00:00। आप जानते हैं कि देवी संध्या ने समस्त पुरुष जाती को तीन भयंकर श्राप दिये थे?
00:06लेकिन क्यों? आखिर ऐसा क्या हुआ था जिसने देवी संध्या को प्रोधित कर दिया?
00:11क्या ये श्राप आज भी हर पुरुष के जीवन को प्रभावित कर रहे हैं?
00:42That's it.
00:45इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर साजह करें, ताकि वे भी इस अद्भुत कथा से अवगत हो सकें।
00:51और सभी शिव भक्त कमेंट बॉक्स में हर हर महादेव लिखकर अपनी भक्ती प्रकट करें।
00:56नमस्कार दोस्तों, एक समय की बात है, जब देवर्शि नारद भग्वान शिव के दर्शन के लिए कैलाश परवत पहुँचे और
01:04फिर शिव जी के चरणों में नतमस्तक होकर पूछा, हे प्रभु, मैं यह जानने आया हूँ कि देवी संध्या कौन
01:10थी और उन्होंने समस्त �
01:12पुरुष जाती को कौन सा श्राप दिया था, भग्वान शिव ने गंभीर स्वर में कहा, हे नारद, देवी संध्या का
01:18यह प्राचीन इतिहास अत्यंत रहस्य मई और प्रभावशाली है, मात्र इसका श्रवन करने से ही असंख्य पाप क्षण भर में
01:26भस्म हो जाते हैं, य
01:39भग्वान शिव ने नारद मुनि को देवी संध्या की दिव्य और रहस्य मई कथा सुनाना प्रारंभ किया, हे नारद, जब
01:46स्रिष्टी का आरंभ हो रहा था, तब ब्रह्मा जी कमल के आसन पर विराजमान होकर गेहन ध्यान में लीन थे,
01:54तब ही उनके मन में स्रिष्टी की
01:55रचना करने की इच्छा उत्पन्न हुई, जैसे ही यह इच्छा प्रकट हुई, उनके मन से एक अध्भुत त्रिभुवन सुन्दरी कन्या
02:03प्रकट हुई, उसकी सुन्दरता अध्वितिय थी, और उसका मोहक स्वरूप देखकर समस्त ब्रह्मांड मंत्र मुग्ध हो गया,
02:10क्योंकि ब्रह्मा जी के मन से उत्पन्न हुई थी, इसलिए वह उनकी मानस कन्या कहलाई, भगवान शिव ने आगे कहा,
02:18हे नारद, क्योंकि ब्रह्मा जी ध्यानावस्था में थे, और उसी दौरान यह कन्या प्रकट हुई, इसलिए उसका नाम संध्या रखा
02:26गया, जब ब्
02:39भी उसके प्रभाव से बच नहीं सके, और उनके भीतर कांभाव जागरित हो गया, जैसे ही ब्रह्मा जी की ऐसी
02:45कुपिट द्रिष्टी संध्या पर पड़ी, उसका दिव्य तेज क्षीन हो गया, यह देखकर संध्या अत्यंत दुखी हो गई, और उस
02:53स्थान को तत्काल छो
03:08उन्होंने स्वयम ब्रह्मा जी के मन में यह विकार उत्पन किया, इसी दिव्य लीला के प्रभाव से क्षण भर के
03:15लिए ब्रह्मा जी के भीतर कांभाव जागरित हुआ, परंतु इस घटना के पीछे एक गूढ रहस्य छिपा था, समस्त मानव
03:22जाती के कल्यान की योजना,
03:24अब हे नारद इस रहस्य पूर्ण लीला को ध्यान पूर्वक सुनो, हे नारद ब्रह्मा जी के उस व्यवहार से देवी
03:31संध्या अत्यंत व्यथित हो गई, उनके मन में अपार दुख था और वे स्वयम को असहाय महसूस करने लगी, इस
03:38पीडा से मुक्ती पाने के लिए वे
