00:00जब हम सोशल मीडिया कंजम्शन करते हैं, कैसे इस चीज़ को समझें कि वो फुराग बन रहा है या सही
00:05केंद्र की तरफ हमें लेके जा रहा है
00:09वो एक साधारन फिल्मी गाने में भी फिल्मी गानों के देखने में भी आईना ही दिख जाए उसको
00:14और कोई ऐसा भी हो सकता है कि उसको बैठा गर कि तुम दो घंटे का कोई ज्यान वर्धक पूरा
00:19एक वीडियो दिखा दो
00:20या कि 400 पन्य की कोई किताब पढ़ा दो लंदी चौड़ी और फिर भी इसमें जो लिखा था वो उसी
00:26को देखता रह जाए उसके माध्यम से खुद को न देख
00:29कोई ऐसा भी हो सकता है कि बिलकुल साधारन से सस्ते किसी फिल्मी गाने की रील में भी अपनी जिंदगी
00:36की हकीकत देख सकता है
00:37और कोई ऐसा हो सकता है कि तुम उसको दर्शन की एक मोटी किताब दे दो पढ़ने के लिए
00:41वो किताब को पढ़ रहा है और उसको लग रहा है कि ये सब कुछ किसी बाहरी जगत के बारे
00:47में है
00:47जब कि कोई भी किताब अगर सार्थक होगी तो उसका संबन बाहरी विशह से कम आप से ज्यादा होगा
00:53नहीं नजर की अपनी इमांदारी की बात है
00:55दोरा रहा हूं यहां कुछ भी नहीं है त्यागने लाया कुछ भी नहीं है
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