00:00यजीर ने हुकम दिया, सर गलम करके मिरे बास भेज़ दो
00:03लेकिन जिस श्छक्स को ये हुकम सुनाया गया, उसने सर जुकाने के बजाए तारीख का रुख मूड दिया
00:09जर एक लम्हे के लिए सोचिए, एक खाफला है जिसमें बुड़े हैं, जवान हैं, पर्दानशीन, खावतीन हैं और छे माह
00:16के मासुम बचे भी हैं
00:17ये खाफला मदीने की खामोश गल्यों से निकलता है, सहराओं की जुलस्ती गर्मी में सफर करता है, और करबला की
00:23मट्टी पर आकर रुख जाता है
00:25ये कोई आम सफर नहीं था, ये तारीक का वो सबसे बड़ा सफर था, जिसकी हर मंजिल, अपने अंदर एक
00:31रास, एक दर्द और एक पेगाम चुपाए हुए थी
00:34आज से चौदा सो साल पहले संग साथ हिजरी में, ये सफर शुरू हुआ था, लेकिन हम में से अक्सर
00:39लोग से दस्वी महरम के मैदान जंग को जानते हैं
00:42ये कभी नहीं सोचते कि उस जंग से पहले मक्के से करबला तक का, वो सफर कैसा था, वो कौन
00:47सी मंजिले थी, जहां ये खाफला रुका, रास्ते में कौन से लोग मिले, तबते हुए सहराओं में, इमाम हुसीन अलही
00:53सलाम ने अपने साथियों से क्या बाते की, और वो कौन स
00:56लंगे थे जब तारीख के सबसे बड़े फैसले किये जा रहे थे, आज हम आपको उसी सफर पर लिए चलते
01:02हैं,
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