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सच के कितने करीब होती है कविता? आजतक के मंच पर दिग्गज कवयित्रियों के साथ चर्चा
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00:00हम जिस सत्र में अभी बात करेंगे हमारी मेमान है सुशीला पूरी जी पल्लवी विनोजी इन लोगों ने सब्द संस्कार जो हैं उनको न केवल अपने लेखन से जिंदा रखा है बलकि कविता गध्य और सब्द विधा में जो कुछ भी हो सकता है
00:23और विशेश कर प्रकृति इस्त्री और अवद की समवेदना ये अवद की समवेदना क्या है जब हम अवद हैं किसी छेत्र विशेश पर कोई टिपड़ी करते हैं या नाम लेते हैं तो हर अस्थान की अपनी एक अलग महक होती है अलग अपना राग होता है अपना एक अलग �
00:53तक लखनौ के चतुर्थ संस्करण में हम और हर बार यहां का मौसम अलग होता है
00:59और मौसम की ये ध्वनिया बसंत और फागुन के संध ही काल में नहीं वलकि बसंत का ही हिस्सा है फागुन
01:11लेकिन कल भी मैंने इस चर्चा में इस बात का उलेक किया था इसी मंच पर कि
01:19एक श्रिंगार का है और एक अलमस्ती का है उसी तरह से गद्य और पद्य की जब बात होती है
01:28तो दोनों में क्या अंतर है भावनाएं किस तरह से प्रवाहित होती है
01:35और जब कविताओं में कवी जब किसी बात की परिकल्पना करता है
01:40तो चाहे वह कविता का कोई भी स्वरूप हो
01:43गीत का कोई भी स्वरूप हो
01:45चाहे वह फिल्मों में दिखाया जा रहा है
01:47वह चाहे वह सीरियल में दिखाया जा रहा है
01:49चाहे वो अपुस्तकों में हो
01:51कवी को बहुत सारी छूत मिलती है
01:54कविताओं में ही
01:56आप आसमान को छू सकते हो ऐसे
01:57तो छोने के लिए जहाज का टिकट बहुत मंगा है
02:00तो मैं
02:01जो सुरुवात करूँगा
02:03सुशीला पुरी जी और
02:06पलवी बिनोज जी
02:08हमारी मेहमान है
02:09और
02:11कविता की दुनिया
02:14जो है वह सत्य और
02:16कल्पना
02:17यतार्थ
02:19और सम्वेदना
02:22इनके सन्योग से बनती है
02:24इनके बीच
02:25कितना सच बचता है
02:29और कितना जूट मेरा प्रस्न
02:30यहीं से सुरू होता है और
02:32आप दोनों से मैं चाहूंगा
02:33कि जो मूल विशय है उस पर थोड़ा सा प्रकाश जाने
02:39कि आप हमारे इस विशय को किस रूप में देखते हैं
02:43नमस्काल
02:46शुक्रिया आज तक
02:48शुक्रिया जे प्रकाश जी
02:51संजीव सर
02:52शुक्रिया और बहुत स्वागत है लखनों में आप सभी का
02:57आज तक लखनों में आके रोनक कर रहा है और वसंत का मौसम है और धूप खिली हुई है
03:06तो ऐसे मैं कविता की बात अगर कर रहे हैं तो बहुत सुन्दर बात है
03:11और जैसा कि हम लोगा टॉपिक है सच और जूट के बीच कविता
03:16तो मुझे तो लगता है कि कविता हमेशा सच का ही साथ देती है
03:22और सच के साथ ही रहना पसंद करती है
03:25और कोई भी कलावो वो सच का ही साथ देती है
03:29तो जूट से तो उसका कोई नाता है नहीं, लेकिन आज का जो समय है, उसमें सच और जूट का जो अलगाओ करना बड़ा मुश्किल है, बहुत बारीक रेख होती है सच और जूट के बीज, तो कविता को समझना और कविता के साथ रुकना, ठहरना और आत्मसाथ करना बहुत क
03:59मुझे तो लगता है कि ये टॉटिक आपने रखकर बहुत अच्छा किया क्योंकि आज के समय में जितनी कविता की जरूरत है, शायद पहले नहीं रही होगी, क्योंकि आज का जो समय है, बहुत ही कठीन समय है, और सच की बहुत जरूरत है.
04:23माईक?
04:26सबसे पहले तो शुक्रिया, जैपरकाश सर, सही तयास तक, और मेरे सामने बैठे, मेरे दोज, मेरा परिवार, सब का बहुत बहुत शुक्रिया, आप लोग का शुक्रिया कि आप लगनोव में आते हैं और हम लोग को जोडते हैं अपने प्रोग्राम से.
