00:04अगर कोई कोई कहता है आपको कि आपको परने वाले ने दिया इसका पालन भी करना चाहिए तो सारी चीजें
00:22अलग अलग है आप में कहां बढ़केगा रेखिए धर्म का जो पहला संबंद है
00:28वो दुनियादारी से नहीं है नैतिकता से नहीं है समाजिकता से नहीं है रीत रिवास से नहीं है उपर वाले
00:35से भी नहीं है धर्म का पहला संबंध अंदर वाले से है क्योंकि जो तड़ रहा है वो अंदर है
00:42उपर नहीं
00:46ये बड़ी भरांते हैं कि धर्म का केंद्रिय संबंध किसी बाहरी शक्तिय सत्ता से है
00:54धर्म शुरुआत होता है हमारी अपनी वेदना से
00:58वेदों का नाम दो जगह से आता है और दोनों ही जगह से उप्युक्त बहुत
01:03जानना और पीड़ा में रहना दोनों ही विद्धातों में नहीं थें
01:09तो धर्म की शुरुआत हमारे भीतर की बेचैनी से और खलबली से होती है
01:14धर्म को वहां जाकर के पूछना है कि क्या है क्यों है और इसको मिटाने के लिए किधर को जाऊं
01:22क्या रिष्टा बनाने से विवाह से या संभोग और जो आप कह रहे हैं उससे मेरी बेचैनी मिट जाएगी
01:29और इमांदारी से जब ये प्रशन पूछा जाता है और जिंदगी का हुलोकन किया जाता तो पता चलता है नहीं
01:34तो ये सब भी अंदविश्वासी है कि धर्म के नाम पर आप बातें करें संभन्धों की संभोग की या उपरी
01:42शक्तियों की या प्रथाओं की या अपने कुनबे की या अपने पंथ की धर्म का इनसे बहुत बाद में लेना
01:49देना हुआ
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