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इस वीडियो में देखिए कार्तिकेय और उस प्राचीन टाइटन का आमना-सामना जिसने हिमालय की जड़ों को हिला दिया है। क्या भगवान कार्तिकेय अपनी दिव्य शक्ति से इस प्रलय को रोक पाएंगे? जानिए स्कंद पुराण के इस गुप्त और रहस्यमयी अध्याय में। #SkandaPurana #Kartikeya #HinduMythology #LordShiva #AncientTitans #MythologyExplained
Transcript
00:00हिमालय की बरफीली चोटियों के नीचे दबी हुई प्राचीन हलचल ने अचानक एक विशालकाई टाइटन की आखों को खोल दिया,
00:08जिससे संपूर्ण परवतिय श्रिंखला एक भीशन कमपन से कांप उठी.
00:13भगवान कार्तिके ने अपने मयूरवाहन पर सवार होकर हिमालय की उस दरार को देखा जहां से टाइटन की जागरित ग्रिष्टी
00:21एक प्रल्यंकारी प्रकाश के रूप में बाहर निकल रही थी.
00:25अचानक उस विशाल दरार से निकलती हुई अलोकिक उर्जा ने बर्फ के विशाल ग्लेशेरों को पिघलाना शुरू कर दिया, जिससे
00:33हिमालय का संतुलन पूरी तरह डग्मगा गया.
00:37ब्रहमांड की स्थिर्टा के रक्षक के रूप में, कार्तिकेय ने अपनी दैविय शक्तियों का आहवान करते हुए उस अज्यात ताइटन
00:45के प्रती अपना एक चेतावनी भरा संदेश प्रसारित किया.
00:50हिमालय की गहराईयों से एक गूंजती हुई आवाज निकली जो प्रित्वी की परतों को चीरती हुई आकाश तक पहुँच गई,
00:58जिससे वातावर्ण में एक भयानक ध्वनी का जाल बिच गया.
01:03भगवान विश्नु अपने वैकुंठ धाम में इस कमपन को अनुभव करते हुए, अपनी शांत और सौमे द्रिष्टी से हिमालय की
01:11उस दरार को देखने के लिए तत्पर हुए.
01:14कार्तिके ने अपनी उर्जा को केंद्रित करके उस दरार के द्वार को बंद करने का प्रयास किया ताकि टाइटन की
01:21द्रिष्टी का प्रभाव और अधिक न फैल सके.
01:25हिमालय के उपर एक अलौकिक नीले रंग का सुरक्षा धेरा बन गया, जो ब्रहमांड की इस प्राचीन घटना के साक्षे
01:33के रूप में स्थिर हो गया.
01:35उस टाइटन की द्रिष्टी अब और अधिक तीवर हो गई थी, जिसकी ज्वाला ने परवतों के भीतर छिपे प्राचीन खनीजों
01:43को पिघला कर उन्हें तरल प्रकाश में परिवर्तित करना शुरू कर दिया था.
01:48भगवान शिव हिमालय की सबसे उची चोटी पर ध्यानमगन अवस्था में बैठे हुए भी इस हल्चल के प्रती सचेत होकर
01:56अपनी तीसरी आख की ओर द्रिष्टी ले गए.
02:00टाइटन की द्रिष्टी से निकली हुई उर्जा कार्तिके के रक्षा कवच से टकराई, जिससे पूरे आकाश में एक विद्युतिय गर्जना
02:08सुनाई दी.
02:10यह संधर्ष ब्रहमांड के प्राचीन नियमों और नए स्रिजन के बीच का एक ऐसा क्षन था जहां समय की गती
02:17भी मानो थमसी गई थी.
02:20परवतों की आत्मा कही जाने वाली वह प्राचीन उर्जा अब अपनी जागरिती को पूरी तरह से प्रगट करने के लिए
02:27प्रित्वी के धरातल पर दबाव डाल रही थी.
02:31देवर्शी नारद इस दिव्य संधर्ष को देख रहे थे, उनकी वीना की तान भी इस प्रल्यंकारी कमपन के कारण थम
02:39गई और वे मौन हो गए.
02:41कार्तिके ने अपने मयूर को संकेत दिया और वे उस ताइटन की द्रिष्टी के केंदर बिंदु के और अधिक निकट
02:49पहुँच गए.
02:51हिमाले की बरफीली हवाओं में अब उस ताइटन की प्राचीन और भारी गंध समाहित हो गई थी, जो एक युग
02:58के अंत की चेतावनी दे रही थी.
03:01प्रित्वी की पर्तों के नीचे से उठती वह द्रिष्टी एक विशाल नेत्र के रूप में परवत के पत्थरों पर उभराई,
03:08जो कार्तिके को चुनौती दे रही थी.
03:12भगवान विश्णू ने अपनी दिव्यशंख को उठाया, ताकि उस टाइटन की ध्वनी को ब्रहमांड की शांती के साथ सन्यमित किया
03:20जा सके.
03:21कार्तिके के प्रहार ने उस विशाल नेत्र को एक पल के लिए शिथिल कर दिया, जिससे हिमालय का कमपन कुछ
03:28हद तक शांत होने लगा.
03:31भले ही कमपन शांत हो गया था, लेकिन उस टाइटन की जागरिती ने ब्रहमांड में एक ऐसी नई चुनौती का
03:38सूत्रपात कर दिया था, जिसे टाला नहीं जा सकता था.
