स्कंद पुराण के 17वें अध्याय में देखिए कार्तिकेय का पाताल लोक में महा-प्रवेश। जब वे जल के नीचे के 'Jala-Dwar' से गुजरकर उस रहस्यों से भरे कालखंड में पहुंचते हैं जहाँ पिछली मन्वंतरों की खोई हुई स्मृतियां कैद हैं। क्या कार्तिकेय बचा पाएंगे ब्रह्मांड के भविष्य को? जानिए इस महा-गाथा में। #SkandaPurana #Kartikeya #LordShiva #Mythology #SanatanDharma #AncientIndia #SpiritualJourney #Puranas #Mahadev #DivineSecrets
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00:00कार्थिके के सम्मुख जलद्वार के रक्षक का स्वरूप एक विशाल तरल प्रकाश की आकरिती के समान उभर आया, जो पाताल
00:08की गहरायों में एक दिव्य प्रकाश पुन्च की तरह धधक रहा था।
00:12भगवान कार्थिके ने अपनी स्वर्ण आभा विखेरते हुए उस रक्षक की ओर देखा, जिनकी आखों में ब्रहमांडिय सत्य की गम्भीरता
00:21और तारकिक्ता का अध्भुत संगम था।
00:42और चारों और केवल अनंत शूने का आभास हो रहा था।
00:46रक्षक की आवाज उस जलमगन लोक में गुंजी, जैसे किसी गहरे सागर की लहरें पत्थरों से टकरा कर कोई प्राचीन
00:54रहस्य उगल रही हो।
00:57कार्तिकेय ने धीर गम्भीर स्वर में उत्तर दिया कि वे केवल ज्यान की खोज में आये हैं, न कि विनाश
01:04के महा इतिहास को बदलने के लिए।
01:07रक्षक ने अपना तरल मुख कार्तिकेय की ओर मोडा और उसकी आखों से निकली रोष्णी ने पाताल की पर्तों को
01:14एक पल के लिए उजागर कर दिया।
01:17पाताल की उन पर्तों में विस्मृत कालचक्र की गूंट सुनाई दे रही थी, जो युगों पहले घटित घटनाओ का मौन
01:25साक्षी था।
01:26रक्षक ने चेतावनी देते हुए कहा कि यहां का हर कन विनाश की गाथा सुनाता है, जिसे सहन करने का
01:34साहस केवल देवों में ही होता है।
01:37कार्ति के का तेज रक्षक की तरल काया को और अधिक चमकाने लगा, मानो सत्य का प्रकाश असत्य की पर्तों
01:45को भेदने की शक्ती रखता हो.
01:48रक्षक ने अपने तरल शरीर से एक पार्भासी ढाल बनाई, जो उस जल्मगन ख्षेतर की पवित्रता की रक्षा करने के
01:55लिए तत्पर थी.
01:58अचानक वातावर्ण में एक दैविय संगीत का स्पंदन हुआ, जिससे पाताल की दीवारों पर जड़े हुए रत्न एक साथ चमक
02:06उठे.
02:07रक्षक ने कार्थिके के धैर्य की परीक्षा लेते हुए उन पर स्मृतियों की एक बाड़ सी छोड़ दी, जो बीते
02:14हुए युगों का द्रिश था.
02:17कार्थिके उन्द्रिश्यों के बीच निर्विकार खड़े रहे, उनका मन सागर की गहराई की भाती स्थिर और गंभीर था.
02:26रक्षक की तरल भुजाओं ने एक नया आकार लिया, जैसे वह कार्थिके को कोई मार्ग दिखाने की प्रतीक्षा में हुँ.
02:34वह पाताल का वहद्वार था जहां से विनाश का महायतिहास स्वयं कार्थिके का स्वागत करने के लिए खुला हुआ था.
02:43रक्षक की काया अब स्थिर हो चुकी थी, उसने जुक कर देवसेनापती का अभिनंदन किया, मानो उसे अपना अधिकारी मिल
02:51गया हो.
02:53कार्थिके ने एक गहरी सास ली और उस जलद्वार के भीतर प्रवेश करने के लिए कदम आगे बढ़ाएं.
03:01जैसे ही वे अंदर गए, रक्षक का स्वरूप जल के अनुओं में विलीन हो गया, जिससे द्वार के चारों और
03:08एक सुरक्षा कवच बन गया.
03:10अंधकार और प्रकाश के उस मिलन स्थल पर कार्थिके ने विस्मृत कालचक्र की पहली कड़ी को अपने सामने देखा.
03:19कार्थिके ने देखा कि कक्ष की दीवारें किसी ठोस पदार्थ से नहीं, बलकि तरल स्वटिक की पर्तों से बनी हैं,
03:26जिन में ब्रहमांड के विस्मृत युग तैर रहे हैं.
03:31दीवारों पर अनकितवे पवित्र मंत्र सहसा जीवित हो उठे और कार्थिके के सम्मुख एक तेजोमय आभा के साथ दैविय घटनाओं
03:40का सजीव चितरन करने लगे.
03:42एक तरल स्वटिक के भीतर उन्होंने देखा कि कैसे स्रिष्टी के आरंभ में नक्षत्रों का निर्मान एक विशाल ध्वनी तरंग
03:50के रूप में हुआ था.
03:52प्रकाश और अंधकार का यह अद्भुत मिलन उस काल्चक्र की गवाही दे रहा था जिसे देवगण भी सदियों से भूल
04:00चुके थे.