04:41जैसा आपने कहा कि कविता कितनी सच और कितनी जूट है, तो मुष्यू शीला दिदी की बात से मैं सहमत होते हुए इस बात को आगे बढ़ाओंगी कि कविता जूट तो नहीं है.
04:53कविता सच है, वो लिखने वाले का सच है, कोई भी कवि लिखता है तो अपना सच लिखता है, अपने परिवेश का सच लिखता है, अपने मन का सच लिखता है, वो आप तक पहुँचके जूट हो सकता है, जैसे रेकिस्तान में रहने वाले जीव के लिए तो समंदर जूट
05:23जैसे किसी को प्रेम ना मिला तो उसके लिए प्रेम की बातें भी जूट हो सकती हैं, लेकिन कविता जूट नहीं होती है, कविता लिखने वाले का सची होती है, उसके आसपास के महौल का सच होती है.
05:35मैं दरसल इस बिशय को रखते समय हमारे दिमाग में यही बात थी
05:42कि कभी अपनी कलपनाओं में कुछ भी स्रिजित कर लेता है
05:47वह एक ऐसा वातावरन स्रिजित करता है
05:51जिसका सायद सत्य से सरुकार होते भी हो सकता है
05:55उसकी समवेदना से उसकी लेखन प्रक्रिया से
06:05मर्म क्या होता है जैसे माल लीजे कोई प्रेमी है
06:10तो वह अपनी प्रेमी का की आखों को
06:15किसी समरिगनाई नहीं तुलना कर सकता है
06:18भले ही उसकी आखें वैसी नहीं हो
06:20चाद तारे सितारे तोड़ने की बातें कभीताओं में तो होती है
06:26जब मैं बिशाय रख रहा था तो हमारे दिमाग में ये इस तरह की बातें थी कि
06:31जिसका आपने एक संकेत दिया
06:36कि नहीं हम सच लिखते हैं
06:40पूरा अगर वांग में हम सोचे हैं हमारे संस्क्रिट से हम सुरू करते हैं
06:47वेदों से जिसमें मंतर उच्चार हैं और वहां चोकी कभीता की जब बात होती है
06:53तो हमें ये भूलना नहीं चाहिए कि गध्य विधा जो है बहुत आधुनिक कालखंड की विधा है
07:00दुनिया में खासकर भारती साहित्य की बात हम करते हैं
07:04तो सबकुछ पद्य में है और वाचिक परंपरा में लोक में जिंदा रहती हैं इसमृतियां
07:12और जितने भी हमारे नायक हैं सबको हम एक महा मानो महा नायकों की तरह से श्रिजित करते हैं
07:20तो दोनों तरप की बात मतलब मेरा काना है कि पूरा अगर हम भक्ति, कालीन, संत, साहित्य को देखें
07:27और बाद में आधुनिक कविता के कालखंड में भी आएं
07:31तो यथार्थ तो होता है लेकिन उसमें जो कल्पना का मिस्रण है वो सहज नहीं होता
07:38तो एक कवी के लिए सब वो कविता स्रिजित कर रहा होता है
07:44तो ठीक है एक विशेश तरह की भाव, एक विशेश तरह की मनहिस्थिती का सामना करना पड़ता है
07:51लेकिन आजकल जिस समय में हम हैं हैं
07:54वहां बहुत तरह की कविताएं लिखी जा रही हैं
07:57और बहुत तरह से कविताओं की प्रस्तोती हो रही है
07:59रंग मंच पर, सिनेमा की दुनिया में, मंचों पर और फिर पुस्तकों में
08:10ये जो कविता का स्वरूपगत अंतर है
08:14वह किसी कवी के लिए, विशेश कर आप जैसे कवीयों के लिए
08:19कितना प्रभावकारी तत्व है, आप जब लिखते हो, जैसे मान लिजे, मैं आप दोनों से पूछूँ कि
08:26वर्स दोहजार पचीस में, या वर्स दोहजार चोविस में जब आप लिख रही थी
08:32तो आपकी जो मनहिस्थिती थी, क्या आपने जब कवीता लिखन की शुरुवात की, तो उसी तरह की मनहिस्थिती के साथ थी, या वह परिपक्वता बढ़ी है?
