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गरुड़ पुराण के इस भीषण अध्याय में, भगवान विष्णु गरुड़ को उन अदृश्य पापों से अवगत कराते हैं जो चोरी, कपट, और धोखे से उत्पन्न होते हैं। जानिए कैसे एक छोटी सी चोरी भी आत्मा को ले जा सकती है भयानक नरकों में, जहाँ हर वस्तु की कमी और भीषण यातनाएं इंतजार करती हैं। इस एपिसोड में पवित्र वस्तुओं, गुरुजनों और असहायों से की गई चोरी के भयानक परिणाम, झूठी गवाही और व्यापार में कपट से होने वाले नरक भोग, और असहायों के शोषण से मिलने वाले कष्टों का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह एपिसोड हमें कर्मों के सूक्ष्म और अटूट नियमों से परिचित कराता है, जहाँ हर गलत कर्म का हिसाब यमलोक में चुकाना ही पड़ता है। अंत तक देखें और जानें कैसे इन पापों से बचें और एक धर्मपरायण जीवन जीकर मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ें। #गरुड़पुराण #गरुड़पुराण_Ep42 #कर्मफल #नरकयात्रा #चोरीकापाप #कपट #धोखा #विष्णु #यमलोक #मृत्यु_के_बाद #आध्यात्मिक_ज्ञान #हिंदू_धर्म #पौराणिक_कथाएं #Karma #Afterlife #Sins #GarudaPuranaHindi
Transcript
00:00भगवान विश्णू ने गरूर से कहा कि केवल महापाप ही नहीं, बलकि मनुष्य के छोटे-छोटे कपट और छुपे हुए
00:07उपपाप भी उसकी आत्मा को नर्ग के भयानक द्वारों तक ले जाते हैं।
00:13इस रहस्यमई ज्ञान को सुनकर जिग्यासु गरूर ने अत्यंत विनीत भाव से प्रभू से पूछा की वे कौन से सुक्ष्म
00:20कर्म हैं, जिन्हें मनुष्य साधारन समझ कर अंदेखा कर देता है।
00:25श्रीहरी ने समझाया कि दूसरों की धरोहर को हडपना, लालचवश चोरी करना और छल से किसी की संपत्ती पर अधिकार
00:34जमाना ही उपपापों की श्रेणी में प्रथम स्थान रखता है।
00:39जब कोई मनुष्य व्यापार में कपटपूर्ण तराजू का उपियोग कर ग्राहकों को ठकता है, तब उसका वह अनैतिक धन उसके
00:47विनाश का कारण बन जाता है।
00:51वैकुंठ के परम पवित्र वातावर्ण में भगवान विश्नु ने विश्वास घात के भयंकर परिणामों को बताते हुए कहा कि किसी
00:59का भरोसा तोड़ना सबसे बड़ा अध्रिश्य पाप है।
01:03प्रभु ने आगे कहा कि निर्बल और असहाय लोगों का शोशन करना तथा उनके पसीने की गाढ़ी कमाई को हडप
01:11लेना साक्षात यमराज के क्रोध को आमंतरन देना है।
01:15जब एक धनी और शक्तिशाली व्यक्ति किसी भूखे मजदूर को उसकी मजदूरी देने से इनकार करता है, तो उसके घर
01:23की सुक्षान्ती सदा के लिए नश्ट हो जाती है।
01:28कप्ती और शोशक मनुश्यों के द्वारों से सुख और समरिध्धी की अधिश्ठात्री देवी माता लक्ष्मी सदा के लिए रुष्ट होकर
01:35प्रस्थान कर जाती है।
01:38वैकुंठ के दिव्यक्षीर सागर के तटपर स्थित होकर स्रिष्टी के पालनहार ने कर्मों के उस सुक्ष्म जाल का वर्णन किया
01:46जो दिखाई तो नहीं देता, किन्तु अत्यंत सुद्रिड होता है।
01:51भगवान विश्णु ने गरूर को सचेत करते हुए बताया कि न्यायालय या समाज में किसी निर्दोष के विरुद्ध जूठी गवाही
01:59देना आत्मा को अंधकार्मय नर्क में धकेल देता है।
02:04जब कोई लोभी मनुष्य चंद्स्वर्ण मुद्राओं के लालच में आकर निर्दोष व्यक्ती के खिलाफ जूठी गवाही देता है, तो वह
02:12अपने कुल के पुन्यों का भी विनाश कर लेता है।
02:16असत्य और कपट से युक्त वानी बोलने वाले मनुष्य की जीव यमलोक में दहकते हुए अंगारों और विशैले सर्पों के
02:24समान पीडादायक बन जाती है।
02:27व्यकुंट की अलौकिक आभा में गरुड ने ध्यानपूर्वक सुना की कैसे मनुष्य की छोटी-छोटी वासनाएं उसके अंतहकरण को पूरी
02:36तरह अपवित्र कर देती हैं।
02:39श्रीहरी ने अनाज के संकट और अकाल के समय अन्न का अवैध भंडारन करने वाले व्यापारियों के महापाप का अत्यंत
02:47गंभीर शब्दों में परिचय दिया।
02:49जब कोई निर्दई व्यापारी भूखी जनता की चीख पुकार को अनसुनाकर अधिक लाब कमाने के लिए अपने अन्न भंडारों को
02:58बंद रखता है तो वह साक्षात काल का भागी बनता है।
03:03ऐसे क्रूर और लोगी मनुश्यों के संचित किये हुए अन्न के दाने नर्ग की अगनी में तप्त लोहे के गोलों
03:09में परिवर्तित होकर उन्हीं को खाने पड़ते हैं।
03:14वैकुंट की स्वन आभा के मध्य भगवान विश्नु ने स्पष्ट किया कि मृत्यू के समय पश्चाताप की अगनी में जलने
03:21वाले पापी को यमदूत अत्यंत क्रूरता से अपने पाश में बांधते हैं।
03:27प्रभु के इन वचनों को सुनकर परम ज्ञानी गरूर ने अत्यंत विस्मय और श्रद्धा के साथ अपने दोनों हाथ जोड़कर
03:35श्रीहरी के चर्णों में प्रणाम किया।