03:43हिमालय की धरातल पर समय के कन बिखरने लगे हैं, जहां पत्थरों की कठोर्ता अचानक किसी तरल पदार्थ में बदलकर
03:50आकाश की ओर बहने लगी है.
03:54भगवान विश्णु ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से इस विरूपन को देखा, उनकी भुजाओं पर दिव्य नीली आभा चमक रही है,
04:02और उनके नेत्रों में ब्रहमांडिय स्थिर्ता का संकल्प स्पष्ठ है.
04:07धोल और राख के गुबार में हिमालय की चोटिया आपस में टकरा कर एक भयंकर ध्वनी उत्पन कर रही हैं,
04:15जैसे कोई प्राचीन टाइटन अपनी नींद में करवट बदर रहा हो.
04:20ब्रहमांड के इस कोने में सत्य और भ्रम की सीमाय मिक्ती जा रही हैं, जिससे प्रकृती के नियम भी एक
04:27अज्यात अंधकार के गर्भ में समा रही हैं.
04:31विशाल परवत श्रिंखलाओं के बीच एक दरार खुल रही है, जहां से किसी अज्यात आयाम की घनी और धुए वाली
04:39राख वायुमंडल में जहर की तरह फैल रही है.
04:43भगवान विश्नों के मुख से निकला मंत्रों का स्वर उस राख के गुबार को रोकने के लिए एक दिव्य सुरक्षा
04:50कवच के रूप में चारों और फैल गया.
04:53कार्तिके की शक्ती से उस दरार के भीतर की हलचल एक क्षण के लिए ठहर गई है, जैसे कि वह
05:00प्राचीन टाइटन भी अपनी विविश्टा में जुप गया हो.
05:04आकाश के रंग में परिवर्तन हो रहा है, जहां राख जैसी धूसर्ता के बीच सुनहरे नक्षत्रों की चमक इस महासंकट
05:12को एक नई चुनोती में बदल रही है.
05:16पूरे हिमालय का क्षेत्र अब एक ऐसे कापते हुए कमपन से गुजर रहा है, जो भूपरपटी के नीचे मौजूद उस
05:23ताइटन के हृदय की धड़कन जैसा जान पड़ता है.
05:28भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यशंख को पुनह धारन किया और उसके नाज से ब्रहमांड की लएको पुनरसंतुलित करने का प्रयास
05:36किया.
05:38शंक की प्रतिध्वनी से हिमालय की गुफाओं में जमे हुए प्राचीन पत्थर पिघल कर नए रूपों में ढलने लगे, जिससे
05:45एक रहस्य में सनरचना का निर्मान हो रहा है.
05:50ब्रहमांडी उर्जा का संतुलन बिगड़ते देख, आकाश में देवगण भी इस अद्भुत और दरावनी घटना को मुकदर्शक बनकर देख रहे
05:58हैं.
06:00टाइटन की जागरिती का असर अब केवल धरातल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह समय की धाराओं को भी अपने
06:07प्रभाव में ले रहा है.
06:10कार्तिके के तेज ने एक सुरक्षा कवच का निर्मान किया है, जिससे उनके आसपास की प्रकृती का विरूपन थमसा गया
06:18है.
06:20प्रित्वी की गहराई से निकलती हुई वहराख और धुआ अब एक दैविय आवर्ण में बदल रही है, जिसे नियंत्रित करना
06:27अब अत्यंत आवश्चक हो गया है.
06:31अंधकार और प्रकाश का यह द्वंद्व पूरे हिमालय के उपर एक अनोखे इंद्रधनुशी प्रभाव को जन्म दे रहा है, जो
06:39विनाश की चेतावनी और निर्मान की आशा दोनों है.
06:44विश्णु के संकेतों पर हिमालय की दिशाय बदल रही हैं, मानो पहाड खुद को उस प्राचीन टाइटन के भारी वजन
06:51से बचाने का प्रयास कर रही हूँ.
06:54शंक की ध्वनी ने उन दैविय शक्तियों को सक्रिय कर दिया है, जो स्रिष्टी के आरंभ से ही इन परवतों
07:01के मूल में निवास करती थी.
07:04अब समय और स्थान का चक्रपुनह अपनी लय पकड़ने की कोशिश कर रहा है, किन्तु टाइटन की शक्ति अभी भी
07:11हिमालय की जड़ों में हल्चल मचा रही है.
07:15युद्ध का यह नया चरण अब हिमालय की उन चोटियों पर आरंभ होने वाला है, जहां आज तक केवल देवदूतों
07:23और रिशियों का ही वास रहा है.
07:26हिमालय की चोटियों पर व्याप्त सन्नाटा अचानक तीवर कमपन से तूट गया, मानो स्वयन धराका गर्भ अपनी प्राचीन सीमाओं को
07:35लांध कर बाहर निकलना चाह रहा हो.
07:38भगवान कार्तिकेय ने अपनी स्वन आभा को संपूर्ण दिशाओं में फैलाते हुए हिमालय की अधोमुखी हलचल को अनुभव किया, और
07:47एक क्षण के लिए समय का प्रवाह ठेहर सा गया.
07:51कार्तिकेय ने अपने दिव्य वेल को उर्ध्व गती से धरा की गहराई में समाहित किया, जिससे एक दिव्य उर्जा की
07:58तरंगे पाताल के उस टाइटनिक केंद्र तक पहुँचने लगी.
08:03वेल के स्पर्ष से हिमालय की जड़ों में एक अभेज्य सुरक्षा कवच का निर्मान हुआ, जो ब्रहमांडिय संतुलन के लिए
08:10एक वजर के समान अटूट दीवार बनकर खड़ा हो गया.
