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Witness the thrilling continuation of Skanda Purana Episode 18! Lord Kartikeya faces the ultimate temporal dilemma in the sunken realm of Jala-Dwar. Will he seal the ancient records or risk the entire cosmic balance to save the lost knowledge? Dive deep into Hindu mythology with cinematic storytelling, epic visuals, and profound spiritual truths. Like, share, and subscribe for more mythological mysteries!
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00:00कार्ति के पाताल के जलद्वार के समक्ष खड़े होकर समय के इस भयंकर कमपन का सामना कर रहे हैं।
00:08उनके समक्ष उत्कीन प्राचीन आर्श अभिलेक इतिहास के उस चक्रव्यू को उजागर कर रहे हैं जो सब कुछ नश्ट कर
00:16सकता है।
00:18यह शाश्वत धूमी गवाह बन रही है उस महा संकट की जो हर एक कल्प के साथ दोहराया जाता रहा
00:25है।
00:27जलद्वार की प्रल्यकारी धाराएं इस बात का प्रमान हैं कि अतीत के निर्णे वर्तमान का भविश्य तै करते हैं।
00:36कार्तिके का दिव्यमन इस बात पर मन्थन कर रहा है कि कैसे इस युग के विनाश को रोका जाएं।
00:43महान योध्धा और सेनाप्ती होने के नातेवे जानते हैं कि ज्ञान की रक्षा और प्रलयका शमन दोनों आवश्यक हैं।
00:53शिलाओं पर खुदे वे अक्षर चेतावनी दे रहे हैं कि यदि परमपराओं को तोड़ा गया तो ब्रहमांड बिखर जाएगा।
01:01समय की यह नदी उल्टी बहने लगी है और इसका हर एक थपेड़ा ब्रहमांड के संतुलन को चुनोती दे रहा
01:08है।
01:10पूर्व मानवंतरा के वे भूले हुए रहस्य अब सतह पर आ रहे हैं जो पिछले युगों के दफन सच को
01:17उजागर करते हैं।
01:19कार्तिके की दृष्टी उन अनमोल अभिलेखों पर टिकी है जो आने वाली पीढियों के अस्तित्व का एक मात्र आधार हैं।
01:28एक तरफ संपूर्ण लोग का विनाश है और दूसरी तरफ युगों पुरानी दिव्यता का यह अमूल्य खजाना।
01:37यह वहक्षन है जहां एक देवता को अपने पराक्रम से अधिक अपनी बुद्धी और विवेक का परिचय देना है।
01:46पाताल की गहराईों में गूंजती हुई यह खामोश पुकार ब्रहमांड के हर कोने को जख जोर रही है।
01:53वे गहराई से समझ चुके हैं कि इस बार की गलती से संपूर्ण स्रिष्टी का चक्र हमेशा के लिए थम
02:00जाएगा।
02:02प्रत्येक अभिलेक के साथ जुड़ा हुआ है एक ऐसा श्राप जो किसी भी सभ्यता को राख में बदल सकता है।
02:11यह अद्रिश काल बंधन अब अपनी चरम सीमा पर पहुँच शुका है, जिसे केवल सकंध ही तोड़ सकते हैं।
02:19कार्तिके का अस्त्र इस बात का प्रतीक है कि शक्ती का उप्योग हमेशा धर्म और सत्य की स्थापना के लिए
02:26होता है।
02:29जलद्वार के रक्षक भी इस महानायक के द्रिड संकल्प को देखकर मौन हो गए हैं।
02:35समय की धारा को मोरने का यह साहस केवल शिवपुत्र ही कर सकते हैं, जो पाताल में डटे हुए हैं।
02:44अब समय आ गया है कि इस प्राचीन श्राप के बंधन को तोड़ा जाए और नए युग का मार्ग प्रशस्त
02:51किया जाए।
02:52कार्तिकेय ने अपने नेत्र मून्द लिये और पाताल की असीमित नकारात्मक उर्जा को अपने भीतर आत्मसात करना आरंभ कर दिया।
03:02कैलाश के शिकरों पर बैठे भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख के माध्यम से पुत्र के इस कठिन संधर्श को
03:09निहारा और उनका मस्तक गर्व से जुग गया।
03:13कारतिके के हाथों में दिव्य वेल का आहवान होते ही पाताल की धरती एक प्रचंड कमपन से धर्रा उठी।
03:21महाकाल का यह अस्त्र अब कारतिके के हाथों में सूर्य के समान प्रदीख्त हो रहा है, जो अंधकार को मिटाने
03:29के लिए ततपर है।
