्रम को देख कर मुस्कुरा रहे थे
53:09उनके चारों मुखों से वैदिक मंत्रों की प्रतिध्वनी गूंज रही थी
53:14उनकी गती इतनी अकलपनिय थी कि बादल उनके बगल से भागे जा रहे थे
53:19जैसे वे स्वयंकाल और स्थान की सीमाओं को चुनौती दे रहे हो
53:25महा सागर के जल पर उनके उड़ने से बनी वायू की शक्ती से एक लंबी सीधी रेखा में जल का
53:32चीरना शुरू हो गया था
53:33जैसे कोई अद्रिश तलवार सागर को काट रही हो
53:38लंका की ओर बढ़ता हुआ हनुमान का द्रिड संकल्प उनके चहरे पर स्पष्ट था
53:43हर मास पेशी उनके महान उद्देश की सिध्धी के लिए सज्ज थी
53:49नारद मुने अपनी वीना के तार छेड़ते हुए इस अलोकिक यात्रा का बखान कर रहे थे
53:55देवर्शी के स्वरों में हनुमान के पराक्रम की गाथा थी
54:00उनके शरीर से एक दिव्य आभा निकल रही थी जो अंधेरे आकाश को प्रकाशित कर रही थी
54:06जैसे वह स्वय एक चलता फिरता नक्षत रहो
54:10यह केवल एक चलांग नहीं थी यह विश्वास की उडान थी असंभव को संभव बनाने की प्रतिग्या जो आने वाले
54:19महाभियान का शुभारंभ थी