08:15स्रिष्टी का यह कोना अब एक दिव्यदुर्ग में परिवर्तित हो चुका था, जहां देवों की मर्यादा के आगे टाइटन की
08:22कोई भी विद्रोही शक्ती प्रवेश करने में असमर्थ थी.
08:27भगवान विश्णु ने अपनी योग निद्रा से जाग कर सुदूर वैकुंट से कार्तिकेय के इस साहस को देखा और अपनी
08:34प्रसन्नता प्रकट करते हुए शेशनात पर विराजमान होकर द्रिष्टी डाली.
08:40कार्तिकेय ने अपनी दूसरी भुजा उपर उठाई और समस्त रिशियों को उस सुरक्षा कवच के भीतर आने का संकेत दिया,
08:48ताकि वे इस प्रल्यंकारी आपदा से सुरक्षित रहें.
08:52अद्रिष उर्जा की रेखाएं हिमालय के कणकण में घुलने लगी, जिससे परवतों का थर्थराना धीरे-धीरे शान्त होने लगा और
09:01आकाश पुनह स्पष्ट होने लगा.
09:04हिमालय की चोटियों पर विशालकाय शिलाएं अपनी पुरानी जगह स्थिर हो गई, जैसे कोई महाशक्ती उन्हें अपने हाथों से पुनह
09:12सन्योजित कर रही हो.
09:15देवराज इंद्र ने स्वर्निम आकाश से कार्तिकेय के इस पराक्रम का अवलोकन किया और उनकी द्रिष्टी में उस युवा सेनाप्ती
09:23के प्रती सम्मान का भाव जागरित हुआ.
09:27कार्तिकेय ने पुनह अपने वेल को प्रिथवी से बाहर निकाला, जिससे धराकी स्थिर्ता और भी अधिक सुद्रिड हो गई और
09:35प्रिथवी ने एक लंबी राहत की सांस ली.
09:38ब्रहमांड के इस दुलब संतुलन को देखकर कैलाश परवत के सभी जीवजन्तु जो भैभीत थे, अब पुनह अपनी सहच स्वाभाविक
09:47अवस्था में लौट आए.
09:50किन्तु टाइटन की प्रतिध्वनी अभी भी हिमालय की उन गहराईयों में गूंज रही थी, जिसे केवल कार्तिके अपनी दिव्यद्रिष्टी से
09:58देख पा रहे थे.
10:00भगवान शिव ने अपनी समाधी से एक आख खोली और हिमालय की रक्षा के लिए कार्तिके को अपनी मौन स्वीकृती
10:08और शक्ती प्रदान की.
10:11कार्तिके की देह से निकलने वाली अगनी अब शान्त हो चुकी थी, परन्तु उनके नेत्रों की चमक एक ऐसे संकल्प
10:18को दर्शा रही थी, जो भविश्य के युद्धों के लिए सन्नध था.
10:23पूरे हिमालय पर एक स्वर्णिन प्रकाश की वर्शा होने लगी, जो उस सुरक्षा कवच से निस्रित होकर चारों दिशाओं को
10:31पुनर जीवित कर रही थी.
10:34कार्तिकेय ने धीरे-धीरे अपने अस्त्र को शांत किया और अपनी दिव्य शक्ती को पुनह सन्यमित करते हुए उस महाविस्पोर्ट
10:42के संकट को पूर्णत है टाल दिया.
10:45स्रिष्टी के आरंभ से ही विद्यमान परवत श्रिंख लाएं अब कार्तिकेय के इस दिव्य हस्तक्षेप के कारण एक बार फिर
10:52सुरक्षित और स्थिर प्रतीत हो रही थी.
10:56देवगणों ने आकाश से फूलों की वर्षा की जिससे कार्तिकेय का यह पराक्रम और भी अधिक अलोकिक व अविस्मर्णिय सिद्ध
11:04हुआ.
11:06हिमाले अब शांत था, किन्तु कार्तिकेय जानते थे कि यह केवल एक अंतराल है क्योंकि आने वाले समय में उन्हें
11:14और भी बड़ी चुनोतियों का सामना करना था.
11:18कार्तिकेय ने हिमालई की गहन कंदराओं के भीतर प्रवेश किया, जहां टाइटन की निद्रा से उत्पन होने वाली उर्जा का
11:25स्पंदन ब्रहमांड की नीम को हिला रहा था.
11:29भगवान विश्णु ने शेशनाग की शया से उठकर चिंतामगन द्रिष्टी से उस पाताल लोग की ओर देखा, जहां कार्तिकेय ने
11:38अपने मन की तरंगों को टाइटन से जोडने का कठिन संकल्प लिया था.
11:43कार्तिकेय ने अपनी ध्यान मुद्रा को सुद्रिड करते हुए उस प्राचीन टाइटन के मस्तिश्किये जाल में प्रवेश करने का प्रयास
11:51किया, जो सदियों से स्थिर पड़ा था.
11:54जैसे ही चेतना का मिलन हुआ, हिमालय के भीतर की चट्टाने एक अजीबो ग्रीब कमपन के साथ कामपने लगी, मानो
12:02स्वयंकाल का चक्र रुप गया हो.
12:05कार्तिके के मस्तिश्क में टाइटन की असीम और आदिन स्मृतिया बाड की तरह बहने लगी, जिससे उनके दिव्यतेज मेभी क्षनिक
12:14उथल-पुथल मच गई.
