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देवी सीता के अपहरण के बाद, श्रीराम और लक्ष्मण का शोक और प्रतिशोध की अग्नि धधक उठी। पंचवटी से शुरू हुआ सीता की खोज का एक गहन और हृदय विदारक सफर, जहां उन्हें वन के हर कोने में उनका पता ढूंढना था। इसी खोज में, उन्हें एक भयानक राक्षस और एक पवित्र भक्त से मिलना था, जो उन्हें लंकापति रावण और वानरराज सुग्रीव तक ले जाने वाला था। इस एपिसोड में देखें, कैसे जटायु ने अपने प्राणों की आहुति देकर दिया सीता का पहला सुराग, कैसे कबंध के श्राप का हुआ अंत, और कैसे शबरी की भक्ति ने श्रीराम को दिखाया आशा का मार्ग! क्या श्रीराम अपनी प्रिय सीता को ढूंढ पाएंगे? #PadmaPurana #Ramayana #Rama #Sita #Jatayu #Kabandha #Sabari #Hanuman #Sugriva #HinduMythology #EpicJourney #SanatanDharma #VishnuPuran #Puranas #YTshorts
Transcript
00:00पंच्वटी की कुटिया वीरान पड़ी थी, जहां कभी प्रेम और आनंद का संगीत गूंजता था, अब वहां केवल एक असहनिय
00:08सन्नाटा पसरा था, जो श्री राम के हरिदय की पीडा का प्रतिबिंब था
00:14भगवान श्री राम अपनी प्रिय सीता के वियोग में गहरे शोक में डूबे, वन में भटक रहे थे, उनके हर
00:20कदम से प्रित्वी भी उनकी असीम पीडा का अनुभव कर रही थी
00:26वनवन वरिक्षवरिश से वे सीता का नाम पुकारते उनकी करुन पुकार से सारा वन शोक में डूब गया था, जैसे
00:33प्रकृती भी उनके दुख में भागिदार हो
00:37पंच्वटी की हर लता हर पत्ती राम के आसूँ से भीगी थी और हवा में एक उदास गीट तैर रहा
00:44था, जो सीता की अनुपस्थिती का मौन विलाप कर रहा था
00:49लक्षमन अपने जैश्ट भ्राता की पीडा देख व्याकुल, उन्हें ढूंडते हुए उसी शोकसंतप्त वन में पहुँचे जहां राम का विलाप
00:57गूंज रहा था
00:59लक्षमन ने अपने भ्राता को सांत वना दी, उनके अश्रु पोँचते हुए उन्हें धैर्य धारन करने और सीता माता की
01:07खोज के लिए प्रेरित किया
01:10राम ने सीता की विस्मृत स्कार्फ को हृदय से लगा लिया, उसकी सुगंध में अपनी प्रिय पत्नी की अंतिम स्मृती
01:17को महसूस करते हुए
01:19एक अश्रुकन धर्ती पर गिरा, और जैसे ही वह मिक्टी में समाया, पंच्वटी की सारी वनस्पती पर एक गहरी उदासी
01:28चागई, हर पुष्प मुर्जासा गया
01:31अपने दुख को संकल्प में बदलते हुए, श्री राम और लक्ष्मन ने सीता की खोज में पंच्वटी के गहन वन
01:38में प्रवेश किया, हर दिशा में उनकी प्रिय पत्नी की तलाश में
01:43राम ने वन के व्रिक्षों और म्रिगों से प्रश्न किये, हे वन देवताओ, हे म्रिगण
01:48क्या तुमने मेरी प्रिय सीता को कहीं देखा है, उनकी वाणी में एक गहरी करुणा थी
01:56अचानक लक्षमन की तीक्षन ग्रिष्टी को धर्ती पर कुछ विखंदित शाखाये और अस्तव्यस्त पच्चेन दिखाई दिये, जो किसी भयानक संधर्ष
02:05का संकेट दे रहे थे
02:07वन में एक स्पष्ट मार्ग बन गया था, जो केवल तबाही और तूटे हुए व्रिक्षों की निशानी नहीं, बलकि किसी
02:15दैत्य और पक्षी के भीशन युद्ध का गवाह था
02:19इसी विनाश के मार्ग का अनुसर्ण करते हुए, दोनों भाई गहरे वन में आगे बढ़ते गए, हर कदम पर सीता
02:27माता के मिलने की क्षीन आशा लिए
02:30राम के हृदय में एक पल के लिए आशा की लौ जिल मिलाई, फिर तुरंत ही चिंता और द्रिड संकल्प
02:37की अगनी धधक उठी, हमें अवश्य सीता को खोजना होगा
02:42उन्हें और भी स्पष्ट संकेत मिले, धर्ती पर बिखरे हुए विशाल पंख, एक रत के तूटे हुए पहिये के टुक्रे
02:49और रक्त के ताजे निशान जो किसी भयंकर युद्ध की गाथा कह रहे थे
02:55मिट्टी में सना एक विशाल, रक्तरंजित पंख, जैसे किसी महान योध्धा का ध्वज गिरा हो, दोनों भाईयों के मन में
03:03एक अनिश्ट की आशंका जगा गया
03:06दूर व्रिक्षों के बीच उन्हें एक विशालकाय आकरिती दिखाई दी एक पक्षी, जो धरा पर पड़ा अंतिम सासे ले रहा
03:14था, उसके पंख रक्त से सने थे
03:17उस घायल पक्षी के पास पहुँचते ही, श्री राम और लक्षमन का हृदय करुना से भर गया, उन्होंने उसके दैनिय
03:25स्वरूप को देखा और समझा कि यह कोई सामान्य प्राणी नहीं
03:30श्री राम ने अत्यंत कोमलता से उस विशालकार पक्षी के पास घुटने टेक दिये, अपने हाथों से उसके रक्तरंजित सिर
03:38को उठाया और उसके नाम का उच्चारण किया, हे पक्षी राज
03:43और जैसे ही राम के पवित्र आसुओं की बूदे जटायू के रक्तस ने शरीर पर गिरी, पक्षी राज में एक
03:50नई शनभंगुर उर्जा का संचार हुआ, जिससे उसने अपनी अंतिन कथा कहने का प्रयास किया
03:57शीन स्वर में ही सही, पक्षी राज जटायू ने अपनी तूटी चोँच को उठा कर श्री राम से कहा कि