03:31पाताल के रक्षक इस दैविय प्रकाश की चकाचौंध से विचलित होकर अपने विशालकाई शरीर को समेटने लगे
03:40भगवान विश्णु ने वैकुंट से अपनी दिव्य द्रिष्टी डाली और मुस्कुराते हुए इस ब्रहमांडिय चक्र के परिवर्तन का साक्षी बने
03:49कार्तिके ने अपने दिव्य शस्त्र को पाताल की गहराई में गार दिया ताकि शापित उर्जा का प्रवाह रुख सके
03:57अस्तित्व के इस केंदर बिंदु पर शांती का एक सूप्षम आवर्ण सा बिचने लगा जैसे युगों का कोलाहल थम गया
04:05हो
04:06श्राप की काली धाराए अब वेल की दिव्य शक्ती से टकरा कर शुद्ध उर्जा में परिवर्तित हो रही थी
04:14नारद मुनी ने वीना के तारों को छेडा जिससे पाताल की गूझ में एक दिव्य संगीत का संचार हुआ
04:22कार्तिके का शरीर एक दिव्य तेज से दमक रहा था
04:25मानो वह स्वया उस पाताल के नए रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हो रहे हो
04:31श्राप का प्रभाव इतना प्रबल था कि पाताल के पत्थर भी पिघल कर नए दिव्य स्वरूप में ढलने लगे
04:39ब्रहमांड के इस अंधेरे कोने में अब एक नई जोती का उदे हो रहा था
04:44जो युगों के संचित पापों का अंत करने वाली थी
04:49देवी पार्वती ने हिमाले से अपने पुत्र के साहस को देख अपनी हथेलिया जोड कर मंगल कामना की
04:57कार्थिकेय ने अपने शस्त्र को पुनह उपर खीचा जिससे पाताल की बंधी हुई उर्जा एक प्रचंड वेक से बाहर निकली
05:06यह उर्जा एक चक्रवात बनकर पाताल की दीवारों से टकराई और पुराने बंधनों को जड से उखाड फेंका
05:14समय का चक्र जो थम गया था वह पुनह अपनी गती से घूमने लगा जिससे पाताल का अस्तित्व नया जन्म
05:22पा रहा था
05:24महादेव ने अपनी मौन स्वीकृती दी जिसे पाताल की गूंज ने पूरे ब्रहमांड में प्रतिध्वनित कर दिया
05:32कार्तिकेय ने वेल को अपने वक्ष से सटा लिया और पाताल की शांती को एक दिव्य सुरक्षा कवच प्रदान किया
05:40पाताल का कालबंधन तूट चुका था और एक नए दिव्य युग की नीम कार्तिकेय के संकल्प से स्थापित हो गई
05:48पाताल की उन प्राचीन शिलाओं पर जैसे ही वेल का स्पर्ष हुआ, सदियों से सोई हुई लिपिया एक दैविय प्रकाश
05:56से धधक उठी
05:58भगवान विश्णु ने अपनी दिव्यद रिष्टी से उन अक्षरों को पढ़ते हुए कहा कि यह स्रिष्टी की उत्पत्ती से पहले
06:05की भूली विसरी गाथा है
06:08वेल की उर्जा से पत्थरों के भीतर का प्राचीन ज्यान एक गूंज बनकर पूरे पाताल में तरंगित होने लगा
06:16ब्रहमांड के रचिता ब्रहमाजी ने कमल पर विराज मान होकर उन प्रतीकों की ओर देखा जो कालचकर के तुटने की
06:24चेताबनी दे रहे थे
06:26जैसे जैसे प्रकाश गहरा हुआ पाताल की दीवारों पर अनकित पूर्व मनवंतरों के द्रिश सजीव होने लगे
06:34नारद मुनी ने वीना के तारों को थाम लिया क्योंकि उन शिलाओं से निकलने वाली ध्वनी में प्रलय का संगीत
06:41छिपा था
06:43कार्तिके ने अपने संकल्प से उन शिलाओं की उर्जा को वश में किया ताकि वे बिखर न जाए
06:50हवा में कालचकर के तूटने की गंध फैल गई जो एक घने सुनहरे कुहासे के रूप में प्रकट हुई
06:58पाताल की गहरायों में जमी हुई काई और धूल उस दिव्य प्रकाश के सामने टिक न सकी
07:05भगवान महादेव की गुंजती हुई मुस्कान ने उन शिलाओं में छिपी हुई शक्ती को नियंतरित करने की अनुमती दी
07:14शिलाओं का पत्थर अब निर्जीव नहीं रहा बलकि वह धड़कन के साथ ब्रहमांडियस पंदन उत्पन करने लगा
07:22वायुमंडल में तैरते हुए प्राचीन मंत्र शिलाओं से टक्रा कर एक नई भाशा का निर्मान कर रहे थे
07:30कार्तिके की वेल का सिरा अब एक सूर्य के समान चमक उठा जिसने पूरे पाताल को प्रकाशित कर दिया
