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क्यों खास है लखनऊ का खानपान और जायका? आजतक के मंच पर दिलचस्प चर्चा
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00:00आप सभी श्रोताओं का दर्शकों का स्वागत है
00:05साहित आज तक के इस मंच पर मैं आप सभी लोगों का स्वागत करता हूँ
00:11मैं हूँ कुमार विशेग जैसा जेपी जी ने बदाया भी
00:14सचमुच ये सेशन इसलिए भी खास है क्योंकि लखनव की पहचान अगर होती है
00:22लखनवी, लखनव की पहचान यहां की नबाबियत, नबाब, कबाब
00:28ये तमाम ऐसी बातें रही हैं जिसने लखनव को पिछले दो-तीन सौ सालों में अलग तरीके से तराशा है
00:36लेकिन क्या नबाबों के पहले भी लखनव था, था तो कैसा था नबाबों के अलावा नबाबों के साथ है
00:45एक कबाबों के पहले का वेंजन क्या था, पाक कला क्या थी, मिठास क्या थी
00:51और नबाबों के जाने के बाद का लखनव क्या है उनके वेंजन उनकी मिठास क्या है
00:57तो आज इसी पर चर्चा हमारे साथ जो पैनल है वो स्टीम पैनल है
01:02और सारे लोग ऐसे हैं जिनका तारूफ अभी जेपी जी ने कराया भी
01:07और सब कम से कम इसके हस्ताक्षर है
01:10तो आप सभी लोगों का स्वागत हैं हेमिन जी आपका बहुत स्वागत नवलकान जी आपका ही बहुत स्वागत और अरशाना आजमत जी आपका ही बहुत स्वागत
01:17मैं थोड़े थोड़े बातें इन दोनों के इनके बारें बता दूँ अरशाना आजमत जी जो हैं
01:22वो खुले विचारों को प्रश्र देने वाली महिला लगातार अपने विचारों के लिए लेखनी के लिए जानी जाती है
01:29Sex Society and She, ये किताब इन्होंने लिखी है
01:33और समाज में किस तरीके से एक और विचार है उसका प्रज़ित तो करती है
01:40स्वागत है आपका मैडम
01:41नवलकान जी लखनव के जाने माने चेहरे हैं
01:45अगर आप लखनव को फॉलो करते हैं तो नवलकान जी अपने आप आपके समें होते हैं
01:51तो पत्रकार, लेखक, सुतंतर टिपनिकार, कई अखवारों में इन्होंने काम किया संपादक रहे
01:59लेकिन इनकी कई किताबें आई जिसमें अभी हाल में गुमनाम राजा टिकैत रहा है
02:06इन्होंने नबावों के पहले की किताबें इस किताब में कहानिया लिखी है
02:10इतिहास लिखा है
02:12लखनव का सच्चा इतिहास जाबाँज राजा दिगविजय सिंग ऐसे तमाम किताबें इन्होंने लिखी है
02:17और हमेंदर धर्व साब ये पॉड़कास्टर भी रहे हैं
02:22पाक कह सकते हैं कला व्यंजनों पर इनकी खास महारत है
02:26स्वागत है आपका
02:27लेकिन हम शुरू करते हैं आपसे
02:29नवलकान जी
02:31जब हमने बात की कि
02:34घैर नवावी वेजेटेरियन
02:36मतलब कि नवाबों के पहले नवाबों के बाद और नवाबों के वक्त
02:40कबाब के अलावा भी बहुत सारी चीज़ें ही
02:44लेकिन आपने लिखा है
02:46टिकाय तराय के बारे में
02:49तो थोड़ा सा इंसाइट दे दीजिए
02:51ताकि हम हमारे दर्शक यह समझ सकें
02:54कि लखनों में नवाब और कबाब इसके अलावा भी बहुत कुछ है
02:58मैं तो आपको सबसे पहले धन्यवाद दूँगा
03:02एक फिल्म आई थी जिसमें
03:03मा कहती है कि मेरे करण अरजुन आएंगे
03:06अहल्या इंतिजार करने थी श्री राम का
03:09अब मैं इंतिजार कर रहा था कि कोई यह तो पूछे कि
03:12भाईया नवाबों से पहले लखनों में कुछ था
03:14या नवाबों के जाने के बाद लखनों में कुछ था