04:04उन्होंने सीता को बचाने के लिए युद्ध किया था और रावन ही उन्हें हरन कर ले गया है
04:11जटायू के कश्टभे शब्दों को सुनकर, श्री राम और लक्षमन की आखों में गेहन पीडा और क्रोध की ज्वाला धधक
04:18उठी, क्योंकि उन्होंने सीता के अपहरन की पहली भयानक पुष्टी सुनी
04:24मरनासन अवस्था में भी पक्षी राज जटायू ने अपनी अंतिम शक्ती को संकलित कर रावन के साथ हुए भयंकर युद्ध
04:32का वर्णन किया, जहां उसने सीता की रक्षा का अथक प्रयास किया था
04:38जैसे ही जटायू ने रावन का नाम लिया, एक शनिक और धुंधली स्मृती उसकी आखों में कौंध गई, जिसमें लंकापती
04:46का तामसिक रथ दक्षिन की ओर तेजी से बढ़ता दिखाई दिया
04:51जटायू ने रावन के भयावह रूप का वर्णन किया, दस सिर्ख, बीस भुजाएं और भयंकर अट्थास, जिसने स्वर्ण म्रिग का
04:59रूप धरे मारीच को धोखा देने के लिए इस्तिमाल किया था
05:03श्री राम का दिव्य चहरा, जो पहले करुणा से भरा था, अब प्रतिशोध की अगनी से प्रजवलित हो उठा, जैसे
05:11सूर्य बादलों से निकल कर अपनी पूरी शक्ती से चमक उठे
05:16जटायू ने उसक्षन का वर्णन किया, जब उसने असहाय सीता को रावन के रथ में रोते हुए देखा था, और
05:23कैसे उसके हृदय में उन्हें बचाने की तीवर इच्छा जागरित हुई
05:28उसकी आखों से एक अंतिम प्रक्तरंजित आसू धलका, जो उसके त्याग और सीता के प्रती उसकी अटूट निष्ठा का प्रतीक
05:37था, और वह धर्ती में समा गया
05:40जटायू का शरीर अब और शक्तिहीन होता जा रहा था, उसकी सासे क्षीन पड़ रही थी, जैसे बुच्छता हुआ दीपक
05:48अपनी अंतिम लौ टिम्टिमा रहा हो
05:51लक्षमन्क जो अब तक अपने क्रोध को रोके हुए थे, अब नम आखों से जटायू को दिलासा देते हुए धीरे
05:58से बोले है पक्षी राज, आपके बलिदान को कभी भुलाया नहीं जाएगा
06:04अपने अंतिम क्षणों में जटायू ने अपनी शेश शक्ती एकत्र कर, श्री राम को स्पष्ट रूप से बताया की लंकापती
06:12रावन सीता का अफ़रन करके दक्षिन दिशा की ओर ले गया है
06:17जैसे ही जटायू ने दक्षिन और लंका शब्दों का उच्चारण किया, आकाश में एक क्षणिक रहस्यमय गर्जना गुमजी और दक्षिन
06:26दिशा से एक अद्रिश्य उर्जा लहर्सी प्रवाहित हुई
06:30सूचना देने के बाद जटायू का जीवन दीप लगभग बुच चुका था, उसकी आखें धीरे-धीरे मिचमिचाने लगी और उसकी
06:38अंतिम सासें उसके गले में अटकने लगी
06:42श्री राम ने जटायू के सिर को अपने हाथों में अत्यंत कोमलता से थामे रखा, उनके हुठोन पर करुणा और
06:50आभार के शब्ध थे, जैसे वे एक पिता को अंतिम विदाई दे रहे हुँ
06:55एक अंतिम कापती हुई सांस के साथ पक्षीराज जटायू ने अपने प्रान त्याग दिये और उसके विशाल शरीर में जीवन
07:04की अंतिम स्पंदन भी शान्थ हो गई
07:07जैसे ही जटायू का प्राण निकला, एक दिव्यक कोमल प्रकाश उसके शरीर से निकल कर आकाश की ओर उठा, स्वर्ग
07:15की शान्ती में विलीन होने का संकेट देता हुआ
07:19श्रीराम और लक्षमन ने अपने प्यारे मित्र के निधन पर गहरे शोक में डूबे हुए, धर्ती पर घुटने टेक दिये,
07:26एक निस्तब्ध श्रधा और अथाह दुहक से भरे हुए
07:31दिव्य परंपरा का पालन करते हुए, श्रीराम ने जटायू के लिए अंतिम संसकार किया, उसे पुत्रवत अगनी प्रदान की, मानो
07:39वह अपना ही कोई प्रिय संबंधी हो
07:43जटायू को अंतिम विदाई देने के बाद, श्रीराम ने अपनी द्रिष्टी दक्षिन दिशा की ओर स्थिर की, उनकी आखों में
07:50सीता को ढूंध निकालने का अटूट संकल्प स्पष्ट था
07:55अब वन शांत था, केवल हवा की सरसराहट और पत्तियों की फुस्फुसाहट ही रह गई थी, जो दो भाईयों के
08:03अटूट संकल्प और सीता की खोज की यात्रा की नई शुरुवात की गवाह बन रही थी
08:09जटायू को अगनी समर्पित करने के बाद, श्रीराम और लक्षमन ने दोहक और द्रिड संकल्प के साथ दक्षिन दिशा की
08:17ओर कदम बढ़ाए, जहां से सीता को ले जाया गया था, उनकी आखों में प्रतिशोध की अगनी और मिलन की
08:24आशा जल रही थी
08:26सुदूर स्वर्गलोक से, देवर्शी नारद ने अपने वीना के तारों पर उंगलिया फेरते हुए, रामलक्षमन की इस यात्रा को उच्छुकता
08:35और भविश्यवानी की मुस्कान के साथ देखा, जानते हुए कि यह महान ब्रहमांडिय नाटक की शुरुवात मात्र थी
08:55सुदूर सा सुराग धूंध निकालने की अटूट आस में।
09:25उन्हें विवश कर रही थी कि वे अपनी यात्रा को जारी रखने के लिए और अधिक प्रयास करें।
09:32वेकुंठ में भगवान विश्नु, शीर सागर के अनन्त विस्तार में शेशनाक पर विराजमान होकर अपनी आखें खोलते हैं, एक शन
