00:00दोस्तों, घने हरे भरे जंगल के किनारे बसे एक छोटे से गाउ में हरिदास नाम का एक इमानदार लकड हारा रहता था।
00:08उसका घर मिट्टी का बना था और बाहर एक छोटा सा आंगन था, जहां उसकी पत्नी सुहानी कुछ सबजियां उगाती थी।
00:16हरिदास गरीब था, पर उसका मन बेहत साफ और सरल था। वो रोज सुभा सूरज उगने से पहले जंगल जाता, लकडियां काटता और शाम तक उन्हें बाजार में बेचकर घर लोटा था।
00:27हरिदास की इमानदारी पूरे गाउं में मशूर थी। लोग जानते थे कि वो कभी किसी का हक नहीं चीनता न किसी को धोका देता।
00:35लेकिन प्रकृती कभी-कभी इमानदार लोगों को भी परकती है। और एक दिन ऐसा ही हुआ।
00:41एक दिन हरिदास रोज की तरह जंगल पहुँचा, रात को बारिश हुई थी, इसलिए जमीन गीली थी और चारों और नमी की खुश्बू फैली हुई थी, हवा में ताजगी थी और पत्तों पर थंडी बूंदे चमक रही थी.
00:52हरिदास एक पुराने बड़े पेड़ के पास पहुँचा और अपनी कुलहाडी से लकड़ी काटना शुरू किया, कुछी देर बाद उसे महसूस हुआ कि कुलहाडी का हत्था धीरा हो गया है, उसने उसे ठीक करने के लिए कुलहाडी उठाई, पर जैसे ही उसने चोट मारी,
01:22आज कुलहाडी नहीं मिली, तो घर कैसे चलेगा, परिवार के लिए अनाज कहां से आएगा, उसकी दिल की बेचैनी देखकर वो नदी किनारे बैठ कया, कुछ पल बाद उसने दुखी होकर भगवान की ओर देखा और कहा, हे इश्वर, मैं मेहनत करके ही कमाना चाहता हूँ
01:52तो दुखी क्यों है, हरिदास ने हाथ जोड़कर सारी बात बता दी, देवता ने कहा, चिंता मत कर, मैं तेरी कुलहाडी ढूंट देता हूँ, फिर देवता नदी में डूबे, कुछी क्षणों में वे हाथ में सोने की चमचमाती कुलहाडी लेकर बाहर आए, क्या ये तेर
02:22तेरी कुलहाडी है, हरिदास ने फिर सिरहिला कर कहा, नहीं देवता जी, ये भी मेरी नहीं है, तीसरी बार देवता नदी में उतरे, और इस बार बिलकुल साधारन लोहा की पुरानी कुलहाडी लेकर लोटे, क्या ये तेरी है लकड़ारे, हरिदास की आँखे चमक उठी,
02:52तीनो कुलहाडियां, सोने, चांदी और लोहा, तीनो मैं तुझे देता हूँ, हरिदास विनमरिता से बोला, देवता जी, मुझे बस मेरी वही पुरानी कुलहाडी चाहिए, बाकी दो मेरे काम की नहीं है, देवता ने हसते हुए कहा, अरे सरल रिदय वाले मानव, मैं तु
03:22तो उसकी आँखों में गर्व और खुशी आ गई, धीरे धीरे ये बात पूरे गाउं में फैल गई, लोग हरिदास की इमानदारी की प्रशंसा करने लगे, कई लोगों ने उससे सीखली की इमानदारी का भल हमेशा मीठा मिलता है, भले ही देर से, सोने और चांदी की कुल
03:52क्यूंकि हरिदास के लिए मेहनत और इमानदारी ही सच्चा धन था, इमानदारी सबसे बड़ी पूंजी है, जो व्यक्ति दूसरे का हक नहीं चीनता, उसे भगवान भी कभी निराश नहीं करते
04:03दोस्तों, इसी तरह की और कहानिया सुनने के लिए हमारे चैनल को सबस्क्राइब करें, धन्यवाद
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