12:16भगवान शिव कैलाश के शिखर पर अपनी आखें खोलते हैं, वे अपनी तीसरी आख के माध्यम से उस समवाद की
12:24तीवरता को महसूस कर रहे थे, जो टाइटन और कार्तिके के बीच आरंभ हुआ था.
12:30समवाद के एक बिंदु पर टाइटन ने अपनी मूख वेदना को एक महागरजना के रूप में प्रकट किया, जिससे पूरी
12:38प्रित्वी की परतें आपस में टकराने लगी.
12:40यह गरजना इतनी भीशन थी कि पाताल के गर्भगरेह में स्थित प्राचीन धातु की दीवारे थर्थरा कर बिखरने लगी और
12:50ब्रहमांडिय संतुलन दग्मगाने लगा.
12:53कार्थिकेय ने अपनी मानसिक शक्तियों को केंद्रित कर उस महागरजना को रोकने का प्रयास किया, जिससे उनके चारों और एक
13:01सुवर्ण सुरक्षा कवच बन गया.
13:04देवराज इंद्र ने आकाश से इस द्रिश को देखते हुए अपनी वजर की मुठिया कसली, क्योंकि वे जानते थे कि
13:12यदि समवाद विफल हुआ, तो प्रलय निश्चित है.
13:16टाइटन की द्रिश्टी में कार्तिकेय ने आदिम अराजक्ता के दर्शन किये, जिसमें ब्रह्मांड के आरंभ से पूर्व की अशांत स्मृतिया
13:25कैद थी.
13:27प्रित्वी के गर्भ को चीर्ती हुई उस गर्जना ने परवतों की चोटियों को आपस में टकरा दिया, जिससे हिमपात की
13:34एक विनाशकारी लेहर उत्पन हो गई.
13:38कार्तिकेय ने अपनी चेतना से टाइटन को यह अनुभव कराने का प्रयास किया कि अब समय बदल चुका है और
13:45स्रिष्टी का विकास हो चुका है.
13:48महान गुरु ब्रहस्पती ने अपनी दिव्यद्रिष्टी का उप्योग करते हुए कार्तिकेय के मार्क को प्रकाशित किया, ताकि वे टाइटन के
13:56क्रोध को शांट कर सकें.
13:59टाइटन के मूख स्वर ने कार्तिकेय के हरिदय को जख जोर दिया, यह अनुभव कराते हुए कि उसकी पीड़ा उस
14:06समय से है, जब समय का कोई अस्तित्व नहीं था.
14:11वातावर्ण में एक रहस्य में नीली माचा गई, जो टाइटन के पुरातन ज्यान और कार्तिकेय की दिव्य उर्जा के मिलन
14:18का संकेत थी.
14:20कार्तिकेय ने फिर से अपनी शक्ती को बढ़ाया और टाइटन के चेतनातंत्र में सीधे अपने दिव्य अंश को संचारित करने
14:28का साहस किया.
14:30अचानक हिमालय का वह हिस्सा, जहां कार्तिकेय स्थित थे, एक स्वर्णिम प्रकाश से चमक उठा, मानो कोई प्राचीन द्वार खुल
14:38रहा हो.
14:40ब्रहमांड के रक्षक के रूप में कार्तिकेय ने अपना अंतिन प्रयास किया. उन्होंने टाइटन की उर्जा को सन्यमित करने के
14:48लिए ब्रहमास्त्र के एक सुक्ष्म अंश का आहवान किया.
14:52एक गूंजती हुई शान्ती के साथ, वह भीशन गर्जना धीरे-धीरे शान्त होने लगी और हिमाले पुनह स्थिर्ता की ओर
15:00लोटने लगा, किन्तु टाइटन के रहस्य अभी भी अनसुलजे थे.
15:06हिमाले की गर्थ से उठी उस प्राचीन उर्जाने कार्थिके की चेतना को एक दिव्य लोग की ओर खीचा, जहां स्रिष्टी
15:13के रच्चिता के पच्चिनह अंकित थे.
15:17भगवान विश्णु अपनी योग निद्रा से जागे, उनकी चतुर्भुज छवी वैकुंट के स्वर्ण कमल पर विराज मान थी, और उनकी
15:25आखें कार्थिके के संकल्प पर टिकी थी.
15:29कार्थिके ने देखा कि कैसे टाइटन के हृदय से निकलने वाली तरंगे काल के चक्र को पीछे की ओर धकेल
15:36रही हैं, जिससे प्रलय का दृष्य साक्षाथ हो उठा.
15:41ब्रहमांड की शांती को बनाये रखने के लिए उस अलौकिक टाइटन के कवच पर अनकित चिन्हों ने एक प्राचीन गाथा
15:48का रहस्योध धाटन किया.
15:51अचानक एक महाविस्पोर्ट की भांती टाइटन की स्मृतिया कार्तिकेय के मश्तिष्क में प्रवाहित होने लगी, जो स्रिष्टी के उदे से
15:59भी प्राचीन थी.
16:01भगवान शिव कैलाश के शिखर पर शांत बैठे थे, उनकी तीसरी आख का स्पंदन बता रहा था कि कार्तिकेय ने
16:09उस प्राचीन रक्षक का सत्य पहचान लिया है.
16:13कार्तिकेय ने अपने शस्त्र को भूमी में गाड़ कर उस टाइटन की पीडा को शांत करने का प्रयास किया, जिससे
16:20पूरी प्रित्वी एक क्षण के लिए स्थिर हो गई.
