00:00विंध्याचल पर्वत श्रिंखला की प्राचीन चट्टाने आदिन गूंच के असहनिय दबाव से लगातार और तेजी से चटकने लगी हैं।
00:09हवा में तैरते हुए भगवान कार्ति के अपनी दिव्यद्रिष्टी से इस आसन, विभीशिका और चट्टानों के तूटने के क्रम को
00:17देख रहे हैं।
00:19भयानक गडगड़ाहट के साथ भारी ग्रेनाइट की चट्टाने तूटकर सीधे उस विशाल गुफा की ओर नीचे गिरने लगी हैं।
00:29यह भयानकर ग्रिश ब्रहमांड के संतुलन के उस नाजुक्षन को दर्शाता है, जहां हर एक सेकंड जीवन और मृत्यु का
00:37निर्नय कर रहा है।
00:40विंध्य पर्वत के गर्भगरेह में गूंजती हुई यह ध्वनी संपून ब्रहमांडिय स्तंभ को अपनी नीम से हिलाने का दुस्साहस कर
00:48रही है।
00:49कार्ति के अपने पराक्रमी चर्णों को स्थिर करते हुए इस बहती हुई उर्जा के केंद्र की ओर तेजी से आगे
00:57बढ़ते हैं।
00:59उनके स्वर्ण आभूशनों की चमक से इस अताह अंधेरे और खतरनाक विंधे गुफा का कोना-कोना जग्मगा उठता है।
01:09चट्टानों के तूटने से उत्पन हुआ भारी मलबा अब एक भयानक आंधी की तरह सुरंगों में फैल रहा है।
01:17धर्ती की धुरी पर मंदरा रहे इस महा संकट को थामने के लिए अब केवल एक ही दिव्य हस्तक्षेप शेश
01:24बचा है।
01:26सकंद अपनी अमोग शक्ती का आहवान करते हुए हवा में उठते हैं और अपने हाथों को फैलाते हैं।
01:34उनके हाथों से फूटने वाली दिव्य उर्जा की किरने सीधे चटकती हुई चट्टानों के बीच समा जाती है।
01:43यह प्रकाश का वह स्तंभ है जो अंधेरे और विनाश की ताक्तों को अपनी हद में रहने की चुनौती दे
01:50रहा है।
01:52नीचे गहरी खायों में बैठी पाताल की शक्तियां इस अचानक प्रतिरोज से बौकला कर और अधिक शोर मचाने लगती हैं।
02:01कार्तिके अपने पाव को चट्टान पर मजबूती से टिकाते हैं और ब्रह्मांड के हिलते हुए स्तंभ को अपने हाथों से
02:09थाम लेते हैं।
02:11उनके शरीर की मास पेशियों में भरा हुआ अपार दिव्यबल उस विशाल भार को अपने उपर सहन कर रहा है।
02:20यह सहन शक्ती का वह चरम है जहां देवताओं का पराक्रम ही प्रित्वी की स्थिर्टा की एक मात्र ढाल बन
02:27जाता है।
02:30विंध्याचल के पत्थरों से टकरा कर गूंजने वाली वह आदिन गूंज अब कार्तिके के संकल्प के सामने मंद पढ़ने लगी
02:37है।
02:39कार्तिके की द्रेड इच्छा शक्ती ने उस भयंकर कमपन को रोक कर गुफा के गिरने के खत्रे को टाल दिया
02:45है।
02:47गिरते हुए पत्थरों की वह भयानक बारिश अब थम चुकी है और चारों तरफ एक शांत लेकिन तनाफपूर्ण माहौल छा
02:55गया है।
02:57तथा पी यह तो केवल शुरुवात थी क्योंकी प्रिथ्वी की धूरी के भीतर छिपे असली रहस्य का परदाफाश होना अभी
03:04बाकी है।
03:06विप गया है ।
03:09थदे मिजना लुमिन तस्छाँ पर दिपास है विए
03:16विग शुए खाँँरुई बाल्यरह है।
03:17थर दे मिजना लुमिना उुमिना अथिए-ॉद
03:30इनिपकत फिए ए्रणिशatin इन्य Subscribe- I
03:36शॉन js espaço मुजसाइ टुज्भाँ टॉ टॉटस से टुझे कर्णिब कमुजु कू बमुजस्द सेुन
03:55गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक
04:15गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्मिक गुस्म
04:24दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब
04:35दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब दूब �
04:49दीपेस्ट फिशर इमर्जिस दे कॉज्मिक गार्डियन अल्यूमिनस.