08:43सवाल बहुत अच्छा है आपका, जैसे कि जो आज का समय है, वो हमारे लिख कठिन है, जब हमने कवीता लिखना शुरू किया था, तब तो बहुत बच्पन में, मैं तो अपनी बात करूँ, तो बहुत बच्पन से कवीता लिख रही हूं, और उस समय चंद बद कवीताएं
09:13अथार्थ होता था, जादा तर स्रिंगार परक होता था, और उतना मतलब समय को साथ लेकर चलने का उसमें बहुत जादा वो नहीं होता था, लेकिन आज का जो समय, जो कवीता का स्वरू बदला है आज जो, उसमें हम अपने समय को साथ लेकर चलने की बात करते हैं, और अ�
09:43मुझे लगता है कि कविता आज के समय में जादा अपनी भूमी का निभाप आ रही है और जादा कलपना शील है आज की समय में आज के समय में क्यूंकि आज का जो समय है बहुत दुरू है और कोई भी कला जो हो वो जितना ही कथिन समय होगा कला उतनी ही परिपक्को होती है उस
10:13लेकिन वो आज और ज्यादा अपने को व्यक्त कर पा रही है और ज्यादा लोगों तक पहुँच रही है
10:20तो मुझे लगता है कविता की भूमी का इस जगे पर काभी महतुपोंड है
10:25पल्लवी
10:55लिखती थी या प्रेम पे
10:57फिर मेरे सब्जेक्ट समाज ओर दुनिया हुए
10:59हम जैसे जैसे प्रक्रिती से करीब और जाते गए
11:03लिखने के बाग ये भी असर हुआ कि हम प्रक्रिती समाज
11:06आसपास के जितना वातरवेंट हो उसे और जोटे गए
11:09तो उन पर लिखते गए
11:10अब आप कह रहे थे
11:12वो जिसकी बात कह रहे थे
11:13वो अतिश्योक्ती होती है
11:15ये जूट नहीं होता
11:16ये मैं मानती हूँ कि अतिश्योक्ती होती है
11:18अब आखों पर पलकों पर थोड़ी
11:20कोई भी प्रेमका को बैठा के रखता है
11:22प्रेम का अब कभी पलकों पे किसी के बैठ पाएगी, लेकिन लिखने वाले लिख देते हैं, चांद तारे कोई तोड़ नहीं ला सकता, लेकिन आज तक कब से लिखा जा रहा है कि चांद तोड़ के लाये जाएंगे, लेकिन मैं सोचती हूँ, लाइन्स, वो वाक्यों और व
11:52यह भी हो सकता है कि आप उसकी हर मां पूरी करें, हर इच्छा पूरी करें, तो भाव को पकड़ना चाहिए, और जैसे आपने कहा कि कभी-कभी ऐसा, विचाधारों की भी कविता होती है, हो सकता है मेरी विचाधारा से आपको आपती हो, कभी-कभी होती है, हर विचाधारा
12:22वो अपनी मानसिक्ता में कभी जूट तो नहीं लाता है, वो सत्ती ही लिखता है, हमेशा, इसके भाव अलग हो सकते, बहुत अच्छी बात भी आप लोगों को में, आप दोनों को पकड़ता हूँ अभी जहां पर, प्रेम आप लोगों की कविताओं का, मुल तत्तु है, भी �
12:52प्रारमभिक जो अनुभूति थी, और प्रेम का जो वरतमान स्वरूप है, आपकी कविताओं में, आपके जीवन में, और आपकी द्रिष्टि की ब्यापकता में, आपने ठीक है, आपने कहा कि हमने प्रेम से शुरू किया, समाज प्रकृति और वो बढ़ता गया दाइरा,
13:22उस प्रेम की बात कर रहा हूं, जहां से प्रेम शुरू हुआ था, सुसिला पुरी जी लिखती है कि तुम्हारा वच्चुंबन जिसमें घुली होती है इस्वर की आख, जो जंकृत करती रहती है अनुवरत मेरे जीवन के तार, ये जीवन का जो तार जंकृत हो रहा था, �
13:52बहुत कठीन सवाल कर लिया अपने, ये तो देखे, प्रेम के बिना जीवन है ही नहीं, मैं ये मानती हूं, और इस समय तो बसंत चल रहा है, बसंत को भी अभी बात हो रही थी, कि बसंत के बिना जीवन कहा है, तो इसी तरह प्रेम के बिना भी जीवन है ही नहीं, मैं मानती
14:22नहीं है जिसने भी लिखा होगा वो किसी किसी भी तथ्य में डूब कर उससे प्यार करके ही लिख रहा होगा तो दुनिया की तमाम कविदाएं मुझे प्रेम कविदाएं ही लगती है और अभी तो संसार में बहुत सारे यूद्ध हो रहे हैं प्रेम के वरक्स तो मैं तो ही च
14:52मेरे पास अभी भी जैसे पहले था वैसे अभी भी है, तो प्रेम के बिना तो जीवन है नहीं, जिस में आप पूरा समूद्र भिगा देती थी, वो प्रेम पर अभी बर्तमान में भिगाई ही exposed है, तो मैं इसलिए कहा, जिन क्थिन है, जरूर बर्टमान तो आज कि समय में तो
15:22तो आप लोग छोड़ नहीं रहे हो, पर प्रेम भी नहीं छोड़ रहे हो, तो यह अभी आपको मैं टास्क देता हूं, जब तक मैं पलवी विनोध जी के पास पहुचता हूं, और तब तक आप एक कविता डुड़िये अपनी नहीं, जिसमें प्रेम का वास्वर हो, अभी र
15:52जिससे उतर आए, और अभी, फिर वही कहूंगी, भाव पे जाएए सार, शुब्दों पे मत जाएए, चुंबन से अंगड, प्रथन चुंबन से अंगड मैं खोली देती हूं, वैसे भी सब ओवर 18 ही है यहाँ पे, तो प्रथन चुंबन जिसका भी होता है, वो अंगड ही
16:22प्रेमी के सामने, जैसे वैसे आईए न, अपने बच्पने के साथ, अपने मासूमियत के साथ, पहली लाइन दी थी, और दूसरा क्या आपने बोला था?