16:24हवा में तैरते हुए वे धूलकन मानो ब्रहमांडिय संगीत के स्वर बिखेर रहे थे, जो टाइटन की निग्रा को और
16:31गहरा बनाने का संकेट दे रहे थे.
16:35यह टाइटन वास्तव में स्रिजन के समय के वे स्थम्ष थे, जिन्हें ब्रहमांजी ने ही प्रित्वी को आधार देने के
16:42लिए स्थापित किया था.
16:45देवर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर एक ऐसी धुन छेड़ी, जिससे कार्थिकेय को उस टाइटन की भाषा को
16:52समझने में सहायता प्राप्थ हुई.
16:55कार्थिकेय ने टाइटन के मस्तक को स्पर्श किया और उनके मन में स्रिष्टी की उत्पत्ती का एक भव्य और दिव्यद्रिश
17:03उभर आया.
17:05ब्रहमांड के रक्षक होने के नाते, कार्थिकेय को अब यह भली भानती ग्यात हो गया था कि इस रक्षक को
17:12जगाना प्रलय को आमंतरन देने के समान होगा.
17:16हिमालय के उस गुप्ध द्वार के पीछे छिपी हुई, वह रहस्य में उर्जा अब धीरे धीरे अपने आपको ब्रहमांड की
17:23धमनियों में विलीन करने लगी.
17:26देवी पार्वती ने कैलाश से अपना आशिरवाद प्रेशित किया, जिससे कार्थिके के संकल्प में एक नई डैविय आभा का संचार
17:35हुआ.
17:36कार्थिके के शरीर से निकलने वाली तेजस्वनी उर्जा ने उस ताइटन को एक सुरक्षा कवच में लपेट दिया, जिससे वह
17:44आने वाले युगों तक सुरक्षित रहे.
17:47प्रकृती के नियम फिर से बदलने लगे और हिमालय की चट्टाने आपस में जुड़कर उस रहस्य को पुनह गर्भ में
17:54समाहित कर गई.
17:57स्रिष्टी का चक्र एक बार फिर से अपनी गती पर लौट आया, और कार्तिकेय ने हिमालय के उस शांत वातावर्ण
18:04में स्वयन को पुनर्समर्पित किया.
18:07स्वर्ग के देवताओं ने पुश्प वर्षा की, यह जानते हुए कि आज कार्तिकेय ने ब्रहमांड को एक भीशन विनाश से
18:15बचा लिया है.
18:17परन्तु उस टाइटन की आख में एक अंतिम चमक देखी गई, जो यह संकेट दे रही थी कि यह केवल
18:24एक अस्थाई विराम है.
18:27कार्तिकेय को अब यह सत्य समझ आ चुका था कि प्रलय के साक्षे केवल अतीत नहीं, बलकि भविश्य की नीम
18:35भी है.
18:37ब्रहमांड के कमपन शान्थ होते ही हिमालय की प्राचीन और विशाल जड़ों में गहरे कलपनिय विदर उत्पन होने लगे.
18:45कार्तिकेय ने अपने दिव्यरत से उतर कर इन पवित्र परवतिय विद्रों का निरीच्षन किया जो मानवता के लिए संकट बन
18:53रहे थे.
18:55प्रित्वी के भीतर से निकलती हुई उष्ण उर्जा ने हिमालय के प्राचीन पत्थरों को भीतर से दहकाना शुरू कर दिया
19:02था.
19:03यह वह धुरी थी जहां प्रलय के अवशेश और स्रिष्टी की स्थिर्टा आमने सामने खड़े थे.
19:10कार्तिकेय ने अपनी हथेलियों को उन दरारों पर रखा ताकी वे अपनी दिव्य उर्जा से इस धुरी को थाम सकें.
19:19रिशी और देवता स्वर्ग से इस महानुष्ठान को देख रहे थे जो प्रित्वी को बचाने के लिए हो रहा था.
19:27कार्तिकेय के शरीर से प्रवाहित होने वाली स्वर्ण आभा ने ठंडी बर्फ को छुकर एक सुरक्षा कवच बना दिया.
19:35प्रकृती की हर शिला इस महाउक्चार के प्रभाव से शांत और स्थिर होने लगी थी.
19:41परंतु यह सीलिंग केवल भौतिक नहीं थी, इसे ब्रहमांडिय नियमों के अनुसार स्थापित किया जाना था.
19:49कार्तिकेय ने अपने अस्त्रवेल को उठाया और उसे परवत की केंद्रिय धुरी पर स्थापित कर दिया.
19:56वेल के स्पर्ष से उत्पन्न हुई तरंगों ने प्रित्वी की हर एक टेक्टोनिक प्लेट को उसकी सही जगहे पर स्थिर
20:04कर दिया.
20:06यह द्रिश ऐसा था मानो स्वय हिमालय एक नए प्राण और अमर्त्व को प्राप्त कर रहा हो.
20:13नदियों का प्रवाह जो थम गया था, वह अब दोबारा से अपनी पवित्र गती और संगीत के साथ बहने लगा.
20:21देवराज इंद्र ने आकाश से इस अभेद्य सुरक्षा चक्र को देख कर कार्तिके की जयजयकार की.
20:29कार्तिके ने परवत की चोटी पर खड़े होकर उस ब्रहमांडिय संतुलन को महसूस किया जिसे उन्होंने अपने श्रम से बचाया
20:36था.