04:01कार्तिके ने अपना हाथ उस तरल स्फटिक के निकट किया और अचानक उनके मस्तिष्क में प्राचीन आकाश गंगाओं के स्पंदन
04:10का संगीत गूझ उठा.
04:12प्रक्षक ने मौन रहकर कार्तिके को उन्द्रिश्यों को गहराई से अनुभव करने का संकेत दिया, जहां समय की रेखाएं आपस
04:20में उलजी हुई दिखाई दे रही थी.
04:23तरल स्फटिकों के भीतर समय का प्रवाह उल्टा बहने लगा, जिससे कार्तिके को स्रिष्टी की उत्पत्ती के पूर्व की रिक्तता
04:31का दर्शन हुआ.
04:33आकाश के उन्द्रिष्यों में उन्होंने देखा कि कैसे ब्रहमांड के प्रथम स्वर उंकार ने शूने को चीर कर सत्यों का
04:41आधार रखा था.
04:43अचानक कार्तिके ने देखा कि एक दिव्य उर्जा पुंज उनके सामने स्थिर हुआ और एक प्रजवलित इतिहास के पन्ने के
04:51समान चमकने लगा.
04:54भगवान विश्नु का दिव्य स्वरूप उन द्रिश्यों के मध्य उभराया, जो काल के उस मोर पर ब्रहमांड के संतुलन को
05:01साध रहे थे.
05:03विश्नु के उस स्वरूप ने एक सुक्ष्म मुस्कुराते हुए ब्रहमांड की नश्वर्ता को कार्थिकेय के मस्तिश्क में सीधे प्रवाहित कर
05:11दिया.
05:12वह द्रिश्य इतना अलौकिक था कि स्वयं कार्थिकेय के चारों और की वायू भी उन पवित्रस पंदनों से थर्थराने लगी.
05:21विस्त्रत पटल पर उन्होंने देखा कि कैसे कालचकर का प्रत्येक पहिया देवताओं की नेती के साथ जुड़ा हुआ था.
05:30कार्थिकेय ने स्वयं को उन दिव्य घटनाओं का एक मूख दर्शक नहीं, बलकि उस कालचकर का एक रक्षक बनते हुए
05:37महसूस किया.
05:39तरल स्वटिकों के भीतर का द्रिश अब बदलने लगा था, जहां काल की सीमाएं तूटकर इतिहास के अग्यात रहसियों को
05:47उजागर कर रही थी.
05:49एक अलौकिक नीलिमा ने संपूर्ण कक्ष को भर दिया, जिससे हर एक स्वटिक एक नक्षत्र की भांती दमकने लगा.
06:08उस विशालकाय द्वार के भीतर अब केवल ज्यान और प्रकाश शेश था, जिसने काल की उन परतों को खोल दिया
06:15था, जिन्हें ब्रह्माने भी गुप्रक्खा था.
06:18जैसे ही वह ज्यान कार्तिके के भीतर आत्मसाथ हुआ, कक्ष की दिवारों पर अंकित चिन्हों ने उनकी दिव्य शक्ती का
06:26अभिवादन किया.
06:28काल चक्र का वह रहस्य अब कार्तिके के सम्मुख पूर्णत है स्पष्ट था, जो भविश्य के विनाश को टालने की
06:35एक मात्र कुंजी थी.
06:38कार्तिके ने अपनी दृष्टी को उस दिव्य भंवर में केंद्रित किया, जहां समय की धाराय पिघलकर अतीत के चित्रों में
06:45परिवर्तित होने लगी.
06:48भगवान शिव अपने ध्यान की मुद्रा में स्थिर थे, उनकी जटाओं से गंगा के जल के समान काल का प्रवाह
06:55निकल कर कार्तिके के हृदय में समा रहा था, वे एक दिव्य विशालकाय योगी हैं, जिनका शरीर नीले रंका है,
07:03ललाट पर तीसरा नेत्र चमक रहा है, ग
07:17जीव स्वर्ण युग के अंत में अपनी ही महत्वा कांक्षाओं के बोच से सिमटने लगे थे, विनाश का यह क्रूर
07:24सत्य एक जलते हुए स्तंभ के रूप में उनके सामने प्रकट हुआ, जो काल के उस विस्मृत अध्याय की साक्षे
07:31दे रहा था, जैसे ही उन्होंने काल
07:35चक्र के अगले घेरे को देखा, धर्ती की सतह पिघल कर धातु के महा सागर में परिवर्तित हो गई, जिसे
07:42देख कार्तिके का मन विचलित हो उठा, भगवान विश्नु का चतुर्भुज रूप उस धातु के पिघलते सागर के बीच प्रकट
07:51हुआ, जिनके चार हाथों मे
07:53शंक, चक्र, गदा और पद्म हैं, उनका वर्ण मेघशाम है, और उन्होंने वैजन्ती माला वस्वर्ण मुकुट धारण किया है।
08:23द्रिश और गहरे हुए, जहां कार्तिकेय ने उन विशालकाय प्राणियों को देखा जो देवताओं के आने से पूर्व इस स्रिष्टी
08:30के संरक्षक बने थे।
08:33ब्रहमाजी का सूक्ष्म रूप वहां उपस्थित था, जो काल की सीमाओं को लिख रहे थे। वेश्वेट दाढ़ी और चार मुखवाले
08:41हैं, जिन्होंने लाल रेश्मी वस्त्रधारन किये हैं और उनके हाथों में वेदव कमंडल है।
08:48कार्तिके ने अनुभव किया कि सृष्टी का यह चक्र केवल एक प्रारंभ या अंत नहीं, बलकि अंगिनत युगों का एक
