00:00रात के दो बज रहे थे, पूरी बिल्डिंग सुनसान थी, सारे करमचारी जा चुके थे, मैं अकेला लिफ्ट में चढ़ा, या शायद मुझे ऐसा लगा, लिफ्ट धीरे धीरे उपर जा रही थी, तभी मुझे लगा किसी ने मेरे पीछे सांस ली, मैं पलता, कोई नहीं था
00:30परचाई थी, धुन्धली, पर चलती हुई, अजीब बात ये थी, कि वो परचाई लिफ्ट में अंदर तो आई, पर बाहर कभी नहीं निकली, आज भी जब मैं उस बिल्डिंग की लिफ्ट में जाता हूँ, मेरे कानों में वही धीमी सांसे गूंचती है,
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