20:38हवाओं में अब कोई विनाशकारी चीख नहीं, बलकि वेदों के मंत्रों जैसी पवित्र शान्ती गूज रही थी.
20:46धर्ती की गहराई में सोया हुआ वह प्राचीन टाइटन भी अब इस अडिग उर्जा के आगे शान्त हो चुका था.
20:54संसार को यह विश्वास हो गया कि जब तक कार्तिके का पहरा है, तब तक प्रलय भी परास्थ है.
21:02हिमाले की रक्षा का यह महाकार्य पूरा होने के बाद आकाश में एक नया स्वर्णिन सूर्योदय हुआ.
21:10यह केवल एक संकट का अंत नहीं था, बलकि धर्म और सहनशील्टा की एक नई अमर गाथा का प्रारंभ था.
21:18हिमाले की शांत चोटियों के मध्य अचानक समय का एक सुक्ष्म धागा जिल मिलाने लगा, जिससे ब्रहमांड की स्थिर्ता एक
21:27क्षण के लिए डगमगा गई.
21:29इस विसंगती को देख कर भगवान विश्नु, जिनका शरीर नील मेगों के समान कांतिमान है, ने अपने चतुर्भुज रूप में
21:38शेशनाग की शया पर उठकर भविश्य के संकट को भामपा.
21:43ब्रहमांड के इस सुक्ष्म छेज से निकल कर भविश्य की विनाशकारी लप्तें एक धुंधले द्रिश के रूप में आकाश में
21:50उभरने लगी.
21:52समय का चक्र इस विदर को बंद करने के लिए अधीर हो उठा, जिससे परवत की तलहटी में एक रहस्य
21:59में कमपन उत्पन हुई.
22:02कार्तिके, अपनी दिव्य आभा और स्वर्ण कवच से सुसजित इस पोर्टल के सामने द्रिड़ता से खड़े हो गए ताकि भविश्य
22:10के अंधकार को वर्तमान में प्रवेश करने से रोक सकें.
22:14देवर्शी नारद ने वीना के सुर्चेरते हुए इस महान घटना की साक्षी बनने के लिए आकाश से प्रिथवी की ओर
22:22प्रस्थान किया.
22:24पोर्टल से दिखाई देने वाले उस भविश्य के शहर को देखकर कार्तिकेय के नेत्रों में करुणा और द्रिड़ता का अध्भुत
22:31मिलन हुआ.
22:33वायु मंदल में तैरते हुए स्वर्णिमकन समय के उस रहस्य को बया कर रहे थे जो अभी गर्भ में पल
22:40रहा था.
22:41पूरे हिमालय पर एक अजीव शान्ती छा गई, जैसे काल स्वयन ठहर गया हो और कार्तिकेय के निर्णय की प्रतीक्षा
22:49कर रहा हो.
22:51भगवान शिव समाधी मेलीन अपनी तीसरी आख से इस ब्रह्मांडिय विसंगती को अनुभव कर रहे थे.
22:59कार्तिकेय ने अपना दिव्य अस्त्रवेल उठाया और भविश्य के उस पोर्टल की उर्जा को नियंत्रित करने का प्रयास किया.
23:08धुन्धले द्रिश में आने वाले युगों की वो कातर ध्वनिया सुनाई देने लगी, जिसे सुनकर कार्तिकेय का हृदय द्रवित हो
23:15उठा.
23:17प्रित्वी की धुरी इस अलौकिक दबाव के कारण हलकी सी विचलित हुई, जिससे पहाडों के सीने में हलचल मच गई.
23:26देवता गन स्वर्ग से इस लीला को देखते हुए कार्तिकेय की शक्ती और त्याग को नमन कर रहे थे.
23:33कार्तिकेय की इच्छा शक्ती पोर्टल के द्वार को सिकोनने लगी, जिससे भविश्य का वह डरावना द्रिश ओजल होने लगा.
23:42समय का धागा जो उलज गया था, कार्तिकेय के अनुशासन के प्रभाव से पुन्ह अपनी लए में लोटने लगा.
23:50तभी हिमालय की उपत्यकाओं में एक दिव्य घंटानाद गूँज उठा, जो किसी बड़े परिवर्तन का सूचक था.
23:59ब्रहमांड के रक्षकों ने इस संकट को तो टाल दिया, लेकिन भविश्य की यह चेतावनी अब एक शिलालेख की तरह
24:06उनके मस्तिष्क में अनकित हो गई.
24:09कार्तिके का संकल्प केवल आज की रक्षा नहीं था, बलकि वह कालखंड की धारा को धर्म की दिशा में मोरने
24:16का प्रयास था.
24:19हिमालय की उचाईयों पर वह स्वर्णिम चमक स्थेर हो गई और फिर से शान्ती का एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ.
24:27हिमालय की गगन्चुम्बी चोटियों के बीच एक अलौकिक नीलिमा फैल गई, जहां महादेव का ध्यान ब्रहमांडिय स्पंदन बनकर गूझ उठा.
24:37कार्तिकेय ने अपनी आखें बंद की और उनके अंतर्मन में भगवान शिव का वह सुक्षम स्वरूप प्रकट हुआ जो काल
24:45की सीमा से परे है.
24:47शिव के मस्तक पर विद्यमान अर्धचंद्र से प्रकाश की एक सुक्षम किरन कार्तिके की दाई भुजा को स्पर्ष कर गई.
24:56उस दैविय प्रकाश के स्पर्ष से परवत की चट्टा ने किसी प्राचीन वाध्ययंत्र की तरह संगीत में गूझ उठी.