08:56अंथीन अनुक्रम है।
08:59विनाश के उस महा इतिहास में, कार्तिके ने अपनी ही दिव्य शक्ती का एक और गुप्ट स्वरूक देखा, जो समय
09:06की पर्तों को काटने में सक्षम था।
09:09वे गहराई में उतरते गए, जहाँ प्रकाश और अंधकार का मिलन हो रहा था, और वहाँ उन्होंने उन पूर्वजों की
09:17आकरितियां देखी जो ग्यान के स्तंभ बन गए थे।
09:21नारद मुनी उस विस्मृत काल के द्वार पर वीना लिये खड़े थे, उनका शरीर तेजो मय है, गले में रुद्राक्ष
09:28माला है, और वे सदैव श्री हरी के नाम का जाप करते हुए ब्रहमांडिये ज्यान के वाहक प्रतीत होते हैं।
09:37कार्तिकेय ने देखा कि कैसे समय के प्रत्येक चक्र के साथ देवताओं की शक्ती का स्वरूप भी बदलता गया, परंतु
09:44उद्देश सदैव धर्म की स्थापना रहा।
09:48स्रिष्टी के उन पुराने अध्यायों की गूंज अब कार्तिकेय के कानों में पड़ रही थी, जो विनाश के वर्तमान संकट
09:55का समाधान दे रही थी।
09:58वे अब उस बिंदु पर थे, जहां से अतीत का संपूर्ण ज्यान एक बिंदु में सिमट चुका था, और कार्तिकेय
10:05ने उस बिंदु को स्पर्श किया।
10:08देवता गण, जिन में इंद्र का विशालकाय इंद्रप्रस्थ स्वरूक शामिल है, उस समय के केंद्र के चारों और एकत्रित थे,
10:16उनका शरीर स्वर्ण आभूशनों से ढखा और तेज से प्रदीप्त है।
10:22स्पर्श करते ही ज्यान की नदिया कार्तिकेय की चेतना में प्रवाहित हो गई, जिसमें स्रिष्टी के आरंभ से लेकर भविश्य
10:30के अंत तक का सारा विवर्ण था।
10:52सीमाओं को अपने स्वार्थ के लिए रौंदा था।
10:56भगवान विश्णु ने अपनी योग निद्रा के आभास से उस रौरव छेत्र के अंधकार को चीरते हुए कार्तिकेय को चेताबनीदी
11:04की धर्म का विस्मरण ही पतन का मुख्यद्वार है।
11:08कार्तिकेय ने अपने दैविय त्रिनेत्र से देखा कि एक प्राचीन समराट का अहंकार किस प्रकार कालचकर के पहियों को उल्टा
11:16घुमा कर पूरी प्रजा को अधर्म की अगनी में धकेल रहा था।
11:21रौरव के उस भयानक कारागार में लोहे की कीलों पर अनकित वे शापित लिपिया कार्तिकेय के हृदय में उस आदिम
11:29भूल का चितरन कर रही थी जिसने सत्युग की शांती को खंडित किया था।
11:35विशालकाई शिलाखंडों के बीच दबे उन प्राणियों का क्रंदन सुनकर कार्तिकेय ने अनुभव किया कि कैसे एक क्षण के लोग
11:42ने युगों की तपस्या को भस्म कर दिया।
11:46देवसे नापती के रूप में कार्तिकेय ने देखा कि वे आत्माए स्वयं को ही अपनी वास्नाओं के शूलों से घायल
11:53कर रही थी जिसका कारण उनका विस्मृत सत्य था।
11:58उन्होंने उस इतिहास को पुना घटित होते देखा जहां एक शक्तिशाली राजा ने देवताओं की अभेलना कर स्वयं को ही
12:05ब्रहमांड का नियामक मान लिया था।
12:09अंधकार की उस गहरी परतों में एक अद्रिश शून्यता ने कार्तिकेय के कानों में उस राजा के अंतिन सत्य को
12:16फुस्फुसाया की विनाश बाहर से नहीं, भीतर से प्रारंभ होता है।
12:22कार्तिकेय ने उन शिलाओं को अपनी दिव्य शक्ती से हिलाया और उस कालखंड की आत्माओं को मुक्ती का मार्ग दिखाया
12:29जो लुगों से अंधकार में जकडी हुई थी।
12:33भगवान शिव की गुंजती हुई गर्जना के साथ, रौरव के उन लोहे के खंभों ने अपना स्थान बदला और कार्तिकेय
12:41की द्रिष्टी के सामने एक नया सत्यद्वार प्रकट हुआ।
12:45नया द्वार उन्हें सुकर्मुख के उनक्षेत्रों की ओर ले गया, जहां कठोर दंड केवल शारिरिक नहीं, बलकि आत्मिक शुद्धी के
12:54माध्यम थे।
12:56सुकर्मुख में कार्तिकेय ने देखा कि कैसे अहंकार को कुचलने के लिए नेती ने स्वयं को बोध की अगनी में
13:03तपाया था, जो एक अनिवार्य बलिदान था।
13:07वहां के प्रहरी, जिनके मस्तक सुवर के समान थे, ने कार्तिकेय को जुखकर नमन किया, क्योंकि उन्होंने विनाश के महा
13:15इतिहास में उस दिव्य चेतना को पहचान लिया था।
13:19उस विस्मृत कालचक्र के रहसियों को सुलजाते हुए कार्तिकेय ने महसूस किया कि उनके भीतर का क्रोध अब शान्थ होकर