07:38विश्नुजी ने आगे बढ़कर उस प्रकाश को धारण किया जिससे वह विनाश के बजाए स्रिजन की ओर मुड़ गया
07:47शिलान्यास के उन प्राचीन निशानों से अब एक सुरक्षा धेरा निकल कर बाहर आने लगा
07:53ब्रहमांड की शांती को भं करने वाली वह उर्जा अब धीरे धीरे शांत होकर एक दिव्य कवच में बदल रही
08:00थी
08:02पाताल का कालबंधन अब इतिहास बन चुका था और वहां का हरकन एक नई शुरुवात की प्रतीक्षा कर रहा था
08:10नारद मुनी ने अपनी वियाँ पर मंगल गान छेड़ दिया जो ब्रहमांड की गहराईयों तक गुंद उठा
08:18कार्तिकेय ने अपने अस्त्र को वापस म्यान में नहीं बलकि अपने संकल्प के केंद्र में रख लिया
08:25एक नए युग का सूत्रपात पाताल की उसी दिव्य भूमी से हुआ जिसे कोई नहीं जान पाया था
08:33पाताल की उन प्राचीन दीवारों से अचानक एक विद्रूप काल भंवर उत्पन हुआ
08:38जो ब्रहमांड के सत्य को निगलने के लिए अपना विराट मुख खोलने लगा
08:44भगवान विश्नु का दिव्य स्वरूप उस भंवर के सम्मुख प्रकट हुआ
08:48जिनकी शांत मुद्रा ने ही काल के उस भयानक वेग को कुछ खशनों के लिए स्थिर कर दिया
08:55कार्तिकेय ने अपने शक्तियस्त्र से भंवर की उन्धारा उपर प्रहार किया
09:00जो पाताल के उस गोपनिय ज्यान को अंधकार में समाहित करने के लिए आतुर थी
09:06समय का वह भयानक चक्र अपनी गती से घूमता हुआ संपून आकाश में एक दरावनी गूंच पैदा कर रहा था
09:14जिसे केवल देवताओं का साहस ही रोक सकता था
09:18प्रित्वी के भीतर छिपी उन दिव्य शिलाओं पर अनकित लिपिया कालभमवर के प्रभाव से धीरे-धीरे लुप्थ होने लगी थी
09:26जैसे अस्तित्व ही मिट रहा हो
09:29गरुर देव ने अपने पंखों से उस कालभमवर की दिशा को मोडने का प्रयास किया
09:34जिससे ब्रहमांडिय उर्जा के कंड चारों और बिखर गए
09:39कार्तिके का अस्त्र पाताल की उस गहरी भूमी में धंस गया
09:43जहां से कालभमवर को संचालित करने वाली मुख्य उर्जाधारा प्रवाहित हो रही थी
09:49एक दरावनी गर्जना के साथ भंवर ने अपना रूप बदल लिया और पाताल की भूमी को भीतर से कामपने पर
09:57मजबूर कर दिया
09:59ब्रहमाजी ने योग निद्रा में लीन होकर उस भंवर के केंद्र में विद्यमान सुक्ष्म छेद को पहचानने का दैविय अनुष्ठान
10:07प्रारंब किया
10:09भगवान शिव ने अपनी जटाओं से काल के उस प्रवाह को रोकने हेतु भस्म का एक अभेद्य धेरा बना दिया
10:16ताकि ज्यान की रक्षा हो सके
10:19कार्तिके के तेज ने काल भंवर के उन जहरीले तत्वों को जुलसा दिया जिससे पाताल में एक शनिक शान्ती छा
10:27गई
10:28समय का वह खंडित पहिया अब वापस अपनी धुरी पर आने का संधर्ष कर रहा था और पाताल की नीव
10:35फिर से हिलने लगी थी
10:38विश्नु जी ने अपनी माया का प्रयोग करते हुए उस काल भंवर को अपने हाथों की हतेलियों के बीच समेटने
10:45का प्रयत्न किया
10:47गरुड की चीक उस पाताल लोग के सन्नाटे को चीरती हुई देवताओं के संकल्प को और अधिक द्रेड कर रही
10:54थी
10:56अचानक कार्तिके ने अपने अस्त्र को घुमाया जिससे भंवर के भीतर फंसे हुए प्राचीन मंत्रों का तेज बाहर निकलने लगा
11:05वह दिव्य मंत्र पाताल की दीवारों से टक्रा कर एक सुरक्षा क्वच में तब्दील हो गया जो काल के घातक
11:12प्रहारों को रोकने में सक्षम था
11:15भगवान शिव ने अपनी तीसरी आख खोल कर काल भंवर के उस मायावी केंद्र पर प्रहार किया जो केवल विनाश
11:23का कारण था
11:25पाताल का वह नरक लोक शिव के तेज के कारण एक क्षण के लिए दैविय आभा से आलोकित हो उठा
11:33कारतिके ने उस अंतिम क्षण में कालबंधन की अंतिम कड़ी को तोर दिया और ज्यान को चिरकाल के लिए सुरक्षित
11:40कर लिया
11:42काल के उस भंवर का अंति हुआ और पाताल की वह भूमी पुनह शान्त हो गई जहां अब भविश्य का