04:53इंशेंट एंटिटी बाउंड तु दी अर्थ's आक्सिस बाई डिवाइन डिक्री सिंस्द।
05:00कार्थिकेय ने अपनी दिव्यचेतना को उस महा सनरक्षक की प्राचीन उर्जा के साथ जोर दिया।
05:07इस मानसिक समवाद में तारकासुर के काले जादू के वे अवशेश स्पष्ट रूप से प्रकट होने लगे जो प्रित्वी की
05:14गहराई में छिपे थे।
05:16प्राचीन रक्षक ने मौन भाशा में सकंद को बताया कि यह कमपन उसी अधर्म का एक गहरा और खतरनाक विश
05:24है।
05:26वह दुष्ट असुर सदियों पहले मारा गया था, परन्तु उसकी कालूर्जा आज भी इस अक्ष को भीतर से खोखला कर
05:33रही है।
05:35कार्तिके की आखें उस अधरिश्य विश की तह तक पहुँच गई और उन्होंने इस महा संकट की पूरी सच्चाई को
05:42भांप लिया।
05:44ब्रहमांड के इस रक्षक ने महसूस किया कि यदि इस काले प्रभाव को तुरंत शुद्ध नहीं किया गया, तो पूरी
05:52प्रिथवी का संतुलन बिखर जाएगा।
05:55दिव्य चेतना की तरंगों ने उस विशालकाय प्राचीन इकाई के भीतर दबे हुए सारे सत्यों को बाहर खींच लिया।
06:03यह समवाद शब्दों का नहीं, बलकि दो महान आत्माओं के बीच बहने वाली ब्रहमांडिय उर्जा का प्रत्यक्ष मिलन था।
06:12रक्षक ने सकंद को वह स्थान दिखाया, जहां तारकासुर के काले तंत्र ने इस धुरी को सबसे अधिक जखमी किया
06:19था।
06:21सकंद ने अपने अस्त्र की चमक से उस स्थान को रोशन किया, ताकि छिपे हुए अंधकार को पूरी तरह से
06:28देखा जा सके।
06:30हर एक सेकंड के साथ वह काला धुआ और अधिक आक्रामक होता जा रहा था, जैसे कोई जीवित नाक फुफकार
06:38रहा हो।
06:39लेकिन कार्तिके का अडिक धैर्य उस उग्र अंधकार के सामने एक अजय पर्वत की भांती अटल खड़ा था।
06:47प्राचीन रक्षक ने अपनी विशाल भुजाओं को उठा कर उस उर्जा को सकंद की ओर प्रवाहित करना शुरू कर दिया।
06:56दोनों की सम्मिलित शक्ती ने उस छेत्र के वायुमंडल को पूरी तरह से एक नए उच्च आयाम में बदल दिया।
07:03यह महास्फाई अब केवल एक उपचार नहीं बलकी ब्रहमांड के पुनरजन्म का एक अनिवार्य चरण बन चुकी थी।
07:13तारकासुर के काले जादू का हर एक कत्रा अब इस दिव्य अगनी में जलकर भस्म होने के कगार पर था।
07:20कार्तिकेय ने अपने मन में ब्रहमांड के कल्यान का संकल्प दोहराते हुए अपनी शक्ती को चरम सीमा पर पहुँचा दिया।
07:28उस गूंजती हुई गंतव्य ध्वनी के बीच प्राचीन रक्षक ने सकंद के प्रती अपनी पूर्ण निष्ठा और आभार प्रकट किया।
07:38प्रित्वी की धुरी अब उस गहरे और घातक संक्रमन से मुक्त होकर एक बार फिर स्थिर होने लगी थी।
07:45इस प्रकार समवाद की इस महापध्धती से कार्तिकेय ने ब्रहमांड के हिलते हुए स्तंभ को अपनी असीम शक्ती से थाम
07:54लिया।
07:55कंपन के शांत होते ही संपूर्ण ब्रहमांड में एक अध्भुत और दिव्य शांती छा गई।
08:02देवलोक में बैठे देवताओं ने राहत की सांस ली और सकंद की इस महान विजय की सराहना की।
