00:00एक दिन महाराज युदिष्ठे ने भगवान से कहा, हे प्रभू, कोई ऐसा उत्तम वरत बताईए, जिसके प्रभाव से मनुष्यों के
00:08अनेको सांसारिक लेश दुख दूर होकर वो पुत्र और पौत्रवान हो जाएं।
00:12ये सुनकर भगवान बोलें, हे राजन तुमने बड़ा ही उत्तम प्रश्न किया है, मैं तुमको एक पौराने के तिहास सुनाता
00:19हूं, ध्यान पूर्वक सुनों।
00:42पथा के कहते, लोमस ने कहा कि, हे देवकी, दुष्ट दुराचारी पापी कंस ने तुम्हारे कई पुत्र मा डाले हैं,
00:49जिसके कारण तुम्हारा मन अत्यंत दुखी है।
00:52इस प्रकार राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी भी दुखी रहा करती थी, किन्त उसने संतान सप्तमी कवरत विधी विधान्त सहित
01:00किया, जिसके प्रताप सुन को संतान का सुख मिला।
01:03ये सुनकर देवकी ने हात जोड कर मुनी से कहा, हे रिशी राज, कृपा करके राणी चंद्रमुखी का संपूर्ण वरतान्त
01:10और इस वरत को विस्तार सहित मुझे बतलाईए, जिससे मैं भी इस दुख से छुटकारा पाऊं।
01:16लोमस रिशी ने कहा कि हे देवकी आयोध्या के राजा नहुष थे, उनकी पतनी चंद्रमुखी अत्यांत सुन्दर थी, उनके नगर
01:23में विश्नुगुप्त नाम का एक ब्रामभन रहता था, उसकी स्त्री का नाम भद्रमुखी था, वो भी अत्यांत रूपवती सुन्दर
01:30राणी और ब्रामभनी में अत्यांत प्रेम था, एक दिन वो दोनों सर्यो नदी में स्नान करने गई, वह उन्होंने देखा
01:37कि आन्य बहुत सी स्त्रियां सर्यो नदी में स्नान करके निर्मल वस्त्र पहन कर एक मंडप में शंकर और पार्वती
01:43की मूर्ती स्थापत कर पूज
01:59विद्धिविधान से किया है यह सब व्रट का विधान है यह सुनकर राश मद्ध के कारण कभी व्रट करती तो
02:17कभी नहीं करती कभी भूल भी जाती कुछ समय बाद दोनों के मृत्य हुई दूसरे जन में राणी बंदरिया और
02:24ब्रामभणी ने मुर्गी की योनी पाई
02:25पर उन्तु ब्राम्भणी मुर्गी की योनी में भी कुछ नहीं भूली और भगवान, शंकर और पार्वती का ध्यान करती रहे
02:31उधरानी बंदरिया की योनी में सब कुछ भूल गए थोड़े समय बाद दोनों ने देहत्याग दिया अब इनका तीसरा जन्म
02:38मनुश्य योनी मे
02:39उस ब्राम्भणी ने एक ब्राम्भणी के यहां कन्या की रूप में जन्म लिया वस ब्राम्भण कन्या का नाम भूशन देवी
02:45रखा गया और विवाग गोकुल निवासी अग्मिशील ब्राम्भण से कर दिया गया भूशन देवी इतनी सुन्दर थी कि वह आभूशन
03:07रहि
03:07का ही पुनितफल था दूसरी ओर शिव विमुक रानी के गर्ब से कोई भी पुत्र नहीं हुआ वो ने संतान
03:14दुखी रहने लगी रानी और ब्रामणी में जो प्रीती पहले जिन में थी वो अब भी बनी रही रानी जब
03:20रिधावस्था को प्राप्त होने लगी तब उसके ग�
03:36हुशन देवी ब्रामणी रानी के अहां अपने पुत्रों को लेकर पहुची रानी का हाल सुनकर उसे भी बहुत दुख हुआ
03:42किन्तु इसमें किसी का क्यावश कर्म और प्रारब्द के लिखे को स्वें ब्रम्भा भी नहीं मिटा सकते रानी कर्म चूद
03:49भी थी इसी कारण �
03:50उसे दुख भोगना पड़ा। इधर रानी पंडितानी के इस वैभोवर आठ पुत्रों को देखकर उससे मन में इर्शाह करने लगी
03:57और उसके मन में पाप उत्पन हुआ। वस ब्रामणी ने रानी का संताव दूर करके निमित अपने आठों पुत्र रानी
04:04के पास छोड़
04:20की मन में ठान ली। भगवान की पूजा से निवरित होकर जब भूशन देवी आई तो रानी ने उनसे कहा
04:26कि मैंने तेरे पुत्रों को मारने के लिए इनको जहर मिला कर लड़ू दिया था। किन्तु इन में से एक
04:31भी नहीं मरा। तुने कौन सा दान पुन निवरत किया है �
04:34जिसके कारण तेरे पुत्र नहीं मरे और तू नित ने सुक भोग रही है तेरा बड़ा सौभागी है इनका भेट
04:41तु मुझसे निश कपट होकर समझा मैं तेरी बड़ी रिनी रहूंगी। रानी के सदीन वचन सुनकर भूशन ब्राम्हणी कहने लगी
04:49सुनो तुमको तीन �
05:19जन्म का हाल कहते हों।
05:20इसलिए मैं तो कहती हूँ कि आप सब भी संतान सब्तमी के वरत को विदी सहित करिए जिससे आपका यह
05:26संकर दूर हो जाए।
05:28उस दिन से रानी ने नियमनुसार संतान सप्तमी का वरत किया
05:32जोसके प्रभाव से रानी को संतान सुख भी मिला और संपूर्ण सुख भोग कर रानी शिवलोक को हो गई
05:38इसलिए कहते हैं कि भगवान शंकर के वरत का ऐसा प्रभाव है कि पत भरष्ट मनुष्ट भी अपने पत पर
05:44अग्रसर हो जाता है और अनंत एश्वर भूख कर मोक्ष को पाता है
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