13:27न्याय की ज्वाला में परिवर्तित हो चुका है
13:31कार्तिकेय ने उस कालखंड के पतन के अंतिम कारणों को अपनी चेतना में धारण किया और उसे ब्रहमांड के रक्षा
13:39हेतु अपनी शक्तियों में विलीन कर लिया
13:42जैसे ही उन्होंने उन रहस्यों को आत्मसाथ किया, सुकर्मुख के काले पत्थर धीरे धीरे एक दिव्य चमक के साथ जीवन
13:50ठोकर मार्ग प्रशस्त करने लगे
13:53गरुड के पंकों की फड़फडाहट जैसी ध्वनी ने उस सन्नाटे को तोड़ा और कार्तिके को अयाहपान के उस महाक्षेत्र की
14:02ओर अग्रसर होने का संकेत दिया
14:05अयाहपान की दहकती हुई कांशय की कढ़ाईया कार्तिके के सामने थी जिन में कर्मों के परिणाम पिघल कर सत्यकारूप ले
14:13रहे थे
14:15कार्तिके ने जान लिया था कि अब किसी भी भूल को दोहराने का अर्थ संपून स्रिष्टी का अन्थोगा जिसे रोकने
14:22का भार अब उनहीं के कंधो पर था
14:26महायतिहास की उन विस्मृत कडियों को जोडते हुए उन्होंने पाताल के उस गहरे गर्भ में एक नया संकल्प लिया जो
14:33भविश्य के कालचकर को धर्म के पथ पर मोरने वाला था
14:38कार्तिके ने जैसे ही उस प्राचीन पाशान शिला को स्पर्श किया पाताल की निरवता एक तीवर प्रतिध्वनी में बदल गई
14:46और भूमी डग्मगाने लगी
14:48स्वया भगवान विश्णु शेशनाग की शया से उठकर इस आकस्मिक हलचल को देख विस्मित हो उठे क्योंकि कालचकर की गती
14:57में यह विचलन अभूत पूर्व था
15:00कार्तिके के चारों और की दीवारों से धूल जड़ने लगी और वे काल के उन विस्मृत पन्नों को देखने लगे
15:07जो सदियों से इस अंधकार में दबे थे
15:10पूरा पाताल लोग एक ऐसे महाकंपन से गूंज उठा मानो स्वयं पृत्वी का गर्भ अपनी सुरक्षा की प्राचीन मर्यादाओं को
15:19खो रहा हो
15:20इस भूचाल के बीच कार्तिकेय ने देखा कि अतीत की घटनाएं वर्तमान की भित्तियों पर एक जीवंत छायाचित्र की तरह
15:29उभर रही थी
15:31महान देव महादेव कैलाश के सर्वोच शिखर पर ध्यानस्थ रहते हुए भी इस हलचल की तीवरता को महसूस कर अपनी
15:39आखें खोलने को विवश हुए
15:42कार्तिकेय ने अपने संकल्प की अगने को तीवर किया और उस डगमगाती धर्ती को थामने के लिए अपनी दिव्य उर्जा
15:50का आहवान किया
15:52समय और स्थान के वे पुराने बंधन जो पाताल को धरातल से जोडते थे अब एक दूसरे से टकरा कर
15:59भंग होने लगे थे
16:01इन्ही दरारों के भीतर से कार्तिकेय को उन धर्म विमुक शासकों के अवशेश दिखे जिन्होंने काल की गती को कुचलने
16:09का दुस्साहस किया था
16:12भगवान विश्णु ने अपनी योगमाया के माध्यम से कार्तिकेय को संकेत दिया कि वे इस कालचकर के बिगड़ते संतुलन को
16:20केवल सन्यम से ही थाम सकते हैं
16:24कार्थिके ने अपना ध्यान पाताल के केंद्र में केंद्रित किया और अपनी चेतना को उस महा इतिहास के प्रवाह में
16:31विलीन कर दिया
16:33अंधकार के उस गहरे गर्त में काल के तूटे हुए टुकडे काज की तरहे चमकने लगे और कार्थिके को स्रिष्टी
16:41का आदियंत दिखने लगा
16:43कैलाश पर बैठे महादेव ने एक गहरी सांस ली जिससे पूरा ब्रह्मान उस कमपन को रोकने के लिए स्थिर हो
16:50गया
16:52कार्थिके के भीतर का दिव्य अगनिपुंज अब और अधिक प्रजवलित हो उठा था ताकि वे पाताल के उस विस्मृत इतिहास
17:00को व्यवस्थित कर सकें
17:02तभी पाताल की उन प्राचीन शिलाओं से एक दिव्य संगीत की गूंज उठी जो काल के बिगड़े हुए ताल को
17:09पुनह लए में लाने लगी
17:12यह संगीत स्वय धर्म के रक्षकों का था जिन्होंने सदियों पहले इस पाताल में संतुलन की स्थापना की थी
17:21कार्तिकेय ने महसूस किया कि अतीत की कडिया जुड रही थी और विनाश का वह महायतिहास अब धीरे धीरे अपनी
17:28सही दिशा में लोट रहा था
17:31भगवान विश्णु ने मुस्कुराते हुए अपनी आखे मूंदली यह जानकर की कार्तिकेय ने काल के सबसे कठिन परीच्षन को पार
17:40कर लिया है