11:49नया इतिहास लिखा जाने वाला था
11:52पाताल की उन विशाल ओपसीडियन शिलाओं के बीच कारतिके ने देखा की कैसे समय का पहिया एक स्थिर गती से
12:00घूमने लगा है
12:02भगवान विश्णु जो सुदूर वैकुंठ के स्वर्ण कमल पर विराजमान थे ने अपनी दिव्य द्रिष्टी से कारतिके के इस साहस
12:10को देखकर एक मंद मुस्कान बिखेरी
12:14कारतिके ने अपने वेल को उस दिव्य केंद्र के निकट रखा जहां जल के तत्व और अगनी का मिलन हो
12:20रहा था
12:22अचानक उस निस्तब्ध वातावर्ण में एक दैवियस पंदन हुआ जैसे काल स्वया अपने अस्तित्व के एक नए अध्याय को जन
12:30दे रहा हो
12:32वो राहमुख वाले रक्षकों ने सिर जुका कर कारतिके के इस अलोकिक कार्य को अपनी मौन सहमती प्रदान की
12:41भगवान शिव ने कैलाश से अपनी तीसरी आख खोली और उनकी कृपा की एक किरन पाताल की गहराईयों तक जा
12:48पहुँची
12:50वेल के भीतर से एक अध्भुत ध्वनी निकली जैसे ब्रहमांड के सभी समुद्र एक साथ गरज रहे हो
12:58उस ध्वनी के प्रभाव से पाताल कीवे प्राचीन शिलाय काम्प उठीन मानो युगों की जरता समाप्थ हो रही हो
13:07कार्तिके ने अपने सम्पूर्ण तेज को उस वेला वेल में प्रवाहित कर दिया जिससे वह शस्त्र और भी अधिक तेजस्वी
13:15हो उठा
13:16गरुर के पंखों की फड़फडाहट की गूँज वैकुंट से पाताल तक पहुँची मानो वे इस घटना के साक्षी बन रहे
13:24हो
13:25अगनी और जल का यह अभूत पूर्व संगम एक नई दैविय उर्जा को जन दे रहा था, जिसका स्वरूप पहले
13:33कभी नहीं देखा गया था
13:35इस शक्ति के प्रक्तिकरण से पाताल का वह घना अंधकार छंटने लगा और एक सुनहरी आभाचा गई
13:44स्वयकार्तिके ने अनुभव किया कि ब्रह्मांड के गुप्त नियम अब उनके शस्त्र के साथ एक रूप हो रहे हैं
13:52नारद मुनी जो अपनी वीना के साथ वहां उपस्थित थे ने इस अध्भुत घटना को देखकर नारायन के नाम का
14:00स्मरण किया
14:01वेल की चमक अब इतनी तीवर हो गई थी कि उसने पूरे पाताल के कणकण को दिव्यता से भर दिया
14:09यह वहक्षन था जहां रक्षकों का बलिदान और कार्तिके का पुरुशार्थ मिलकर इतिहास की नई धारा मोरने वाले थे
14:19कार्तिके की भुजाओं में वह अनंत शक्ती संचित हो गई जो स्रिजन और सहार दोनों का आधार थी
14:26आकाश और पाताल के बीच का वह अंतर अब मिट रहा था जैसे दोनों ही सत्य के एक ही धरातल
14:33पर आ गए हो
14:35अंतिम हुंकार के साथ कार्तिके ने उस शक्ती को थाम लिया और कालबंधन के अंतिम अवशेशों को भस्म कर दिया
14:44पाताल अब एक नई आभा के साथ शांत था और ब्रहमांड का भविश्य अब सुरक्षित हाथों में था
14:52पाताल के गर्भ में स्थित उस प्राचीन आधारशिला पर कार्तिके ने अपना वेल पूरी शक्ती के साथ स्थापित कर दिया
14:59है
15:00जिससे ब्रहमांडिय संतुलन की नीव फिर से सुग्रिड होने लगी है
15:06भगवान विश्य अपनी शेश्या पर विराज मान होकर इस घटना को देख रहे हैं
15:11उनके मुख पर एक शांत और संतोश जनक मुस्कान है जो इस संकट के अंत का संकेत दे रही है
15:19वेल से निकलती दिव्य उर्जा पाताल की दरारों में प्रवाहित हो रही है
15:24जो युगों पुराने कालबंधन को जादूई रूप से सील कर रही है
15:29पाताल के अंधकार को मिटाते हुए वह दिव्य प्रकाश एक विशाल कमल के रूप में खिल उठा है
15:36जो ब्रहमांड की स्थिर्ता का प्रतीक बन गया है
15:40पूरे पाताल में फैले उस विशाल का रॉक स्लैब के बीचों बीच कार्तिके अडिक खड़े हैं
15:47जैसे वे स्वयंकाल की गती को थामे हुए धुरुभों
15:51कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी आखें खोली और उस दिव्यस पंदन को महसूस किया
15:57उनके मस्तक पर स्थित तीसरा नेत्र अब शांट आभा बिखेर रहा है
