00:00शबे बरात आते ही बहुत सी बेहनों के मन में एक स्वाल ज़रूर आता है
00:06अगर किसी औरत को पिरियट्स चल रहे हों तो क्या वो शबे बरात का रोضा रख सकती है
00:11और अगर नहीं रख सकती तो क्या उसका सवाब चला जाता है
00:14आज की इस वीडियो में हम इस सवाल का सही साफ और इसलामी जवाब जानेंगे
00:18इसलाम में ये बात बिलकुल साफ है कि पिरियर्ट्स यानि हैस की हालत में औरत का रोजा रखना जायज नहीं है
00:23ये कोई गुनाह या कमी नहीं है बलकि अल्ला का दिया हुआ हुआ है
00:26हदीस सही बुखारी और मुस्लिम में नभी इसलाला झालाम की जवाड़ों को पिरियर्ट्स आते थे तो उन्हें नमाज और रोजा दोनों छोनने का खुड़ने का हुक्म दिया जाता था
00:35बाद में रोजे की कज़ा रखने को कहा जाता था
00:38लेकिन नमाज की कज़ा नहीं होती थी
00:39इसका मतलब साफ है पिरियेट्स में रोजा रखना बिलकुल मना है
00:43चाहे वो रमजान का हो या शब बरात का नफल रोजा हो
00:46क्या पिरियेट्स में शब बरात का रोजा रखना चाहिए इसका जवाब है नहीं
00:50पिरियेट्स की हालत में शब बरात का रोजा रखना सही नहीं है
00:54धियान रखें शब बरात का रोजा नफल होता है ये कोई फर्ज रोजा नहीं है
00:58अल्ला किसी को उसकी मजबूरी पर सजा नहीं देता
01:01पिरियेट्स में रोजा छोड़ना गुना नहीं बलकि अल्ला की आग्या मानना है
01:04क्या इसकी कोई कजा या कफारा है ये बहुत जरूरी बात है
01:08शब बारात का रोजा नफल होता है
01:09नफल रोजे की कोई कजा जरूरी नहीं होती
01:12मतलब पिरियेट्स की वज़ा से रोजा नहीं रखा
01:14कोई गुना नहीं, कोई कजा या कफारा नहीं
01:17अल्ला नियत को देखता है, मजबूरी को समझता है
01:20अब सवाल ये है कि अगर रोजा और नमाज नहीं पढ़ सकते तो क्या करें
01:24बहनें ये सारे काम कर सकती है, दिल से तौबा करना, अल्ला से गुनाहों की माफी माँगना, दूआ करना, जिक्र करना, दरूत शरीफ पढ़ना, अल्ला को याद करना, नेक नियत करना
01:34याद रखें, पिरियेट्स में सिर्फ नमाज और रोजा मना है, दूआ, जिक्र, तौबा पूरी तरह जायज है, तो पिरियेट्स में शवेबरात का रोजा रखना चाहिए या नहीं, जवाब है नहीं, इसलाम औरतों के लिए रहमत है, जबरदस्ती नहीं, अगर आज रो
02:04झाल
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