17:42पाताल की डग्मगाती धर्ती अब पूर्न तह स्थेर हो चुकी थी लेकिन उस महायतिहास का सत्यकार्तिकेय के रोमरोम में अंकित
17:50हो गया था
17:52एक नए भविष्य की नीम्व पाताल के उस अंधकार में पढ़ चुकी थी जहां धर्म का एक नया चक्र अपनी
17:59यात्रा के लिए तयार था
18:02पाताल के उस गहन अंधकार में रक्षक की वानी गुंजी जो कार्तिकेय को चेतावनी दे रही थी कि अब उसका
18:10भाग्य बीते हुए विनाशकारी कालचक्र से अटूट रूप से जुर चुका है
18:15दिव्य रक्षक जिसकी देह तप्तामरसी चमक रही थी और नेत्रों में युगों का संताप था कार्तिकेय के सम्मुख आकर धर्म
18:24की उस जटिल उल्जन को समझाने लगा
18:28कार्तिकेय ने अपने सम्मुख उस विशाल कालियंत्र को हिलते हुए देखा
18:32जिसके दाते पाताल की भूगर भी उर्जा को सोख रहे थे और एक अद्रिश्य बंधन का निर्मान कर रहे थे
18:40अंधकार से घिरे हुए उस स्तंभ पर एक दिव्य चिन्ह उभरने लगा
18:45जो यह दर्शाता था कि कार्तिकेय का भविश्य अब उस बीते हुए यूग के अवशेशों का संरक्षक बन चुका है
18:53रक्षक ने गंभीर स्वर में कहा कि अतीत की स्मृतिया केवल देखने के लिए नहीं होती
18:59बलकि उन्हें अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाना एक कठिन कर्तव्य है
19:05भगवान विश्नु अपनी योग निद्रा में भी उस परिवर्तन को महसूस कर रहे थे
19:10और उनके होठोन पर एक ऐसी मुस्कान थी जो स्रिजन और विनाश के संतुलन को दर्शाती थी
19:18कार्ति के एक एहरिदय में एक तीवर हल चल हुई
19:21मानो पाताल की वहस्तिर धर्ती उनके स्वयन के संकल्प के साथ स्पंदित हो रही हो
19:27हवा में एक अजीब सी गूंच थी
19:30जैसे पाताल की बेडिया अब किसी नए स्वामी की पच्चाप को पहचान रही हो
19:36रक्षक ने अपनी दाहिनी भुजा उपर उठाई जिससे उस पाताल लोग का अंधकार क्षन भर के लिए दिव्य प्रकाश में
19:44परिवर्तित हो गया
19:46भगवान शिव कैलाश की उचाईयों पर शांत थे किन्तु उनके त्रिनेत्र का एक हलका सा फड़कना कार्तिके के उस कठिन
19:54निर्णय का मौन समर्थन था
19:57कार्तिके की द्रिष्टी उस कालचकर के छिदरों के पार गई जहां उन्हें भविष्य की धुन्धली पर शाया एक चेताबनी की
20:05भाती दिखाई दी
20:07पाताल की डरावनी गूंज एक संगीत में बदल गई जैसे कोई प्राचीन मंत्र युगों के मौन को चीरते हुए बाहर
20:15आ रहा हो
20:17रक्षक की आकरिती अब और भी अधिक विशाल हो गई थी जैसे वह पाताल के अस्तित्व का ही एक अंश
20:24बन गया हो
20:26कार्तिके के हाथों में उर्जा का एक छोटा सा गोला प्रकट हुआ जो पाताल की उस पुरानी स्मृती को धारन
20:33करने की शक्ती दे रहा था
20:36रक्षक ने चेतावनी को दोहराते हुए कहा कि जिस किसी ने भी इस कालचकर के सत्य को छू लिया वह
20:43अब इस लोग की नेती का भागिदार है
20:47उस पाताल के भीतर अचानक ही एक धड़कन सुनाई दी जो किसी प्राचीन प्रानी के पुनृत्थान का संकेत दे रही
20:55थी
20:56कार्तिके ने धैर्य पूर्वक उस चेतावनी को स्विकार किया क्योंकि वे जानते थे कि धर्म की रक्षा के लिए किसी
21:04भी सीमा को पार करना अनिवार्य है
21:08दूर कहीं देवताओं की सभा में एक भारी सन्नाटा चा गया था, क्योंकि उन्हें आभास हो गया था कि पाताल
21:15में एक बड़ा परिवर्तन हो रहा है
21:19कार्तिके का तेज अब पाताल की उस गहरी पर्तों के साथ मिलकर एक नए युग का सूत्रपात करने के लिए
21:26ततपर था
21:28अंतिन चेतावनी समाप्थ हुई और कार्तिके ने अपने पच्चेहन पाताल की उस कालजई भूमी पर अनकित कर दिये जो अब
21:36उनके मार्गदर्शन की प्रतीक्षा कर रही थी
21:40कार्तिके के समक्ष पाताल का यह लोक अयपान कुंड के रूप में प्रकट हुआ जहां तप्त कांस्य के पात्रों से
21:47निकलती स्वर्णिम अगनी उनके संकल्प को चुनौती देने लगी
21:52विष्णू लोक के स्वर्ण सिनहासन पर विराजमान भगवान विष्णू ने अपनी कमल नैनों से उस हलचल को देखा उनके मुख
22:00पर एक गंभीर चिन्ता की रेखा उभराई
