00:00मृत्यू, ये एक ऐसा सच है, जिसे कोई नकार नहीं सकता।
00:05जब हमारे अपने इस संसार से विदा लेते हैं, तो सिर्फ शुन्यता और पीडा नहीं आती, बलकि कई तरह के प्रश्न भी उठते हैं।
00:14खास कर हिंदू समाज में जब कोई अपने शरीर को छोड़ता है, तो परिवार पर कई तरह के नियम, व्रत और रिस्ट्रिक्शन आ जाते हैं।
00:44आज के इस विडियो में हम विस्तार से समझेंगे कि मृत्यू के बाद तेरा दिन तक हिंदू परिवार इतने नियम क्यों मानते हैं।
01:14परिवार में एक दृष्टिकोन, स्पिरिचुल एंगर, एक आत्मा की यात्रा।
01:18हिंदू धर्म कहता है कि मृत्यू शरीर की समापती है, आत्मा की नहीं।
01:23मृत्यू के बाद आत्मा तुरंत अगले जन में नहीं जाती।
01:27कहा जाता है कि 10-13 दिन तक आत्मा, पृत्वी लोक और पित्र लोक के बीच एक संक्रमन काल में रहती है।
01:36इस अवधी को अंतराल काल कहा गया है।
01:39इसी दौरान आत्मा को मार्ग दर्शन और आशिरवाद की आवशक्ता होती है।
01:45दो अशौच, जब परिवार का कोई सदस्य जाता है, तो पूरा परिवार अशौच में माना जाता है।
01:52इसका अर्थ है कि वे आध्यात्मिक रूट से भारी, समवेधन शील और शोक ग्रस्त है।
01:58अशौच का समय दस दिन ब्रहामनों के लिए, बारत दिन क्षत्रियों के लिए, और तेरा दिन सामान यतह परिवार के लिए माना जाता है।
02:07तीन श्राद और पिंड़ान।
02:10आत्मा को शांती देने और पित्रों तक अनवजल पहुचाने के लिए, श्राद और पिंड़ान किये जाते हैं।
02:17ऐसा माना जाता है कि जब तक ये कर्म नहीं होते, आत्मा भटक सकती है।
02:23गीता और गरुड पुरान में कहा गया है कि ये कर्म आत्मा को आगे की यात्रा के लिए शक्ती और संतोष देते हैं।
02:31चार शुब कारियों पर रोक इस अवधी में विवा, उत्सव या मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
02:38इसका अर्थ है कि परिवार पूरी तरह शोक और प्रार्थना में डूबा रहे हैं।
02:44आत्मा को विदाई देने के समय हसी खुशी के बजाए शान्ती और साधना आवश्चक है।
02:50पांच प्रती कात्मक महत्वा, तेरा दिन पूरे होने पर तहरवेल की रस्म होती है।
02:56ये केवल एक सामाजिक सभा नहीं, बलकि आत्मा की यात्रा का पूर्ण विराम भी है।
03:03इसके बाद परिवार सामान्य जीवन में लौट आता है।
03:06वैज्ञानिक द्रिष्टी कोन, साइन्टिफिक आंगल, एक स्वास्थिय और हाईजीन, पुराने समय में शव घर पर रखा जाता था।
03:15संक्रमन और बिमारियों का खत्रा ज्यादा था।
03:18इसलिए परिवार को कुछ दिनों तक अलग रहना और साधारन भोजन करना आवश्यक माना गया।
03:25राख, गंगाजल और अगनी का उप्योग जीवानों और वातावरन को शुद्ध करने के लिए किया जाता था।
03:32दो मन और भावनात्मक स्वास्थय, साइकोलोजी ओव ग्रीफ, मृत्यू परिवार को हिला देती है।
03:39मनों विज्ञान कहता है कि शोक के समय इंसान के भीतर तनाव, हार्मोन, कॉटिसोल बढ़ जाते हैं।
03:46इसी लिए उत्सव और मेलजोल से दूर रहना ज़रूरी है, ताकि मन को संभलने का समय मिल सके।
03:53तेरा दिन का शोक काल एक तरह का हीलिंग पीरियड है।
03:57तीन भोजन संबंधी नियम।
04:00शोक काल में हलका भोजन जैसे खिचडी, दाल चावल या पफल लिया जाता है।
04:06इसके पीछे कारण है कि दुख के समय डाइजेशन कमजोर हो जाता है।
04:10साधारन भोजन शरीर और मन दोनों को संतुलन देता है।
04:14चार शुब कार्य क्यों वर्जित है।
04:17आधुनिक दृष्टिकों से देखे तो, ग्रीव के समय इनसान सोशल फंक्शन में नैचरल बिहेवियर नहीं दिखा पाता।
04:24यदि किसी परिवार का सदस्य गुजर गया हो और उसी समय विवा या उत्सव हो, तो ये मानसिक रूप से भारी पड़ सकता है।
04:32इसलिए परमपरा ने इन कारियों को कुछ समय के लिए वर्जित किया।
05:02इसलिए धर में भी मौनिंग पीरियड होता है, और फ्यूनरल के बाद कुछ दिनों तक चर्च में विशेश प्रार्थना होती है।
05:10बौद धर में भी मृत्यू के बाद उन्चास दिन तक आत्मा की यात्रा मानी जाती है।
05:16यानि हर संस्कृती ने मृत्यू के बाद के दिनों को ट्रांजिशन पीरियड माना है।
05:20जहां मृत्यक के लिए प्रार्थना और जीवितों के लिए हीलिंग जरूरी है।
05:25तो दोस्त अब आपने देखा कि मृत्यू के बाद हिंदू समाज में जो तेरा दिन तक के नियम और रिस्ट्रिक्शन्स है।
05:34वे केवल अंद विश्वास नहीं बलकी गहरे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक कारणों से जुड़े हैं।
05:40धर्म कहता है कि ये समय आत्मा की अगली यात्रा के लिए आवश्चक है।
05:44जबकि विज्ञान कहता है कि ये परिवार के स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन और सामाजिक हीलिंग के लिए जरूरी है।
05:52यानि धर्म और विज्ञान दोनों एक ही दिशा में इशारा करते हैं कि मृत्यू केवल अंत नहीं है बलकी एक नई शुरुवात है।
06:02और इस संक्रमन काल में हमें मृतक के लिए प्रार्थना करनी चाहिए और अपने लिए धैर्यव शक्ती संचित करनी चाहिए।
06:10इसलिए हमारे रिश्यों ने कहा है मृत्यू अंत नहीं एक नया जन्म है और शोक केवल दुख नहीं बलकी जीवन को समझने का अफसर है।
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06:29जै श्री कृष्णा अगर आप ऐसे और सनातन रहस्य जानना चाहते हैं तो जुड़े रहिए हमारे साथ।
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