08:10कार्तिकेय ने अपने हाथों की असीम उर्जा से धर्ती की आंतरिक पर्तों को फिर से कस दिया।
08:17इस चमतकारी क्षण में आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी और संपूर्ण दिशाएं प्रदीप्थो उठी।
08:25विंध्याचल की घाटियों में जो खलबली मची थी वह अब एक स्थिर और पवित्र सन्नाटे में बदल चुकी थी।
08:33भगवान विश्णू ने क्षीर सागर से इस संपूर्ण घटना का अवलोकन करते हुए सकंड की प्रशंसा की।
08:41सकंड ने अपने दिव्य अस्त्र को समेकते हुए धर्ती के उस कमपनकारी केंद्र को सील कर दिया।
08:48धर्ती की गहराई में दबी हुई प्राचीन उर्जा अब नियंत्रण में आकर एक शांत प्रवाह बन चुकी थी।
08:56समुचे ब्रहमांड में यह संदेश फैल गया कि धर्म और संतुलन के रक्षक अजय है।
09:03महर्शी नारद ने वीना बजाते हुए सकंद के इस पराक्रम का गुनगान तीनों लोकों में किया।
09:11कार्तिके ने उस विशाल स्तंभ के पास खड़े होकर प्राकृतिक संतुलन का पुनीख्षन किया।
09:17स्तंभ के चारों और लिप्टी हुई दिव्यरे खाएं चमक उठीन और सुरक्षा कवच मजबूत हो गया।
09:25प्रकृति ने भी अपनी इस संकट की घड़ी से उबरने पर कार्तिके के प्रती आभार व्यक्त किया।
09:32कैलाश परवत पर भगवान शिव ने अपनी आखें खोल कर इस संकट के टलने पर संतोष प्रकट किया।
09:40सकंद ने उस स्थान पर बैठ कर कुछ क्षणों तक ब्रहमांड ये उर्जा के प्रवाह को संतुलित किया।
09:47ब्रहमांड के सभी ग्रह और नक्षत्र अपनी अपनी कक्षाओं में सुचारू रूप से घूमने लगे।
09:54धर्ती की धुरी का यह महा संकट अब पूरी तरह टल चुका था और इतिहास में अमर हो गया।
10:02समस्ट गंधर्व और अपसराओं ने कार्ती के की इस महान उपलब्धी पर दिव्य संगीत की रचना की।
10:09कार्ती के ने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए एक बार फिर धर्म की सर्वोच्छता को स्थापित किया।
10:17इस प्रकार प्रिथ्वी के हिलते हुए स्तंभ को थाम कर सकंद पुराण के इस अध्भुत अध्याय का समापन हुआ।
10:25कार्ती के ने ब्रहमांड के संतुलन को बनाय रखने के लिए अपने दिव्य अस्त्र वेल का स्मरण किया।
10:32भगवान शिव और माता पार्वती की सन्युक्त उर्जा से वह स्वर्ण में भाला चमक उठा।
10:39वेल के प्रकट होते ही संपूर्ण गुफा में एक अलौकिक और तेज प्रकाश फैल गया।
10:45यह दिव्य अस्त्र आदी शक्ती और महादेव के प्रेम वशक्ती का जीवंत प्रतीक था।
10:52कार्टिके ने अपने दोनों हाथों से उस महातेजस्वी वेल को द्रिड़ता पूर्वक थाम लिया।
10:59उनके हाथों के स्पर्ष से ही अस्त्र की ज्वालाएं और अधिक तीवर हो उठी।
11:05उन्होंने उस अस्त्र को अंतरिक्ष की ओर लक्षित कर पूरी शक्ती से प्रवाहित किया।
11:12वेल से निकली उर्जा की लहरोंने धर्ती के हर कमपन को शांट करना आरंभ कर दिया।
11:29पर पुश्पवर्शा की। वेल के चारों और घूमते हुए प्रकाश के चक्र ने एक अभेद्य सुरक्षा कवच बना लिया।