03:52विचार में डूबी हुई संध्या, पृत्वी लोक में भ्रमन करती हुई, ब्रह लोहित नामक सरोवर के समीब जा पहुचीं और
03:59वहीं खड़ी हो गई, तब ही संयोगवश महर्शिवशिष्ठ उसी मार्ग से गुजर रहे थे, उन्होंने सरोवर के पास खड़ी एक
04:11तपस
04:20बताओ, तब देवी संध्या ने महर्शिवशिष्ठ को अपनी पूरी व्यथा सुनाई और विनम्र स्वर में कहा, हे मुनिवर, मैं इस
04:28परवत पर तपस्या करने के उद्देश्य से आई हूँ, कृपा करके मुझे बताईए कि मैं किस देवता की आराधना करूँ,
04:34कौन मु
04:57तब तक भगवान के दर्शन ना हो जाएं, तब तक इस मंतर का निरंतर स्मरण करती रहो, तुम्हें स्वच्छ वस्त्र
05:03धारण कर, पूर्ण नियम और संयम के साथ मौन रहकर इस तपस्या का पालन करना होगा, जब तुम्हारी भक्ती से
05:09प्रसन्न होकर भगवान नारायन �
05:12प्रकट होंगे, तो वे तुम्हें अवश्य दोश्मुक्त कर देंगे, इस प्रकार उपदेश देकर महर्शिवशिष्ठ देवी संध्या को आशीरवाद देकर वहां
05:20से प्रस्थान कर गए, अब देवी संध्या को तपस्या का सही मार्ग मिल चुका था, उनकी प्रसन्नता
05:38और सावधानी से पालन करना शुरू किया, समय बीतता गया और देवी संध्या अपनी कठोर तपस्या में मगन रही, उनकी
05:45भक्ती इतनी गहरी थी कि उन्होंने चारों युगों तक बिना विचलित हुए तप किया, उनकी तपस्या, व्रत और भगवान के
05:53प्रती अटूट स
06:06प्रकट हुए, भगवान विश्णू ने मुस्कुराते हुए कहा, हे देवी, उठो, मैं तुम्हारी कठोर तपस्या और अटूट भक्ती से अत्यंत
06:15प्रसन्न हूँ, भगवान के दिव्य दर्शन पाकर देवी संध्या विस्मित रह गई, उन्होंने शीघरता से उठकर भ
06:36नहीं वानी साथ दे रही थी, उनके हृदय में भगवान की स्तुती करने की तीवर अभिलाशा थी, परंतु उनके तेजस्वी
06:43स्वरूप को देख कर वे शब्द हीन हो गई, भगवान विश्णू ने उनकी मनोदशा को भली भांती समझ लिया, उन्होंने
06:51संध्या को दिव
07:06भगवान विश्णू की स्तुती करने लगी, उनके प्रत्येक शब्द में भक्ती की गहराई और समर्पन स्पष्ट जलक रही थी, तपस्या
07:13के कारण देवी संध्या का शरीर अत्यंत क्षीन और दुर्बल हो चुका था, भगवान विश्णू ने उनकी दशा देखी और
07:20अ
07:35और अटूट भक्ती से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ, तुम जो भी इच्छा रखती हो निह संकोच वर्दान मांगलो। यह सुनकर
07:43देवी संध्या भाव विहवल हो गई और विनम्र स्वर में बोली, हे प्रभु, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और
07:49मुझे वर्दान देन
07:50चाहते हैं, तो कृपा करके मुझे ये तीन वर्दान प्रदान करें, प्रथम वर यह कि संसार के समस्त प्राणियों के
07:58मन में जन्म लेते ही काम का विकार उत्पन्न न हो, द्वितिय वर यह कि मेरा पती वरत धर्म सदा
08:04अटूट बना रहे और कभी खंडित न हो, तृतिय व
08:20पुरुष मेरी और कामभाव से देखे, वह तुरंत ही नपुनसक हो जाए, भगवान विश्णु मंद मुस्कान के साथ बोले, कल्यानी,