03:38कपट और धोखे से जीवन जीने वाले उन पापी जीवों के प्राण हरने के लिए भयानक यमदूत अपने हाथों में
03:45लोहे के जलते हुए पास और गदा लेकर ततपर खड़े रहते हैं।
03:51अत्र न्याय और धर्म के शाश्वत चक्र के समक्ष हर जीव के सुक्षम पापों का लेखा जोखा किया जाता है
03:58और अधर्म का अंधकार पूरी तरहे छिन्न भिन्ध हो जाता है।
04:03भगवान श्रीहरी विष्णु ने अपने परम भक्त गरोर को स्तेने अर्थात चोरी के महापाप के विशय में बताते हुए कहा
04:11कि जो मनुष्य कपट से दूसरों के धन का हरन करता है देवी लक्षमी उसका सदा के लिए परित्याग कर
04:17देती हैं।
04:20परमेश्वर के इन वचनों को सुनते हुए पक्षी राज गरोर ने अत्यंत विस्मय से अपने हाथ जोड लिये और प्रभु
04:27ने सोने तथा चांदी की चोरी करने वाले पापियों के भयानक अंत का वर्णन प्रारंभ किया।
04:34अयहपान नामक उस भयानक नरक में यमदूत उन पापियों को पकड़ लेते हैं जिन्होंने अपने जीवनकाल में सुवर्ण अथवा बहुमूल्य
04:42धातूओं की चोरी करके दूसरों को दरिद्र बनाया था।
04:46चोरी किया गया वही सोना और चांदी नरक की भीशन अगनी में पिघल कर खौलते हुए तरल में बदल जाता
04:53है, जिसे यमदूत बलपूर्वक उन तडपते हुए पापियों के मुख में उडेल देते हैं।
05:00इसके पश्चात भगवान विश्णू ने गरुड को अन्न और अनाज की चोरी करने वाले दुराचारियों के भीशन गंतव्य के रूप
05:08में क्रिमिभोजन नरक का मार्ग दिखाया।
05:11प्रभू ने समझाया कि जो मनुष्य भूखों का निवाला चीनते हैं और अन्न का अवैध भंडारण कर दूसरों को भूखा
05:19मारते हैं। वे देवी अन्न पूर्णा के शाप के भागी बनते हैं।
05:24क्रिमिभोजन नरक के उस दुरगंधयुक्त दलदल में गिरे हुए उन पापियों के शरीरों को लाखों विशैले और चमकते हुए कीडे
05:32अत्यंत क्रूर्ता पूर्वक धीरे-धीरे कुतरते रहते हैं।
05:37संसार में दूसरों का भोजन चुराने वाले वे जीव वहां अन्न के एक-एक दाने के लिए तरस्ते हैं। किन्तु
05:44उन्हें केवल असहनिय भूख और अत्यंत घ्रेनित कीडों का भक्षण ही प्राप्थ होता है।
05:51ततपश्चात श्रीहरी ने जल और मूल्यवान पे पदार्थों की चोरी करने वाले पापियों के दंड का वर्णन करते हुए पूयोद
05:59नामक अत्यंत भयावह नरक की ओर संकेत किया।
06:02गरुर ने अत्यंत व्याकुल होकर पूछा की जल जैसी जीवंदायनी वस्तु को चुराने या उसे प्रदूशित करने वाले मनुश्यों को
06:11यम्राज किस प्रकार का दंड देते हैं।
06:15प्रभु ने बताया कि पूयोद नरक की उस घेनित नदी में प्यास से व्याकुल चोरों को पीने के लिए केवल
06:21पीप, मूत्र और रक्ट से युक्त अत्यंत दुरगंधित गर्म कीचड ही मिलता है।
06:28कंठ में लगी भीशन अगनी को शांत करने के प्रयास में जब वे उस अशुद्ध जल को पीते हैं, तो
06:34उनकी अंतडिया अंदर ही अंदर जल कर राख होने लगती हैं।
06:40इसके बाद नारायन ने भूमी, संपत्ती और दूसरों के घरों पर अवैध कबजा करने वाले महापापियों के लिए आरक्षित सुकरमुख
06:49नरक का भीशन द्रिश्य प्रस्तुत किया।
06:52विश्नुजी ने अत्यंत कठोर स्वर में कहा कि जो बलशाली मनुष्य निर्बलों की भूमी हडपते हैं, वे अपने इस कृत्य
07:00से अपने संपून पुन्यफलों का समूल विनाश कर बैठते हैं।
07:06सुकरमुख नरक में सुवर के मुख वाले भयानक यमदूत उन भूमी चोरों को पकड़ कर भारी और तपते हुए विशाल
07:13काले पत्थरों के बीच रखकर गन्ने की भांती पीस डालते हैं।
07:18दूसरों की जितनी भूमी का कोई अवैध रूप से उपभोग करता है, वह आत्मा उतने ही वर्षों तक उस भयानक
07:26नरक में पिसकर असहनिय यातनाएं सहन करती हैं।
07:31फिर नारायन ने उनकरूर मनुश्यों के विशय में बताया जो गायों, घोडों और अन्यमूख पशुओं की चोरिया तसकरी करके उन्हें
07:39कष्ट पहुँचाते हैं, जिसके लिए वे रौरव नरक के गर्थ में गिरते हैं।
07:45भगवान विश्णू ने स्पश्ट किया कि मूख और असहार प्राणियों के अधिकारों का हनन करने वालों पर प्रकृती का शाश्वत
07:52नियम कभी दया नहीं दिखाता।
07:55रौरव के उस धधकते हुए अंधेरे गर्थ में पशुओं की चोरी करने वाले उन पापियों को भयानत जलते हुए सिंगों
08:03वाले प्रेत पशु खदेडते हैं और पैरों तले बेरहमी से रौंदते हैं।
08:09अंतर नरक की इन भीशन यातनाओं को भोगने के बाद वे पापी जीव मृक्यों लोक में अत्यंत दरिद्र अपाहिज मनुष्य
08:17अथवा निक्रिष्ट पशु योनियों में जन्म लेकर जीवन भर भटकते हैं।
08:23भगवान विश्णू समझाते हैं कि जो मनुष्य मंदिरों, देवप्रतिमाओ, अनाथों या असहाय विध्वाओं की धनसंपत्ती का हरण करते हैं, वे