03:16या कबाबो बिरियाने की सिवा भी लखनों में कुछ होता है
03:19तो आज तक और कुमार भाई आपका बहुत बहुत धन्यवाद
03:22ये नवाबों का जो तिहास है
03:241775 में आसिफूत दौला जब शुजाओ दौला की मौत के बाद
03:28नवाब बने तो उन्होंने अपनी राधधानी को लखनों शिफ्ट किया
03:331775 से फिर 1856 में अंग्रेजों ने जो वाजिय दिली शाह थे उनको अपदस्त कर दिया
03:42और कुलकता भेज दिया
03:4581 साल का दौर तो टोटाल 81 साल का नवाबी दौर है
03:50और लेकिन दोर इतना हावी है और जितने भी किस्साग हो थे जितने भी इतिहास करते हैं
03:56उन्होंने केवल जिस नवाबित का जिक्र रे किया वह बड़ा कल्चर विता और उन्हें तमाम इमारते बनाई जब दिली उज़र रहा था
04:03तो वो आज के जमाने में होता तो सरकार कहती है देखे दिल्ली सरकार निदी पर ही हम रोज़गार दे रहे हैं तो वहां से जितने शायर थे जितने खानसामा थे तमाम लोग यहां लखनौ आके बसे और लखनौ एक बहुत बड़ा मरकज बहुत बड़ा सेंटर बन गया तो �
04:33पर रोल रहा है पूरी हिस्ट्री आपको बताओं तो यह तो काफी लंबा हो जाएगा लेकिन थोड़ी सी बात इस पर जरूर होगी कि लोग जानना चाहें कि कोई भी आता है तो यह जानता है कि लखनौ आ रहे हैं तो चलो पहले जरह नवाबों की इलाकों को घुम लें क�
05:03वो अवत था और उस अवत का एक हिस्सा एक शहर था जिसको लक्ष्मन जी को कहा जाता शीरनाम जी ने सौपा था और जहां पे इसमें टीली आली मजजीद इसको लक्ष्मन टीला कहा जाता था और वहां पे शेशनाग जी का मंदिर उवा करता था और वो औरंग जेब के ज
05:33लाखन पासी पासीयों का बड़ा थी हासराज इस पर आज तक अभी लखनों में चर्चा नहीं हूँ लाखन पासी यहां पर 1000 से 1030 के बीच यहां का जो है शाशक था और इसको फिर युद में जो महमूद गजनवी था उसके जो भांजा था सालार उसने उनको परास किया उसक
06:03बिजली पासी यहां पर 1190 के आसपास यहां के राजा बने और बिजली पासी ने बारा किले हां बनवाए थे कुछ किले तो उसके ज़ेटी नवस्ता मैं है यह पुराना किला आप नाम सो दो फिर नाम का ही किला है तो यह कुछ बचे हुए चीज़ें उसके बाद शेक जा�
06:33तो आज भी सरकार का निशान है उसके बाद जब और उरंग जीप की मौत के बाद जब यहां पर
07:03नवाब बनाये गए फैजाबाद के जो मतलब यह आसिफुद्दालों के परिवार करते जो पहले नवाब बनाये गए बुरहानुल मुल्क तो जब वह आ रहे थे तो शेख्जादों का अचना प्रभाव था कि वहां पर उन्होंने में गेट पर तलवार लटका रखे थी और
07:33जो शेख्जादों के जो शुरुवाती शाहसकते वो यह मना जाता था वहां पर जो जाता था उसकी मननत पूरी हो जाती इता बीसिकली निदान महल था बाद में वो नादान महल हो गया
07:43और उसके बादा सिफ़ दौला है, तो ये हिस्ट्री जो है, यहां से शुरू होती है, तो काफि उस्तार है.
07:49तो ये लखनव को ऐसी हिस्ट्री है, जो अंजान गुमनाम हिस्ट्री है, जिसको की लोग कम जानते हैं, लेकिन क्रेडिट जाता है नवल जी को, जिन्होंने बहुत कुछ ढूंड करके लखनव के बारे में निकाला, नवाबों के पहले भी.
08:01हिमेंद्र जी, आपके पास आते हैं, मैडम आएंगे उसके बाद. हिमेंद्र जी, ये तो इतिहास हो गया, कि भई नवाब थे, नवाबों के महल, नवाबों के आर्किटेक्चर, लेकिन कबाबों के पहले क्या था? कबाबों के बाद क्या है?