25:05कार्तिके को महादेव का मौन आदेश मिला कि इस टाईटन के विनाश में ही जगत का और भी बड़ा संकट
25:11छिपा है.
25:14महादेव का वह सौमे स्वर कार्तिके के हृदय में गूझा की टाईटन का जागना मात्र एक प्राकृतिक क्रिया नहीं, बल्की
25:21एक विस्मृत सत्य की पुनह प्राप्ती है.
25:25कार्तिके ने उस विशालकाय प्राचीन शक्ती के अस्तित्व को सुक्ष्म जगत की पर्तों में समाहित होते हुए अनुभव किया.
25:34वह दिव्य उर्जा परवत की बरफीली चट्टानों को चीरती हुई आकाश की और एक सुनहरी लकीर की भाती दोड़ गई.
25:43हिमालय का कणकन उस ब्रह्मांडिय उर्जा के आगमन से एक अध्भुत दिव्य चैतन्य से उतप्रोथो उठा.
25:51कार्तिके अब योध्धा के रूप से हटकर एक द्रश्टा के रूप में उस प्राचीन सत्य के रहस्य को समझने हेतु
25:58अग्रसर हुए.
26:00जैसे ही उन्होंने ध्यान लगाया, टाइटन की द्रिश्टी का केंद्र उनके सम्मुख एक अध्रिश्य द्वार बनकर उभरने लगा.
26:09यह वह स्थान था जहां भौतिक सत्य और आध्यात्मिक रहस्यों का मिलन बिंदुस्थित था.
26:16महादेव की कृपाद रिश्टी ने उस टाइटन की सुक्त स्मृतियों को कार्तिके के मानस पटल पर एक चल्चित्र की भाती
26:24अनकित कर दिया.
26:26कार्तिके ने देखा की कैसे वह प्राचीन टाइटन स्रिष्टी के प्रारम्भिक काल में रक्षक की भूमिका में प्रतिष्थित था.
26:34उसके क्रोध का कारण केवल जागर्ण नहीं, बलकि उस युक के धर्म का विस्मरण था जिसके लिए वह नियुक्त था.
26:42पर्वत की हवाओं में एक सौमे संगीत सा घुल गया, जैसे प्रकृती स्वय उस पुराने रक्षक का स्वागत कर रही
26:50हो.
26:51कार्तिके ने अपना त्रिशूल भूमी में स्पर्ष किया, जिससे समस्त धरा को एक सुरक्षा कवच प्राप्थ हुआ.
26:59वह कवच टाइटन की शेश पूर्जा को सोखने और उसे स्थिर करने का एक अध्भुत यंत्र बन गया.
27:07ब्रहमांड के रक्षकों को अब यह स्पष्ट हो गया था कि हर प्रलय के पीछे एक नया निर्मान छिपा होता
27:14है.
27:15हिमाले की उस पवित्र भूमी पर शान्ती का एक नया अध्याय फिर से स्वन अक्षरों में लिखा जाने लगा.
27:23हिमाले की उस शांत कंदरा में अचानक एक भारी कमपन गूंज उठा जो प्राचीन युगों की सोई हुई चेतना को
27:30जगा रहा था.
27:33कार्तिकेय ने अपने दिव्य नेत्रों से उस विशाल टाइटन के भीतर उठ रही रहस्यमय उर्जा तरंगों का गहराई से निरीख्षन
27:40किया.
27:41उस प्राचीन प्राणे के विशाल वक्षस्थल से निकलती हुई गूंज ने ब्रह्मांड के सभी आयामों को एक पल के लिए
27:49थाम दिया.
27:50समय के पहिये की गती धीमी पड़ गई और अंतरिक्ष की अनंत गहराईयों में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया.
27:59टाइटन ने अपनी अनंत गहरी आखों को खोला, जिससे स्रिष्टी के आरंभिक काल का इतिहास प्रकट होने लगा.
28:07उसकी भारी और गंभीर आवाज से परवतों की चट्टाने जंकरित हो उठीन और हवा में दिव्यस पंदन उत्पन हो गए.
28:16उस प्राचीन इकाई ने कार्तिके के समक्ष भविश्य के उन गुप्ट अध्यायों को खोलना शुरू किया जो देवताओं की पहुँच
28:24से परे थे.
28:26ब्रहमांड के मान्चित्र पर अंगिनत नए नक्षत्रों और विलुप्ट होने वाले लोकों की एक अध्रिश्य चाया तैरने लगी.
28:34कार्तिके ने अत्यंत एकाग्रचित्त होकर उस रहस्यमय वानी को सुना जो आने वाले महाप्रिवर्तन की ओर संकेत कर रही थी.
28:44देवलोक के सिनहासन भी इस अज्यात भविश्य के खुलासे से अंजाने भय और आश्चर्य में डूग गए.
28:52टाइटन की प्रतेक पुकार के साथ अंतरिक्ष की नीली चादर पर स्वर्ण रंगों की रिखाएं उकेरने लगी.
28:59यह संबाद केवल दो प्राणियों के बीच का नहीं, बल्कि युगों के अंतराल को पाटने वाला एक महान से तु
29:07था.
29:08हवा की हर सास में प्राचीन वेदों की रिचाओं जैसी प्रतिध्वनी गूझने लगी और वातावर्ण पवित्र हो गया.
29:17कार्तिके के मुखमंडल पर उस महासत्य को जानने के बाद एक अलोकिक तेज और स्थिर्ता छा गई.