08:32सीधे पूयोद, नामक, अत्यंत, घेनित और भयावा नरक में गिरते हैं।
08:38विस्मय और करुणा से भरे पक्षी राज गरुड अपने पंखों को समेट कर भगवान नारायन से इस घोर पाप की
08:45विभीशिका और इसके सुक्ष्म प्रभावों के बारे में पूछते हैं।
08:51पवित्र गर्भग्रेह की दिव्य आभा को कलंकित करते हुए, लाल्ची मनुष्य देवमूर्तियों के बहुमूल्य स्वर्ण आभूशनों और भक्तों द्वारा अर्पित
09:00की गई पवित्र भेंट को निरलजिता से चुरा लेते हैं।
09:04इस महापाप के एक्षण ही धर्म का प्रकाश बुझ जाता है और उस पापी की आत्मा पर पूयोद नरक की
09:12अंथी न्यातनाओं की अमिट छाप अनकित हो जाती है।
09:34जब भूमी पर गिरती है तो वह पापी के लिए वजर के समान विनाशकारी बन जाती है।
09:41उस नदी की असहनिय दुरगंद से छटपटाते हुए पापीयों को भयानक यमदूत अपने त्रिशूलों से छेदते हैं और उन्हें वही
09:49सड़ा हुआ मल और पीक पीने को विवश करते हैं।
09:54अनाथ बच्चों के मुख का ग्रास चीनने वाले क्रूर मनुश्यों के सुक्ष्म शरीर को नरक की अगनी भीतर से जलाकर
10:01भस्म करने लगती है।
10:04पूयोद के विशाल तपते हुए लोहे के पिंजरों में बंध होकर पापी जीव सदियों तक रोते और चिलाते हैं, जहां
10:12हवा भी केवल तीखी राख और धुआ लेकर आती है।
10:17गरुड अपने विस्मित नेत्रों से नारायन की ओर देखते हुए पूछते हैं कि क्या इन अभागे जीवों को इस यातनापूर्ण
10:24नरक से कभी मुक्ती मिल पाती है।
10:28मृत्यो लोक में किसी लाचार विध्वा की एक मात्र कुटिया और उसकी बची-खुची जमापूंजी को कपट से हडपते हुए
10:36पापी अपने विनाश की पटकता स्वया लिखता है।
10:41धोखे से चीनी गई वह संपत्ती उस पापी के कुल के लिए एक महाविनाशकारी कालसर्प बन जाती है जो उसके
10:48संपूर्ण वंश के पुन्यों को डस लेता है।
10:52नरक के उस दुरगमगर्थ में पवित्र ब्राहमनों की भूमी और गौधन का अफ़रन करने वाले पापी अंगारों के बिच्छोने पर
11:00तडपते हैं।
11:03जगतपालक भगवान विश्नुगरूर को बताते हैं कि इन घोर पापों के प्रभाव से आत्मा का ओज और दैविय संरक्षन पूरी
11:11तरह समाप्थ हो जाता है।
11:14भूखे और प्यासे तडपते हुए इन पापियों को पूयोद नरक में केवल सड़े हुए मास के लोथडे और कीडों से
11:21भरा हुआ वीभत्स भोजन ही प्राप्थ होता है।
11:26पवित्र मंत्रों और देवताओं का अपमान करने वाली वह वानी नरक के अंधकार में एक मुख क्रंदन बनकर विलीन हो
11:33जाती है।
11:35हजारों वर्षों की नरक यातना भोगने के पश्चात ये पापी जीव मृत्यो लोग के अत्यंत निर्जन और बंजर स्थानों में
11:43जन्म लेने को बाध्य होते हैं।
11:46भगवान माधव रहस्यो धाटन करते हैं कि वे पापी जीव पुनर्जन में चेतनाशून्य व्रिक्ष अथवा अत्यंत दुर्बल उपेक्षित प्राणी बनते
11:56हैं।
11:57उस निर्जन भूमी पर एक सूखे और कांटेदार व्रिक्ष के रूप में खड़ा रहकर वह जीव ग्रीश्म की प्रचंड धूप
12:05और शीत रितु के जंजावातों को मूख रहकर सहन करता है।
12:09इस प्रकार देवताओं और असहायों की संपत्ती चुराने वाले पापी को प्रकृती के शाश्वत नियम अन्तह मौन और यातनापूर्ण जीवन
12:19का भोग कराते हैं।
12:22भगवान नारायन अब गरूर को उस भयानक क्रीमि भोजन नरक का दर्शन कराते हैं, जहां केवल कपट और धोखे से
12:29जीने वालों को स्थान मिलता है।
12:33प्रभु विश्णु अत्यंत गंभीर स्वर में कहते हैं कि जो मनुष्य जीवन भर दूसरों को ठकता है और असत्य का
12:40आश्रय लेता है, उसका पतन निश्चित है।
12:44इस दलदल में वे पापी व्यापारी तडप रहे हैं, जिन्होंने जूठे तराजू और मिलावट के बल पर निर्दोशों की गाढ़ी
12:52कमाई हडप ली थी।
12:54धर्म का तराजू यहां पूरी तरह तूटकर इस विशैले की चड़ में विलीन हो जाता है, जो यह दर्शाता है
13:01कि छल से कमाया धन अंता विनाश ही लाता है।
13:06मीलों दूर तक फैला यह चमकीला हरा की चड़ उन अंगिनत आत्माओं की चीखों से गूंज रहा है, जिन्होंने सत्य
13:14की पीठ पर वार किया था।
13:17श्री हरी समझाते हैं कि न्यायालियों और सभाव में दी गई जूठी गवाही मनुष्य की आत्मा को सबसे गहरे अंधकार
13:24में धकेल देती है।
13:27भीशन रूप वाले यमदूत उन कप्टी जीवों की जीव को धधकते हुए लोहे के संडसों से खीच कर बाहर निकालते
13:35हैं, जिन्होंने जूठ से दूसरों का जीवन उजारा था।
13:39उनके मुख से निकले असत्य के शब्द यहां साक्षात रेंगते हुए विशैले कीडों का रूप ले लेते हैं, जो उनकी
13:46अपनी ही त्वचा को कुतरते हैं।
13:50इस दलदल के किनारों पर स्थित नुकीले काले पत्थरों से टकरा कर पापी जीव बार-बार गिरते हैं, पर उन्हें