09:41के लिए ब्रहमांड के सभी कश्टों को अपने नीले कमल जैसे नेत्रों में समेटे हुए और फिर एक सुक्ष्म मुस्कान
09:48के साथ उन
10:01अननी तलवार से घनी जाडियों और बाधाओं को काट कर श्रीराम के लिए मार्ग प्रशस्त किया।
10:31मानो प्रकृती भी सीता की अनुपस्थिती में शोक मना रही हो और अपने आपको दुर्गम बना लिया हो।
10:39कैलाश परवत पर भगवान शिव अपनी आखें कुछ खोल कर अपनी दिव्यद रिष्टी से ब्रहमांड के इन मार्मिक शनों का
10:47अवलोकन कर रहे थे।
10:48उनके माथे पर स्थित तीसरे नेत्र में संपूर्ण ज्यान का प्रकाश चमक रहा था।
10:54एक प्राचीन नदी के पास पहुँचकर लक्षमन ने बिना हिचकिचाए अपने बाहुबल से मार्ग में पड़े भारी पत्थरों को हटाया
11:03ताकि श्रीराम बिना किसी बाधा के आगे बढ़ सकें उनकी भक्ती और सेवा अतुलनिय थी।
11:10नदी का शांत प्रवाह आगे बढ़ता रहा जो काल के अविराम चक्र और रामलक्षमन की अनवरत यात्रा का प्रतीक था।
11:18एक ऐसी खोज जो उन्हें अंजाने और खतरनाक रास्तों से होकर गुजार रही थी।
11:24कई दिनों के अथक परिश्रम के बाद वे एक ऐसे विरान और पत्रीले ख्षेत्र में पहुँचे जहां केवल सुखे पेड
11:32और बंजर भूमी थी जो उनके मार्ग की कठिनाई और सीता की अनुपस्थिती के दुहक को और बढ़ा रही थी।
11:39ब्रहम लोक में चतुर्मुख ब्रहमा अपने भव्य सिनहासन पर विराज मान होकर अपनी चारों आखों से धर्ती पर घट रही
11:48घटनाओं को देख रहे थे।
11:50सृष्टी के हर पहलू पर उनकी गहन दृष्टी थी।
11:54अचानक श्रीराम को धर्ती में एक कमपन का अनुभव हुआ।
11:58मानो कोई अद्रिश शक्ती उन्हें किसी महत्वपूर्ण संकेत की ओर इशारा कर रही हो।
12:04उनकी अंतरात्मा ने एक आसन घटना का पूर्वाभास कराया।
12:09दूर क्षितिच पर आकाश में गहराते बादलों का एक विशाल समोह तेजी से उमड रहा था, जिसका रंग नारंगी और
12:17लालिमा से भरा था, जो उनकी यात्रा की बढ़ती जटिलताओं और आने वाले तूफानों का प्रतीक था।
12:24इस बंजर भूमी को पार करते हुए, वे एक ऐसी खुली और समतल जगह पर पहुँचे, जहां दूर-दूर तक
12:32एक प्राचीन परवत श्रिंखला के धुंधले आकार दिखाई दे रहे थे, जो एक नए अध्याय का संकेट दे रही थी।
12:40स्वर्ग से देवर्शी नारद अपनी वीना के मधुर स्वरों के साथ उन्ह इस दृष्ष पर अपनी दिव्य दृष्टी डालते हैं,
12:48उनके मुख पर एक गंभीर भाव था, क्योंकि वे जानते थे कि अब इस कथा का एक महत्वपूर्ण मोड आने
12:56वाला था।
12:57आगे बढ़ते हुए, श्री राम की दृष्टी अचानक एक ऐसी वस्तु पर पड़ी जो धर्ती पर पड़ी थी, एक सुन्दर
13:05आभूशन, जिस पर सीता की पहचान के चिनह थे, जिससे उनके हृदय में आशा की एक नई किरन जग्मगा उठी।
13:13वह आभूशन भले ही छोटा था, लेकिन सीता की वापसी के लिए एक विशाल आशा का प्रतीक बन गया, जिससे
13:22राम के हृदय में एक नई शक्ती और संकल्प की अगनी प्रजवलित हो उठी।
13:27सीता के आभूशन से मिली आशा की किरन को हृदय में संजोए, श्री राम और लक्षमन ने अपनी खोज की
13:34यात्रा एक और रहस्यमई, घने और प्राचीन वन की ओर जारी रखी, जहां हर पत्ता एक अनकही कहानी फुस्फुसाता प्रतीत
13:43होता था।
13:45स्वर्ग से देवर्शी नारद अपनी वीना के मधूर स्वरों के साथ पुनह इस द्रिश्य पर अपनी दिव्य द्रिश्टी डालते हैं,
13:53उनके मुख पर एक गंभीर भाव था, क्योंकि वे जानते थे कि अब इस कथा का एक महत्वपूर्ण मोड आने
14:00वाला था।
14:02आगे बढ़ते हुए, श्री राम की द्रिश्टी अचानक एक ऐसी वस्तु पर पड़ी जो धर्ती पर पड़ी थी, एक सुन्दर
14:09आभूशन, जिस पर सीता की पहचान के चिनह थे, जिससे उनके हृदय में आशा की एक नई किरन जग्मगा उठी।
14:18वह आभूशन भले ही छोटा था, लेकिन सीता की वापसी के लिए एक विशाल आशा का प्रतीक बन गया, जिससे
14:26राम के हृदय में एक नई शक्ती और संकल्प की अगनी प्रजवलित हो उठी।
14:32जैसे ही वेवन में गहराई तक बढ़ते गए, वातावर्ण और अधिक बोजिल और रहस्यमय होता गया, प्राचीन व्रिक्षों की काया
14:40प्रेतवाधित आकृतियों जैसी प्रतीत होने लगी, जो किसी अग्रिश्य खत्रे की चेताबनी दे रही थी।
14:48शितिज से परे, भगवान विश्नु अपनी अनंत शया पर लेटे हुए, अपनी दिव्यद्रिश्टी से इस ब्रहमांडिय नाटक को देख रहे
14:56थे, उनका शांत मुखमंडल सभी घटनाओं के गहन अर्थ को दर्शाता था।
15:02अचानक हवा में एक अजीब सी गंध फैल गई, और पैरों के नीचे की धर्ती कापने लगी, जो किसी आसन्न
15:09दैत्य के आगमन का संकेट दे रही थी।
15:13फिर एक विशाल काली चाया ने वन के शांत वातावर्ण को निगल लिया, जिसके साथ ही एक भयावह गर्जना गूंज
15:21उठी, जो आसन्न खत्रे की सपष्ट चेतावनी थी।