08:17जैसा कि नवाल सर ने भी धन्यवाद दिया आपका और आज तक का मैं भी देना चाहूंगा, क्योंकि मेरे साथ एक प्रॉब्लम रही कि मैं पूरे भारत बर में घुम घुम के मैंने नौकरियां कियें काम किया है, लेकिन लोग ये जब जानते हैं कि आप लखनों से हैं तो
08:47यमना और गंगा के बीच का जो छेत्र है जहां पर हर चीज उगती थी, तो मौसमी सबजीयों के उपर भी बहुत जादा जोर हुआ करता था, जैसे कि निमोना एक डिश है, जो हम लोग खाते हैं, सरदियों में उत्तर भारती है, यूजली उत्तर प्रदेश और बिहार में
09:17तेहरी. अच्छा, तेहरी की भोज खूब होती है. बिल्कुल, लखनों में बहुत भोज होती है, लेकिन यहां पर यूजली लोग यहां के बिर्यानी के बारे में बात करते हैं, जो कि आइचली है पुलाव, लेकिन तेहरी एक ऐसी, तेहरी और बिर्यानी में फर्क क्या हो
09:47पगा जाता था वन पॉट डिश हुआ करती थी तो तहरी भी यहां से निकली साथी साथ बथुवे का राइता अगर आप लोग शायद खाते हैं वो बढ़ा मशूर है और लखनों में होता बाकि और जगें होता नहीं है तो अगर बथुआ हो रहा है यहां तो ही तो उसका साल
10:17अच्छी बिल्डिंग्स बनी और क्योंकि वो खाने के शौकीन थे तो फिर खाना भी उसी तरीके से डेवलब अपुआ ब्रामणों का खाना अलग था कायोस्तों का खाला अलग था मुस्लिम परिवारों का अलग खाना था तो उनका जो खाना था उसकी जो इंडियन या कह �
10:47बिरादरी थी उस वक्त की या कायश थी वो क्या उनका खाना उनका उनका उनका जो वेंजन था वो क्या अलग था सब मिक्स्टों गए फिर नहीं देखिए टोनालिटी सिमिलर हुआ करती थी क्योंकि पढ़ने वाले मसाले वही है सामान वही है फर्क आजाता है कि कोई मांस
11:17क्या प्रों की सिमिलर टोन पे सिमिलर टेस्टेस्ट लोगों को मिले और वो जो मांस वाला उप्षण वो उसको नहीं चाहिए वो भी मिले तो जैसा अब ही हम लjust के बढ़े पहले डिस्क्ष भी कर थे कि कायस्तों के खाने में क्या अ कर्क त्ष्ड ते काय verbessering का जो तो झा�
11:47है लेकिन मेरे हिसाब से जो सबसे आदा रिच डाइनिंग टेबल था वो कायस्तों का हुआ करता है तो अर्शाना जी को अब
11:56सुनेंगे किस्सागोई के लिए जानी जाती है और जैसा मैंने बताए कि बड़ा बेबाक विचारों को रखती है लेकिन
12:03अर्शाना जी आप की कहानियों में भोजन की भी एक बड़ी जगा है तो आखिर इस किस्सागोई में ये व्यंजन ये पाक कला ये भोजन ये कहां से आता है ये कहां आता है
12:17क्योंकि हम जब भी सबसे पहले तो आदाब आप सबको और बहुत बहुत शुक्रिया आज तक को और आप लोगों को इतनी धूप में आप लोग आए भी और क्योंकि हम जब भी बात करते हैं जैसे मैंने जब करना शुरू किया तो जो वेजिटेरियन टिशेज हैं उनके सा
12:47है वो बड़ा निगलेक्ट हो जाता है उसकी कोई जगे होती नहीं है जल्दी सोसाइटी में तो उसके बारे में किसी ने बात नहीं की इसलिए वो वैसे ही रहके चला गया तो मेरे जहन में था कि मैं उन चीजों को लाओं और नवाब जो थे वो वेजिटेरियन भी खाते थे
13:17दें किसी को पतानी पर उनकी खासित थी वो डाल बनाते थे और सिर्फ डाल बनाते थे एक डिश
13:22बस और उसके लिए उनको सालार जंग ने बुलाया डाल के लिए