13:57इस यातना से मुक्ती नहीं मिलती।
14:00पक्षी राज गरोर भाय और विस्मय से भर कर अपने विशाल पंखों को समेट लेते हैं और प्रभो की न्याय
14:07प्रियता के सामने नत्मस्तक होते हैं।
14:11उन पापियों को विवश होकर वही चमकीले और घिनोने कीडे खाने पड़ते हैं, जो उनके द्वारा बोले गए कपटपूर्ण वाक्यों
14:19के प्रतीक हैं।
14:21छलकपट से अरजित किया गया धन यहां सोने के सिकों से सीधे विशैले नागों में बदल कर उनहीं के शरीरों
14:29को डसने लगता है।
14:31इस दलदल के केंद्र में एक भयानक भवर उठता है, जो सबसे बड़े विश्वास घातियों और कप्टी मित्रों को अपनी
14:39गहराई में खींच लेता है।
14:42नारायन स्पष्ट करते हैं कि प्रकृती का यह कठोर नियम केवल दंड देने के लिए नहीं, बलकि आत्मा की शुद्धी
14:50और संतुलन के लिए है।
14:52इस नरक भोग के पश्चात, जब ये आत्माएं पुना मृत्यो लोक में जन्म लेती हैं, तो वे एक मूक और
15:00बहरे शिशु के रूप में अत्यंत दरिद्र घर में आती हैं।
15:04वह नवजात शिशु चाहकर भी अपने विचारों को वाणी नहीं दे पाता, क्योंकि पिछले जन्म के असत्य ने उसकी बोलने
15:13की शक्ती छीन ली होती है।
15:16दलदल के मध्य तूटे हुए सत्य के स्तंब इस बात के गवाह हैं, कि बिना सत्य के मनुष्य का संपूर्ण
15:23अस्तित्व ही ढह जाता है।
15:26जगनात महादेव के समान शांत परंतु द्रिड होकर बताते हैं, कि सत्य मेव जयते केवल एक वाक्य नहीं, अपितु ब्रहमांड
15:34का परम विधान है।
15:37पापी जीव रोते हुए अपनी आखों के सामने अपनी मायावी संपत्ती को इस जहरीले कीचड में सदा के लिए बिलीन
15:45होते देखते हैं।
15:47अंतर इस भयावह दलदल से सत्य का एक अत्यंत दिव्य और श्वेत कमल प्रस्पुटित होता है, जो यह संदेश देता
15:55है कि लाख छल के बाद भी विजय केवल सत्य की ही होती है।
16:01भगवान विश्नु गरूर को बताते हैं कि जो पापी अपने अधीन कार्य करने वाले असहाय सेवकों, श्रमिकों और निर्धनों का
16:09शोशन करते हैं, उन्हें सुकर्मुख नामक भयानक नरक में कठोर दंड दिया जाता है।
16:16परम्पिता नारायन अपने गरूर वाहन को करुणा और न्याय से भरे स्वर में समझाते हैं कि असहायों की चीक और
16:24उनके आसु ब्रह्मांड के सबसे शक्तिशाली पाप का निर्मान करते हैं।
16:29सुकर्मुख नरक में वे कठोर मालिक जिन्होंने गरीबों का पसीना और महंत का पारिश्रमिक छीन लिया था। भारी विशाल पत्थरों
16:38के नीचे पिस्ते हुए निरंतर पीडा से चीतकार करते हैं।
16:43गरीबों के बहे अश्रु की हर एक बूंद धर्म की तराजू पर पिघले हुए जलते तामबे की भाती भारी हो
16:50जाती है, जो शोशक के समस्त पुन्यों को भस्म कर देती है।
16:55श्री हरी आगे बताते हैं कि जो मनुष्य मूख और असहाय पशुओं पर करूर अत्याचार करते हैं, उन्हें क्रिमिभोजन नामक
17:04घ्रेनित और भयावह नरक कुंड में फेंक दिया जाता है।
17:08गरुर जी अत्यंत दुख और विस्मय के साथ भगवान से प्रश्ण करते हैं कि बेजुबान जानवरों के दर्द का प्रतिशोध
17:16भगवान किस प्रकार विधान में सुनिश्चित करते हैं।
17:21क्रिमिभोजन नरक के उस कीचड में पापी आत्माओं को नगन करके डाला जाता है, जहां लाखों विशैले और नुकीले कीडे
17:29उनके शरीर को निरंतर कुतरते रहते हैं।
17:33जिस पशु को किसी निर्दई मनुष्य ने लाठियों से पीट कर मार डाला था, उसकी आत्मा वहा एक विशाल छाया
17:40बनकर पापी को भयानक भय से आतंकित करती हैं।
17:45विश्नु पुरान और गरुर पुरान के अनुसार, भूखे और प्यासे सेवकों से काम करवाने वाले निष्ठुर लोगों के लिए अयहपान
17:53नामक जलता हुआ नरक निर्मित है।
17:57भगवान विश्नु का गंभीर स्वर गूंजता है कि अपने घर के सेवकों को भूखा रखकर स्वय मिश्ठान भोगने वाले कप्टी
18:05मनुष्य कभी प्रभू की क्रिपा प्राप्त नहीं कर सकते।
18:09अयहपान नरक में यमदूट पापी स्वामियों के मुह में जबरन खौलता हुआ पिघला ताबा और पिघला लोहा उडेलते हैं, जिससे
18:17वे अनंतकाल तक तडपते हैं।
18:21एक भूखे सेवक की खाली थाली में पड़ा एक भी अन्न का दाना पापी के लिए उस लोहे की गर्म
18:27जंजीर के समान बन जाता है, जो उसे नरक में बांधती है।
18:33पुयोद नामक नरक उस पापी का स्थान है, जो अपने आश्रितों और अनाथों की संपत्ती हडप कर उन्हें सडने के
18:40लिए छोड़ देता है।
18:43गरुर जी सिर जुका कर पूचते हैं कि हे प्रभु क्या ऐसे पापीयों को नरक भोगने के पश्चात प्रित्वी पर
18:50पुनह जन्म लेते समय भी दंड जेलना पड़ता है।
18:55पुयोद नरक के गंदे कुंड में गिरे पापीयों को वे आत्माएं खीचती हैं जिन्हें उन्होंने अपने जीवनकाल में असहाय बना
