00:02।
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01:30उसी तरह केवल धार में क्रियाय करना परियाप्त नहीं है, उन्हें भीतर उतारना जरूरी है।
02:00वो कहता है, जो भी हो रहा है, उसमें भी मैं सीखूंगा, समझूंगा और आगे बढ़ूंगा।
02:07लेकिन जब धर्म केवल इच्छाओं को पूरा करने का साधन बन जाता है, तब वो हमें शान्ती नहीं दे सकता।
02:13तीसरा कारण है आहंकार, ये सबसे सूक्ष्म और सबसे खतरनाग है।
02:18जब कोई व्यक्ति धार्मिक बनता है, तो कई बार उसके भीतर एक नया आहंकार पैदा हो जाता है।
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03:00जाकते नहीं, उन्हें अपने गुस से, अपनी इर्शया, अपने डर, अपनी कमजोरियों को देखने की हिम्मत नहीं होती, वे सोचते
03:08हैं कि पूजा कर लेने से सब ठीक हो जाएगा, लेकिन जब तक हम अपने भीतर की गंदगी को साफ
03:14नहीं करेंगे, तब तक केवल बाहर की
03:17सफाई से कुछ नहीं बदलेगा, धर्म हमें सिखाता है कि पहले खुद को देखो, अपने विचारों को देखो, अपने व्यवहार
03:24को देखो, कहां गलती हो रही है, कहां सुधार की जरूरत है, यही आत्मचिंतन हमें बदलता है, पांचवा कारण है,
03:33ध्यान और अनुभव
03:47नहीं होता, तब तक धर्म केवल जानकारी रह जाता है, ध्यान वो माध्यम है, जो हमें इश्वर से जोडता है,
03:54जब हम कुछ समय के लिए सब कुछ छोड़ कर भीतर जाते हैं, तब धीरे धीरे एक शान्ती का अनुभव
04:00होता है, वही अनुभव हमें बदलता है, वही अन�
04:14इसमें, रिष्टों में हम अलग तरीके से जीते हैं, लेकिन सच्चा धर्म हर जगे होना चाहिए, अगर हम पूजा में
04:22शान्त हैं, लेकिन व्यवहार में कठोर हैं, तो ये अधूरा धर्म है, धर्म का अर्थ है, हर क्षन जागरुक रहना,
04:29हर व्यक्ति के साथ प्रेम से व
04:31जवहार करना, हर परिस्थिती में संतुलन बनाय रखना, यही वास्तविक साधना है, धीरे धीरे हमें समझ में आता है कि
04:38धर्म का उद्देश हमें बदलना है, नकि केवल हमारी पहचान को, ये हमें भीतर से हलका बनाता है, मुक्त बनाता
04:46है, लेकिन जब हम इसे केवल एक �
04:48४ुजान बना लेते हैं, मैं धारमेख हूं,
04:51तब ये बोज़ बन जाता है.
04:53सच्चा धर्म वो है,
04:54जो हमें सरल बनाता है,
04:56जो हमें दूसरों के करीब लाता है,
04:58जो हमारे भीतर करुणा और प्रेम जगाता है.
05:02अगर धर्म के बाद भी हम कठोर हैं,
05:04तो कुछ गलत है, जब व्यक्ति इस सच्चाई को समझने लगता है, तब उसका दृष्टिकोन बदलने लगता है, अब वो
05:11केवल पूजा नहीं करता, बल्कि हर कर्म को पूजा बना देता है, अब वो केवल भगवान के सामने नहीं जुपता,
05:18बल्कि जीवन के हर अनुभव क
05:20सामने विनम रहो जाता है, धीरे धीरे उसका मन शांत होने लगता है, अपेक्षाय कम होने लगती है, अंकार धीला
05:28पढ़ने लगता है, और भीतर एक नई शांती जम लेने लगती है, यहीं वो बिंदु है जहां धर्म बाहर से
05:35भीतर की यात्रा बन जाता है, जहां व्यक्त
05:50ुपिए विए वास्तविक परिवर्तन शुरू होता है।
05:53अब वो केवल भगवान से मांगने वाला व्यक्ति नहीं रहता,
05:56बलकि खुद को बदलने वाला साधक बन जाता है।
06:00उसकी प्रार्थना भी बदल जाती है।
06:02पहले वो कहता था,
06:03भगवान मेरी समस्या दूर कर दो अब वो कहता है।
06:08भगवान मुझे इतना मजबूत बना दो कि मैं हर परिस्थिती को समझ सकूं।
06:13यही परिवर्तन धर्म को बोज से शक्ति में बदल देता है।
06:16अब वो हर कठिनाई को सजा नहीं,
06:18शिक्षा के रूप में देखने लगता है।
06:21जब जीवन में कुछ गलत होता है,
06:23तो वो तुरंथ तूटता नहीं,
06:25बल्कि खुद से पूचता है।
06:26इसमें मुझे क्या सीखना है।
06:28यह दृष्टिकोन ही उसे बाकी लोगों से अलग बना देता है।
06:32धीरे धीरे वो ये समझने लगता है कि दुख बाहर की परिस्थितियों से नहीं,
06:38बलकि भीतर की प्रतिक्रिया से पैदा होता है।
06:40दो लोग एक ही परिस्थिति में होते हैं,
06:43एक दुखी होता है, दूसरा शान्त रहता है,
06:46फर्क परिस्थिती में नहीं, दृष्टी में होता है
06:49और धर्म का असली काम यही है
06:51दृष्टी को बदलना
06:52अब वो हर घटना को साक्षी भाव से देखने की कोशिश करता है
06:56जब गुस्सा आता है, तो वो उसे पहचानता है
07:00जब इर्शया उड़ती है तो वो उसे देखता है
07:03वो अब भावनाओं में बहता नहीं उन्हें समझता है
07:07यही जागरुकता धीरे धीरे उसके मन को शांत करने लगती है