22:04कार्तिके ने अपने त्रिशूल को भूमी पर टिकाया जिससे उत्पन्न कमपन ने उस अगनी कुंड के भीतर छिपे रहसियों को
22:12बाहर खींच लिया
22:14वातावर्ण में कालचकर का एक अद्रिश्य पहिया घूमने लगा जिससे भविष्य की भयावः छायाएं एक धुंधली चित्रमाला की तरहे दीवारों
22:23पर तैरने लगी
22:25कार्तिके को आभास हुआ कि इस ज्ञान का भार उठाने के लिए उन्हें अपनी दिव्य उर्जा का एक अंश इसी
22:32पाताल की शुनि में विसर्जित करना होगा
22:36कैलाश परवतपर भगवान शिव ने अपनी समाधी भंग की उनकी तीसरी आख से निकी एक किरण ने पाताल के अंधकार
22:44को भेद कर कार्तिके को दिशा दिखाई
22:47जैसे ही कार्तिके ने उस कालग्यान को स्पर्श किया उनकी दैविय कांती मंद पढ़ने लगी और उनके दिव्य कवच पर
22:55धूसर रन की धूल जम गई
22:58पाताल की गूंज में एक चेतावनी उभर कर आई की जिसे बचाया जा रहा है वह स्वया विनाश के बीज
23:05बो सकता है
23:08कार्तिके के हृदय में द्वंदव छिड़ गया क्या वे अपने अस्तित्व को समर्पित कर उस अनिश्चित भविश्य को सुरक्षित करना
23:15चाहते थे
23:17गरुर देव ने बादलों के उपर से उस पाताल अद्वार की ओर निहारा उनकी विशाल पंखों की फड़फडाहट से पाताल
23:25के वातावर्ण में हलचल मच गई
23:28कार्तिकेय ने एक गहरे श्वास के साथ अपनी उर्जा का संचय किया जिससे उनके चारों और एक स्वर्णिम सुरक्षा घेरा
23:36निर्मित हो गया
23:38समय का महा इतिहास दीवार पर जीवित हो उठा जिसमें देवताओं के पतन और दानवों के उदे का एक अन्थीन
23:46चक्र दिखाई दिया
23:48यह विस्मृत काल चक्रकार्तिकेय को बता रहा था कि नेती का मार्ग कांटों और फूलों के समान एक साथ चलता
23:55है
23:57नारद मुनि जो कहीं दूर अंतरिक्ष में भ्रमण कर रहे थे अपनी वीना के तारों में उस पाताल के भारी
24:04कमपन को महसूस कर स्थब्ध रह गए
24:07कार्तिकेय ने अपनी भुजाओं को फैलाया और काल्चक्र के उस ज्ञान को अपने भीतर समाहित करने का सासी निर्णय लिया
24:16समूचे पाताल लोक में एक जोरदार गर्जना हुई जैसे प्रकृती स्वयं इस महान त्याक के विरुद्ध अपनी आवास उठा रही
24:25हो
24:26कार्तिकेय का तेज अब ख्षीन होने लगा लेकिन उनकी आखों में भविश्य को देखने की स्पष्टता और अधिक प्रखर हो
24:34गई
24:35शिव के अंश के रूप में कार्तिकेय ने यह समझ लिया था कि निर्मान के लिए विनाश को गले लगाना
24:42ही एक देवता का परमधर्म है
24:46कालचकर का वह पूरा इतिहास अब कार्तिकेय के मस्तिष्क के एक सुक्ष्म बिंदू में सिमट चुका था जिसे वे धरातल
24:54तक ले जाने के लिए तयार थे
24:57पाताल का विस्मृत कालचकर अब शान्थ हो गया था और कार्तिकेय ने एक अंतिम बार उस भयानक लोग की ओर
25:04देखा जहां उन्होंने अपने भविश्य की नीव रखी थी
25:09कार्तिकेय ने अपने भीतर की दिव्य उर्जा का आहवान किया जिससे पाताल की अधोमुखी परते एक प्रकाशमान स्वन आभामंडल में
25:17बदलने लगी
25:20भगवान विश्णु ने अपनी योग निद्रा को त्याग कर कार्तिकेय के संधर्ष को अपनी दिव्य द्रिष्टी से निहारा और सनरक्षन
25:27का संकल्प लिया
25:29कार्तिकेय ने अपनी शक्ती के केंद्र को स्थिर करते हुए समस्त विस्मृत अभिलेखों को अपने सुक्ष्म शरीर में समाहित करना
25:37आरंभ किया
25:39अस्तित्व के इस सुक्ष्म बिंदु पर ब्रहमांडिय उर्जा एक स्वर्ण कमल की तरह खिल उठी जो पाताल के अंधकार को
25:47चीरने लगी
25:49अचानक पाताल की गहराई से एक भीशन गर्जना हुई और चारों और के शिलाखंड कामपने लगे जैसे कालचक्र का भार
25:57असहनिय हो गया हो
26:00शिव के अंश के रूप में कार्तिकेय ने अपनी हठ योग की अगनी को प्रजवलित किया ताकि वे इस डेटा
26:07की स्थिर्टा को बनाए रख सकें
26:10कार्तिकेय ने अपनी भुजाओं को फैला कर ब्रहमांडिय तरंगों को नियंत्रित किया जिससे पाताल के भीतर का वायुमंदल पूरी तरह
26:18बदल गया
26:19उस विस्मृत लोग के धरातल पर अब प्राचीन लिपिया स्वर्ण किर्णों के रूप में उभी जो इतिहास का सत्य कह
26:27रही थी