16:03कार्तिके ने वेल पर अपना हाथ रखा और उसके कमपन से पाताल की उन प्राचीन शिलाओं पर अनकित इतिहास स्वयंद
16:11जीवित हो उठा
16:14ब्रहमांड की उन खोई हुई कडियों को वापस अपनी जगह पर जुरते हुए देखकर पाताल का वातावर्ण एक नई दिवे
16:21शांती से भर गया है
16:24सैकडों वर्षों से चले आ रहे उस भारी दबाव का अंत हो गया और पाताल के भारी भरकम ग्रेनाइट के
16:31पत्थर अब एक मधुर ध्वनी के साथ अपने सही स्थान पर सेठ हो रही है
16:38देवी पारवती जो इस पूरी घटना को अपनी दिव्यद्रिष्टी से देख रही थी उनके चहरे पर अपने पुत्र की इस
16:45विजय के प्रती गर्व और ममता के भाव है
16:50कार्तिके की हथेली से निकली एक नीली उर्जा की लहर ने पूरे पाताल में व्याप्त कालदोश को सोख लिया और
16:57उसे शुद्ध हूर्जा में बदल दिया
17:00वह भयानक अभिशाप जिसने युगों से पाताल को अंधकार में रखा था अब एक सुनहरी राख बनकर हवा में विलीन
17:08हो रहा है
17:10पाताल की गहराई अब किसी नर्ग के समान नहीं बलकि एक सुरक्षित तिजोरी की भांती है जहां ब्रहमांड का कालचक्र
17:18पूरी तरह सुरक्षित है
17:21स्वर्ग के देवतागण अपनी दिव्य सभा में एकत्रित होकर कार्तिके के इस शौर्य और विवेक को नमन कर रहे हैं
17:31कार्तिके का वेल अब और अधिक चमक रहा है जैसे वह स्वयंकाल के उस नए युग का रक्षक बन गया
17:37हो
17:39वातावर्ण में एक दिव्य संगीत गूंज रहा है जो संकेत दे रहा है कि पाताल और आकाश का तालमेल अब
17:46पूरी तरह स्थापित हो चुका है
17:50कार्तिके ने एक गहरी सांस ली और उनके चारों और एक सुरक्षा घेरा निर्मित हो गया जो आने वाले समय
17:57में भी इस स्थान की रक्षा करेगा
18:01भगवान ब्रहमा अपनी योग माया से इस घटना का साक्षी बन रहे हैं वे इस स्थिरी करण को भविश्य के
18:07लिए एक वर्दान मान रहे हैं
18:11पाताल की उन प्राचीन दीवारों पर जो इतिहास अनकित था वह अब स्वयं को फिर से लिख रहा है ताकि
18:18भविश्य में कोई भी इसे मिटा न सके
18:22ब्रहमांड के काल चक्र की धुरी अब स्थिर है और कार्तिके ने पाताल को उस भयानक श्राप के बंधन से
18:29मुक्त कर दिया है
18:32पाताल की गहराईयों में जल के भीतर उठती विशाल लहरेंग अब शान्त होकर एक जादूई नीले प्रकाश में विलीन हो
18:39रही है
18:41भगवान विश्नु जो शेशनाग की शया पर विराजमान है अपनी कमल नयन आखों से पाताल के इस नवस्रिजन को देख
18:49रहे है
18:52कार्तिके ने अपने दिव्यभाले शक्ती को पाताल की उस धुरी पर स्पर्श कराया जिससे संपूर्ण भूमंडल में एक मधूर स्पंदन
19:00गूज उठा
19:02धूल और भस्म के बादल पाताल की छतों से नीचे गिर कर एक दिव्य आवर्ण का निर्मान कर रहे हैं
19:11पाताल की वे विशाल शिलाएं जो अब तक कांप रही थी अब एक व्यवस्थित क्रम में स्थिर होकर एक अटूट
19:18कवच का रूप ले रही हैं
19:20शिव के परमभक्त और देवों के सेनाप्ती कार्तिके के मुख पर अब उस शान्ती का तेज है जो केवल ब्रहमांड
19:28के रक्षक के पास होती है
19:31पाताल की उन प्राचीन दीवारों पर अब केवल वे ही इतिहास शेश हैं जो मानवता के कल्यान के लिए अनिवार्य
19:39हैं
19:40पूरे पाताल में बहने वाला वह दूशित जल अब एक स्वच और अम्रित्मई सरिता में परिवर्तित हो गया है
19:49ब्रहमांड की धुरी जो पहले विचलित थी अब कार्तिके के प्रयासों से अपनी पूर्ण केंद्रस्थिती पर आ चुकी है
19:58गरूर देव अपनी विशाल पंखों को समेटे विश्णु के साननिध्य में पाताल की उस नई भव्यता को निहार रहे हैं
20:07कार्तिके ने अपने हाथों को उपर उठा कर उस दिव्य उर्जा को पाताल के हर कण में प्रवाहित कर दिया
20:14है