16:30मैं यह कह रहा हूं कि वरतमान में जो प्रेम का, की अनुभूती है, क्योंकि आपने देखी आप, आपकी उस कविता की जो आगी की पंक्तियां हैं, उसमें आपने लिखा है कि प्रेम संपूर्ण ना हो, पर खुला रहे वह रास्ता, जिससे आती रहे धूप, बउचार, ख
17:00आपने मेरी बहुत अच्छी गविता उठाई है, प्रेम अपूर्ण ना लगे, जीवन संपूर्ण लगे, प्रेम दो तरके हैं, एक तो अगर आपको प्रेमी या प्रेमी का मिल गई, आप उसके संग बंधन में बंद गए, और एक ना मिला, तो पहले में जो ना मिला उसक
17:30तो खिड़कियां खुली रखें कि जब जब यादाय तब तब मुस्क्राएं, और जब प्रेम पूर्ण भी हो जाता है, जैसे हर वेवाहिक जीवन में बहुत सारी लड़ाईयां होती है, तो उन लड़ाईयों के बाद, फिर बाद में प्रेम आता ही आता है, अगर वो सही
18:00अंगड़ापन आपको दिखाएगा, मेरे कहने का तात्तर वही है कि प्रेम बचा रहे, आपके जितने भी व्याचारिक मत भेद हो, लेकिन मन भेदना हो, मन जुडा रहे है, ठीक है, तो आपकी नई कविता भी हम सुनेंगे आप से, आपको जो मैंने सुशीला जी को टास्
18:30नई संग्रे से सुनाई है या नई, तो आप पढ़िये, मैं कुछ ताजी प्रेम कविता है पढ़ रहे हूं, यही यही वही चाहिए था, क्यूंकि समय के साथ स्वरूप तो बदली रहा है, वो आप समझ रहे हैं, और आपने बहुत मतलब गहरा सवाल कर लिया है, तो उस �
19:00प्रेम भारी भरकम लोहे का द्वार है, जहां जहां धूप इतनी है कि मोबाइल से देख पाना बड़ा कठीन हो रहा है, मा भी चाहूंगी।
19:30जहां आसंख पहरुए प्रवेस वर्जित की तक्तियां लिए घूमते रहते हैं रात दिन और आपको दाखिल होना होता है अधीक हवा में घुलती सुगंध की तरह
19:43प्रेम भारी वर्कम लोहे का द्वार है
19:47अगला है
19:49प्रेम में अगन पाखी उड़ता है भीतर ही भीतर भीतर ही भास्म होते हैं हम
20:04खोजते रहते हैं अपने हिस्से की खुश्बू अपने हिस्से की मृत्तू प्रेम के लिए सिर्फ जीवन ही नहीं
20:14मरण भी उतना ही जरूरी है
20:17बहुत उच्छा बहुत अथीं
20:38प्रेम कबूतरों का वो जोड़ा है जो पिछली कई सदियों से परबत गुफाओं में गुटर्गूं करता
20:46पर दिखता नहीं, दिखती है सिर्फ उसकी अपलग सी आखें और आखों का पानी
20:53बहुत सुन्द, अथी सुन्द, बहुत
20:55अभी मैं इसी कविता की किसी पंक्ती से मैं आप से पूछूंगा
21:00लेकिन अभी पलवी बिन्यो जी को इक कविता पढ़नी है
21:03क्योंकि उनकी जिस कविता का मैं उलेक कर रहा था, उसकी कुछ पंक्तिया ऐसे हैं कि प्रेम को क्यों ही होना चाहिए इसके जैसा उसके जैसा उसे खुद जैसा ही होना चाहिए
21:14अनगड, अनहद, अनाम और अपॉंड
21:18पहले तो शुक्रिया सर, आपने अच्छे आंक्रिंग आज की है, हम लोगो को खुश कर दिया, हम लोगो को लग रहा था कि आज कैसे सवाल पूछे जाएंगे
21:30शुक्रिया, मैं अपनी कर्ता सुना तूँ आपको
21:33अब इस कवता में भी सर, पंक्तिया मत पकड़िएगा, भाव पकड़िएगा
21:37कविता का शीशक है, गुजर जाने के बाद भी