15:25उस विशाल चाया के बीच से कबंध नामक एक भयानक राक्षस उभरा, जिसका सिर और गर्दन नहीं थी, और उसके
15:34पेट में एक विशाल दातों वाला मुह था, जिसकी भयानक भुजाय शिकार को तलाश रही थी।
15:41कैलाश परवत पर भगवान शिव गहन ध्यान में लीन थे, किन्तु उनके तीसरे नेत्र में एक सुक्ष्म कमपन अधर्म पर
15:49धर्म की आसन्न विजय का पूर्वाभास देता हुआ, स्पष्ट जलक रहा था।
15:54कबंध की विशाल व्रिक्ष जैसी भुजाय बिजली की गती से उन पर जपती, श्रीराम और लक्षमन को अपनी मजबूत पकड
16:03में कसने का प्रयास करती हुई।
16:06अपनी अदमय शक्ती का प्रदर्शन करते हुए, कबंध ने श्रीराम और लक्षमन को अपनी विशाल भुजाओं में जकड लिया, उनके
16:14संधर्ष को व्यर्थ करते हुए।
16:36इस भीशन युद्ध को देख रहे थे, उनके चहरे पर ब्रहमांडिय योजना की गंभीरता और उच्सुकता का मिश्रण था।
17:06इस भीशन को दूर तक बिखेर दिया, जो एक जीत की शुरुवात का संकेत था।
17:36एक शाप मुक्ती को होते देख रहे थे।
17:39कबंध का राक्षसी शरीर विलीन हो गया और उसके स्थान पर एक तेजस्वी गंधर्व प्रकट हुए, जो शाप से मुक्त
17:47होकर कृतग्यता पूर्वक श्रीराम और लक्षमन के सामने नत्मस्तक हुए।
17:52शाप मुक्त गंधर्व ने श्रीराम को सुग्रीव के पास जाने का मार्ग बताया, जो सीता की खोज में एक नई
18:00आशा और दिशा का प्रतीक बन गया।
18:02उस घने वन में एक दिव्य प्रकाशस्तंभ के समान चमक उठा।
18:32की और बढ़ते कदमों को देख कर मंदमंद मुस्कुराएं, उनके मुखमंडल पर संतोष और दिव्य ज्यान का प्रकाश था।
18:40गंधर्व ने श्रीराम को उस रिश्यमुक परवत का विस्तृत विवर्ण दिया जहां सुग्रीव निवास करते थे, उसकी भागोलिक विशेश्ताओं और
18:49गुप मार्गों को रेखांकित करते हुए, मानो स्वय मार्ग दर्शक बनकर पत प्रशस्त कर रहा हो।
18:56वन के गहन मौन में सुदूर परवत की ओर उठती उनकी द्रिठ द्रिश्टी सीता की खोज में एक नई सुभा
19:03और अटूट संकल्प का प्रतीक बन गई, जो हर बाधा को पार करने की शक्ती रखती थी।
19:10गंधर्व ने विनमरता पूर्वक श्रीराम और लक्षमन से विदाली, उसकी आत्मा अब शाप मुक्त होकर स्वर्गलोग की ओर अग्रसर थी,
19:19परन्तु उसके शब्द वन में गूंचते रहे एक अद्रिश मार्ग दर्शक की तरहे।
19:25कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी योग निद्रा से उठकर श्रीराम की यात्रा को अपनी तीसरी आख से निहारा,
19:33उनके मुखमंडल पर शांत और गंभीर भाव थे, जानते हुए कि यह धर्म की स्थापना का एक महत्वपूर्ण चरण था।
19:41श्रीराम और लक्षमन ने सघन वन के भीतर से अपना पत बनाया, जहां वनस्पतियों का सामराज्य था और हर कदम
19:49नई चुनोतियों को सामने ला रहा था, पर उनके संकल्प में कोई कमी नहीं थी।
19:55पेडों की जड़े जमीन पर प्राचीन नसों की तरह फैली हुई थी, जो अतीत के रहसियों और जंगल की अदमय
20:03शक्ती को दर्शाती थी, जबकि सूर्य की किरने उन पर सुनहरे धागों सी गिर रही थी।
20:09अपनी यात्रा के दौरान उन्हें मार्ग में एक प्राचीन और तूटी हुई कुटिया दिखाई दी, जो दूर से ही शांती
20:17और त्याग का आभास दे रही थी, मानो किसी पुन्यात्मा की प्रतीक्षा कर रही हो।
20:24वैकुंट में भगवान विश्नु अपने शेशनाग शया पर लेटे हुए लक्षमी देडी के साथ श्री राम के हर कदम को
20:31देख रहे थे, उनके चहरे पर एक रहस्यमय मुस्कान थी, जैसे कि वे ब्रहमांड के नाटक का आनंद ले रहे
20:38हुँ।
20:40लक्षमन ने श्री राम की ओर देखा, उनके नेत्रों में प्रश्न था कि क्या यह वही आश्रम हो सकता है,
20:47जिसका उलेक कबंध ने शबरी के निवास के रूप में किया था, उनके चहरे पर जिग्यासा और आशा थी।
20:54आश्रम के चारों और उरते हुए पक्षियों का जुन्ड और शान्त हवा, उस पवित्र स्थान की गरिमा और एकांत को
21:02उजागर कर रही थी, जहां समय ठहरा हुआ प्रतीत होता था।
21:07श्री राम ने लक्षमन को धीरे से सिर हिला कर उत्तर दिया, यह संकेत देते हुए कि वे सही मार्ग
21:14पर हैं और उन्हें उस कुटिया की ओर ही बढ़ना चाहिए, उनके चहरे पर एक शान्त स्विकृती थी।
21:21इंद्रदेव अपने वजर को धारन किये हुए, स्वर्गलोग से इस द्रिश को देख रहे थे, उनके मुख पर अब कोई
21:28क्रोध नहीं, बलकी श्री राम के प्रती सम्मान और ओका भाव था।
21:34जैसे ही वे आश्रम के निकट पहुँचे, उन्हें एक तीवरक मीठी सुगंध का अनुभव हुआ, जो पके हुए मीठे बेर
21:42और जंगल के फूलों की थी, मानो कोई वर्षों से उनकी प्रतीक्षा में यह सब संजो कर बैठा हो।
21:49कुटिया के प्रवेश द्वार पर जंगली लताओं और रंगीन फूलों की मालाए लटकी हुई थी, जो आने वाले आगंतुकों का