11:37इस सुरक्षा घेरे के प्रभाव से परवत की दरारें तुरंट आपस में जुड़ने लगी।
12:07नत्मस्तक होकर इस महान शक्ती के आगे जुग गए।
12:11सकंद कुमार ने अपने अस्त्र को वापस समेटते हुए गहरी सांस ली।
12:17धर्म और न्याय की इस विजय से तीनों लोकों में हर्शोलास की लहर दोड़ गई।
12:23ब्रहमांड का यह स्तंभ अब युगो युगो तक सुरक्षित रहने का आशिरवाद पाचुका था।
12:29इस प्रकार कार्तिके ने अपने पराक्रम से प्रिथवी के अस्तित्व की रक्षा का यह एतिहासिक कार्य पूरा किया।
12:38कार्तिके ने अपने दिव्य दिव्यास्त्र वेल को पूरी शक्ती के साथ धर्ती के हिलते हुए भूगर्भ में उतार दिया।
12:46देवराज इंद्र और अन्य देवताओं ने इस महा अभियान की सफलता पर स्वर्ख से पुश पवर्शा की
12:54वेल के स्पर्ष मात्र से ही प्रित्वी की विचलित होती प्लेटे अपनी निश्चित धुरी पर स्थिर हो गई
13:01प्रकृती की इस महा व्यवस्था ने एक बार फिर ब्रहमांडिय संतुलन का अनुठा उदाहरन प्रस्तुत किया
13:09धर्ती के भीतर गूंजने वाली वह भयानक प्रतिध्वनी धीरे-धीरे एक शांत संगीत में परिवर्थित हो गई
13:17महर्शी नारद ने अपनी वीना के तारों पर विजय का पावन गान छेड़ कर इस महानक्षन का अभिनंदन किया
13:25कार्ती के इने अचल स्तंभ की भानती धर्ती को थाम कर यह सिद्ध कर दिया कि वे रक्षक है
13:33समस्थ दिशाओं में एक नया प्रकाश फैल गया जो आने वाले स्वन युग का प्रतीक था
13:40पाताल लोग के द्वार पर खड़े संरक्षक भी इस अध्भुत और शांत द्रिश को देखकर नत्मस्तक हो गए
13:48भगवान शिव ने कैलाश परवत से अपनी आखे खोल कर अपने पुत्र के इस पराक्रम को स्विकार किया
13:56माता पारवती के चहरे पर ममता और गर्व की एक अलौकिक मुस्कान खिल उठी
14:03ब्रहमांड के इस महास्तंभ की सुरक्षाने देव और दानव दोनों को एक नया संदेश दिया
14:10धर्ती की सांसे अब सामान्य हो चुकी थी और उसकी धड़कने फिर से लैबध हो गई
14:17रिशिमुनियों ने इस अभूत पूर्व संकट से मुक्ती पाने पर यग्य और अनुष्ठान शुरू कर दिये
14:24कार्ती के ने अपने दिव्य शस्त्र को थामे हुए उस थल की पवित्रता को और अधिक बढ़ा दिया
14:31यह एतिहासिक शन पुराणों के पन्नों में अमर हो गया, जो हर युग में प्रेणा देता रहेगा
14:38समस्त लोग के प्राणियों ने चैन की सांस ली और अपने अपने कर्तवियों की ओर लौट चले
14:46ब्रहमांड का संतुलन बनाये रखने वाले इस महानायक का यश चारों दिशाओं में गूझ गुठा
14:52इस प्रकार कार्तिके ने अपने असीन पराक्रम से प्रित्वी के अस्तित्व की रक्षा का यह कार्य पूरा किया
15:00समय का चक्रपुनह अपने निर्धारित मार्ग पर गतिमान हो गया और स्रिष्टी सुरक्षित हो गई
15:08विंध्याचल की कंदराओं में गूंजने वाला वह भयानक ब्रहमांडिय नाद अब धीरे-धीरे एक शांत और कोमल स्वर में बदलने
15:16लगा
15:17दिव्य और शांत वातावर्ण के बीच कार्तिकेय ने अपने चै मुखों पर एक स्निग्ध और संतुष्ट मुस्कान धारण कर ली