19:03कर तडपने के लिए छोड़ दिया था।
19:06काल चक्र का चक्र निरंतर घूमता है जहां इस जन्म का करूर धनवान अगले जन्म में एक दुर्बल बैल बनकर
19:13भारी गाड़ी खीचने के लिए विवश होता है।
19:17जो लोग दूसरों के अधिकारों को बलपूर्वक छीनते हैं वे मृत्यू के बाद कर्म की उस सीमा रेखा पर पहुँचते
19:25हैं जहां कोई धन या संबंध उनकी रक्षा नहीं कर सकता।
19:30भगवान श्रीहरी विश्नु अपने गरूर को सांत्वना देते हुए बताते हैं कि जो मनुष्य जीवन में दया, करुणा और सेवा
19:38का मार्ग चुनता है, वह इन भयानक नरकों से सदा मुक्त रहता है।
19:44नरक की भीशन यातनाए भोगने के उपरांत ये पापी प्रिथवी पर जन्मजात अपाहिज, असाध्य रोगों से पीडित मनुष्य अथवा बोज़ा
19:52ढोने वाले पशुओं के रूप में जन्म लेते हैं।
19:57गरूर पुरान का यह परम संदेश उद्गोशित करता है कि कमजोरों की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है, और किसी
20:04का हक मारना स्वय अपनी आत्मा को नरक में धकेलना है।
20:09भगवान श्रीहरी विश्णु ने शांत सुरमय वानी में गरूर से कहा कि जो मनुष्य अशुद्ध और निशिद्ध भोजन ग्रहेन करता
20:17है, उसकी आत्मा अत्यंत मलिन हो जाती है।
20:21हे पक्षिराज विशेश रूप से जब कोई ज्यानवान ब्राहमन मदिरा या अन्य निशिद्ध पेये का सेवन करता है, तो उसका
20:29समस्थ संचित पुन्य तत्काल भस्म हो जाता है।
20:33निशिद्ध वस्तूओं का उपभोग करने वाली आत्माएं अपनी चेतना खो बैठती हैं और उनका जुकाव धर्म से हटकर अधर्म के
20:42गहरे कुएं की ओर होने लगता है।
20:46जब मनुष्य अपवित्र अन्न से अपने शरीर का पोशन करता है, तो उसके द्वारा किये गए सभी धार्मिक अनुष्ठान और
20:54दान निश्फल हो जाते हैं।
20:57इस घोर पाप के कारण मृत्यू के पश्चात यमदूत उस जीवात्मा को घसीटते हुए भयानक अयहपान नामक नरक की ओर
21:05ले जाते हैं।
21:07नरक के उस भयानक ग्रिश्य को देखकर गरुड के पंक कामपने लगे और उन्होंने अत्यंत व्यथित होकर प्रभु के चर्णों
21:15में मस्तक जुका दिया।
21:18अयहपान नरक में क्रूर यमदूत उन पापियों को पकड़ कर उनके मुह में धधकती हुई पिघली हुई कांसे की धातु
21:25बलपूर्वक डाल देते हैं।
21:28यह भयंकर यातना पापी की अंतरात्मा को चीर देती है, क्योंकि जो मुख कभी पवित्र मंत्रों के लिए था, वह
21:36अब आग की लप्टों से जलता है।
21:39इसके अतिरिक्ट जो लोग यग्य और पूजा में अशुद्ध या बासी वस्तूओं का उप्योग करते हैं, उन्हें पुयोद नामक घेनित
21:47नरक में स्थान मिलता है।
21:50भगवान विश्णू ने गरूर को समझाया कि देवताओं और पित्रों को समर्पित की जाने वाली सामगरी अत्यंत शुद्ध और श्रध्धा
21:58से युक्त होनी चाहिए।
22:00पुयोद नरक में गिरे हुए उन पापियों को अत्यंत दुरगंध युक्त मलमूत्र और सडीधी घेनित वस्तूएं खाने पर विवश्किया जाता
22:09है।
22:10स्रिष्टी का यह अटल नियम है कि जैसा अन मनुष्य ग्रहेन करता है, वैसी ही उसकी बुद्धी बनती है और
22:18वैसा ही उसका भाग्य निर्धारित होता है।
22:22जो लोग दूसरों को धोखा देकर अशुद्ध भोजन परोस्ते हैं, वे अपने इस कृत्य से स्वय अपने कुल का विनाश
22:30का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
22:33गरुर ने अत्यंत जिग्यासा और भक्ती से पूछा कि है प्रभु सांसारिक माया के बीच रहते हुए मनुष्य शुद्धता की
22:41पहचान कैसे करे।
22:43श्रीहरी ने उत्तर दिया कि जो वस्तुएं प्रकृती द्वारा प्रदत हैं और जिनहें इमानदारी की कमाई से प्राप्त किया गया
22:51है, वे ही वास्तव में शुद्ध हैं।
22:55पवित्रता केवल बाहरी सफाई में नहीं, बलकि मन की निर्मलता और सात्विक विचारों में बस्ती है, जो आत्मा को पर्मात्मा
23:03से जोडती है।
23:05जदी कोई पापी बिना प्रायश्चित किये मृत्यू को प्राप्त होता है, तो उसका अगला जन्म अत्यंत दैनिय और कश्टकारी होता
23:14है।
23:15अशुद्ध भक्षन के पाप के कारण, जीवात्मा को पुनर्जन में जन्मजात असाध्य रोग, अंधापन या विक्रित अंगोवाला शरीर प्राप्त होता
23:24है।
23:25परंतु जो मनुष्य अपने पापों को स्विकार कर सच्चे मन से पश्चाताप करता है, उसकी आत्मा पुनह पवित्रता की ओर
23:34अग्रसर होने लगती है।
23:36गरुर पुरान का यह पावन अध्याय हमें सिखाता है कि भोजन और कर्म की शुद्धता ही मोक्ष और परमधाम वैकुंट
23:45की प्राप्ती का एक मात्र मार्ग है।
23:49हे खगेश्वर, अब मैं तुम्हें उन महापापों के विशय में बताता हूँ जो किसी के अटूट विश्वास को छलपूर्वक तोड़ने