21:41प्रेम गुजरता भी है, प्रेम रह रहे के आपको ऐसे थपेड़े भी देता है, लगता रहे सब खतम हो गया
21:47लेकिन प्रेम रहता है, तो कविता का शीशक है, गुजर जाने के बाद भी
21:51लोग पूछते हैं, प्रेम की याद आती है, ऐसे बेवकूफाना सवालों का भला क्या जवाब दूँ
22:03कैसे कहूं कि याद आने जैसा, याद जाने जैसा, कुछ भी नहीं होता हमारे बीच
22:10सिग्रेट ठोड़ी ही है, सिग्रेट ठोड़ी है, जो जले और धीरे धीरे खत्म हो जाए
22:17यहाँ एक धूनी है, जो जलती ही रहती है, मन चंदन हो जाता है, मेरी अस्थिया भसम बन जाती है
22:28तिलिस्म सा ये संसार, असली, नकली या मिलावटी, कैसे पहचानोगे
22:39तुमने तो प्यार किया ही नहीं
22:41थोड़ा दूबो
22:43तलहती तक जाओ
22:45थोड़ा दूबो
22:47तलहती तक देख आओ
22:49फिर उपर आना
22:50भरने दो फेफणों में पानी
22:52थोड़ी देर घुटने देना दम
22:54प्रेम साथ होगा
22:56तो बचा लेगा
22:57प्रेम साथ होगा तो बचा लेगा
23:00पेट में तैती मचलियां
23:02एक दिन मर जाएंगी
23:03लेकिन उनका अक्स
23:05उसकी आँखों में बचा रहेगा
23:07तुम कच्छवा बन
23:11कबच में छिपने का ढोंग मत करना
23:14कटीली जाडियों में
23:16तितली सा उड़ना
23:17प्रेम तुम्हारे पंक के
23:19रंगों में भरा पड़ा है
23:20किसी की उंगलियों पर छूट कर
23:23भी कम नहीं होगा
23:24जब ठक जाना
23:26जब ठक जाना दो चक्तानों की
23:28बीच की आड में छिप जाना
23:30मैसूस करना हर सिंगार
23:33तुम्हारी नंगी पीट के नीचे
23:35मचल रहे है
23:36होने देना प्रेम को विवस्त्र
23:39देखना उसको अमावस की रात में
23:42पहना कर सुबह का उजाला
23:44घूट घूट पीते जाना
23:46चुबने देना कंकर तपती जमीन के
23:50रेल की पटरियां और खिड़कियां
23:53साथ साथ तै करती हैं दूरियां
23:55रेल की पटरियां और खिड़कियां
23:58साथ साथ करती हैं दूरियां
24:01पर दृष्य दोनों को अलग दिखते हैं
24:04वैसा ही है प्रेम
24:05सब की तस्वीर अलग उतारता है
24:08जैसे सफर खत्म होने पर
24:10डिब्बे की महक भी उतरती है तुम्हारे साथ
24:14वो भी रह जाता है
24:25यह प्रेम का जो भाव है
24:29जो समवेदना है जहां आप
24:32प्रकृति से
24:33मनोभावं से उम्र के पड़ाव से
24:38विरह से वियोग से
24:40राग से अनुराग से
24:44हर तरह के जितने भी मानो
24:46मन के भाव हो सकते हैं
24:47उनसे आप लोग अपनी कविताओं को जोडते हो
24:50विश्रेश कर आपकी पीड़ी
24:52और आपसे पुर्व की पीड़ियां
24:54लगाता है रूस काम को करती रही है
24:56ऐसे समय में
24:58जब हम आधुनिक दोर में हैं
25:00यानि वरतमान समय में
25:02युवा पीड़ी के पास
25:04क्योंकि प्रेम की जो समवेदना है
25:06या प्रेम का जो
25:07राग है जो मनो भाव है
25:10जिसको आप महसूस करते थे
25:12या हम लोगों की पीड़ी महसूस करती थी
25:16उसको उसका आउसर
25:18नई पीड़ी के पास नहीं है
25:19इसका बतलाओ फिल्मों ने तो
25:24दर्ज किया
25:25लेकिन हिंदी कविता का
25:30जो वितान है और जो