15:26उन्होंने अपनी असीम दैविय उर्जा को धीरे-धीरे समेट कर उस प्राचीन सनरक्षक के भीतर समाहित करना शुरू किया
15:35धर्ती की थिरक्ती हुई परते मानों किसी माता की ममतामई गोद में सोए शिशु की तरह स्थिर हो गई
15:43वह विशालकाय और प्राचीन जागरित उर्जा अब अपनी अनंत विश्राम की अवस्था में वापस लोटने लगी थी
15:51देवलोक से आकाश मार्ग में खड़े देवता इस अध्भुत शांती को देखकर विस्मय और श्रधा से भर गए
15:59परवत की गहरायों से उठने वाली वह उश्नता और कंपन पूरी तरह शांत होकर एक मधुर स्पंदन में बदल गई
16:08प्रकृती के कणकण में एक बार फिर से संतुलन का वह पावन संगीत गूंज उठा
16:15कार्तिके ने अपने शस्त्र को विश्राम देते हुए स्रिष्टी के इस अंचल को पूर्णत सुरक्षित घोशित किया
16:22समस्त दिशाओं में व्याप्थ हुआ वह तनाव अब एक मीठी और शीतल शांती में विलीन हो चुका था
16:30वह प्राचीन जीव अपनी युगो लंबी योग निद्रा में पुना प्रवेश कर चुका था जिससे ब्रहमांड भैमुक्त हो गया
16:39वायुमंडल में तैरती हुई धूल और पत्थरों के टुकडे धीरे-धीरे भूमी पर वापस शांत बैठ गए
16:46पृत्वी की धुरी ने एक बार फिर अपनी धुरी पर अत्यंत सहेच और अबाध गती से चलना आरंभ किया
16:54देवरिशी नारद ने अपनी वीना के तारों पर एक अत्यंत मधुर और कृतग्यता से भरा मंगलगान छेडा
17:02उस मंगलगान की स्वरलहरियों ने संपून ब्रहमांड में एक नए आनंद और उल्लास का संचार कर दिया
17:10ब्रहमांड की हर एक शक्ती ने कार्ति के एके इस अतुल्निय और धैर्यवान पराक्रम को नमन किया
17:18समय का महाचक्र अब बिना किसी बाधा के अपनी शाश्वत गती से आगे बढ़ने लगा था
17:25विंध्याचल की वाधिया एक बार फिर से अपनी प्राचीन सुन्दर्ता और निर्मल शांती में मगन हो गई
17:33सकंद के इस महान कार्य ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि सन्यम और शक्ती का मिलन ही सच्ची
17:40रक्षा है
17:41और इस प्रकार प्रित्वी की धुरी का यह महारहस्य सदा के लिए शांत और सुरक्षत हो गया
17:49कार्तिके रिइन्फोर्से इन्षें ज सील्स विंध्या श्राइन विध्दिया श्राइन जिलेजिए रें।ट गें
18:00Kartikei reinforces the ancient seals of the विंध्य श्राइन विंध्य श्राइन विंध्य श्राइन विंध्य विंध्य विंध्य श्राइन विंध्य विंध्य विंध्य
18:12विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विंध्य विं�
18:35जर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया
18:48शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षिया शर्षि
19:02कार्तिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके रिए्टिके
19:26रिए्
19:30seals of the Vindhya Shrine with celestial runes, ensuring that no dark remnants can ever breach
19:38the barrier again.
