00:00और ये भी आजकल बड़ा प्रचलन है
00:01फैशन बन गया है, लोग कहतें मैं मंदिर नहीं जाता
00:04मैं मूर्ति पूजक नहीं हूँ
00:06ये मूर्ति पूजा हो गहरा हम नहीं जानते
00:08जो भी कोई परम सत्ता तक जाने के लिए
00:11ये किसी भी तरह के पदार्थ का सहारा ले रहा है
00:13वो मूर्ति पूजक ही है
00:15और पदार्थ का सहारा तो सभी ले रहे हैं
00:18अगर तुम किसी खास जगह जाते हो
00:21ये कहके कि ये मेरा तीर्थ है
00:23तो तुम पदार्थ का सहारा ले रहे हो या नहीं ले रहे हो
00:26अगर तुम किसी खास दिशा को मूह करके प्रार्थना करते हो
00:30तो तुम पदार्थ का सहारा ले रहे हो या नहीं ले रहे हो
00:33दिशा भी तो मूर्थ होती है ना
00:35अमूर्थ में तो कोई दिशा ही नहीं होती
00:38मूर्थि पूजक सभी है
00:39बस कुछ लोग कहते हैं कि
00:41हमारी तरह की मूर्ति पूजा करो, तुम्हारी तरह की नहीं
00:44दुनिया में कई धर्म हैं जो सगुण ईश्वर की उपासना करते हैं
00:49और कई हैं जो निर्गुण की उपासना करते हैं
00:52पर फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस धर्म किस पंत से हो
00:57सब मूर्ती की ही पूजा करते
00:59आपने सुन लिया कि
01:01मूर्ती अमूर्त का द्वार है
01:03और एक बिंदु आता है
01:06जिसके बाद मूर्ती अवश्यक नहीं रह जाती
01:08और ये सुन करके आपने सोच लिया
01:10कि अम मेरे लिए भी मूर्ती अवश्यक नहीं है
01:12मैं कहा रहा हूँ 99% लोगों के लिए साधना के 99% काल तक मूर्ति आवश्यक है
01:19वो बिरले होते हैं
01:21जो मूर्ति से उतिर्ण होकर के फिर निराकार में अमूर्त में प्रवेश कर सकते हैं
01:27बाकियों को तो मूर्ति चाहिए ही
01:29आप छोटे बच्चे को क्या निराकार ब्रहम से परिचित कराओगे
01:34वहां तो मूर्ति का सहारा लेना ही पड़ेगा न
01:37और ये तो छोड़ो कि छोटे बच्चे को मूर्ति की जरूरत है
01:4099% वयसकों को भी मूर्ति की पूरी पूरी जरूरत है
01:45तो कोई भी जल्दी से ये आगरह ये डावा कर ही न दे कि मुझे मूर्ती नहीं चाहिए
01:52सबको चाहिए
01:53कोई बिरला ही होता है जो अमूर्त में प्रवेश का अधिकारी बनता है
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