07:11वो अब अपने व्यवहार में भी परिवर्तन लाता है
07:14पहले जहां छोटी छोटी बातों पर प्रतिक्रिया देता था
07:18अब वो ठहरता है
07:19पहले जहां दूसरों की गलती तुरंत पकड़ लेता था
07:23अब वो खुद को देखने लगता है
07:25यह बदलाव धीरे धीरे उसके रिष्टों को भी बहतर बना देता है
07:29अब धर्म उसके लिए केवल पूजा का समय नहीं है
07:32बलकि हर क्षण की जागरुकता बन जाता है
07:35जब वो काम करता है तब भी वो पूरी इमांदारी से करता है
07:39जब वो बात करता है तब भी वो सजग रहता है
07:43कि उसके शब्द किसी को चोट न पहुँचाए
07:45यही कर्मयोग धीरे धीरे उसके जीवन को संतुलित बनाता है
07:50वो अब ये भी समझने लगता है कि भगवान बाहर कही दूर नहीं है
07:54वो हर क्षण, हर अनुभव, हर व्यक्ति में उपस्थित है
07:58जब ये अनुभव गहरा होता है, तब व्यक्ति अकेला महसूस नहीं करता
08:03उसे हर जगे एक अद्रिश्य सहारा महसूस होता है
08:06यही अनुभव उसके भीतर विश्वास को जन देता है
08:10अब वो डरता कम है, भरोसा ज्यादा करता है
08:14अब वो भागता कम है, स्वीकार करता है. अब वो शिकायत कम करता है. कृतक गिता ज्यादा महसूस करता है.
08:21धीरे धीरे उसकी प्राथमिकताइब बदल जाती है. पहले वो बाहरी चीजों में खुशी ढूंता था. अब भीतर की शान्ती को
08:29महत्व देता है. पहले वो दूसरो
08:54।
09:13Dhiray-Dhiray이었
09:40Dhirira-Dhiray
10:10He will be able to see the day of his life.
10:13Phritagyata que saad
10:14din ko samabd kerta hai
10:15Ye prakriya usse har din
10:17thosda behetar banaati hai
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10:20wo anubhav kerta hai
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10:24Ab wo choo-ti batao se nahi tute ta
10:26Ab wo her siamay beechein nahi raheta
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10:33Or yahi satche dharma ki pehachan hai
10:36Jahaan man shant ho
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10:39and teams haveしょう a ground you find and they are in the
10:43sully known the surroundings, except that sitting there and
10:49who are getting in existence and who make
10:49She begins square building above the areost more
10:51and is now moving.
10:52Theしита Kriyal Kriyee night комп видas
10:55what is the secure environment where
10:56this astutta, which is over the place is
10:58depressed and the pure emotions
11:04to turn upon.
11:04It is special.
11:05It remains underwater and the senses
11:09पूज़ती समझ जाता है कि वो अब तक बाहर जिन चीजों में सुख खोज रहा था, वो सब खशनिक था।
11:39बलकि धर्म उसके स्वभाव में उतर जाता है। अब उसे याद नहीं करना पड़ता कि मुझे अच्छा व्यवहार करना है
11:46क्योंकि उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाता है।
11:49अब उसे बार-बार खुद को रोकना नहीं पड़ता क्योंकि भीतर की समझ उसे सहज रूप से सही दिशा में
11:56ले जाती है।
11:56अब उसके लिए भगवान कोई मूर्ती या स्थान तक सीमित नहीं रहते। वो हर व्यक्ति में, हर परिस्थिती में, हर
12:04अनुभव में उसी चेतना को महसूस करने लगता है।
12:07जब वो किसी दुखी को देखता है, तो उसके भीतर करुना जाकती है। जब वो किसी सफल व्यक्ति को देखता
12:14है, तो उसके भीतर इरश्या नहीं, प्रे ना आती है।
12:17ये परिवर्तन ही सच्चे धर्म की पहचान है, अब जीवन उसके लिए संघर्ष नहीं रहता, बलकि एक साधना बन जाता
12:25है, हर दिन एक नया अफसर बन जाता है, अपने भीतर और गहराई में जाने का, अपने अहंकार को थोड़ा
12:32और छोड़ने का, अपने प्रेम को थोड�
12:35और बढ़ाने का, यही यात्रा धीरे धीरे उसे उस अवस्था तक ले जाती है, जहां वो बाहर से सामान्य दिखता
12:42है, लेकिन भीतर से पूरी तरह स्थिर और संतुष्ट होता है, और तब वो समझ जाता है कि दुख का
12:49कारण धर्म नहीं था, बलकि धर्म को गलत तरीके से
12:52समझना था, जब धर्म केवल बाहरी क्रिया था, तब वो बोज बन गया, लेकिन जब वही धर्म भीतर उतर गया,
12:59तो वो मुक्ती बन गया, यही वो अंतिम सत्य है, धर्म हमें बदलने के लिए है, हमें हलका करने के
13:06लिए है, हमें मुक्त करने के लिए है, अगर धर्म के बा
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