19:40Kartikei reinforces the ancient seals of the Vindhya Shrine with celestial runes, ensuring
19:47that no dark remnants can ever breach the barrier again.
19:52Kartikei ने अपने दिव्यचर्नों को Vindhya Chal के नूतन स्थिर शिखर पर
19:57रखकर ब्रह्मांडिय संतुलन का प्रत्यक्ष अनुभव किया.
20:01आकाश में तैरते हुए देवर्शी नारद ने इस महाविनाश से
20:05रक्षा पर परम संतोष व्यक्त किया.
20:09उनकी दृष्टी में ब्रह्मांड के अदृष्य धागे स्पष्ट रूप से
20:12दिखाई दे रहे थे, जो स्रिष्टी और सहार को बांधे रखते हैं.
20:18यह वह सुप्ष्मक्षन था जब स्रिजन की कोमलता और प्रलय की कठोरता एक ही तराजू में तौली जा रही थी.
20:27विंध्याचल की चट्टानों पर उकेरी गई प्राचीन दिव्यरिचाएं मूख रहकर इस शाश्वत सत्य का गान कर रही थी.
20:35सकंद ने महसूस किया कि शक्ती का उप्योग केवल नियंत्रण के लिए नहीं, बलकी रक्षा के लिए होना चाहिए.
20:43उनके हाथों का स्पर्ष पाते ही परवत की हर एक शिला में प्राणों का नया संचार होने लगा.
20:51यह स्तंभ केवल प्रिथवी का आधार नहीं, बलकी समस्त लोकों की चेतना का केंद्र बिंदु था.
20:58निचे बहने वाली नदियां शांत होकर इस महास्तंभ की परिक्रमा करती हुई प्रतीत हो रही थी.
21:05देवराज इंद्रने स्वर्ख से इस द्रिश्य को देख कर महासेनाप्ती के प्रती आधर भाव से अपने हाथ जोडे.
21:14कार्तिकेय ने अपने अस्त्रवेल को भूमी पर टिका कर ब्रहमांडिय उर्जा को वापस प्रित्वी में प्रवाहित किया.
21:22धर्ती की धुरी अब पूर्ण रूप से स्थिर हो चुकी थी, जिससे प्रलय का संकट टल गया था.
21:29पर्वतिय घाटियों में गूंजने वाली भैभीत करने वाली ध्वनिया अब एक शांत संगीत में बदल चुकी थी.
21:37ब्रहमा जी ने सत्यलोक से इस महान विजय पर पुष्प वर्षा करते हुए आशिरवात प्रदान किया.
21:45कार्तिके की सुवर्ण आभा ने संपूर्ण विंध्यक्षेत्र को एक नई दिव्य चेतना से उतप्रोत कर दिया.
21:53यहक्षन इस बात का प्रतीक था कि धर्म और कर्तव्य ही इस ब्रहमांड के वास्तविक रक्षक हैं.
22:00महान पर्वत माला की श्रिंख लाएं अब गर्व से अपने स्थान पर अडिग और सुरक्षित खड़ी थी.
22:08समस्त गंधर्व और अपसराओं ने आकाश में निरित्य करते हुए सकंद के पराक्रम की गाथाएं गाईं.
