00:00एक ये समाज है जो मुझे देवी बोल दासी बनाता है
00:04एक मुखर्टा पहनाया है इसने मुझे मा का
00:07वो मा जिसकी सुगा घरवालों को एक कप चाय पच्चों के टिफिन और स्कूल भेजने से होती है
00:16और अंधेरी रात में बिस्तर में परे पती की ठाकान दूर करने से ढलती है
00:20चूला, चौका, साफ सफाई, कप्रे और बरतन की खनक
00:26वो हातों में पहने सूने की बेरियों के दाम है जो हर दिन चुकाने पड़ते है
00:32ये समाज है जिसने चुप्पी को मेरी साधना, घर बच्चों के लिए बलिदान को मेरा धर्म बताया है
00:39पती की पूजा में ही मेरा स्वर्ग बताया है
00:43जो मेरे माथे पर बिंदिया, हातों में कंगन, पाउं में गुंगरू और बिच्या पहनाता है
00:49जो इन पाउं में पाहिल डाल मुझे बांधता है और कटकुतली की तरह ना चाहता है
00:56मा, देवी, बलीदान इनको अपना गहना मान छूती पैचान को खुद की शान मानती रही
01:04जो जीवन मिला था कुछ करने को उसको यूही गवाती रही
01:08पर वो सिर्फ तुम्हारी ही करुना और प्रेम रही
01:12जिसने इन जूटे बंदन को देखना सिखाया
01:15जिसने इन उंगलियों को कलम पकड़ना सिखाया
01:19पाउं को लंबे रास्ता चलना सिखाया
01:22और दुनिया की सैर करना सिखाया
01:24तुमने समाच से दिये गए जूटे मुखोटे को हटा, मा का सही अर्थ सिखाया, खुली आस्मा के नीचे इनसान का
01:33चादर उड़ाया, मुझे खुद से प्रेम करना सिखाया
01:38धन्यवाद
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