26:29पाताल का वह विस्मृत कालचकर अब एक विशालकाय यंत्र की भांती घूम रहा था जिसे केवल कार्तिकेय की शक्ती ही
26:37साथ सक्ती थी
26:39भगवान शिव ने हिमालय के कैलाश से उस कालचकर की गती को नियंत्रित किया जिससे कार्तिकेय को असीम बल प्राप्थ
26:47हुआ
26:48कार्तिकेय ने अपने भीतर सिंटे उस महायतिहास को धरातल की और भेजने के लिए एक सुक्ष्म छेद बनाया जिससे उर्जा
26:57का प्रवाह निरंतर हो गया
26:59पाताल की घुटन भरी हवा धीरे-धीरे निर्मल होने लगी और चारों और दैविय सुगंध का संचार होने लगा
27:08कार्तिकेय का मस्तिश्क अब उस संपूर्ण कालचकर का एक मात्र केंद्र था जहां सृष्टी का प्रतेक्षन सुरक्षित था
27:17गरुर ने उपर से उस प्रकाश को देखा और समझ गया कि पाताल का वह रहस्य अब सुरक्षित हाथों में
27:24है
27:26अचानक कालचकर के भीतर से एक प्राचीन मंत्र की ध्वनी गूंज उठी जिसने पाताल की सभी परतों को एक साथ
27:33मिला दिया
27:35शुन्य और काल का वह मिलन कार्तिके के धैर्य की अगनी परीच्षा थी जिसे उन्होंने अपनी शान्ती से जीत लिया
27:43था
27:44अत्तर विनाश का महा इतिहास स्थिर हो गया और कार्तिके ने अपनी आखे खोली जिनसे दिव्य प्रकाश का पुंज निकला
27:54देवताओं की सभा में शान्ती की लहर दोड़ गई क्योंकि स्रिष्टी का विस्मृत काल अब फिर से जागरित हो चुका
28:00था
28:02कार्तिके ने उस पाताल लोग को प्रणाम किया जिसने उन्हें भविश्य की द्रिष्टी और निर्मान की शक्ती प्रदान की थी
28:10अब समय आ गया था कि पाताल की यह उर्जा धरातल तक पहुँचे और स्रिष्टी के नवनिर्मान का मार्ग प्रशस्त
28:18करे
28:20कार्तिके ने देखा कि पाताल की गहराईयों में सुरक्षित प्राचीन पांडुलिपिया काल के थपेडों से जरजर हो चुकी थी
28:27जो स्रिष्टी के विनाश का भयावह सत्य बया कर रही थी
28:32भगवान विश्णु का दिव्य स्वरूप उस कक्ष में प्रकट हुआ
28:36जिनका शांत मुखमंडल स्रिष्टी के संतुलन की जटिलता को प्रतिध्वनित कर रहा था
28:42कार्तिके ने उन लिपियों पर हाथ रखा
28:45जहां ब्रहमांड के पतन के अंतिम संकेट अंकित थे
28:48जिन्हें पढ़ते ही उनका मस्तक भविश्य की चिन्ताओं से भर गया
28:54पाताल की उन दीवारों पर उभी आकृतिया मानों समय के उस चक्र को स्थिर करने का प्रयास कर रही थी
29:00जिसे केवल इश्वर ही नियंत्रित कर सकते थे
29:05भगवान विश्णु ने धीर स्वर में चेतावनी दी की कुछ सत्य इतने शक्तिशाली है
29:10कि उन्हें जानने मात्र से वर्तमान युग का संतुलन डगमगा सकता है
29:16कार्तिके ने अपनी दिव्यद रिष्टी से देखा कि उन ज्यानपुंजों के बीच छिपी विनाशकारी विधाय यदी मनुष्य के हाथ लग
29:24गई
29:24तो पूरी मानवता राख में परिवर्तित हो जाएगी
29:28उन्होंने उन प्राचीन ग्रंथों को स्वन की पेटिका में संजोना प्रारंभ किया
29:34ताकि मानवता के अज्यान को विनाश की अगनी से बचाया जा सके
29:39अंधकार में डूबी वह गुफा मानो कार्तिके के इस त्याग की गवाह बन गई
29:44जहां उन्होंने स्वयन के ज्यान को सीमित कर स्रिष्टी को बचाने का संकल्प लिया
29:50विश्णु ने कहा कि हे सकंद तुम्हारा यह निर्णय इतिहास का सबसे बड़ा बलिदान है
29:56क्योंकि तुम सत्य के ग्याता होकर भी मौन रहने का साहस कर रहे हो
30:02कार्तिके ने उत्तर दिया कि यदि इस ज्यान को छुपाने से आने वाली पीडिया सुरक्षित रह सकती है
30:08तो यह विस्मृती ही उनका सबसे बड़ा रक्षक है
30:13अचानक उस पाताल लोग के संरक्षक जो विशालकाय सुर के मुखवाले थे
30:18वहां उपस्थित हुए और उन पवित्र ग्रंथों को उज़ल करने का मार प्रशस्त किया
30:25वातावर्ण में एक रहस्यमें कमपन उत्पन हुआ
30:28जिससे वह स्वर्ण पेटि का धीरे-धीरे भूमी के गर्भ में समाने लगी
30:32जिसे कोई साधारन जीव कभी नहीं ढूंड पाएगा
30:37सृष्टी का वह विस्मृत इतिहास अब फिर से पाताल की परतों में दफन हो चुका था
30:42जिसे केवल नेती के जागने पर ही पुनह प्रकट होना था
