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  • 2 days ago
ओडिशा के गजपति के आदिवासी आज भी लाल चींटियों का चटनी खाते है. यहां के गुमा ब्लॉक में आदिवासी परिवार इसे पीढ़ियों से एक पौष्टिक भोजन के रूप में खा रहे हैं, जो उनकी परंपरा से जुड़ा है. भुइयां आदिवासी समुदाय के सदस्यों ने बताया कि पहाड़ी जंगलों से इकट्ठा की गई लाल चींटियों से बनी यह चटनी इम्यूनिटी बूस्टर की तरह काम करती है. जंगलों में घूमते समय, वे पेड़ों पर चींटियों की कॉलोनियों की जगह पहचानते हैं, चींटियों को सावधानी से इकट्ठा करते हैं और उन्हें थोड़ी देर आग पर गर्म करते हैं. फिर चींटियों को प्याज, लहसुन, अदरक, मिर्च और नमक के साथ पत्थर पर पीसकर एक तीखी चटनी बनाई जाती है और इसे ये चावल के साथ खाते हैं. बबुला भुइयां ने इस प्रक्रिया के बारे में बताया और कहा, “हम अलग-अलग पेड़ों से काई इकट्ठा करते हैं, उसे आग पर गर्म करते हैं क्योंकि इससे गंदगी जल जाती है, फिर हम इसे अदरक, मिर्च, प्याज, लहसुन और नमक के साथ पीसते हैं। हम इसे गर्म मंडिया जाउ या पखाल के साथ खाते हैं। यह सिर्फ़ एक साइड डिश नहीं है बल्कि हमारी पसंदीदा है क्योंकि यह कई बीमारियों को ठीक करने में मदद करती है।” एक अन्य आदिवासी ने कहा, “इसे खाने से घुटनों और जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है और आंखों की रोशनी तेज़ होती है। यह सर्दी, खांसी और बुखार को ठीक करती है। हमारे पूर्वज इसे खाते थे, और हम इस परंपरा को जारी रखे हुए हैं। हम इसे भोजन और दवा दोनों के रूप में इस्तेमाल करते हैं।” अदिवासियों के इस दावे को लेकर एक डॉक्टर से बात की गई. तो इन्होंने इसे खतरनाक बताते हुए पेट संबंधी बीमारियों के होने की आशंका जताई. आदिवासियों में जागरुकता फैलाने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है. कई समाजिक संगठन भी इनके लिए काम कर रहे हैं. लेकिन ओडिशा के इस आदिवासी इलाके में आज भी सदियों पुरानी खाने की परंपरा कायम है.

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00:00Odisha
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00:28Pod Sierra
00:29The fire is the fire of the fire, and the fire is the fire of the fire.
00:34After putting them in a pot, they put them in a pot and then they put them in a pot.
00:39LAL CHITIYON COU GHAR LAY KAR PAHASTA HAY
00:41SUP ME DAAL KAR MAHILAIN JHUND ME
00:44इन चिटियों को साफ करती हैं
00:46एक आदमी अद्रक और लहसुन छील रहा है
00:49पत्थर पर मिर्चा प्याज डाल कर इन लाल चिटियों की चटनी बनाई जा रही है
00:54चावल के साथ बड़े चाव के साथ खाया जा रहा है
00:57इस चटनी को अस्थानिय बनाई
00:59पूली में काई चटनी कहते हैं
01:01आदिवासियों का ये स्वाद पुराना है
01:04रूढिवादी ट्रेडिस्नल खाना आज भी कायम है
01:06इनका दावा है किसको खाने से खाया है
01:09से कई बीमारियां दूर होती है
01:11हमें अज्जा अंकरोटू काउच होता
01:14ये कई बीमारियों को भी ठीक करता है
01:16इसे खाने से गुटने के दर्द से लिए
01:19लेकर आखों की रौशनी बढ़ाने तक
01:20हर चीज में मदद मिलती है
01:22ये सरदी खान से लिए
01:24और बुखार भी ठेक करता है
01:29हमारे पुर्वाइ
01:34इसे खाते थे
01:34और हम अभी भी खा रहे हैं
01:36इसलिए कहा जाता है
01:37कि यह एक पारमपरी
01:39खाना होने के सासा दवाभी है
01:40जब पूरी दुनिया कोरोना से
01:42संक्रमित थी
01:44तब हमारे इलाके में
01:46कोई भी इस बिमारी से
01:47इन्फेक्टेट नहीं हुआ था
01:49इसका यही कारण है
01:49एक ग्रामिन ने बताया
01:51कि यह पूरा गाउं
01:52या गुमा ब्लॉक में ही
01:54बलकि लाके के ज्यादा तर
01:56आदिवासी लाल चिटियों की
01:57चटनी को खाते हैं
01:59उन्होंने दावा किया
02:00कि यह सेहत के लिए
02:01बहुत अच्छी है
02:04ज्यादा तर आदिवासी
02:09से खाते हैं
02:10माना जाता है कि
02:11इसमें काफी दवा वाले गुड़ होते हैं
02:13इसलिए हर
02:14उम्र के लोग इसे खाते हैं
02:16यह सेहत के लिए बहुत अच्छा है
02:18और चेहते हैं
02:19जहरे को फ्रेस रखता है
02:21अदिवासीयों के इस दावे को लेकर
02:23हमने एक डॉक्टर से बात लिए
02:24तो इन्होंने इसे खतरनाक बताते हुए
02:26पेट संबंधी बिमारियों के होने की आश्चा
02:29संब्सक्राइब
02:30आए काई जड़ने खाइने रोगों बहला हुए
02:33विसे ता
02:34किसी किता में इसके दवाबाले गुणों का जिकर नहीं है
02:38बलकि
02:39हमारे लिए खाने लायक नहीं है
02:41इसलिए इसे खाने से लोगों को
02:44पेट की बिमारियां होने का चांस जड़ा है
02:47इसलिए इसे खाना सही नहीं है
02:49आदिवासियों में जागुक्ता फैलाने के लिए
02:52सरकार कई योजनाय चला रही है
02:54कई समाजिक संगठन भी इनके लिए काम कर रहे हैं
02:57लेकिन ओडिसा के इस आदिवासियों
02:59आज भी सदियों पुरानी खाने की परंपरा कायम है
03:04इटिवी भारत के लिए गजपती से हरी हर पतनायक की रिपोर्ट
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