23:57और दिये गए वचनों की पवित्रता को भंग करने से उत्पन होते हैं।
24:02भगवान विश्णु ने अपने परम भक्त गरोड की ओर देखते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में कहा कि संसार में विश्वास
24:10घात से बड़ा कोई दूसरा मानसिक आघात नहीं है।
24:15जो मनुष्य धर्म की साक्षी मान कर ली गई सार्वजनिक प्रतिग्याओं, व्यापारिक समझोतों या आपसी वचनों को अपने स्वार्थ के
24:23लिए निर्दैता पूर्वक तोर देते हैं। वे महापाप के भागी बनते हैं।
24:29ऐसे विश्वास धातियों को मृत्यू के पश्चात, यम्दूत, अत्यंत, भयंकर और तप्त लौह खंभों से घिरे रौरव नरक की घोर
24:37अंधकारमई गहराईयों में फैंक देते हैं।
24:41रौरव नरक का यह भयानक द्रिश अत्यंत विचलित करने वाला है, जहां चारों और केवल धधकती हुई काली अगनी और
24:49एकांत के भयानक विलाप की गूंच सुनाई देती हैं।
24:54गरुर ने आश्चर यचकित होकर प्रभु से पूछा कि क्या वचनों का यह उलंधन केवल मनुष्यों के बीच के संबंधों
25:01को ही प्रभावित करता है या इसका प्रभाव स्रिष्टी के अन्यनियमों पर भी पड़ता है।
25:08भगवान नारायन ने समझाया कि जब कोई मनुष्य किसी को जीवन भर साथ निभाने का वचन देकर बीच राह में
25:16छोड़ देता है तो वह आक्मा के स्तर पर एक गहरा घाव पैदा करता है।
25:22नरक के इस विशेश भाग में विश्वासघात करने वाले अपराधियों को अत्यंत एकांत और भयानक सामाजिक तिरसकार की असहनिय मानसिक
25:31वेदना भोगनी पड़ती है।
25:34इस नरक में यमराज के भयानक दूत उन पापी आत्माओं को लगातार यह स्मरण कराते हैं कि कैसे उन्होंने प्रित्वी
25:42पर मासूमों के भरोसे का गला घोंटा था।
25:46नारायन की आखों में इस सत्य को बताते हुए एक गहन करुणा और न्याय की कठोर्ता की चमक एक साथ
25:53दिखाई दे रही थी।
25:55जो शासक या समाज के रक्षक अपनी प्रजासे किये गए लोग कल्यान के वचनों को तोड़ कर भष्टाचार में लिप्ठ
26:02हो जाते हैं, उन्हें यम्दूत तप्त लौह शूलों से भेदते हैं।
26:08इस भयानक गंड की समाप्ती के पश्चात, जब ये आत्माएं पुना मृत्यू लोक में जन्म लेती हैं, तो उनका प्रारब्ध
26:16अत्यंत अशांत और दुखों से भर जाता है।
26:20पुनरजन्म के चक्र में ऐसे मनुष्यों को समाज से बहिश्कृत कर दिया जाता है, और वे जीवन भर बिना किसी
26:27अपराद के भी अप्यश तथा कलंग का सामना करते हैं।
26:32गरुर ने हाथ जोड़ कर पूछा की प्रभु क्या कोई ऐसा मार्ग है जिससे मनुष्य अपने इस विश्वास घात के
26:39पाप का इस लोक में ही प्रायश्चित कर सके।
26:43श्री हरी ने अत्यंत दयालुता से उत्तर दिया कि यदि कोई पापी हृदय से गलानी का अनुभव करे और उस
26:51व्यक्ति से क्षमा मांगे जिसके साथ उसने चल किया है, तो उसके पापों का क्षय होने लगता है।
26:58सच्चे प्रायश्चित की यह अगनी आत्मा के उपर जमे विश्वासघात के काले मैल को पूरी तरह जलाकर उसे पुनह कंचन
27:06की भाती शुद्ध कर देती है।
27:10परंतु जो अग्यानी अपने अहंकार के मद में चूर होकर अंत समय तक अपने विश्वासघात को सही ठहराते हैं, उनका
27:18बिनाश सुनिश्चित है।
27:20भगवान विश्णु ने अपने दाहिने हाथ से वरद मुद्रा बनाते हुए संसार को सत्य और वचन बधता के पत पर
27:28चलने का शाश्वत संदेश दिया।
27:31गरूर पुरान का यह प्रसंध हमें सिखाता है कि किसी के विश्वास की रक्षा करना ही सबसे बड़ा धर्म है
27:38और वचन का पालन ही साक्षात नारायन की सेवा है।
27:42इस प्रकार सत्य और निश्था से युक्त जीवन ही जीवात्मा को नरक की यात्नाओं से बचाकर अंत्ता वैकुंट के परम
27:51धाम की प्राप्ती कराता है।
27:53भगवान विश्णु वैकुंट के परम दिव्य लोक में गरूर को संबोधित करते हुए अकर्मन्यता और कर्तवियों की उपेक्षा से उत्पन
28:02होने वाले सुक्ष्म किन्तु भयानक पापों के विशय में बताना प्रारंभ करते हैं।
28:09नारायन अपनी गंभीर वानी में कहते हैं कि जो मनुष्य जीवन पाकर अपने व्रिद्ध मातापिता और गुरुजनों की सेवा नहीं
28:17करता वह अंजाने में ही घोर नरक का अधिकारी बन जाता है।
28:22अपने ही आश्रितों और लाचार मातापिता को भूख तथा बीमारी में अकेला छोड़ देने वाला व्यक्ति साक्षात धर्म की हत्या
28:31का दोशी माना जाता है।
28:34अर्तव्य की इस उपेक्षा को कालपुरुष अत्यंत घेनित मानता है, जहां अकर्मनेता के कारण आत्मा पर पाप का काला आवर्ण
28:42चड़ने लगता है।
28:44इस भयानक निश्क्रियता के दोशी मनुश्यों की जीवात्मा को यमदूत खीच कर पुयोद नामक नरक्की दुरगंधयुक्त धूसर कीचर वाली नदी
28:54में फैंक देते हैं।