21:57स्वागत कर रही थी और एक अद्रिश्य भक्तिमय उर्जा का संचार कर रही थी।
22:03श्रीराम और लक्षमन ने कुटिया के भीतर कदम रखा, जहां एक व्रिध तपस्विनी, शबरी अपनी गहरी समाधी से उठकर उनकी
22:12वर्षों की प्रतीक्षा को पूर्ण करने के लिए तैयार बैठी थी।
22:17वैकुंट में भगवान ब्रह्मा और नारद मुनी इस अद्वितिय मिलन के साक्षी बने, उनके मुखमंडल पर शांती और दिव्य आलोक
22:26था, क्योंकि वे धर्म के पत को अपनी आखों से देख रहे थे।
22:31शबरी ने श्रीराम के चर्णों में अपना मस्तक रखा, उसकी आखों में वर्षों की तपस्या का फल और उनके आगमन
22:39की अटूट श्रधा जलक रही थी, मानो जीवन का सार मिल गया हो।
22:44उस प्राचीन कुटिया में जहां वर्षों से मौन का वास था, अब भक्ती और प्रेम की दिव्य उर्जा प्रवाहित हो
22:51रही थी, जिसने पूरे वातावर्ण को पवित्र और आलोकित कर दिया था।
22:57अपने परम आराध्य को सम्मुख पाकर, शबरी ने उन्हें आदर पूर्वक कंदमूल और अपने तोड़े हुए मीठे बेर अर्पित किये,
23:06जिनके स्वाद में वर्षों की साधना और प्रेम का सार घुल गया था।
23:11श्री राम ने शबरी द्वारा प्रेम पूर्वक अर्पित उन बेरों को सहर्ष ग्रहन किया, मानों उनके लिए कोई राजसी व्यंजन
23:19भी इस भक्तिमय भेंट के आगे तुछ था।
23:22शबरी ने अपने गुरु मतंग रिशी की आध्या का पालन करते हुए वर्षों तक राह देखी थी, और आज अपने
23:30इश्ट को देखकर उसकी आत्मा त्रिप्थ हो गई, उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकली।
23:36इस पवित्र मिलन से आश्रम का कणकन पुलकित हो उठा, जहां वर्षों से मात्र मौन और प्रतीक्षा का सामराज्य था,
23:44अब वहां भक्ती और दिव्य आनंद का महासागर उमड पड़ा।
23:48शबरी ने श्रीराम को अपने गुरु मतंग रिशी की भविश्यवानी सुनाई की कैसे उनके गुरु ने उन्हें प्रभु के आगमन
23:57की प्रतीक्षा करने और उन्हें मोक्ष प्रदान करने का आदेश दिया था।
24:02प्रभु श्री राम ने ध्यानपूर्वक शबरी की कथा सुनी उनके मुखमंडल पर करुणा और गंभीरता का भाव था क्योंकि वे
24:11धर्म के मार्ग पर अपने कर्तव्य को समझ रहे थे
24:15शबरी ने भाव विभोर होकर अपने गुरु के अंतिम क्षणों का वर्नन किया, जब उन्होंने शबरी को विश्वास दिलाया था
24:22कि श्री राम स्वयं उसके उद्धार के लिए आएंगे
24:27समस्थ आश्रम में एक पवित्र गूंच फैल गई, मानो स्वयं मतंग रिशी की आत्मा भी इस क्षण की साक्षी बनकर
24:34शबरी की भक्ती का अनुमोधन कर रही हो
24:38शबरी ने प्रभु श्री राम को किशकिंधा और रिश्यमूख परवत का मार्ग बताया, जहां वे सुग्रीव और हनुमान से मिल
24:46सकते थे, जो सीता की खोज में सहायक होंगे
24:50श्री राम की आखों में एक नई आशा की किरण जगी, क्योंकि यह सीता के प्रथम सुराग की और बढ़ने
24:57का संकेत था, उनकी वर्षों की पीरा अब एक लक्ष में बदल रही थी
25:03शबरी ने रिश्यमूप परवत के दुर्गम मार्ग का विस्तार से वर्णन किया, जहां वानर राज सुग्रीव अपने बंधुत्व के दुख
25:11में एकांत वास कर रहे थे
25:14आश्रम के शांत वातावर्ण में भविश्य की गूँच सुनाई दे रही थी, मानो अद्रिश्य शक्तिया श्रीराम के अगले कदम को
25:22आकार दे रही हूँ
25:24श्रीराम ने उन्हें सावधान किया कि मार्ग में अनेक बाधाय होंगी, परंतु श्रीराम का अटल निश्चे उन्हें हर चुनाउती से
25:32पार ले जाएगा
25:34श्री राम ने शबरी को अपने गुरु के दिखाए मार्ग पर चलने और मोक्ष प्राप्थ करने का आशिरवाद दिया, जिससे
25:42शबरी का जीवन धन्य हो गया
25:45आशिरवाद पाकर शबरी का जीनशियन शरीर दिव्य जोती से जग्मगा उठा, मानो जन्मों की प्रतीक्षा का फल उसे तुरंट प्राप्थ
25:53हो गया हो
25:55इस पवित्रक्षन में आत्मा और परमात्मा का अद्भुत मिलन हुआ, जहां गुरु की वानी और शिश्य की अटूट श्रद्धा ने
26:03एक साथ मोक्ष का द्वार खोल दिया
26:06शबरी के शरीर ने परमधाम की ओर प्रस्थान किया, और उसकी आत्मा श्रीराम के चर्णों में विलीन हो गई, वह
26:14मुक्ती पाचुकी थी
26:17श्रीराम और लक्षमन ने उस पवित्र आश्रम को प्रणाम किया, जहां एक महान भक्त की प्रतीक्षा पूल्ण हुई थी, और
26:24उन्हें सीता की खोज का मार्ग मिला था
26:28अपने आगे के मार्ग पर चलने के लिए कृत संकल्प होकर, दोनों भाई आश्रम से बाहर निकले, उनके मन में
26:35सीता को खोजने का अटल निश्चय था
26:39सूरज की किर्णे उनके मार्ग को प्रकाशित कर रही थी, मानो स्वयं प्रकृती भी उनके धर्मप्रायन कार्य में सहायक हो
26:47रही हो, उन्हें रिश्यमुख परवत की ओर ले जाते हुए
