00:08ुदिष्ठिर ने महाप्रयान का कठिन मार्ग चुना।
00:23ुदिष्ठिर ने कहा द्रोपदी का प्रेम अर्जुन के प्रती थोड़ा अधिक था।
00:27यही उसका मोह था। आगे बढ़ते हुए एक एक करके सहदेव, नकुल और बलशाली अर्जुन भी धराशाई हो गए। जब
00:35अंत में सिर्फ युधिश्थिर और एक वफादार कुट्ता बचे तब हुआ असली चमत का। स्वर्ग के द्वार पर स्वयन देवराज
00:42इंद्र �
00:43अपने रत के साथ युधिश्थिर का स्वागत करने आए। इंद्र ने कहा हे युधिश्थिर, इस शरीर के साथ ही स्वर्ग
00:50में तुम्हारा स्वागत है। परंतु युधिश्थिर ने अपने वफादार कुट्ते के बिना स्वर्ग में प्रवेश करने से साफ इंकार कर
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