28:57पक्षी राज गरुड इस भयानक ग्रिश्य को देखकर कामप उठते हैं और प्रभु से पूछते हैं कि निश्क्रिय रहकर धर्म
29:04का त्याग करना किस प्रकार इतना बड़ा अपराध बन जाता है।
29:09जो समर्थ होते हुए भी अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज नहीं उठाते और निर्बल को सताए जाते देखते रहते हैं।
29:17वे भी इसी नरक में असहनिय पीडा भोगते हैं।
29:22न्याय के प्रती उदासीन्ता और सत्य की रक्षा में अकर्मन्यता दिखाना भी उसी श्रेणी का महापाप है जो मनुष्य के
29:30पुन्यों को तत्क्षन भस्न कर देता है।
29:33पुयोद नरक की सीमाओं में चारों और विशैली धुन्द फैली हुई है, जहां अकर्मन्य आत्माएं अपने कर्तवियों से मुहु मोडने
29:42के कारण पश्चाताप की अगनी में सुलकती हैं।
29:46श्रीहरी समझाते हैं कि भगवान द्वारा दी गई शक्ती और बुद्धी का समाज कल्यान में उप्योग न करना साक्षात विधाता
29:54के उपहारों का अपमान है।
29:58जो राजा या शासत प्रजा की पुकार सुनकर भी न्याय करने में उदासीन रहता है, उसकी आत्मा को इस दलदल
30:05में अनंतकाल तक दूबना पड़ता है।
30:09जिस प्रकार बिना फल का व्रिक्ष व्यर्थ माना जाता है, उसी प्रकार कर्महीन और समवेदन हीन मनुष्य का जीवन स्रिष्टी
30:17पर केवल एक बोज मात्र बनकर रह जाता है।
30:21इस घोर नरक की यातनाय भुगतने के पश्चात, जब इन जीवात माओं का पुना मृत्य लोक में जन्म होता है,
30:29तो उनका प्रारब्ध अत्यंत गयनिय हो जाता है।
30:33नारायन प्रकट करते हैं कि पूर्व जन्म में दूसरों की उपेक्षा करने वाले लोग नए जन्म में स्वय अत्यंत असहाय,
30:40अनाथ और उपेक्षित अवस्था में जन्म लेते हैं।
30:45जिन्हें अपने व्रिद्ध मातापिता पर गया नहीं आई, उन्हें इस जन्म में अपनों का सने कभी प्राप्त नहीं होता और
30:53वे दरदर की ठोकरे खाने को विवश होते हैं
30:57यह कर्म का वह अटल सिध्धान्त है जहां उपेक्षा के बदले केवल उपेक्षा ही मिलती है और अकर्मन्यता का फल
31:05अत्यंत दारोन एकाकीपन बनकर सामने आता है
31:09इस प्रकार प्रभो विश्नु के मुख से अकर्मन्यता के इस सुक्ष्म पाप का रहस्य जानकर वैकुंठ लोक पुनह दिव्य प्रकाश
31:17की तरंगों से आलोकित हो उठता है
31:21गरुर अत्यंत विनमरता पूर्वक अपने मस्तक को जुकाते हुए स्विकार करते हैं कि सक्रिय रहकर धर्म की रक्षा करना ही
31:29मनुष्य जीवन का परम पुरुशार्थ है
31:33भगवान विश्नु मंद मुस्कान के साथ वरध हस्त उठाते हैं मानु संसार को यह संदेश दे रहे हो की पुरुशार्थ
31:41और सेवा ही मोक्ष का एक मात्रद्वार है
31:45निश्क्रेता और उपेक्षा के इस अंधकार को मिटा कर कर्तव्य प्रायंता और सेवा का मार्ग अपना कर ही जीवात्मा अंत्ता
31:53वैकुंठ के दिव्य परमपत को प्राप्त कर सकती है
31:58भगवान विश्नु अपने तेजस्वी मुख मंडल से गरूर को संबोधित करते हुए समझाते हैं कि कर्मफल का यह अकाट्य चक्रहर
32:06पाप और उपपाप की यथायोग्य यातना निर्धारित करता है
32:11गरूर अत्यन्त ध्यानपूर्वक हाथ जोड़ कर भगवान विश्नों के वचनों का श्रवन करते हैं ताकि स्रिष्टी के इस कठोर विधान
32:19के सत्य को समझ सकें
32:22यमदूत पापी आत्माओं को घसीटते हुए कालकूट और महारौरव जैसे भयानक नर्कों की अगनी और शूलों के बीच जलती भूमियों
32:31पर ले जाते हैं
32:33यमलोक का यह भयानक द्रिशित जहां कर्म चक्र का दंड हर क्षन पापियों पर प्रहार करता है आत्माओं में असीन
32:41क्रंदन भर देता है
32:43जो मनुष्य छलकपट से पराया धन हर्पते हैं उन्हें अंधतामिस्र और सुकर्मुख नरक में अत्यंत भारी शिलाओं के नीचे कुछला
32:52जाता है
32:54भगवान विश्नुस पष्ट करते हैं कि बिना पश्चाताप के किये गए छोटे-छोटे उपपाप भी समय के साथ अत्यंत भायंकर
33:02नरक यातनाओं का कारण बनते हैं
33:06यम्दू तपती हुई कांस्य धातूओं और उबलते हुए तेल के कड़ाहों में पापी आत्माओं को दुबो कर उनके दुशकर्मों का
33:14हिसाब चुपता करते हैं
33:17खौलती हुई धातू और धधकते शूलों का यह यम्दंड पापी आत्माओं को उनकी वासनाओं और लालच का भीशन भान कराता
33:25है
33:27पवित्र जल और अनका अपमान करने वाले तथा असहायों को सताने वाले जीवों को क्रिमिभोजन नरक के जहरीले कीडों वाले
33:35कुंड में फैंका जाता है
33:38भगवान विश्नो गरूर से कहते हैं कि नरक की यात्नाए आत्मा को शुद्ध करने और उसके संचित पापों का क्षय
33:46करने के लिए ही निर्मित की गई है
33:49विश्यले कीड और जहरीले कीडे पापी आत्मा के शरीर को नोचते हैं जिससे वह अपने अतीत के निष्ठुर कर्मों पर
33:57बिल्ख बिलख कर रोती है