26:51घने वन के हृदय में, जहां सदियों की प्रतीक्षा सांस ले रही थी, श्रीराम और लक्षमन एक अवर्णनिय शांती की
26:59ओर अग्रसर हुए, उनके चरण जैसे किसी अद्रिश्य मार्ग दर्शक द्वारा निर्देशित थे
27:06दूर कहीं, अपनी कुटिया में बैठी, वृद्ध शबरी की आखें आकाश की ओर टिकी थी, मानो उनके प्रान सदियों से
27:14एक ही दिव्यच्षवी की प्रतीक्षा में लीन हो
27:18जैसे ही श्री राम और लक्षमन आश्रम की परिधी पर पहुँचे, उनके पवित्र आगमन से वातावर्ण में एक अध्भुत सुगंधित
27:26उर्जा का संचार हो उठा
27:29वृद्ध शबरी की कुटिया में सदियों की तपस्या और एकनिष्ठ भक्ती ने एक अग्रिश्य जोती प्रजवलित कर रखी थी, जो
27:37उनके आराध्य के आगमन का संकेट दे रही थी
27:42श्री राम और लक्षमन ने उस पवित्रस्थल में प्रवेश किया, जहां एक महान भक्त की आत्मा अपने आराध्य की प्रतीक्षा
27:50में युगों से जागरित थी, और प्रत्येक पत्ती मानों उनके आगमन का जयगोश कर रही थी
27:57श्री राम को अपनी कुटिया के द्वार पर देखकर शबरी का हरिदय आनंद से उचल पड़ा, उनकी आखों से अविरल
28:04अशुरुधारा बहन निकली और उनके होठोन पर भक्तिपून जय श्री राम का स्वर गूंध उठा
28:11पुल्कित होकर शबरी ने श्री राम और लक्षमन का स्वागत किया, उन्हें अपने आश्रम के भीतर आने का निवेदन करते
28:19हुए और उनके पवित्र चर्णों को स्पर्श करने की अगमय इच्छा के साथ
28:24शबरी की कुटिया अत्यंत साधारन होते हुए भी, उनकी अटूट भक्ति से इतनी पवित्र हो गई थी कि वहा स्वर्गिक
28:32शान्ती और दिव्य उपस्थिती का अनुभव हो रहा था
28:37अपने आराध्य की थकान मिटाने के लिए शबरी ने तुरंत वन से एकत्र किये गए ताजे, जंगली बेरों को एक
28:44साधारन पात्र में सजाना शुरू कर दिया
28:48यह सुनिश्चित करने के लिए कि उनके प्रभू को केवल सर्वोत्तम और मीठे बेर ही मिलें, शबरी ने प्रत्येक बेर
28:55को अत्यंत सावधानी से चखा, उनके चहरे पर भक्ती और चिंता का अध्भुत मिश्रण था
29:02उसके गालों पर जर्नों की तरहा आसू बह रहे थे, फिर भी उसने अपने आराध्य के लिए सबसे मधुर फल
29:09सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक बेर को चखने का अपना पवित्र कार्य जारी रखा
29:15चखे हुए बेरों से भरा पात्र भले ही वह भौतिक रूप से जूठा था, परंतु भक्ती के अमरित से भरा
29:22होने के कारण वह स्वयं भग्वान के लिए एक परम पावन भोग बन गया था
29:28अत्यंत विन्मरता और प्रेम से भरी, शबरी ने वह जूठे बेरों का पात्र श्रीराम को अर्पित किया, उनकी आखें अपने
29:36प्रभु की प्रतिक्रिया जानने के लिए उच्सुक थी
29:40श्रीराम ने शबरी की निस्वार्थ भक्ती को समझा, उनके मन में कोई संकोच नहीं था और उन्होंने प्रेम तथा सम्मान
29:48से उन जूठे बेरों को सहर्ष स्विकार कर लिया
29:52दिव्यता से भरे श्रीराम ने एक-एक बेर को ग्रहन किया, प्रत्येक निवाला उनके लिए केवल फल नहीं, बलकि शबरी
30:00की अटूट भक्ती और निर्मल प्रेम का प्रसाद था
30:04जैसे ही श्रीराम ने बेरों को ग्रहन किया, आश्रम की हवा में एक मधुर, स्वर्गिय सुगंध फैल गई और एक
30:12अध्भुत दिव्य प्रकाश ने पूरे वातावर्ण को आच्छा दित कर लिया
30:17श्रीराम के दर्शन और उनके स्पर्ष मात्र से शबरी का वृद्ध शरीर एक तीवर आंतरिक प्रकाश से प्रकाशित हो उठा,
30:26उसकी आत्मा मोक्ष की ओर अग्रसर होने लगी
30:30श्रीराम ने अपने करुणापून हाथों से शबरी को आशिरवाद दिया, उनके चहरे पर एक हलकी मुस्कान थी जो उनकी भक्ती
30:38की पराकाश्ठा को दर्शा रही थी
30:41एक स्वर्गिय प्रकाश पुंज में विलीन होती हुई, शबरी की आत्मा ने अपने भौतिक दे का त्याग किया, सीधे वैकुंठ
30:49धाम की ओर प्रस्थान करते हुए
30:52शबरी के शरीर त्याग के उपरांथ आश्रम में एक गहन शांती और दिव्य उर्जा व्याप्त थी, मानो प्रकृती भी इस
31:01महान भक्त की मोक्ष प्राप्ती का सम्मान कर रही हो
31:05शबरी आश्रम की दिव्य शांती को पीछे छोड़ते हुए, श्रीराम और लक्षमन ने रिश्यमुप परवत की ओर अपनी यात्रा पुनहा
31:13आरंभ की, उनके कदमों में एक अटूट संकल्प था
31:18वन की गहन शांती में भी, श्रीराम के हृदय में सीता के विरह की पीड़ा एक अंतरधारा के समान बह
31:25रही थी
31:27लक्षमन अपने अग्रज की मनोच्षा को समझते हुए, चुपचाप उनके पीछे चलते रहे, उनकी द्रिड उपस्थिती ही श्रीराम का सबसे
31:35बड़ा संबल थी
31:38जैसे जैसे वे आगे बढ़ते गए, वन का मार्ग घना होता गया, और रिश्यमुक परवत की भव्यचाया क्षितिच पर धीरे
31:45धीरे आकार लेने लगी
31:48सूर्य की किरने घने पत्तों से च्छनकर भूमी पर स्वर्णिम पैबंद बना रही थी, जैसे प्रकृती स्वय उनकी पवित्र यात्रा