20:16पाताल की उस गहरी शान्ती में अब केवल ब्रहमांडिय नाद की ध्वनी सुनाई दे रही है जो काल के चक्र
20:23को गती प्रदान करती है
20:26वह भयानक श्राप जिसने सदियों से पाताल को अंधकार में रखा था अब हमेशा के लिए समाप्त हो चुका है
20:35शिव के दिव्यदूत के रूप में कार्ती के अब उस स्थान को एक सुरक्षित रक्षक कवच में बदल रहे हैं
20:41जिसे कोई भी भेद न सके
20:44पाताल की शिलाओं पर अब भविष्य के उन्शुब संकेतों का अंकन हो रहा है जो आने वाले मनवंतर को सुरक्षित
20:52रखेंगे
20:54ब्रहमांड की चेतना का एक सुक्ष्म अंश पाताल के इस जल में समाहित होकर इसे सदैव के लिए चैतन्य कर
21:01रहा है
21:03देवों की सभा अब पाताल के इस अध्भुत काया कल्प को देखकर विस्मय और आनन से परिपूर्ण है
21:11भगवान विश्नु अपनी मुस्कान के साथ कार्तिके को आशिरवाद दे रहे हैं यह सुनिश्चित करते हुए की ब्रहमांड का संतुलन
21:20बना रहे
21:21पाताल का वहस्थान जो कभी अंधकार का केंद्र था अब प्रकाश और इतिहास का एक पवित्रस मारक बन गया है
21:31कार्तिके ने अपने कार्य को पूर्ण कर अब उस दैविय शक्ती को वापस सन्यमित कर लिया है और पाताल का
21:38यह अध्याय यहीं पूर्ण होता है
21:42कार्तिके ने मौन होकर उस प्राचीन रक्षक के सामने अपना मस्तक जुकाया, जिसके अस्तित्व का हर कन अब पाताल की
21:50गहराई में विलीन होने की प्रतीक्षा कर रहा था
21:54भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए अपनी दिव्य आभा का विस्तार किया, जिससे पाताल की जड़ता में एक नई चेतना का
22:02संचार होने लगा
22:04रक्षक की देह धीरे-धीरे जल की उन अनंत धाराओं में घुलने लगी, जो ब्रहमांड के निर्मांड की मूल कथाओं
22:11को अपने भीतर सहेजे हुए थी
22:14हवा में एक अलौकिक शान्ती छा गई, जैसे काल स्वयन ठहर गया हो और उस रक्षक के बलिदान को नमन
22:22कर रहा हो
22:24कार्तिकेय ने अपने मयूरवाहन की स्मृती में एक सुक्ष्म आहवान किया, जिससे पाताल के इस एकांत में भी एक दिव्यस
22:32पंदन उत्पन हो गया
22:34विष्णु का तेज उस अंधकार्मय लोक में व्याप्थ हो गया, जैसे कोई सुनहरी नदी सुखे पत्थरों के बीच अपना मार्ग
22:42बना रही हो
22:44रक्षक के नेत्रों में अंतिम बार एक कृत अग्यता का भाव उभ्या, मानो उसने कार्थिके के कंधों पर पूरे ब्रहमांड
22:51का भविष्य सुरक्षित देखिया हो
22:55पाताल की उन प्राचीन दीवारों से एक मूख गूंज उठी, जो उस रक्षक के अनंत काल के मौन व्रत के
23:02समाप्थ होने का संकेत थी
23:05कार्थिके के एक एहरिदय में उन अनकही गाथाओं का ज्यान समाहित हो गया, जिन्हें अब तक कोई भी देवता पढ़ने
23:12का साहस न कर सका था
23:15भगवान विश्णु ने अपना सुदर्शन चक्र था में रखा, यह सुनिश्चित करते हुए कि पाताल का यह द्वार काल के
23:22किसी भी अन्य चक्र से सुरक्षित रहे
23:25जैसे जैसे रक्षक पूर्णता विलीन हुआ, उसके द्वारा संरक्षित रहस्य पाताल की वास्तुकला में ही समाहित होकर अमर हो गए
23:34एक गुंजती हुई दिव्यध्वनी ने पूरे पाताल को गुंजायमान कर दिया, जो एक युग के अंत और नए संतुलन के
23:42आरंभ की घोशना थी
23:45कार्तिके अब उस स्थान पर अकेले थे, किन्तु उनके भीतर उस रक्षक का ज्यान और विश्नु का आशिर्वाद एक अटूट
23:53धाल बन चुके थे
23:55विश्नु की दिव्यद्रिष्टी से अब पाताल का यह क्षेत्र एक साधारन कारागार न रहकर ज्यान का एक पवित्र तीर्थ स्थल
24:03बन चुका था
24:05कार्तिके ने अपने वेल को भूमी पर स्पर्श कराया, जिससे एक दिव्य उर्जा तरंग उत्पन हुई जिसने पाताल की अशुद्धियों
24:13को क्षन भर में मिटा दिया
24:16अंधकार की उस गहरी पर्तों में अब सोने जैसी चमक बिखरी हुई थी, जो रक्षक के बलिदान का अंतिम प्रमाण