25:32वर्तमान पीड़ी है क्या
25:34वर्तमान का रचनकार
25:37उस समवेदना उन भावों को
25:40दर्ज करने की इस्तिती में है
25:43और अगर वह दर्ज कर रहा है
25:46तो उसकी स्वानुभूती
25:48नहीं हो सकते क्योंकि उसके पास
25:50वो उसर ही नहीं मिला
25:52जिन भावों से
25:53हमारा दौर गुजरा था
25:57मैं ये
25:59मेरा प्रस्न मूल प्रस्न यह है
26:01मैंने इसलिए भी इसको बिस्तार से लिखा
26:03क्योंकि बिस्तार से पूछा कि
26:05क्योंकि मुझे ये लगता है कि
26:07बदलते परिवेश ने
26:09हमारे किशोरों से
26:10युवाओं से
26:12सम्वेधना चुवन
26:14प्रेम के तंतुओं का
26:17मर्म
26:18सायद छीन लिया है
26:20सायद तकनिक ने
26:21समय ने
26:23कि वे उन भावों को
26:25उन सम्वेधनाओं को
26:27सायद उस रूप में
26:29महसूस ना कर पाते हूं
26:31जिस रूप में हम महसूस करते हैं
26:33प्रश्ण ये है कि क्या युवा पीढ़ी
26:35अपने प्रेम को किस रूप में
26:39दर्ज करे और किस रूप में स्विकार करे
26:41दूसरा युवा रचनाकार
26:44उसे कैसे संप्रेशित कर सकता है
26:47और आप इस बदलाव को किस रूप में देखते हैं
26:50बहुत अच्छा प्रश्न है, और चुकि हमारे सामने बहुत सारे युवा बैठे हैं, मुंबई से चल कर आई है मेरी दोस्त की बेटी जो चाता लगाए बैठी है, तो बहुत सारे युवा हैं, तो ये सवाल उन तक जाए, ऐसी मेरी कोशिस रहेगी, प्रेम का जो स्वरूप
27:20से आई आया है, तब से तो और भी फटा-फट वाली चीज़ें हैं, तू मिनिट्स का, तो ऐसे दोर में इवा प्रेम को किस तरह ले रहा है, और वो प्रेम को किस तरह जी रहा है, अपने जीवन में किस तरह उसको ढ़ाल रहा है, ये बहुत मौत मूड है देखना, और इस म
27:50पूरी दुनिया वो प्रेम को किस तरह ले रही है ये बहुत मायने वाली बात है आज की डेट में एक से दूसरा देश नफरत कर रहा है युद्धू हो रहे हैं ऐसे में प्रेम की भूमिका क्या है अगर आज कही हुआ ये कहेगा कि हम एक दूसरे देश से नफरत करें तो प्
28:20युवा को प्रेम को समझना बहुत जरूरी है उसके लिए मुझे लगता है कि परिवार शुरुवात ही करता है और परिवार से ही बच्चों को या युवा को हम वो संसकार देते हैं जिससे कि वो आगे चलकर प्रेम को अपने से आगे वाली पीडी तक हस्तांत्रीत करें औ
28:50प्रेम को किस तरह ले रही क्या वो एक प्रेमी प्रेम का को ही प्रेम समझती है या पूरे अपने परियावरंट से
29:18प्रेम कर रही है, अपने पडोसी से प्रेम कर रही है, अपने पेंड से प्रेम कर रही है, अपने नदी से प्रेम कर रही है, अपनी प्रिथवी से प्रेम कर रही है, तो ये देखना जरूरी है, कि प्रेम का स्वरूप किस तरह हम उनको दें, अपने कला के द्वारा, अपने स
29:48इ én को, हम युवां को, कैज्से ले रही है!
29:52अब यह बताये, क्या आप यह परिवेश्ट देती हैं, आपकी इह कविटा में आप लगती हैं,
29:56कि पता है तुमें, जब भी हम बात करते हैं, बता है तुमें क्या-क्या होता है?
30:02जब रहा हैं दौन में कांप जाते हैं?