30:47भगवान विश्णू ने कार्तिकेय के मस्तक पर अपना हाथ रखा
30:51और उनके ओज से गुफा का अंधकार दूर हो गया
30:55मानो सत्य का प्रकाश वापस लौट आया हो
30:59कार्तिकेय ने अपने नेत्र खोले
31:01और अब उनकी दृष्टी में भविश्य का भय नहीं
31:04बलकि वर्तमान के निर्मान का द्रिड संकल्प था
31:09पाताल की वह उर्जा अब शांत हो चुकी थी
31:12क्योंकि उसने एक ऐसे रक्षक को देख लिया था
31:15जो अपनी शक्ती के लिए नहीं अपितु सन्यम के लिए जाना जाएगा
31:21देवताओं के दूट के रूप में उन्होंने उस पाताल लोग को अलविदा कहा
31:25ताकि वे धरातल पर जाकर मानवता के नवनिर्मान का कार्य आरंभ कर सके
31:31उनके पीछे वह पाताल लोग पुनह रहस्य की धुंध में ओजल हो गया
31:36जिससे यह संदेश मिला की सत्य सदैफ प्रकट होने की प्रतीक्षा नहीं करता
31:43कार्तिके की इस यात्रा ने उन्हें सिखाया कि शक्ती केवल विनाश करने में नहीं
31:48बलकि उचित समय पर मौन धारन करने और सत्य को सुरक्षित रखने में भी है
31:55स्रिष्टी के नवनिर्मान के लिए कार्तिके इने पाताल की गहराईयों से विदाली
32:07कार्तिके इने अपने मयूर वाहन को संबोधित करते हुए कहा कि हमें अब इस मायावी घेरे से बाहर निकलना ही
32:28होगा
32:30मयूर के पंखों की फड़फडाहट से उत्पन हुई दिव्यवायू ने पाताल के उनकाले पत्थरों को चीर दिया जो द्वार बंद
32:37करने के लिए खिसक रहे थे
32:40पाताल की गहरायों में दफन वह प्राचीन सत्य जिसे कार्तिकेय ने अपने हस्तक्मल में धारन किया था अब प्रकाश की
32:48एक किरन बनकर चमकने लगा
32:52सहसा आकाश की ओर जाने वाला मार्ग क्रिम भोजन के विशैले दलदल से घिर गया जहां से उठती हुई गैसों
32:59ने वातावर्ण को हरे रंग की विभीशिका में बदल दिया
33:04कार्तिकेय ने अपने त्रिशूल की नोक से उस विशैली धुन्ध को छिन्न भिन्न कर दिया जिससे उनके मार्ग में एक
33:11शनिक प्रकाश पुंज उत्पन हो गया
33:14त्रिशूल से निकली उस दिव्यत अरंग ने दलदल में छिपे हुए उन सुक्ष्म जीवों को शांट कर दिया जो विनाश
33:21का महा इतिहास छिपाए हुए थे
33:24धुन्ध के पीछे से कार्तिकेय ने देखा कि कालचक्र की गती थमने के कारण समय के अनुजड होकर बिखर रहे
33:31थे
33:33अचानक अयपाना के भयंकर भट्टियों से पिघला हुआ कांस्य बरसने लगा जिससे मार्ग को सुरक्षित रखना कार्तिकेय के लिए एक
33:41कठिन परीक्षा बन गई
33:44भगवान शिव ने कैलाश की उचाईयों से अपनी दिव्यद्रिष्टी से अपने पुत्र की सहायता हेतु उर्जा का एक शीतल प्रवाह
33:52नीचे पाताल की ओर भेजा
33:54उस शीतल उर्जा के स्पर्ष मात्र से पिघला हुआ कांस्य पत्थर में बदल गया जिससे कार्तिकेय का धरातल की ओर
34:02बढ़ने का मार्ग प्रशस्थ हुआ
34:05अगनी और पाशान के उस भीशन मिलन ने एक ऐसी गूँच पैदा की जिसने पूरे पाताल लोग की आधारशिला को
34:13हिला कर रख दिया
34:15कार्तिकेय ने अपने मयूर को संकेत दिया और एक ही जपट्टे में वे उपर की ओर उठने लगे जैसे पतन
34:23बादलों को चीरती है
34:25गरुर देव की उपस्थिती का अहसास कार्तिकेय को हुआ जिन्होंने अद्रिश रहकर उस उर्ध्वगामी यात्रा में वायू का वेग प्रदान
34:34किया
34:35उपर की ओर बढ़ते हुए उन्होंने देखा कि पाताल की दीवारों पर लिखे प्राचीन शिलालेक स्वयं ही मिट रहे थे
34:44यह विस्मृत इतिहास अब केवल उनकी चेतना में सुरक्षित था जो आने वाली पीढियों के लिए एक नया अध्याय लिखने
34:52वाला था
34:54पाताल की अंतिन देहलीज पार करते ही उन्होंने स्वयं को एक शांत धरातल के द्वार पर खड़ा पाया
35:02भगवान कार्तिकेय ने पीछे मुड़ कर देखा जहां वह काला प्रवेशदवार अब पूरी तरह से लुप्ध हो चुका था
35:10अब उनके हाथ में केवल वह सत्य का अंश था जो मानवता के भविश्य के लिए नई दिशाधारा साबित होने
35:18वाला था
35:20धरातल पर पद रखते ही कार्तिकेय ने महसूस किया कि कालचक्र अब रुक नहीं रहा बलकि एक नए युग का
35:27आरंभ कर रहा था