00:00कुरुक्षेत्र के मेहदान पर सूर्य ढलने को था, हवा में धूल तैर रही थी और अर्जुन का मन प्रश्नों से भरा था, वे रत में बैठे कृष्ण की ओर देखता है और धीरे से बोल उठता है।
00:12केशव, एक बात मेरे मन को उद्वेलित कर रही है, क्या सच्मुच परमात्मा ही ये संसार के पालक है, क्या वही सब का भरण पोशन करते हैं।
00:42करता है, पर इसे समझने के लिए मन को स्थिर करना पड़ता है।
01:12करते हैं, जो अच्छे से तैयार हो। परमात्मा का पालन समान है, पर जीव अपने करमों के अनुसार उसका फल अनुभव करता है।
01:20अर्जुन के मन का एक कोना जैसे हलका हो गया, पर फिर उसने एक और प्रशन पूछ लिया।
01:26अर्जुन और यदि कोई परमात्मा को नहीं जानता, तो क्या उसका भी पालन होता है।
01:34क्रिश्न हसे, जैसे किसी बच्चे ने भोला प्रशन पूछ लिया हो।
01:38क्रिश्न, अर्जुन, मा अपने बच्चे से नहीं पूछती के वह उसे पहचानता है या नहीं, वह बस उसका पालन करती है।
01:48उसी प्रकार परमात्मा सभी प्राणियों के प्राणों में बैठ कर उन्हें शक्ती, बुद्धी और जीवन देते हैं, चाहे वे उन्हें जाने या ना जाने।
01:58अर्जुन अब शान्त था, उसके चहरे पर एक नई समझ की चमक थी अर्जुन।
02:03तो हे माधव, क्या मैं कहूं कि संसार में जो भी चलता है, विकास, पालन, संग्रक्षन, सब आपका ही प्रकट रूप है।
02:11कृष्ण ने सिर हिलाया, हाँ पार्थ, मैं ही बीज हूँ, मैं ही परिणाम।
02:17जगत चलता है क्यूंकि मैं उसे चलने की शक्ती देता हूँ, मैं अद्रिश्य स्वरूप में सब का पालक हूँ, ना कि किसी पद या दाईत्व से, बल्कि अपने प्रेम से।
02:28अर्जुन ने हाथ जोड दिये, जैसे उसके मन ने वह उत्तर पालिया, जिसे वह लंबे समय से खोज रहा था।
02:35हे पुरुशोत्तम, अब समझ गया, परमात्मा कहीं बाहर नहीं, बल्कि हर हिदय की धड़कन में पालक रूप से विद्यमान है।
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