30:04नहीं, नहीं, वोसकी नन्नी बुधों में अन्वरत भीगती है मेरी आत्मा, यह वोसकी जब नन्नी बुधें युवा पिढ़ी को मिलेंगी नहीं, तो उसकी आत्मा कैसे भीगिएगी, आप लिखती हैं, भोर की पहली किरन सी दोड़नें लगती हो, नर्मनंगी दूप पर, �
30:34को मिला ही नहीं, वो उसको कैसे अनुभूत करें, उसके सामने दोहरी, तीहरी मार है, एक प्राकृतिक परिवेश बदल गया, समुचा का समुचा, दृस्चिकोंड पूरा का पूरा समय बदल गया, समय संसार बदल गया, तकनिक में आपको किसी जमाने में आपने अपने प
31:04होती है, वो एक दूसरे को एक साथ वो चार लोगों के साथ समवाद कर रहे होते हैं, मैं गलत सही की बात नहीं कर रहा हूं, मैं सिर्फ ये कह रहा हूं कि वह अनुभूत वह कैसे करें, और क्या युवा पीड़ी अगर उस भावना को, उस मर्म को अनुभूत नहीं कर पा �
31:34आपकी एक्षाएं आकांचाएं यवें पल्लवी बिनोद जी की तरह जहां वो मुझे बार बार ये स्वम्झानी का प्रयास कर रही थी, कि सर आप ये इस बात में जाये बहाव को पकड़िए, वो बहाव आए कैसे युवा पीड़ी में बस ये जानना क्या देखिए, इव
32:04कि प्रेम को लेकर जो आज का इवा है, वो हमारे जमाने से आज ज्यादा गंभीर है, और उसको उसी तरह ले रहा है, परियाबरन और समय का बदला और निसंदे उसको प्रभावित कर रहा है, और वो प्रेम को उस तरह से नहीं आदमसाथ कर पा रहा है, जिस तरह हम लोगो
32:34लेकिन आज के समय में चैट, GPT, AI तो है, जब आपको चैट, GPT से रात के दो बजे भी अपनी प्रेमी का से बात करना है, प्रेमी से बात करना संभो है, कल के हमारे जमाने में तो ये था कि एक चित्थी कोई कब उतर लेकर जाता था, वो भी चित्थी कहां से कहां पहुंच ज
33:04तो मैं ये बहुत मतलब अपने विश्वात से कह सकती हूं कि प्रेम का स्वरूप भले बदल गया हो, लेकिन प्रेम अक्की गंभीरता, प्रेम क्या जो भूमिका है वो नहीं बदली है, और इवाव उसको लेके उतना ही गंभीर है आज भी, ठीक है, प्लवी बिनोट जी, �
33:34उने जो लिखा है वो आपको जानना भी चाहिए, याद होना चाहिए, प्रेम की तोहों के भीतर स्वा के मिट जाने की प्रक्रिया की गती इतनी धीमी होती है, जैसे प्रित्वी का घुर्णन, इतनी धीमी वाकई प्रित्वी घुंती है, हमको पता नहीं था, सदा, सर्व�
34:04कैसे समझे, हाप नहीं कह सकते सर्, हम लोग के टाइम से परिवेश बहुत बदल गया, हम लोग जीते हैं, हमारा टाइम था, कि एक लव लेटर साइकिल के कैरियर में आ गया, लड़कियां खुष, यहां तो दिन भर मैसेज आरें सर्, तो प्रेम की वह अनुभूती, हम यह
34:34की बात तो उस समय भी समाज में हम लोग के संभी बहुत सारे ऐसे युवक होते थे, कि एक ही लीटर चार लड़कियों को देते थे, ऐसा नहीं था कि उस समय भी खराबियां नहीं थे, उस समय भी फ्लर्ट होते थे, ऐसा यह नहीं था कि उस सारे प्रेम सच्चे ही होते थे
35:04प्रेम बहुत मुश्किल से, तो मेरी कवताय हैं, तो सर नॉस्टेल्जिया में मैं लिखती हूँ, तो वो समय के कवताय हैं, घुड़न धीरे धीरे अरहे, अब तो नहीं हो रहा है, अब वो कवताय हैं, यह नहीं समझ पाएंगे, तो बहुत फास्ट हैं, चाहे जिपटी से �
35:34प्रेम को समझना जरूर, करना जरूर, अगर प्रेम को समझो गई ही नहीं, तो फिर उसको कर नहीं पाओगे, जब तक नहीं समझ रहे हो, ठीक है, वो भी अच्छा है, जब तक नहीं समझ रहे हो, तभी समझ रहे हो, तभी समझ पाओगे, जूट को जब तक नहीं जानोग
36:04एक प्रस्न आप लोगों से है कि बार पार हमारे कवियों ने और यहां तक कि आपने भी
36:31प्रस्ण के उत्तर के दोरान एक बात कही थी कि प्रेम की जो अपूर्णता है वह बहुत महत्वपूर्ण है प्रेम वही अमर है जहां मिलन नहीं हो पाया
