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यह वीडियो 12 जनवरी 2025 को आयोजित "बोध प्रत्यूषा" सत्र से लिया गया है।

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Transcript
00:00एक घड़ा था, उसको एक महिला अपने सर पे रखे जाती थी नदी से पानी भरने रोज
00:04और घड़े को बड़ा गुमान था कि मैं कितना खुबसूरत हूँ, घड़े पे चितरकारी और भी हुई थी
00:08और घड़ा कहता था, आली हूँ बहुत मैं, खोखला हूँ भीतर से
00:30क्यों भर रहे हूँ, तो पानी भरते हो अच्छी बात है, सर के ओपर रहू रखते हो उसको कभी चैन
00:47न आ lagi
00:48एक दिन महिला उसको लेकर आई नदी के पास भरने के लिए घड़ा फिसल के गिर गया जिस चिकनी मिटी
00:54से वह घड़ा उठा था
00:55वो घड़ा वihin चिकनी मिटि हो गया
00:57उसको चैन आ गया
00:58जब तक तुम अपने आपको
01:01मिटि से अलग मानते रहोगे
01:03तुम्हें चैन नहीं आएगा
01:04जब तक तुम्हें लगता रहेगा
01:05ये तुम्हारे भीतर कोई है
01:07और वो प्यार करता है
01:09वो डरता है
01:10उतड़ता है उसकी हसरते हैं तब तक तुम्हें चैन नहीं आएगा
01:15मिट्टी को मिट्टी होना पड़ेगा तभी उसको चैन आता है
01:19अब तो ऐसा हुई चला जिए पाउं तले की घास
01:23जब तक पाउं तले की घास जैसा अपने आपको नहीं मान लेते
01:26तब तक चैन नहीं आएगा
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