22:16कार्तिके ने अपनी द्रिष्टी को क्षितिज की ओर फेरा, जहां अनंत भविष्य की संभावनाएं प्रतीक्षा कर रही थी.
22:24इस प्रकार ब्रहमांड की धुरी को बचा कर महासे नापती ने एक बार फिर धर्म की सर्वोच्च विजय सुनिश्चित की.
22:33विंध्याचल की शान्त घाटियों में अचानक एक अज्यात नदी के जल स्रोतों से कमपन की अनोखी ध्वनी गूझ उठी.
22:41दूरस्ट जल धाराओं से उठ रही इस रहस्यमई प्रतिध्वनी ने महासे नापती का ध्यान अपनी और आकर्षित कर लिया.
22:50कार्थिके ने अपने दिव्य मयूर रत को सुसज्जित किया और अज्यात जल स्रोतों की खोज में आगे बढ़ने का संकल्प
22:57लिया.
22:59यह यात्रा केवल एक दिशा परिवर्तन नहीं थी, बलकि ब्रहमांड के एक नए और अंचुए रहस्य का द्वार खुलने वाली
23:07थी.
23:08विंध्य परवत्मालाओं की प्राचीन चट्टानों को पीछे छोड़ते हुए दिव्य रतने कलकल करती नदियों के मार्ग को अपनाया.
23:17आकाश में तैरते हुए बादलों ने मार्ग को सुहाना बनाया और देवताओं ने इस महायात्रा पर पुष्प वर्षा की.
23:26नदियों की धाराएं मानो स्वयन्सकंद को उनके उद्गम स्थल तक का मार्ग दिखाने के लिए संगीत उत्पन कर रही थी.
23:34पवन के जोकों ने देव सेनाप्ती के केशों को सहलाया और उनके पराक्रम की गाथाओं को दिशाओं में प्रसारित किया.
23:43हर मील की दूरी के साथ भूमी के नीचे छिपी हुई उर्जा का कमपन और अधिक स्पष्ट और तीवर होने
23:50लगा.
23:52रिशियों और मुनियों ने अपने आश्रमों से इस दिव्यरत की यात्रा को देख कर मंगल कामनाएं अर्पित की.
24:00कार्तिके ने अपने नेत्रों को बंद कर उस सुक्ष्म उर्जा के स्रोत की दिशा को सटीक्ता से भाप लिया.
24:07यह पवित्र जलधाराएं किसी सामान्य भूभाग से नहीं, बलकि ब्रहमान के एक अत्यंत गोपनिय तल से जुड़ी थी.
24:16रथ के पहियों की गती अब और अधिक तीवर हो गई, जिससे मार्ग के पुष्प और पत्ते हवा में तैरने
24:23लगे.
24:24देवराज इंद्र ने स्वर्ग से इस यात्रा को निहारते हुए सकंद के अजे साहस की सराहना की.
24:32जल घाटियों के पास पहुँचते ही वायुमंडल में एक अजीब सी शितलता और दिव्य सुगंध का संचार हो गया.
24:40प्रकृती ने भी अपनी धड़कनों को महासे नापती के रथ की ताल के साथ मिला लिया, जिससे संपूर्ण वातावर्ण शान्त
24:48हो गया.
24:49नदियों के संगम स्थल पर पहुँचकर कार्ति के इने अपने रथ को रोक दिया और भूमी पर पग रखे.
24:57जल की हर बूंड मानो सकंद के स्वागत में स्तुती गान कर रही थी और वातावर्ण में दिव्य उर्जा का
25:04सामराज्य था.
25:06सामने प्रकट हुई विशाल और रहस्यमई जल राशी के भीतर से एक प्राचीन मंत्र की गूंच सुनाई दी.
25:13इसी रहस्यमई जल स्रोत के गर्भ में छिपे अगले महासंकट का सामना करने के लिए महासेनापती पूरी तरह तयार हो
25:21गए.
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