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Santan Saptami Vrat Katha 2026: भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी व्रत किया जाता है। यह व्रत करने वाले व्यक्ति को संतान सुख मिलता है और समस्त पापों का नाश होता है। इस व्रत के पुण्य प्रभाव से संतान दीर्घायु होती है और संकटों से मुक्ति मिलती है। इस व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। संतान सप्तमी का व्रत कथा के बिना अधूरा माना जाता है। कहा जाता है कि व्रत करने वाले हर व्यक्ति को व्रत कथा पढ़ना या श्रवण अवश्य करना चाहिए। यहां पढ़ें संतान सप्तमी व्रत की पौराणिक कहानी।Santan Saptami Vrat Katha 2026: Lyrics In Hindi,Kyu Manaya Jata Hai ?

The Santan Saptami fast is observed on the Saptami Tithi of the Shukla Paksha (waxing phase of the moon) of the Bhadrapada month. Those observing this fast are blessed with children and all sins are absolved. The virtuous effects of this fast ensure long-lived children and freedom from troubles. Lord Shiva and Goddess Parvati are worshipped during this fast. The Santan Saptami fast is considered incomplete without a story. It is said that everyone observing the fast must read or listen to the story. Read the mythological story of the Santan Saptami fast here.

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~PR.111~HT.408~ED.120~VG.HM~

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Transcript
00:00एक दिन महाराज युदिष्ठे ने भगवान से कहा, हे प्रभू, कोई ऐसा उत्तम वरत बताईए, जिसके प्रभाव से मनुष्यों के
00:08अनेको सांसारिक लेश दुख दूर होकर वो पुत्र और पौत्रवान हो जाएं।
00:12ये सुनकर भगवान बोलें, हे राजन तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है, मैं तुमको एक पौराने के तिहास सुनाता
00:19हूं, ध्यान पूर्वक सुनों।
00:42पथा के कहते, लोमस ने कहा कि, हे देवकी, दुष्ट दुराचारी पापी कंस ने तुम्हारे कई पुत्र मा डाले हैं,
00:49जिसके कारण तुम्हारा मन अत्यंत दुखी है।
00:52इस प्रकार राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी भी दुखी रहा करती थी, किन्त उसने संतान सप्तमी कवरत विधी विधान्त सहित
01:00किया, जिसके प्रताप सुन को संतान का सुख मिला।
01:03ये सुनकर देवकी ने हात जोड कर मुनी से कहा, हे रिशी राज, कृपा करके राणी चंद्रमुखी का संपूर्ण वरतान्त
01:10और इस वरत को विस्तार सहित मुझे बतलाईए, जिससे मैं भी इस दुख से छुटकारा पाऊं।
01:16लोमस रिशी ने कहा कि हे देवकी आयोध्या के राजा नहुष थे, उनकी पतनी चंद्रमुखी अत्यांत सुन्दर थी, उनके नगर
01:23में विश्नुगुप्त नाम का एक ब्रामभन रहता था, उसकी स्त्री का नाम भद्रमुखी था, वो भी अत्यांत रूपवती सुन्दर
01:30राणी और ब्रामभनी में अत्यांत प्रेम था, एक दिन वो दोनों सर्यो नदी में स्नान करने गई, वह उन्होंने देखा
01:37कि आन्य बहुत सी स्त्रियां सर्यो नदी में स्नान करके निर्मल वस्त्र पहन कर एक मंडप में शंकर और पार्वती
01:43की मूर्ती स्थापत कर पूज
01:59विद्धिविधान से किया है यह सब व्रट का विधान है यह सुनकर राश मद्ध के कारण कभी व्रट करती तो
02:17कभी नहीं करती कभी भूल भी जाती कुछ समय बाद दोनों के मृत्य हुई दूसरे जन में राणी बंदरिया और
02:24ब्रामभणी ने मुर्गी की योनी पाई
02:25पर उन्तु ब्राम्भणी मुर्गी की योनी में भी कुछ नहीं भूली और भगवान, शंकर और पार्वती का ध्यान करती रहे
02:31उधरानी बंदरिया की योनी में सब कुछ भूल गए थोड़े समय बाद दोनों ने देहत्याग दिया अब इनका तीसरा जन्म
02:38मनुश्य योनी मे
02:39उस ब्राम्भणी ने एक ब्राम्भणी के यहां कन्या की रूप में जन्म लिया वस ब्राम्भण कन्या का नाम भूशन देवी
02:45रखा गया और विवाग गोकुल निवासी अग्मिशील ब्राम्भण से कर दिया गया भूशन देवी इतनी सुन्दर थी कि वह आभूशन
03:07रहि
03:07का ही पुनितफल था दूसरी ओर शिव विमुक रानी के गर्ब से कोई भी पुत्र नहीं हुआ वो ने संतान
03:14दुखी रहने लगी रानी और ब्रामणी में जो प्रीती पहले जिन में थी वो अब भी बनी रही रानी जब
03:20रिधावस्था को प्राप्त होने लगी तब उसके ग�
03:36हुशन देवी ब्रामणी रानी के अहां अपने पुत्रों को लेकर पहुची रानी का हाल सुनकर उसे भी बहुत दुख हुआ
03:42किन्तु इसमें किसी का क्यावश कर्म और प्रारब्द के लिखे को स्वें ब्रम्भा भी नहीं मिटा सकते रानी कर्म चूद
03:49भी थी इसी कारण �
03:50उसे दुख भोगना पड़ा। इधर रानी पंडितानी के इस वैभोवर आठ पुत्रों को देखकर उससे मन में इर्शाह करने लगी
03:57और उसके मन में पाप उत्पन हुआ। वस ब्रामणी ने रानी का संताव दूर करके निमित अपने आठों पुत्र रानी
04:04के पास छोड़
04:20की मन में ठान ली। भगवान की पूजा से निवरित होकर जब भूशन देवी आई तो रानी ने उनसे कहा
04:26कि मैंने तेरे पुत्रों को मारने के लिए इनको जहर मिला कर लड़ू दिया था। किन्तु इन में से एक
04:31भी नहीं मरा। तुने कौन सा दान पुन निवरत किया है �
04:34जिसके कारण तेरे पुत्र नहीं मरे और तू नित ने सुक भोग रही है तेरा बड़ा सौभागी है इनका भेट
04:41तु मुझसे निश कपट होकर समझा मैं तेरी बड़ी रिनी रहूंगी। रानी के सदीन वचन सुनकर भूशन ब्राम्हणी कहने लगी
04:49सुनो तुमको तीन �
05:19जन्म का हाल कहते हों।
05:20इसलिए मैं तो कहती हूँ कि आप सब भी संतान सब्तमी के वरत को विदी सहित करिए जिससे आपका यह
05:26संकर दूर हो जाए।
05:28उस दिन से रानी ने नियमनुसार संतान सप्तमी का वरत किया
05:32जोसके प्रभाव से रानी को संतान सुख भी मिला और संपूर्ण सुख भोग कर रानी शिवलोक को हो गई
05:38इसलिए कहते हैं कि भगवान शंकर के वरत का ऐसा प्रभाव है कि पत भरष्ट मनुष्ट भी अपने पत पर
05:44अग्रसर हो जाता है और अनंत एश्वर भूख कर मोक्ष को पाता है
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