34:00नरक कुंड का वह भयंकर हरित प्रकाश और नार्किये चीतकार अधर्म के भयानक परिनामों का साक्षात साक्षय प्रस्तुत करता है
34:10नरक की निर्धारित समय सीमा पूर्ण होने के पश्चात वही जीवात्मा प्रिथवी पर अपने कर्मों के अनुसार निम्नतर रूपों में
34:18जन्म लेती है
34:20गरूर जिग्यासा भाव से पूछते हैं कि कौन सा विशिष्ट पाप मनुष्य को किस पशुया बीमारी के रूप में पुनरजन्म
34:28लेने पर विवश करता है
34:31चोरी और कपट करने वाली आत्माय अगले जन्म में विशैले सर्प, बिच्छू, शिपकली और घिनोने कीडेम कोडों की योनियों में
34:39भटकती है
34:42प्रकृती का यह अद्रिशनियम आत्मा के कर्मों के चिन्हों को उसके नए भौतिक शरीर की बनावट में स्पष्ट रूप से
34:49उकेर देता है
34:51गुरु और मातापिता का अनादर करने वाले जीव जन्मजात, अंधत्व मुक्ता या असाध्य रोगों से ग्रसित होकर मनुष्य रूप में
35:00दर्दर की ठोकरे खाते हैं
35:03भगवान विश्णु करुना से कहते हैं कि दुख और वितलांगता वास्तव में पूर्व जन्मों के अधर्म और अहंकार का ही
35:10प्रतिशोध होती है
35:13परोपकार, धर्म प्रायंता और भक्ती ही एक मात्र ऐसे साधन हैं जो जीवात्मा को इस नारकी चक्र और निन्न योनियों
35:22से बचा सकते हैं
35:23इस प्रकार कर्मों के इस गंभीर रहस्य को जानकर गरुड अत्यंत भक्तिभाव से श्रीहरी के चर्णों में प्रणाम करते हैं
35:32और संपूर्ण ज्यान को आत्म साथ करते हैं
35:36भगवान श्रीहरी विश्णु अपने स्वर्ण सिन्हासन से दिव्य मुस्कान के साथ पंकराज गरूर की ओर देखते हुए कर्म के अखंड
35:44सिध्धान्तों का स्मरण कराते हैं
35:48श्रीहरी कहते हैं कि है पक्षी श्रिष्ट संसार में कोई भी प्राणी काल और कर्म की सुक्ष्म द्रिष्टी से छिप
35:55नहीं सकता
35:57मनुष्य द्वारा किया गया प्रत्येक छोटा या बड़ा कार्य एक ऐसे बीज के समान है जो समय आने पर अपने
36:04स्वभाव के अनुसार फल अवश्य देता है
36:08धर्म और अधर्म का यह तराजू अत्यंत सुक्ष्म है जहां विचारों की शुद्धता का भी पूरा हिसाब रखा जाता है
36:17जो मनुष्य अपने हृदय में करुना और मन में सत्य को धारन करता है उसे यमलोक के भैभीत कर देने
36:25वाले मार्गों का सामना नहीं करना पड़ता
36:28भगवान विश्नुस पष्ट करते हैं कि भौतिक धनसंपत्ती प्रित्वी पर ही छूट जाती है परंतु आत्मा के साथ केवल धर्मरूपी
36:37धन ही यात्रा करता है
36:40भूखे को अन देना, निर्बल की रक्षा करना और निस्वार्थ भाव से सेवा करना ही मानव जीवन का सर्वोच करतव्य
36:48है
36:49जिस प्रकार कमल जल में रहकर भी कीचर से अचूता रहता है, उसी प्रकार धर्म प्रायन मनुष्य सांसारिक मुहमाया के
36:58बीच भी पवित्र बना रहता है
37:01जन्म और मृत्यू के इस विशाल चक्रव्यू से छूटने का एक मात्र द्वार केवल निश्काम कर्म और प्रभु भक्ती ही
37:08है
37:10गरुर विन्मरता पूर्वक पूछते हैं कि हे प्रभु यदि कोई जीव अज्यानता या भूलवश पाप कर बैठे तो क्या उसके
37:18उद्धार का कोई मार्ग शेश रहता है
37:22श्रीहरी अभ्यमुदरा धारन करते हुए कहते हैं कि पशचाताप और प्रायश्चित की अगनी से बड़े से बड़ा पाप भी भस्म
37:29हो सकता है
37:32प्रायश्चित वह पावन अगनी है जो पापी आत्मा को शुद्ध करके उसे पुन्ह धर्म के प्रकाश मार्क पर स्थापित करती
37:40है
37:41संपूर्ण ब्रहमांड में इश्वर का यह विधान इसलिए है ताकि प्रत्येक आत्मा अपने सत्य स्वरूप को पहचान कर मुक्ती की
37:50ओर अग्रसर हो सके
37:52विष्णुजी गरूर से कहते हैं कि अगले अध्याय में वे उन दिव्य प्रायश्चित और उपायों का विस्तार पूर्वक वर्णन करेंगे
38:00जो जीव को भयानक नर्कों से बचा सकते हैं
38:05शास्त्र सम्मत प्रायश्चित ही वे महामंत्र हैं जो भटकती हुई आत्मा के लिए अंधकार में प्रकाश स्तंभ का कार्य करते
38:13हैं
38:14ज्यान और प्रायश्चित का यह अलौकिक प्रकाश सबसे गहरे नर्कों की अंधियारी खाईयों को भी भेदने की सामर्थ्य रखता है
38:24इस प्रकार कर्म सिध्धान्त की इस गहन शिक्षा को सुनकर वैकुंठ लोक में शान्ती और पवित्रता का परम प्रवाह बहने
38:32लगता है
38:34गरुर भाव विभोर होकर प्रभु के चर्णों में अपना मस्तक जुकाते हैं और आगामी प्रायश्चित ज्यान को सुनने के लिए
38:41आतुर होते हैं
38:43जो प्राणी श्रीहरी के श्रीचर्णों का आश्रय लेता है उसके समस्त संताप और कर्मबंधन स्वतह ही क्षीन होने लगते हैं
38:53तो आएए अगले पड़ाव पर जाने कैसे प्रायश्चित के पावन नियमों का पालन करके आत्मा अपने कठिन से कठिन पापों
39:02का अंत कर सकती है

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