08:26तुमने संसार के कल्यान हेतु अत्यंत उत्तम वर्दान मांगा है, इसलिए मैं आज से एक अटल मर्यादा स्थापित करता हूँ,
08:33आ�
08:44तुम्हे केवल कौमार्य अवस्था के अंत में ही कामभाव उत्पन्न होगा, तुम्हारे तप और सतीत्व की महिमा तीनों लोकों में
08:51गूंजेगी, तुम्हारे पती के अतिरिक्त, यदि कोई अन्य पुरुष तुम्हे कामभाव से देखेगा, तो वह ततकाल नपुनसक ह
08:58भगवान विश्णु ने आगे कहा, हे देवी संध्या, तुम्हारे पती अत्यंत भाग्यशाली, तपस्वी और दिव्य गुणों से युक्त होंगे, वे
09:07न केवल सुन्दर और तेजस्वी होंगे, बल्कि तुम्हारे साथ, साथ कल्पों तक जीवन यापन करेंगे, तुम
09:24कि ब्रह्मा जी की द्रिष्टी तुम पर पड़ी थी, हालां कि तुम पूर्णतह निर्दोष थी, फिर भी यह घटना तुम्हारे
09:30मन में एक बोज बन गई, लेकिन हे देवी, मैं तुम्हें मार्ग दिखाता हूँ, यहां के पास ही चंद्रभागा नदी
09:37के तट पर महर्श
09:38मेदाति थी, एक महान यग्य कर रहे हैं, जो बारह वर्षों में पूर्ण होगा, उसी यग्य में उचित समय पर
09:44तुम अपने शरीर का त्याग कर, अपनी प्रतिग्या पूरी कर सकती हो, परंतु स्मरण रहे, वहां तुम्हें ऐसे वेश में
09:51जाना होगा, कि मुनियों की द
10:07अपने दिव्य हाथों से देवी संध्या के मस्तक का स्पर्ष किया, जैसे ही भगवान का स्पर्ष हुआ, संध्या का शरीर
10:15आठे का बन गया, भगवान ने ऐसा इसलिए किया ताकि यग्य की पवित्र अग्नी में मांस न गिरे, और अग्निदेव
10:22मांस भोजी न बने, क्यो
10:37कि जब प्रिथवी पर आई, तब सबसे पहले उन्होंने महर्शिवशिष्ठ के दर्शन किये थे, इसलिए उनके मन में यह द्रण
10:45विश्वास था कि वही उनके आदर्श और नियत पती हैं, संध्या ने अपने अंतर मन में महर्शिवशिष्ठ का स्मरण किया
10:52और उनकी छ�
10:53कि जब द्यान में रखते हुए, यग्य की पवित्र अग्नी में अपने शरीर का त्याग कर दिया। फिर भगवान विश्णु
11:00की आज्या से अग्निदेव देवी संध्या के शरीर को सूर्य मंडल पर ले गए। वहां सूर्य देव ने संध्या के
11:06दिव्य शरीर को दो भा�
11:20संध्या काल में परिवर्तित कर दिया। यही कारण है कि सूर्योदय के समय को प्राथह संध्या और सूर्यास्त के समय
11:27को संध्या काल कहा जाता है। इस प्रकार त्याग और समर्पन की मूर्ति देवी संध्या ने यग्य की पवित्र अग्नी
11:35में अपने जीवन का समर्पन कर
11:49इस प्रकार देवी संध्या के तप और त्याग के कारण ही संसार में जन्म लेने वाला प्रत्येक प्राणी प्रारंभ में
11:58काम वासना से रहित होता है।
12:19जीवन का संपूर्ण चरित्र सुना दिया। उनका त्याग, उनकी भक्ती और उनके द्वारा स्थापित मर्यादाएं युगों युगों तक अमर रहेंगी।
12:49अब आप बताईए क्या आपको लगता है कि देवी संध्या के श्राप आज भी सच साबित होते हैं।
Comments