24:23थी
24:24युगों से चला आ रहा वह भयानक श्राप जो पाताल को अभिशप्त रखता था, कार्तिके के द्वारा तोड़ा जा चुका
24:32था
24:33भगवान विश्णू ने अंतह अपनी आखे बंद की, जिससे संपूर्ण पाताल में एक गहन ध्यानपूर्ण शान्ती चा गई
24:42कार्तिके अब उस पाताल लोग से बाहर निकलने के लिए ततपर थे, क्योंकि उनका कार्य पूर्ण हो चुका था और
24:50सत्य की रक्षा का उद्देश्य सिद्ध हो गया था
24:54पाताल की गहरायों में एक नया सूर्योदय हो रहा था, जो भविश्य के उन संधर्षों की नीम्व था जिनका सामना
25:01कार्तिके को करना था
25:04कार्तिके ने अपने पच्चेहनों के नीचे दबी उस पाताल की मिट्टी को स्पर्ष किया, जहां से युगों पुराना अंधकार अब
25:12विदाले रहा था
25:14भगवान विश्णु का ध्यानमगन स्वरूप पाताल की आभाको और अधिक प्रदीप्त कर रहा था, मानो ब्रहमांड स्वय अपनी गती बदर
25:22रहा हो
25:24कार्तिकेय ने अपने दाहिने हाथ से उस जादूई सुरक्षाकवच का निर्मान किया, जो उन्हें पाताल से भूतल की ओर ले
25:32जाने है तुँ एक दिव्यमार्ग प्रशस्त करने वाला था
25:36पाताल की उन प्राचीन शिलाओं के बीच एक गूंच सुनाई दी, मानो काल स्वय अपने बंधन से मुक्थ होने के
25:43लिए संधर्श कर रहा हो
25:46अंधेरी गुफाओं की छटें फटने लगी और उपर स्थित पावन सरिता का जल प्रकाश की किर्णों के साथ पाताल के
25:54मुख में प्रविष्ठ होने लगा
25:56भगवान विष्णों के नेत्रों के सुक्ष्म स्पंदन ने पाताल की जलधारा को पवित्र कर दिया जिससे वह एक दैविय अमरित
26:04में परिवर्तित हो गई
26:07कार्तिके उस दिविय जलधारा के मध्य में खड़े हो गए जहां उनका तेज उस पाताल लोग के अंधकार को काटते
26:14हुए एक प्रचंड स्थम्भ बन गया
26:17वातावर्ण में एक दैविय स्पंदन भर गया जैसे ही कार्तिके ने उपर की ओर अपनी गती बढ़ाई जल और प्रकाश
26:25का एक अभूत पूर्व मिलन हुआ
26:28नीचे से उपर तक एक सीधी रेखा खिंच गई जो पाताल के निस्तब्ध युगों को प्रित्वी के वर्तमान काल से
26:36जोडने वाली एक स्वर्ण में सेतू बन गई
26:39भगवान विश्णू ने अपनी दिव्य शंक ध्वनी का संकेत दिया जो पाताल की गहराईयों में गुंजती हुई उपर की ओर
26:47बढ़ने लगी
26:49कार्तिके ने अपने तेजस्वी वाहन का आहवान किया और देखते ही देखते वे जलधारा के प्रवाह के विप्रीत दिशामे वेग
26:57से उपर उठने लगे
26:59जल के भीतर ही दिव्य प्रकाश के कणों ने एक सुरक्षा आवरन बुन लिया था, जिसने कार्तिके को पाताल की
27:06विशैली लहरों से सुरक्षित रखा
27:10प्रित्वी की सतह के समीप पहुँचते ही पाताल का वह घना कोहरा एक शीतल फुहार में बदल गया, जो उपर
27:17की प्रकृती को त्रिप्त करने लगा
27:20भगवान विश्णु के ध्यानपूर्ण आशिरवाद से कार्तिके के शरीर से फूट्ती अगनी ने जल को और भी अधिक तेजस्वी और
27:29पवित्र बना दिया
27:31कार्तिके ने अपनी गती को और तेज किया, जिससे उनके चारों और की जलधाराएं एक चक्रवात की भाती घूमने लगी
27:40धरा की उपरी परतों में एक दिव्य कमपन हुआ, जैसे किसी महान शक्ती का पुनरागमन पृत्वी के हिदय को स्पर्ष
27:48कर रहा हो
27:50कार्तिके अंतह उस सतह के निकट पहुँच गए, जहां जल और वायू का मिलन एक चमकीली धवल रेखा के रूप
27:57में द्रिश्टि गोचर हो रहा था
27:59भगवान विश्णू ने अपनी आखें खोली और उनके दिव्य मुख पर एक संतुष्ट मुस्कान उभराई जो कार्तिके के सफल आरोहन
28:08का संकेट थी
28:11कार्तिके ने अंतिम शक्ती का संचार किया और एक प्रचंड विस्पोट के साथ जल की सतह को भेदते हुए वे
28:18भूतल पर प्रकट हुए