13:26कि आप आईए और बनाईए वो आए और उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ एक डाल बनाऊंगा
13:31और उस जमाने में उन्होंने कहा कि मैं बारा सो रुपे महीना लूँगा
13:34किस वक्त की बात कह रही है आप
13:35सालार जंग मतलब सत्रह सो के थोड़ा सा आगे की बाद
13:39सत्रह सो साट में बारो सो रुपे महीना
13:42जी जी जी और उनको रखलिया सालार जंग जी ने कि भई तुम बनाओ डाल
13:46अच्छा वो रकाब्दार ने बनाई डाल और बना के नवाब साहब को बताया गया
13:50कि में डाल बन चुकी है आईए
13:52अब नवाब साहब जो थे वो दस मिनट तक आई नी
13:54तो जो रकाबदार थे वो नराज हो गए
13:56पंद्रा मिनट नी आए बीस मिनट नी आए
13:58अच्छा रकाबदारों में भी जो था
14:00वो बड़ा आजकर लोग भौकाल वर्ड यूज करते हैं
14:03मैं वो नी बोलती हूँ वो हमारी तहजीब का
14:05शब नहीं है हमारे आटिट्यूड होता था
14:07तुम होगे नवाब हम है जो है
14:09रकाबदार हमारी अपनी पहचाने है ना
14:11यह वो जमाना तो थानी की जैसे आज है वो
14:13यह सरवाला ना कि जो तुमको पसंद हो वही बात कहेंगे
14:16तुम दिन को कहो रात हम रात कहेंगे हम नहीं कहेंगे
14:19उन्होंने का ऐसा है नवाब साहब जाएं हम भी जा रहे हैं
14:22और वो दाल फेक के चले गए
14:24अच्छा
14:24अब जब वो फेक के चले गए तो नवाब साहब नी ढूंडा वो मिले नहीं
14:28नहीं मिले नवाब साहब ने कहा जाने दो
14:30वो दाल जिस जमीन पे फेकी गई थी
14:33वो पत्रीली पत्रीली नहीं मिट्टी वाली जमीन होगी
14:36और चार-चे महीने बाद वहाँ फूल खिल गए
14:39पौधे निकल आए
14:40तब नवाब साहब को समझ में आया कि उस दाल की क्लीमत क्या थी
14:43वो सिर्फ जाइका नहीं था जो यहां का वेजिटेरियन फूर था
14:47उसमें पॉश्टिकता कितनी थी
14:49और इसलिए उसकी कीमत थी
14:51और इसलिए उस रकाबदार को अपने उपर इतना वुरूर था
14:54कि ये मैं बना सकता
14:55बहुत बढ़िया बहुत शांदार ये किस्सा आपने सुनाया
14:57कि एक रकाबदार
14:59जो आपने कहा कि भौकाल शब्द इस्तेमाल बेशक ना करें
15:04लेकिन उनका attitude किसी बहुत स्वायक था वो
15:07स्वायक था
15:08आप वेच पे बात कर रहे थे
15:10तो मैं चार लाईने लिखके लाई थी
15:12अगर आपके पास समय बहुत में सुना दूँ
15:14उसमें शायद थोड़े बहुत जायके आजाए
15:16कुछ की बात भी की है हमारे
15:17साथ के लोगों ने
15:19आलू की तहरी सर्दियों का शबाब है
15:23आलू की तहरी सर्दियों का शबाब है
15:25बैगन का भरता बनता ला जवाब है
15:28अमरूत की चाट की रवायत पुरानी है
15:31सोट के लड़ू सेहत की निशानी है
15:34और रसावल की अलग कहानी है
15:37बहुत बढ़िया शल्जम के सालन का दस्तूर है काली गाजर का हल्वा मशूर है शकरकन की खीर बनती जरूर है घुगरी पूरी हल्वा तो कभी सबजी हरी मटर का हरेक को फितूर है
15:49पुराने लखनओं से खोए पटी की सदा आती है ये सब विच है मलाई मक्कन खाने तो पूरी दुनिया आती है निमोना सर ने बात की थी निमोना से अकसर दस्तरफ़ान सचता है उलत की डाल में पालक डाल सक पैता बनता है सिंगाडे के बिना कहीं सरदिया कती है सरसो मेथी �
16:19अगर खानपान में जिन्हें इंटरेस्ट रहता हो इस तरीके से आपने इसको शब्द दिये हैं कि वेंजनों का की कविता मुझे लगता है कि बहुत रेर ही आपको देखने को मिलती होगी कि कोई वेंजन की बात करे और उस पर इतने बढ़िया शब्दों को गुत शुक्र
16:49शब्द और वो यहीं की है यह जो आपने आलू आली बात कही आलू की तहरी यह सब चीजें लखनपान की ऐसी घुल मिल गई है बेशक ठीक है लखनपान की अपनी एक संस्कृति अपना एक समाज रहा जिसने की कवाब को भी दुनिया में देखने पूछने लोग लगन आ�
17:19इसमें जो गैर नवावी वियंजर हम लोग कह रहे हैं तो क्या यह सचमुची यह गैर नवावी ही रहे या नवावों ने भी इसे बढ़ाया नवावों ने भी बढ़ाया जैसे मैंने आपको दाल की बात बताई और उसी तरीके से जो नवाव थे जो अवत का भंडारा है �
17:49नवाव जो थे वो खाने वाले और बटवाने वाले थे बनाने वाले जो थे वो तो सब हमारे आपके जैसे आम लोगी थे तो वो वहां से आया जो उसका कनवर्जन था मैं एक चोटा सा किससा आपको सुना देती हूँ उससे आपको समझ में आएगा और फिर मैं बताऊंग
18:19तो इनको बुलाया गया इंतियास कुरेशी और इनको बताया गया इनोंने कहा ठीक है मैं बना लूँगा कोर्मा कबाब मुझे क्या परेशानी है दूसरे दिन प्रोटोकॉल आया तो प्रोटोकॉल में यह था कि आज पंडित नेरू वेच खाएंगे
18:41तो फिर से इनसे कहा गया कि सारी तैयारी छोड़ दो तुम वेच बनाओ नेरू जी के लिए पहले नॉनवेच की तैयारी थी थी लेकिन अब इनूने कहा मैं तो वेच बनानी सकता तो इनूने सीधे मना कर दिया तो फिर सीभी गुप्ता जी ने उने खुद बुला के कहा कि क
19:11उसके बाद बात हो गई दूसरे दिन जो था वो डाइनिंग टेबल सजी सब लोग वहाँ पे आए बैठे और सीबी गुपता ने देखा तो वहाँ पे उन्हें लगा ये टंगली कबाब रखें ये मुर मुसल्म रखा है ये जो है काकोरी कबाब रखें तो उन्होंने बुला
19:41तो तरोई है और ये जिसे आप काकोरी कबाब कह रहे हैं ये मासूम सी लोकी है तो खेर पंडिक नेरू आए खाया पिया गए बड़ी तारीफ हुई उसके बाद वापस ही भी गुपता ने उनको बलाया वो सिर्फ एफ खान सामा थे और उन्होंने कहा कि तुमने इतनी अ�
20:11सोराम पर अनवप्रा सलंगार नहीं मिल रहा था तो कायस कुजीन हो गया वो किसी जाती के लिए नहीं है लेकिन हाँ वो शाका हाडी खाना है उसके लिए है उन्होंने क्या कि जब
20:20वो वेज वर्जन में गए तो उन्होंने वो सारी चीज्जों वो
20:23क्ली कीम्लम में वेज तै, उनको सब्जियों के साथ लेके
20:26बना दिया, तो वो करेले के कोफ़े बनने लगें, वो जो है
20:29गोभी मुसल्म बनने लगी, वो जो है, पालक डालके
20:32गोष्ट बनता था नवाबों किया तो गोड़ डाल के बनाने लगे तो इस तरीके से उन्होंने उसको एक्सपेरिमेंट किया
20:38नहीं बहुत बड़िया मतलब सिर्फ नाम का फरक है यह यूँ कहें नाम का भी फरक नहीं है सिर्फ गोश्ट और सबजीयों का फरक है बाकी सब पेस्ट वही रहे गए और यही साथ इस अवद की धरती की पहचान रही कि चाहे जो यहां आया वो यहीं का हो करके रह गया रं�
21:08नवाब हुआ करते थे तो आपने टिकाइट राइक के बारे भी लिखा लेकिन जो हम खान पान की बात करते हैं तो नवाबों के पहले के कुछ ठिकाने रहे वेज खानों के यह गयर नवावी खानों के कोई टिकाने है या उसके तुरंट बाद जिसे के अपने ढूदा हो �
21:38मुसल्लम जितने भी आइटम थे सब नॉनवेच के थे लेकिन गो भी भी मुसल्लम निकाला गया वो उसको चॉप जिटीरियन बना दिया गया तो बढ़ खने कश अनवात थे हुआ नवात थे उनक्यड होते थे उहां
21:51खाना बनाते थे बावर्ची होते थे और रकाबडार होते थे रकाबडार भी स्पेस्टलिस होते थे वह एक ही चीज बनाते थे रोटी के लिए नान्फू हुआ करते थे वह केवल रोटी ही बनाते थे रकाबडार का वोकाल तुम लोगों ने देखी लिया लेकिन जो कायस्त
22:21जो तिल पर सूखे मिर्चे पीस कर सालन बनाती थी, सहर से शाम हो जाए, मशुरूफ रहती थी, मगर मुस्कुराती थी, तो पहले काम को भोज नहीं, खाना बनाने को भोज नहीं समझा जाता था, खाना बनाना एक आर्ट होती थी, और उसकी बात करना, उससे जुड़ा रहन
22:51हमारा बहुत पुराना खाना है, और यह माना जाता है, जिसे शीर सागर जहां विश्लूजी सोते थिल, वहां वो छीर सब बनाए उसी से खीर शबदाया है, तो खीर के तीन वर्जन लखनों में डवलब हुए है, जिसे खीर थी, फिर जब इसलामी शाशक आए, नवाब आ
23:21तो उनके लिए फिर शाही टुकळा बना और शाही टुकळा और बिजय के बना था, लेकिन यहां पर जो मुलामियत और पाचन हम लोग क्या खाने से जादा उसको सिहर पर देया यहां के जो नवाब थे ना वो बिसिकली आप इसको इसको बड़े आपको रोचक चीज बता
23:51जाना और आनन लेना था और तो महना ज्यादा नहीं करते तो उनको खाने के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत होती थी कि खाना उनको पच जाए इसलिए जो लखना को कवाब यहां जितनी भी डिशाद देख लेजिए वो बड़ी सुपाची डिश है दिल्ली में भी जही सब
24:21और इसके लावा खाना परोसना भी लखनौ में बहुत बड़ी कला के रूप में देखा जाता था इस तरह का नहीं था कि मतलब कैसे भी देदो खाना वो यहां पर बेद्वी समझी जाती थी पान पान तक जो है बेजने के देने के तरीके होते थे जैसे आज कल का दौर तो
24:51निगicon कि खाने के शाने पर कुलचर का जनाध्ळ का द्राप कंदा के अट तो यह जommes एक तरो कौने को भाजक्त के ऐसे थे थे
25:01सब्सक्राइब hasn頭 Japanese नार अटे तो पीटल के बर्तन होते दे जब अंग्रेज के गया तो पोर्सलीण के बरतन भी इस्तेमाल अगए और एक चेन
25:10खाना होता था चीन खाना जिसमें बरतन रखने का भी तरीका था कि कैसे कोन बरतन रखा जाएका और
25:16बुझे जाती है तो उन परतनों को रखने के लिए विशेष लूप से बना होगा तो वहां से यह चला नुझे पान की बात हुई तो फूरा पत्ता खाय जाता है पूरा पत्ता है उसमें लगाते हैं यहां पर हर चीज में मुलाइमियत में आपको पता ही निया वो ज़िरूर
25:46इधर से कटके और फिर असे कटके तो वो बीच की दंडी निकल जाती है तो दो जोड़ा मना के दिया जाता है यह चार पान दिया जाता है लेकिन वो सुपाच्चे हो आप आराम से पज जाए आप उसका अनद ले पाए खाने के लिए बहुत बढ़ा मुना खोला जाए यहां
26:16सबको कुछ न कुछ कहना है तो हमें जी इन्होंने जो बात कही इसमें क्या वैल्यू एड़ आप कर रहे हैं