29:24वह प्राचीन टाइटन अंतह शान्थ हुआ और उसकी उर्जा हिमालय की धड़कनों में हमेशा के लिए विलीन हो गई.
29:33ब्रहमांड के इतिहास का एक अत्यंत गोपनिय प्रिष्ट अब देवताओं और कार्तिके के समक्ष खुला था.
29:40हिमालय की चोटियों पर सूर्य की किरने पड़ी तो लगा मानों पूरा ब्रहमांड एक नए स्वर्ण युग का स्वागत कर
29:47रहा हो.
29:49कार्तिके ने अपने स्थान से उठकर उस दिव्य संदेश को समस्थ संसार के कल्यान हेतु अपने हृदय में धारण कर
29:57लिया.
29:58प्रकृती ने अपनी संपूर्ण दिव्यता के साथ इस महान रहस्योध धाटन को अपनी पावन स्मृती में अनकित कर लिया.
30:06इस प्रकार टाइटन के रहस्यमय खुलासे ने धर्म और कर्म के एक नए मार्ग को सदा के लिए प्रशस्त कर
30:13दिया
30:15कार्तिकेय ने अपने पच्चिहनों को पीछे छोड़ते हुए उस दिव्य परवत शिखर को त्यागा जहां से ब्रहमांड की गूंज अब
30:23एक मंद विलाप की भांती सुनाई दे रही थी
30:27कैलाश के मौन में डूबे भगवान शिव ने अपनी योग निद्रा से आखे खोली और कार्तिकेय के प्रस्थान की सूचना
30:34पाकर एक गंभीर मुस्कान के साथ दिशाओं को निहारा
30:39कार्तिकेय की शक्ती का प्रभाव उनके हर कदम के साथ उस मार्ग को प्रकाशित कर रहा था जहां से होकर
30:46स्रिष्टी का नवनिर्मान होना निश्चित था
30:50आकाश में नक्षत्रों ने अपनी गती बदल दी और एक अद्रिश्य उर्जा चक्र ने कार्तिके के चारों और सुरक्षा कवच
30:57का निर्मान कर लिया
31:00रास्ते में ही देवर्शी नारद वीना बजाते हुए प्रकट हुए उनके मुख पर आगामी संधर्ष की गंभीर्टा का स्पष्ट आभास
31:08जलक रहा था
31:10नारद ने कार्तिके को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रहमान्ड के गुक्त लोकों में एक नई हल्चल का प्रारंभ हो
31:17चुका है जो काल के चक्र को बदल देगा
31:22कार्तिके ने अपने दिव्य शस्त्र शक्ती को द्रिड़ता से थामते हुए उत्तर दिया कि कर्तव्य का मार्ग सदैव कठिन होता
31:29है किन्तु वे विचलित होने वाले नहीं है
31:33पर्वत की घाटियों में गुंजती उनकी वानी से ऐसा प्रतीत हुआ जैसे प्रकृती स्वय उनके संकल्प को स्विकार कर रही
31:41हो
31:42वे अब एक ऐसे द्वार पर पहुँचे थे जहां से लोकलो कांतरों का स्वरूप पूरी तरह धिन्न और अत्यंत रहस्य
31:50में दिखाई पड़ रहा था
31:52भगवान विश्नुने क्शीर सागर में स्थित अपने दिव्य धाम से कार्तीकेय के साहस को अपनी दृष्टी से आशिरवात प्रदान किया
32:02कार्तिकेय ने उस उर्जा के द्वार में प्रवेश करने से उर्व एक क्षन रुखकर उस ब्रह्मांडिय संतुलन का स्मरण किया
32:09जिसे उन्होंने संरक्षित किया था
32:13जैसे ही उन्होंने द्वार को स्पर्श किया चारों और स्वर्ण और नीले रंग की प्रकाश्टरंगे फूट पड़ी और वातावर्ण पवित्रता
32:21से भर गया
32:23उस अज्यात दिशा में आगे बढ़ते हुए कार्तिकेय ने अनुभव किया कि ब्रह्मांड के नियम अब और भी अधिक सुक्ष्म
32:31और जटिल होते जा रहे हैं
32:34महादेव के प्रिय पुत्रकार्तिके अब उन गोपनिय रहसियों के द्वार खोल रहे थे जो कालखंडों से छिपे हुए थे
32:43हवाओं ने भी उनकी गती के साथ तालमेल बिठाया और एक दिव्य संगीत उत्पन हुआ जो सन्नाटे को आनंद में
32:50बदल रहा था
32:52यह यात्रा मात्र एक प्रस्थान नहीं बलकि स्रिष्टी के भावी भाग्य का एक नया अध्याय था जो उनकी भुजाओं के
33:00बल पर लिखा जाना था
33:03कार्तिके के हरिदय में अब केवल एक ही धेय था उस आने वाली आपदा के मूल तक पहुँचना जो स्रिष्टी
33:10की नीम को हिला सकती थी
33:13शिव के अंश के रूप में वे जानते थे कि विनाश के बिना नवनिर्मान की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती
33:21उन्होंने अपनी दिव्यद्रिष्टी का विस्तार किया और काल के उस प्रवाह को देखा जो आने वाले समय में एक भीशन
33:29परीक्षा के संकेत दे रहा था
33:32निश्चय के साथ आगे बढ़ते हुए कार्तिके ने घोशनाकी की धर्म की रक्षा के लिए वे ब्रहमान्ड के किसी भी
33:39छोर तक जाने को तयार है

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