28:21प्रित्वी की पावन धरा पर कार्तिके के चर्णों का स्पर्श होते ही समस्त ब्रह्मांड में एक नई उर्जा का संचार
28:28हुआ और युगों का चक्र फिर से जागरित हो गया
28:32भूमी पर कदम रखते ही कार्तिके के मस्तक पर एक अद्रिश्य स्पंदन हुआ
28:37मानो उत्तर दिशा की परवत श्रिंख लाओं से कोई प्राचीन चेतावनी उन्हें पुकार रही हो
28:44सुदूर कैलाश के शिखर पर बैठे देवाधिदेव महादेव की तीसरी आख अचानक तमतमा उठी
28:50जैसे वे कार्तिके के हृदय में उठते हुए उस अंजाने भय के साक्षी बन गए हो
28:57कार्तिके ने अपना ध्यान उत्तर की ओर केंद्रित किया
29:01जहां आकाश में बादलों का एक काला चकर बिजली की गड़गडाहट के साथ अनिष्ट का संकेट दे रहा था
29:09ब्रहमांड के इस महामौन में केवल कार्तिके की श्वसन गती की ध्वनी गूंज रही थी
29:14जो आने वाले किसी बड़े युद्ध की पज्चापसी प्रतीत हो रही थी
29:20धरातल की मिट्टी कार्तिके के स्पर्ष से स्पंदित हो रही थी
29:24जैसे वर्षों से सोई हुई कोई प्राचीन शक्ती जागरित होने के लिए छटपटा रही हो
29:31वैकुंठ में विराजमान श्री हरी विष्णू ने अपनी दिव्यद्रिष्टी से उत्तर की ओर देखा
29:37जहां एक पुरातन कालबंधन के तूटने की आहट साफ सुनाई दे रही थी
29:43कार्तिकेय ने अपने वेल को जमीन पर टिकाया और उस दिव्य अस्त्र से निकली तरंगों ने परवतों के भीतर छिपे
29:50एक गोपनिय द्वार का मार्ग उजागर कर दिया
29:54परवत की विशाल शिलाए मानो स्वयंकार्तिकेय के स्वागत में जुक रही थी जिससे वह द्वार धीरे-धीरे एक स्वर्णिम आभा
30:02के साथ खुलने लगा
30:04पहाडों की उंचायों पर हवा का वेग बढ़ गया था जो अपनी फुस्फुसाहट में युगों पुरानी उन घटनाओं का बरणन
30:11कर रहा था जिन्हें काल ने मिटाने का प्रयास किया था
30:16शिव जी ने अपनी आखें खोली उनके ललाट पर पसीने की एक बूंद चमक रही थी जो इस बात का
30:23प्रमान थी कि यह संकट केवल मानविय नहीं बलकि दैविय था
30:28कार्तिके ने द्वार के भीतर प्रवेश किया जहां की दीवारें किसी विस्मृत सभेता की लिपी से सजी हुई थी जो
30:36चमकती हुई नीली आभा छोड़ रही थी
30:39वह द्वार एक भूल भुलिया सा लग रहा था जिसके गलियारों में समय स्वय थमा हुआ था प्रतीक्षा कर रहा
30:47था किसी ऐसे योध्धा की जो इसे फिर से चला सके
30:51जैसे जैसे कार्तीके आगे बढ़े उनके पैरों के नीचे की भूमी किसी रहस्यमय धड़कन की तरह कमपायमान हो रही थी
31:00जो उनकी अपनी उर्जा के साथ तालमिल बिठा रही थी
31:05ब्रहमाजी ने सत्यलोक से इस द्रिश्य को निहारा और उनके मुख से केवल इतना ही निकला की कार्तीके का यह
31:12प्रवेश नेती के उस चक्र को पुनह सक्रिय करेगा
31:16कार्तीके ने अपने भीतर की दिव्य अगनी को प्रजवलित किया ताकि वे सुरंके उस घने अंधेरे में छिपे हुए सत्य
31:24को सपष्ट रूप से देख सके
31:27अंधेरे के उस सामराज्य में चमकते हुए अक्षरों ने कार्तीके के समक्ष उस भयंकर श्राप का वर्णन अंकित कर दिया
31:35जो उत्तर दिशा को अपनी जकड में लेने वाला था
31:39पर्वत की उन गहरी चट्टानों के बीच एक गूंज उठी जो कार्तीके के साहस को चुनौती दे रही थी
31:46मानो स्वयंकाल ही उनकी परीक्षा लेने आया हो
31:51महादेव ने त्रिशूल को स्पर्श किया जिसके कमपन से हिमालय की शिकरों पर एक दिव्य आभाचा गई
31:57जो कार्तीके के लिए एक सुरक्षा कवच का कार्य कर रही थी
32:03कार्तीके ने रुखकर उस संदेश को पढ़ा और उनके चहरे पर एक ऐसी द्रिड़ता आई जो बड़े से बड़े अनर्थ
32:10को रोकने की शक्ती रखती थी
32:13काल के उस बंधन को तोड़ने का समय आ चुका था और कार्तीके ने अपने वेल की शक्ती से उस
32:20संपूर्ण परवत को एक दिव्य प्रकाश में परिवर्तित कर दिया