26:24मैं सोचना था कि पान के बारे में कहीं मिस्न हो जाए और अच्छ वहा कि पान की बात हो गई यह बहुत अहम बात है कि मतलब पान तो पूरे हंदुस्तान में खाया आता है बनारस का फेमस है लेकल लगनाओ की खासियत जो शर ने बता है वह एक्शली यह है कि कोई भी चीज �
26:54बढ़े हैं की जाए लगा कि क्यूश आओ जोड़े लगा करक्क क्हाने वाली बात थैंक्यू सो मचछ मैचा अधरौि कोई न को इसके बात कर ले बाकी जैसा की बात थि परियानी की तो बिरियानी की बारे में अच्छी डीटेल में हम लोग ने बात लेगे क्रीप लगन की
27:24लगनों की और इंस्टागम तो आजकर बड़ा फेमस है यहां के एक बड़े फेमस शेफ है रणवीर ब्रार उन्होंने तो बहुत साफ सा बताया भी यह और एक्टिक कॉलकाता को बिर्यानी देने वाले हमी लोगते लगनों से अगर नवाब साभ वहां नजर बंद नहीं होत
27:54बिल्कुल बहुत सूक्ष चीजें आप लोग बता रहे हैं मैडम आप कुछ कहना चाहरी थी जब लगनों की अलग अलग खाने की जो रवायते उनकी बाते हुई आप एक तो पान वाली जो बात कही ने वह बहुत सही बात है कि पान जो है वह हमारे एटिकेट्स को दिखात
28:24और मैं आपको बताओं कि पांदान जो है उसकी बड़ी रवायत रही और एक जमाने में यहाँ जब शादी होती थी तो दुल्हन के घरवाला दुल्हन कहां से आई है उसका जो इस्टेटस है वो इस बास से तह होता था कि पांदान कितना बढ़ा लाई है मतलब इतने बड
28:54कि अधिए जन्न तो तरीका था ही पान के पीघडान का भी तरीका था बतला कर आप पीघडा जो रखा रख यह अंगे होते थे उसमें हाथ ऐसे लगा कि मानन और आपका हाथ लगा ऐसे कर दिया आपने तो मतलब इसको गुना माना जाता था आप शादी पहले यह कै यह तया �
29:24इनकी जाड़ी है, इसको हर महीने कितने पैसे दोगे खर्च करने के, और वो घर का खर्चा नहीं होता था, वो जो चाहे करें उसका, तो उसको पांदान का खर्चा कहते थे, वो एक रवायत थी, थोड़ा समय डिसागरी करती हूं, कि जो नवाब जो थे वो जगला नहीं करत
29:54वो थोड़ा सा पीछे चली गई है, क्योंकि जब आसिफुद दौला आय थे, तो तब अंग्रेजों की रेजिनेंट यहां रहने लगे थे, तो उससे पहले वो अंग्रेजों के यहां पर जितनी भी चीज़े चलती थे, नहीं नहीं वो तो लखनव के पानी में ही है, मु�
30:24राजा डिंविजे सिंग के ऊपर, जांवाज योध्दा डिदीविजे सिंग, वो किताब ऐसा करेक्टर आप लोग में से उमराओ जान के पारे, कितना लोग जानते हैं को, हात्व कढ़ा कीजिये, मुरे खाल से मिरे कहल से लिए फिल्म के देजों के और में तो सब जानत
30:54अग्रेजों के खिलाब पहले राजा थे और उसके बाद जब 1888 में पूरी क्रांती दबा दी गई और क्रांती दबाने के बाद सब लोग जो चले गए नेपाल जितने लोग जिन्दा बज गए थे वो नेपाल चले गए दिगविजे सिंग भी गए लेकिन उनको यह गवारा
31:24देदी काला पानी में भी मौत हो गई मम्मू खान के बारे में लोग नहीं जानते होंगे अंग्रेजों ने यहीं जो लक्षमान टीला है वाँ चालीस लोग को फांसी दी ती चालीस लोग को लटका दिया था और बॉडी उतारने नहीं दी कि जब तक पूरी गाली गल ना �
31:54दी मतलब यह होता है कि पेल पे जिसको फांसी देना लटका दिया जाता है और पूरे लोगों को दिखाया जाता है कि देखो यह जो लोग यहां पर बिद्रो करें उनका यह करेंगे और उन बॉडी ओंको चील कव्य काट के खाके जब खतम कर देते कई दिन बाद जब खाल