31:56का मार्ग प्रकाशित कर रही हो
31:59श्रीराम के नेत्रों में एक नई चमक थी, उन्हें आभास हो रहा था कि सीता तक पहुँचने का कोई महत्वपून
32:07सूत्र इसी दिशा में छिपा है
32:10उनके अंतर्मन में एक अलौकिक उर्जा का संचार हुआ, जिसने उनकी थकान और विरह की वेदना को क्षन भर के
32:18लिए विस्मृत कर दिया
32:20रिश्यमूग की ओर प्रत्येक बढ़ते कदम के साथ, श्रीराम को लगा जैसे नेती स्वयं उनके मार्क को प्रशस्त कर रही
32:28है
32:29रिश्यमूग परवत जो अपने अलौकिक सौंदर्य और मतंग रिशी के श्राप के लिए विख्यात था, अब उनकी द्रिश्टी में पूर्णता
32:38स्पष्ट था
32:40लक्ष्मन ने स्मरण किया कि मतंग रिशी के श्राप के कारण कोई भी पापी उस परवत पर वास नहीं कर
32:46सकता था, जिससे इसकी पवित्रता और बढ़ जाती थी
32:51श्रीराम ने रिश्यमूग की ओर देखा, उनके चहरे पर एक शांतिपून आत्म विश्वास ज़लक रहा था, यह जानते हुए कि
32:59वे एक पवित्र उद्देश के लिए बहां जा रहे हैं
33:04परवत से आती शीतल, शुद्ध हवा ने उनके हृदय में एक नई उर्जा और आशा का संचार किया, मानो परवत
33:12स्वयं उनका स्वागत कर रहा हो
33:15वे एक संकीर्ण पहाडी रास्ते पर चड़ते गए, जिसके दोनों और प्राचीन व्रिक्ष और रंग बिरंगे फूल खिले थे, जो
33:23इस पवित्रस्थल की शोभा बढ़ा रहे थे
33:27श्रीराम के मन में सीटा के प्रती प्रेम और उन्हें पुनह प्राप्त करने की उतकट इच्छा अब और भी तीवर
33:33हो चुकी थी
33:35उनके प्रत्येक कदम में सीटा को ढूंधने का द्रिड संकल्प और एक नई आशा की उर्जा समाहित थी
33:43परवत की चोटी पर उन्हें कुछ असपष्ट आकरितिया दिखी जैसे कोई उनकी प्रतीक्षा कर रहा हो जिससे उनके भीतर की
33:51उचसुकता बढ़ गई
33:54जैसे जैसे वे उपर चड़ते गए नीचे का विशाल वन और दूर क्षितिच पर फैली धर्ती का नजारा उनके सामने
34:01विस्तृत होता गया
34:03लक्षमन ने श्रीराम की ओर देखा उनके चहरे पर उनके अगरज के अटूट विश्वास की गहरी चाप थी
34:11श्रीराम ने एक गहरी सास ली रिश्यमूग की पवित्र उर्जा को अपने भीतर समाहित करते हुए और उनके कदम अब
34:20और भी द्रिड़ता से आगे बढ़ रहे थे
34:23रिश्यमूग परवत के शीर्ष पर एक नई आशा का सूर्योदय हो रहा था जो सीता की खोज में एक महत्वपून
34:31मोड का संकेत दे रहा था
34:34श्रीराम और लक्षमन के प्रतेकपग पर रिश्यमूग परवत की प्राचीन शिलाएं उनके आगमन का स्वागत कर रही थी
34:41मानो सदियों से किसी दिव्य मिलन की प्रतीक्षा में हो
34:46रिश्यमूग के सरवोच शिखर पर किशकिंधा के निशकासित राजा सुग्रीव ने अपने वानर मंतरियों के साथ
34:53दूर से आते उन दो तेजस्वी धनुर्धरों को देखा उनके हृदय में एक अज्यात आशंका घर कर गई
35:01भयभीत सुग्रीव ने अपने मंतरियों की ओर मुड कर एक गहन द्रिश्टी डाली उनके चहरे पर बाली के प्रती उनके
35:08चिरस्थाई भय की छाया सपष्ट दिखाई दे रही थी
35:13उनके मस्तिश्क में विचारों का एक बवंडर उठ रहा था कि कहीं ये बाली द्वारा भेजे गए जासूस तो नहीं
35:20जो उनकी छिपने की जगह का पता लगाने आये हूँ
35:25रिश्यमूग परवत की शान्त वादिया जो कभी उनके लिए सुरक्षित थी अब उन अंजान आगंतुकों के कारण भय और अनिश्चित्ता
35:33से भर गई थी
35:35सुग्रीव ने अपने मंत्रियों से परामर्ष किया उनकी आवाज में चिंता और आदेश का मिश्रण था मित्रों ये कौन हो
35:43सकते हैं जो इस पवित्र रिश्यमूग पर जहां बाली का श्राप प्रवेश नहीं कर सकता प्रकट हुए है
35:51एक मंत्री ने संशय से कहा महाराज उनकी वेश्भूशा तपस्वियों जैसी है किन्तु उनके कंधों पर दिव्य धनुष और तरकश
36:00देख संदे होता है कि वे साधारन तपस्वी नहीं
36:05सुग्रीव का हरिदय तेजी से धड़क रहा था बाली के कठोर शासन और उसके अजे बलकी स्मृती उसके हर विचार
36:13को घेर रही थी
36:15ऐसे विकट समय में जब सभी मंत्री भयभीत थे पवनपुत्र हनुमान ने शांत और आत्म विश्वास से आगे बढ़कर कहा
36:23महाराज मुझे आग्या दें मैं जाकर उनकी वास्तविक पहचान का पता लगाऊंगा
36:30सुग्रीव ने हनुमान की ओर देखा उनकी आखों में आशा की एक किरन चमकी क्योंकि उन्हें हनुमान की असाधारन बुद्धी
36:39और निष्ठा पर अटूट विश्वास था
36:41ठीक है हनुमान सुग्रीव ने कहा किन्तु सतर्क रहना अपनी अध्भुत मायावी शक्ती से उनकी पहचान सुनिश्चित करना और उनके
36:51इरादों को समझना
36:54हनुमान ने अपने स्वामी को नत्मस्तक किया उनके भीतर एक दिव्य उद्देश की पुकार गूंज रही थी और वे अपनी
37:01नियती की ओर एक कदम बढ़ाने को तैयार थे