36:46दुनिया की जितनी महान प्रेम गाथाएं हैं वह मिलन की प्रेम गाथाएं नहीं हैं विछो और विरह की गाथाएं हैं
36:58दोनों से मेरा प्रस्ण ये है कि प्रेम जो है वो उसकी नस्वरता में छिपा हुआ है यानि न मिल पाने में छिपा हुआ है या उसस्वतता में छिपा हुआ है जो हम अपनी कलपना या अपने मन की किसी कोनी अतरे में जीवन परयंत मृत्यू के समय तक छिपा के भी रखते ह
37:28हम उसे उजागर भी नहीं कर पाते हैं।
37:30बहुत सुंदर सवाल है कि प्रेम कहां टिका हुआ है।
37:36तो मुझे लगता है प्रेम अपनी सास्वत इस्थिती में ही होता है।
37:41मेरी एक कविता शायद आपको याद होगी उसका होना।
37:45कि वो है कहीं भी प्रेथवी पर है तो उसका होना ही काफी है प्रेम के लिए।
37:51उससे मिलना या उससे विवा या जो भी अन्य बातें वो सारी सांसारी बातों से कोई लेना देना नहीं है।
37:59तो प्रेम का स्वरूप मुझे लगता है वही सुन्दर है जो प्रेम है प्रेम क्योंकि मरता नहीं है मैं मानती हूं तो प्रेम अगर है आपको किसी से तो वो रहेगा जीवन परियंत और उसकी गरिमा तभी है जब आपके भीतर उस प्रेम की जगा नफरत ना आए तो मुझे
38:30अरुण जी पीछे ही बेatalter हैं ऐसला हरें आगे आ जाई है
38:33प्रेँम नश्वर्था में है या शाश्वर्था में है
38:38दोनों में यज़ी है सर
38:40नश्वर्था में भी है क्योंकि खतम होने के बाद भी आद रहते है
38:44विछूड़ने के बात भी वो जाता नहीं है मन से
38:46जब-जब याद आता है, वो आपको खुशी ही देता है, अच्छा ही लगता है
38:51और शाश्वत्ता में तो है ही
38:56प्रेम इतना असान भी नहीं है, सर के हम लोग बैठ के उसको समझ ले
39:01इतना असान नहीं है, प्रेम में बहुत समय देना पड़ता है
39:05उस पे जूजना पड़ता है, उसमें लगना पड़ता है, सवाल नहीं है, सूत्र नहीं है, हल हो गया, प्रेम हो गया
39:10प्रेम में थहरना पड़ता है, रुकना पड़ता है
39:14तो शाश्वत्ता में रहेगा, जब आप चाहेंगे कि प्रेम रहे हमारे जीवन में, तो जरूर रहेगा
39:19आप हर छोटी बात पे प्रेम को ही कोसने लगेंगे, तो प्रेम कहां रहेगा
39:26अगर एक वैवाहिक जीवन में लडाईयां हुई, और हमके पहले प्रेम था, अब नहीं रहे गया, ऐसा नहीं होता है
39:33कल किसी ने पोश्ट डाली थी पेस्बुक पे, कि शादी शुदा चालिस के बाद के लोगों का प्रेम, कि दस बच गई, वो फूल नहीं देता है
39:41तो प्रेम तो है सर, प्रेम को महसूस करना पड़ता है
39:46बहुत बहुत धन्यवाद हमारे पास समय चुकी इसारा हो चुका है कि मैं इस सत्र को समाप्त करूँ
39:56लेकिन मैं उमेद करता हूँ कि ऐसे समय में जब पीछे से भुषपूरी के एक बड़े स्टायर की गाने की आवाजें आ रही हैं तब
40:07उसे भी प्रेम ही कह सकते हैं
40:09इस मंच पर बहुत सारे लोग हैं और उम्र के लोग हैं
40:15प्रेम सास्वतता का प्रतीक है और यह स्रिस्टी और यह संसार भारती वांगमे में कहा जाता है
40:24कि इस्वर हमसे प्रेम करता है इसलिए यह स्रिस्टी संचालिते हैं
40:29तो प्रेम को हरकन में महसूस करिए हर्चन में महसूस करिए जिस भी रूप में है
40:35उसकी साथ स्वतता और उसकी पवित्रता को बरकरार रखिए जो आपके अंतरमन में है
40:40मिलना बिछडना तो जीवन की रीती है होता रहता है
40:44बहुत बहुत आभार आप दोनों का समय देने के लिए
40:47और साहित्या आज तक के चतूर्थ संसकरण का या सिलसिला आगले वर्ष फिर कायम रहेगा ही
40:54मा प्रयास करूंगा कि हमारे जो आतितियां उनसे बातचीतों सके
40:58बहुत शुक्रिया आपका जे प्रकाजित
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