32:24तो यह एक अच्छे संसकारी लोग थे लेकिन किसी एक ही जगे से हम लोग जो आपने अच्छा टो भी रखा फिर से मैं शुक्रिया करो कि इस वजह से हम और बाकी जो आयाम उसके चर्चा कर पा रहे हैं
32:49चलिए बस छोटा छोटा आंसर आपसे भी कि अगर हम पीछे का दौर देख लें और आज के दौर देख लें तो लखनव ने अब बहुत सारे नाम दे दिये हैं
33:01टुंडे कबाब प्रकाश कुलफी बहुत सारे नाम है जो इस वक्त देश दुनिया में चल रहे हैं अब तो सरकार भी
33:07वन डिस्टिक्ट वन कुजीन जैसी चीजों को लेकर के आ रही है वन डिस्टिक्ट वन प्रोड। था ही तो बस आखिर में छोटा सा जबाब क्या लखनव अपने खानों के लिए अपने जाएके के लिए लखनव सदियों काई सौ सालों से जो जाना जाता रहा है इसमें ल
33:37कि आएंगी जाएंगी लोग आएंगे जाएंगे लिकिन जो इन फिजाओं में जो जो क्या कहते हैं डीयेने जो कहते हैं यहां की हवा का यहां की सभविक्ता का जो वो हमेशा रहेंगा तो पहले से लेकर आज अज तक कुछनकुछ उसमें अड ही हुआ है तो मैं बड़ा प�
34:07तब तक कुछ न कुछ अवद छेत्र जो है, संसार को देता ही रहेगा.
34:12बहुत शुक्रे मैडम, आपसे बस खतम करेंगे, आपकी किस्सा गोई है, तो क्या कहेंगे आप चंद लाइनों में, एक सबसे छोटा किस्सा अगर आप यहां की पाक कला पर सुना से.
34:22ठीक है, मैं एक नवाब वाजी दिली शाह का ही सुना देती हूँ, उससे आपको वही बात समझ में आएगी, कि लखनौ जो है, वो अगर आपसे बदला भी लेता है, तो कितनी अदा से लेता है, तो नवाब वाजी दिली शाह के दरबार में कोई उनके दोस मिलने आया, और न
34:52गहा कि यूँता है, यह मेरे रकाब्दार का कमार है, वो नहीं दिखता है, वो होता है, वो दिखता नहीं है, यह दिखता है, मुरबा है मिर्ची का सालन, वह वाजु ऊieza, वो चले गाए, अब नवाब सहाब जानते थे कि ये लखनों की बात है, तो यह मुझसे बदला तो
35:22कि हर चीज को देखा, भाला
35:23और जो मीथी चीज थी, खीर
35:26वो उठा के खाई, तो वो मीथी थी
35:27फिर उन्होंने शीरमाल चक्ती
35:29शीरमाल भी ठीक थी, शीरमाल में होती है
35:31हलकी मिठास
35:33नहारी खाई
35:34उन्हें लगा मिर्चोगी, नहारी भी
35:36ही मीठी थी विर्याणी भी मीठी ती और बाद लो
35:40यह लीने वाले ने दुला लीए है लेकिन बड़ी अदा से लिया जो मिर्ची में खिलाई थी और
35:46ने शककर खिला लिया तो वह लखनいき भेड़ों की अदा है
35:50बहुत शुक्रिया क्योंकि अधा तो मतलब बाद से बता है कि यहां पर वेज की बात कर रहे हैं लेकिन नॉन्वेज और वेज का कनेक्शन है जैसे कि ब्राम्मणों को कहा जाता है कि काइस्तों के घर जाके नॉन्वेज खाने की आगत लगी और यह भी कहा जाता है कि जो न�
36:20कि खा के घुईया क्या सुनाएं आपको साहिरी का बागपन हो गए पालक का पत्ता नाजुकी में जाने मन वाँ वाँ वाँ बहुत शांदार बहुत बढ़िया तो इसी अदा के साथ हम आपना ये शो खत्म करते हैं इस गैर नबाबी वेजिटेरियन का ये सेशन बहुत र
36:50जरब जगा वेज़ की इतनी साथ हक चर्चा कर सकें बहुत शुक्रिया और साना जी आपका भी नवलकिशो जी आपका भी और हमें जी आपका भी बहुत शुक्रिया आप सब्सक्राइब
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