37:05पलक जपकते ही हनुमान ने अपना विशाल रूप त्याग कर एक सामान्य ब्राहमन का वेश धारण किया और रिश्यमुक परवत
37:14से श्रीराम और लक्षमन की ओर उडान भरी
37:18जैसे ही वे रिश्यमुक की धलानों पर आगे बढ़ रहे थे श्रीराम और लक्षमन ने आकाश में एक अध्भुत आकरिती
37:26को अपने करीब आते देखा
37:29हनुमान अपने ब्राहमन वेश में वायुवेग से उनके समीप पहुँचे और अत्यंत विनमर्ता से भूतल पर उतर गए उनके दिव्य
37:37आगमन की कोई आहट नहीं हुई
37:41दोनों भाईयों ने उस तेजस्वी ब्राहमन को विस्मय और सम्मान के साथ देखा उनके चहरे पर जिग्यासा की एक स्पष्ट
37:49छाप थी
37:51ब्राहमन रूप में हनुमान ने विनमर्ता से हाथ जोड़ कर उनका अभिवादन किया उनके शब्दों में सौमयता और बुद्धी का
37:59संगम था
38:00श्री राम ने उस ब्राहमन की शांत और सन्यमित वानी को ध्यान से सुना उनकी आखों में एक गेहन चिंतन
38:08और अंतरग्यान जलक रहा था
38:10हे धनुर्धरो हनुमान ने मधुर स्वर में कहा आप कौन हैं इस रिश्यमूग की पवित्र भूमी पर किस उद्देश से
38:18आये हैं और आपके चहरे पर यह चिंता किस कारण
38:23श्रीराम ने उस ब्राहमन की ओर देखा उनकी आखों में सीता की खोज की पीडा और एक नई आशा का
38:30मिशृत भावस पष्ट दिखाई दे रहा था
38:33श्री राम ने अपनी गहरी पीडा और असीम धैर्य को समेटते हुए उस ब्राहमन की ओर देखा, जिनके मुख पर
38:41अध्भुत शांती और प्रज्या का तेज जलक रहा था
38:45उनके मौन में भी एक अटूट कथा छिपी थी, जिसकी वेदना रिश्यमुक के शांत वातावर्ण में भी स्पष्ट महसूस की
38:53जा सकती थी
38:55एक लंबी सांस लेकर श्रीराम ने अपने कंट से शब्दों को मुक्त किया, जो उनके हृदय के अथा दोहक को
39:03लेकर बहचले थे
39:05उन्होंने अपनी व्यथा सुनाना आरंभ किया, हर शब्द सीता के विरह में डूबा हुआ, जैसे उनके हृदय का रक्थी शब्दों
39:13में ढलकर बह रहा हो
39:16हनुमान ब्राहमन वेश में श्रीराम की प्रत्येक बात को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे, उनके चहरे पर करुणा और गेहन विचार
39:24का भाव स्पष्ट था
39:27श्रीराम ने बताया की कैसे उनकी पत्नी, जनकनन्दिनी सीता का रावन ने छल से हरण कर लिया है और वे
39:34उन्हें ढूंडने की अथक यात्रा पर निकले हैं
39:39लक्षमन अपने बड़े भाई के हर शब्द में नहित पीडा को महसूस करते हुए अपनी मुठी भीच रहे थे, उनकी
39:46आखों में प्रतिशोध की अगनी जल रही थी
39:50रिश्यमूग की पवित्र हवा में श्रीराम के दुहक की गूंच फैल रही थी, जिसने उस परवत के कणकन को भी
39:57उदासी से भर दिया था
40:00श्रीराम ने अपने वनवास और फिर पंच्वटी में हुए घटनाओं का विवर्ण दिया, कैसे शूर्पनखा के अपमान ने रावन को
40:07प्रतिशोध के लिए उकसाया
40:10हनुमान का हृदय श्रीराम की व्यथा सुनकर द्रवित हो उठा, उनके ब्राह्मन वेश के भी तर भी एक महान योध्धा
40:18का करुणा से भरा हृदय धड़क रहा था
40:21श्रीराम ने मारीज के स्वर्ण म्रिग के छलावे और सीता के अफरण की दारोन गाथा सुनाई, उनके शब्दों में उसक्षन
40:29का सारा भय और निराशा निहित थी
40:33जैसे जैसे श्रीराम ने अपने दुहखद अनुभव साजा किये, रिश्यमूग के वातावर्ण में एक गहरा, शांत विशाद छा गया, मानो
40:41प्रकृती भी उनके दर्ग में शरीक हो रही हो
40:45सहसा हनुमान का ब्राह्मन वेश विख्टित होने लगा, और उनके भीतर से एक तेजस्वी वानर का अध्भुत रूप प्रकट होने
40:54लगा, जो पवनपुत्र की शक्ती का प्रतीक था
40:58श्रीराम और लक्षमन ने विस्मय से उस परिवर्तन को देखा, उनकी आखों में अचरज और एक नई प्रबल आशा का
41:06संचार हो रहा था
41:08पूरे रिश्यमूक में एक दिव्य उर्जा का संचार हुआ, जब हनुमान ने अपने वास्तविक, शक्तिशाली और तेजस्वी रूप को पूर्णता
41:17प्रकट किया
41:19उनके विशालकाय रूप से निकली उर्जा ने रिश्यमूक के हर कोने को प्रकाशित कर दिया, और हवा में एक अद्भुत
41:26शक्ती का अनुभव किया जा सकता था
41:29पवन पुत्र हनुमान ने अत्यंत विनमर्ता से श्रीराम के चर्णों में अपना मस्तक जुकाया, अपनी सेवा और निष्ठा अर्पित करते
41:38हुए
41:39श्रीराम ने अपनी भुजाय उठा कर हनुमान को गले लगाया, जैसे एक पिता अपने बिछ़़े हुए पुत्र को पुनह प्राप्त
41:47कर रहा हो, यह मित्रता का एक नया अध्याय था
41:52हनुमान ने शपतली की वे सीता माता की खोज में श्रीराम की हर संभव सहायता करेंगे और उनके मुख पर
41:59द्रिड संकल्प की आभाथी
42:02इस प्रथम भेंट ने एक ऐसे शक्तिशाली गठ बंधन की नीम रखी जो भविश में अधर्म पर धर्म की विजय
42:10का मार्ग प्रशस्त करने वाला था

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