00:00अच्छा तो कभी सोचा है कि हम जो कुछ भी करते हैं उसके पीछे आखिर चल क्या रहा होता है?
00:04दरसल इनसानी तजर्बे के पीछे एक बुनियादी पैटर्न काम करता है, एक ऐसा सिलसिला जो हमारी पूरी जिन्दगी को शकल देता है.
00:11चले आज हम इसी ताकतवर तसलसुल को जरा खोल कर समझते हैं, तो सवाल ये है कि जो कुछ हमारे दिमाग के अंदर चल रहा है, यानि हमारी सोचें, हमारे एसासात, वो हमारे actions, यानि हमारे बैरूनी आमाल में कैसे बदल जाता है? इन दोनों दुनियाओं की बीच में पुल
00:41फिर वो सोच एक जजबे को जनम देती है, और आखिर में वो जजबा हमें किसी अमल, किसी काम पर मजबूर कर देता है, सोच, फिर जजबा, और फिर अमल. ठीक है, तो आईए इस सिलसले की पहली और सबसे एहम कड़ी से शुरू करते हैं, वो जगा जहां से हर कहानी का आ�
01:11माजी को याद करती है, मुस्तक्बिल के मनसुबे बनाती है, यह हर चीजब का खामोश, बिलकुल खामोश नुकताय आगाज है. और सबसे एहम बात पता है, यह सारा अमल नजरों से ओज़ल होता है. किसी को नहीं मालूम कि हमारे दिमाग में इस वक्त क्या चल रहा है, ले
01:41पर इस सिलसले की दूसरी कड़ी सामने आती है, और वो है हमारे जजबात. जजबात, आप कह सकते हैं कि हमारे जिस्म का हमारी सोच पर एक रद्दे अमल है. यह वो लमा है जब कोई खयाल सिर्फ दिमाग तक नहीं रहता, बलके हमारे पूरे वजूद में महसूस होने लग
02:11अगर एक गाड़ी है, तो जजबात उसका पैट्रोल हैं. उनके बगएर सोच कहीं नहीं जा सकती, वो बस खड़ी रहती है. तो जब खयाल मौजूद हो और उसे जजबात का इंधन भी मिल जाए, तो अगला कदम क्या होता है? जाहिरे सफर शुरू होता है. और यही चीज
02:41यह वो लमहा है जब हमारी अंदरूनी दुनिया बेरूनी हकीकत से आकर टकराती है. इसको ऐसे समझें कि हमारे आमाल एक बरफ के तूदे की नौक की तरह हैं, जो कुछ सता पर नजर आता है न, वो तो बहुत थोड़ा है. असल कहानी तो सता के नीचे छुपे वे ख्याला
03:11पलक जपकते ही उस ख्याल से जुड़ा एक जजबा पूरे जिसम में पहल गया और इस से पहले कि हम कुछ समझ बाते हम उस जजबे की बुनियाद पर कोई ना कोई कदम उठा चुके होते हैं. ये एक खुदकार और इंतहाई तेज रफ़तार अमल है. सोच, जजबा, अमल
03:41सी कड़ी को पकड़ना होगा. सोच को, जजबे को या अमल को.
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